जब ब्रिगेडियर शेर जंग थापा ने ६ महीनों तक पाकिस्तान को एक ही जगह पर रोककर रखा था

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उगता भारत ब्यूरो

१९४७ के देश के विभाजन के बाद पाकिस्तान बड़ी संख्या में मुजाहिदों को प्रशिक्षण देकर भारत में हमला करने के लिए तैयार कर रहा था। प्रशिक्षण देने के बाद पाकिस्तान ने उन्हीं हथियारबंद मुजाहिदों को घुसपैठियों (कबाली) को लद्दाख पर कब्जा करने की नीयत से भेजा था, इन कबालियों के साथ पाकिस्तानी सेना भी शामिल थी। लेकिन पाकिस्तान अपने इस नापाक मंसूबे में कामयाब नहीं हो सका।
*ब्रिगेडियर शेर जंग थापा ने ११ फरवरी १९४८ से १४ अगस्त १९४८ तक लगभग ६ महीने ३ दिन तक पाकिस्तानी सेना को स्कार्दू में रोक रखा था! जिसके कारण पाकिस्तान लद्दाख में कब्जा जमाने में असफल रहा, और लद्दाख आज भारतीय क्षेत्र में है।
११ फरवरी १९४८ के दिन पाकिस्तान की ६०० सैनिकों वाली सेना ने स्कार्दू शहर पर हमला बोल दिया। उस समय कर्नल शेर जंग थापा स्कार्दू की रक्षा के लिए अपने ५० जवानों के साथ वहां पर तैनात थे। संयोग अच्छा था कि पाकिस्तान द्वारा हमला करने के एक दिन पहले १० जनवरी को कैप्टन प्रभात सिंह के नेतृत्व में ९० जवानों की टुकड़ी स्कार्दू पहुंच चुकी थी। पाकिस्तान द्वारा हमला करने के बाद शेर जंग थापा ने १३० जवानों के साथ ६ घंटे लंबी लड़ाई लड़कर पाकिस्तानी सैनिकों को पीछे जाने पर मजबूर कर दिया था।
स्कार्दू में तैनात भारतीय सेना को पाकिस्तान सैनिकों का मुकाबला करने के साथ ही वहां की मुस्लिम आबादी का भी मुकाबला करना पड़ रहा था, क्यों कि स्कार्दू की मुस्लिम आबादी पाकिस्तानी सैनिकों के साथ मिल गई थी, और उनका सहयोग कर रही थी।
पाकिस्तान द्वारा हमला किये अभी दो ही दिन हुए थे कि १३ फरवरी को कैप्टन अजीत सिंह के नेतृत्व में ७० सैनिकों की टोली और १५ फरवरी को भी लगभग इतने ही भारतीय सैनिकों की टोली स्कार्दू पहुंच गयी थी।
सैनिकों के पहुंचने से शेर जंग थापा को थोड़ी राहत तो जरूर मिली थी, लेकिन उन्हें यह भी ज्ञात था कि लड़ाई अभी लंबी है। इसीलिए वह श्रीनगर सैन्य छावनी से अतिरिक्त सेना भेजने का आग्रह किया। स्कार्दू की रक्षा के लिए चोटी प्वाइंट ८८५३ पर भारतीय सेना की तैनाती जरूरी थी , लेकिन कर्नल शेर जंग थापा के साथ मात्र २८५ सैनिक होने के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा था।
इसलिए कर्नल शेर जंग थापा ने चोटी प्वाइंट ८८५३ पर भारतीय सैनिकों की तैनाती के लिए श्रीनगर सैन्य छावनी से लगातार कई बार आग्रह किया। लेकिन किसी कारण यह संभव नहीं हो पाया था। जिसके बाद कर्नल शेर जंग ने स्कार्दू के स्थानीय गैर मुस्लिम युवकों को इकठ्ठा किया, जिससे आगे चौकियों तक राशन और अन्य सामान पहुंचाये जा सके।
कुछ दिनों के बाद पाकिस्तानी सैनिकों ने दोबारा हमला बोल दिया, और चोटी प्वाइंट ८८५३ पर अपना कब्जा कर लिया। कब्जे के बाद पाकिस्तान सैनिकों ने भारतीय सेना की चौकियों को निशाना बनाकर गोलाबारी शुरू कर दी थी। पाकिस्तान सैनिकों की संख्या लगातार बढ़ा रहा था, जिससे वह स्कार्दू छावनी की घेराबंदी कर सके। पूरे मार्च महीने भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सैनिकों का डटकर मुकाबला किया था और उन्हें आगे नहीं बढ़ने दिया था।
१६ फरवरी १९४८ को अपनी बटालियन के साथ निकले कर्नल पृथ्वीचंद भारी बर्फबारी के कारण १ मार्च १९४८ को कारगिल पहुंचे थे। जहां उनकी मुलाकात कर्नल शेर जंग थापा की बटालियन से हुई। वहां उन्हें जानकारी मिली कि पाकिस्तानी सेना ने स्कार्दू पर अपना कब्जा जमा लिया है, यह सूचना मिलने के बाद कर्नल पृथ्वीचंद बिना देर किये लेह आ गये। जहां पर उन्होंने स्थानीय नागरिकों से मुलाकात की और तिरंगा झंडा फहराया। उस समय उन्होंने लेह के स्थानीय नागरिकों को संबोधित करते हुये कहा था कि मुझे यहां लद्दाख की रक्षा के लिए भेजा गया है। उन्होंने स्थानीय नागरिकों से कहा था कि हम आपको प्रशिक्षण देंगे, जिससे लद्दाख की रक्षा और मजबूती से की जा सकें। पृथ्वीचंद ने वहां पर सबसे पहले इंजीनियर सोनम नोरबु के सहयोग से एक हवाई पट्टी बनवाई ताकि भारतीय सेना के और सैनिक लेह पहुंच सकें। जिसके बाद लेह में २२ मई के दिन वायु सेना का डकोटा विमान जनरन थिमैया और एयर कमांडर मेहर सिंह को लेकर पहुंचा था। जिसके बाद लेह और कारगिल में स्थिति लगभग भारतीय सेना के नियंत्रण में थी।
१२ अगस्त १९४८ का दिन : स्कार्दू में बीते ६ महीने से पाकिस्तानी सैनिकों से लड़ रहे भारतीय सैनिकों के पास अब राशन लगभग खत्म हो चुका था, उनके लिए 1 समय का भोजन करना भी मुश्किल हो चुका था। साथ ही हर एक राइफलमैन के पास सिर्फ लगभग १० कारतूस ही बचे थे। बिना गोली और राशन के उनके लिए लड़ना बहुत चुनौतीपूर्ण था। कर्नल शेर जंग थापा लगातार श्रीनगर से मदद की मांग कर थे, लेकिन रास्ता बंद होने के कारण मदद पहुंचाना संभव नहीं हो पा रहा था।
१३ अगस्त का दिन: श्रीनगर डिवीजन के कर्नल श्री राम ओबेरॉय ने आत्मसमर्पण करने का आदेश दे दिया था।
१४ अगस्त १९४८: आदेश के बाद कर्नल थापा, ४ अधिकारी, १ जेसीओ और ३५ अन्य रैंक के सैनिकों ने दुश्मनों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।
मेजर जनरल के एस थिमय्या ने उस वक्त का वर्णन करते हुए बाद में कहा था कि “मेरी रणनीति लद्दाख को बचाने की थी, हर कीमत पर स्कर्दू पर भारतीय सेना की पकड़ बनाये रखनी थी, ताकि पाकिस्तानी सैनिक कारगिल और लेह तक ना पहुंच सकें। सौभाग्य से इस मिशन को पूरा करने के लिए स्कर्दू में सही आदमी लेफ्टिनेंट कर्नल शेर जंग थापा था। कोई भी शब्द लेफ्टिनेंट कर्नल शेर जंग थापा की वीरता और नेतृत्व का वर्णन नहीं कर सकता है, जिन्होंने छह महीनों तक मुश्किल से २५० पुरुषों के साथ स्कार्दू पर कब्जा जमाया हुआ था। मैंने सैनिकों तक अधिक राशन और गोला बारूद छोड़ने पहुंचाने की कोशिश की थी, लेकिन अफसोस की वह राशन पहुंच नहीं पाया और सब कुछ दुश्मनों के हाथ लग गया। छह महीने के अंत में जब पूरी तरह से राशन और गोला-बारूद खत्म हो गया था, तब मैंने जवानों आत्मसमर्पण करने के लिए कहा। क्योंकि मुझे पता था कि राशन और गोला-बारूद के बिना नहीं रहा नहीं जा सकता। मुझे ये भी पता था मेरे सैनिक आत्मसमर्पण करने के बाद ही जिंदा वापस हमारे पास आ सकते है।
कई सालों के बाद एक इंटरव्यू में ब्रिगेडियर शेर जंग थापा ने उस वक्त के पिछले २४ घंटों के दृश्य का वर्णन करते हुये बताया था कि “हमने अपने आखिरी बचे गोला बारूद का इस्तेमाल कर लिया था। हर कोई हमारी स्थिति को जानता था और चारों तरफ सिर्फ दहशत और अराजकता थी। महिलाओं ने सिंधु नदी में कूदकर आत्महत्या करना शुरू कर दिया और कई महिलाओं ने अपने सम्मान को बचाने के लिए जहर खा लिया था। एक उदाहरण था जब एक लड़की ने खुद को मारने के लिए सिंधु में तीन बार छलांग लगाई लेकिन हर बार लहरें उसे किनारे तक पहुंचा देती। मेरे सैनिकों ने बहुत ही मुश्किलों के साथ लड़ाई लड़ी थी और ६ महीने ३ दिनों तक स्कार्दू पर कब्जा जमा कर रखा था। फिर आखिरी में आदेश के मुताबिक आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। आत्मसमर्पण के सभी सिखों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। एकमात्र सिख जो बच गया, वह था कल्याण सिंह, जो मेरी दल में था जो मेरे साथ रह रहा था। ”
पाकिस्तान सेना के कमांडर-इन-चीफ जनरल सर डगलस ग्रेस थे। इन्होंने धर्मशाला में युवा शेर जंग थापा के साथ हॉकी खेला था, और उन्होंने ही सेना में शामिल होने के लिए उन्हें सलाह दी थी। उनके व्यवहार के कारण ही शेर जंग थापा को किसी ने नहीं मारा था।
युद्ध के कुछ हफ्तों के बाद शेर जंग थापा और बाकि बचे सैनिक भारत वापस आये थे। शेर जंग थापा को उनकी वीरता के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। वह ब्रिगेडियर के पद तक पहुंचे, और १९६१ में सेवानिवृत्त हो गये थे। शेर जंग थापा का अगस्त १९९९ में ९२ वर्ष की आयु में निधन हो गया था।
बता दें कि पहले लद्दाख की ग्रीष्मकालीन राजधानी लेह थी, और लद्दाख की शीतकालीन राजधानी स्कार्दु (अब पाकिस्तान के कब्जे में) थी।
( साभार)

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