प्राचीन भारतीय गणतांत्रिक अवधारणा

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-अशोक “प्रवृद्ध”

 

 

विभाजित भारतवर्ष में 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू होने के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष 26 जनवरी को गणतन्त्र दिवस मनाया जाता है। वर्तमान केंद्र सरकार के द्वारा नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के जन्म दिवस 23 जनवरी को पराक्रम दिवस के रूप में मनाये जाने और उस दिन से ही गणतन्त्र दिवस का समारोह प्रारम्भ कर 26 जनवरी तक तत्सम्बन्धी कार्यक्रमों के चलने की घोषणा करने के बाद गणतन्त्र दिवस का समारोह चारदिवसीय हो गया है। यद्यपि वर्तमान में भारतवर्ष में प्रचलित गणतांत्रिक व्यवस्था भारतीयों के असंख्य बलिदानों के पश्चात और भारत विभाजन के बाद प्राप्त कर स्थापित किया गया है, तथापि भारतवर्ष में गणराज्य की अवधारणा कोई नई बात नहीं है, और सम्पूर्ण विश्व को गणतन्त्र का पाठ सर्वप्रथम इसी धरा अर्थात भारतवर्ष से ही पढ़ाया गया था। हमारे ही देश में सर्वप्रथम गणतन्त्र स्थापित हुआ जिसकी सफलता ने सम्पूर्ण विश्व का ध्यान आकर्षित किया। वैदिक, पौराणिक साहित्य के अध्ययन से भी इस सत्य का सत्यापन व अधिष्ठापन होता है कि सहस्त्राब्दियों पूर्व भी भारतवर्ष में गणतन्त्र व्यवस्था थी और देश में अनेक गणराज्य थे, जहाँ शासन व्यवस्था अत्यन्त दृढ़ थी और जनता सुखी-सम्पन्न थी। यूनान के नगर राज्यों से प्रारम्भ होने से भी हजारों-लाखों वर्ष पूर्व भारतवर्ष में वेदों के आधार पर अनेक गणराज्य स्थापित हो चुके थे। भारतीय पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार अधिकांश स्थानों पर भारतवर्ष में वैदिक ग्रन्थों में वर्णित अनुसार  गणतंत्रीय व्यवस्था ही थी। कालान्तर में, उनमें कुछ दोष उत्पन्न हुए और राजनीतिक व्यवस्था का झुकाव राजतंत्र की तरफ होने लगा। वेद सभी विद्याओं का मूल है, और भारत विभाजन के बाद देश के कर्ता- धर्ताओं ने भी इस गणतांत्रिक व्यवस्था की प्रेरणा ईश्वरोक्त ग्रन्थ वेद से ही ली है। संविधान निर्माताओं के इस गणतन्त्र की अवधारणा के पीछे भारतवर्ष की पुरातन सांस्कृतिक विरासत वेदों की अवधारणा ही छिपी हुई थी।

 

गण शब्द का अर्थ संख्या अथवा समूह से है। गणराज्य या गणतन्त्र का शाब्दिक अर्थ संख्या अर्थात बहुसंख्यक का शासन है। इस शब्द का प्रयोग ऋग्वेद में चालीस बार, अथर्व वेद में नौ बार और ब्राह्माण ग्रंथों में अनेक बार किया गया है।इन ग्रन्थों में यह प्रयोग जनतंत्र तथा गणराज्य के आधुनिक अर्थों में ही किया गया है। ऋग्वेद के एक सूक्त में प्रार्थना की गई है कि समिति की मंत्रणा एकमुख हो, सदस्यों के मत परंपरानुकूल हों और निर्णय भी सर्वसम्मत हों। वैदिक ग्रन्थों में समिति को शाश्वत कहा गया है। उसे प्रजापति अर्थात ब्रह्मा की पुत्री कहकर संबोधित किया गया है। इसीलिए वह अमर है। इस समिति की छोटी बहन को सभा कहा गया है। अथर्ववेद में राज्य प्रमुख की प्रार्थना है- प्रजापति की दोनों पुत्रियाँ -समिति और सभा मिलकर मेरी सहायता करें। जिनसे भी मेरी भेंट हो, मुझसे सहयोग करें। हे पितृगण ! मैं तथा यहाँ एकत्रित सभी सहमति के शब्द बोलें। सभा में प्रौढ़ या विशेषज्ञ (पितृगण) रहते थे। इसे नरिष्टा कहा गया है, अर्थात जिसके निर्णय का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, और न उपेक्षा। सभा का शाब्दिक अर्थ है वह निकाय, जिसके लोग आभायुक्त हों। यह राष्ट्रीय न्यायाधिकरण अर्थात सर्वोच्च न्यायालय के रूप में भी कार्य करती थी। पाणिनि ने गणराज्यों के लिए गण अथवा संघ दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। गण का शाब्दिक अर्थ है गिनना। भगवान बुद्घ ने बौद्घ भिक्षुओं की संख्या को गिनने के लिए कहा है-

उन्हें गिनो, जैसे गण में मत गिने जाते हैं। अथवा शलाका अर्थात मतपत्र लेकर गिनो।

उस समय से राज्य की सर्वोच्च सभा या संसद को भी गण कहकर पुकारा जाने लगा। इसी से गणपूरक हुआ, वह व्यक्ति जिसका उत्तरदायित्व गण की बैठक में कोरम पूरा करवाना था और देखना। वह समिति का सचेतक भी था। इन गणों के विधान का विवरण जैन सूत्रों और महाभारत में अंकित मिलता है कि किन नियमों के द्वारा यहाँ विचार-विमर्श होता था और कैसे निर्णय लिये जाते थे? इसी प्रकार नागरिकता तथा मताधिकार के भी नियम थे। पाणिनि ने अनेक गणराज्यों का वर्णन किया है- वृक, दामनि, त्रिगर्त-षट् अर्थात छह त्रिगर्त, अर्थात कौंडोपरथ, दांडकी, कौटकि, जालमानि, ब्रह्मगुप्त तथा जानकी का संघ, यौधेय, पार्श्व आदि। महाभारत में भी मद्र, वृज्जि, राजन्य तथा अंधक-वृष्णि आदि अनेक गणराज्यों अथवा उनके संघों का नाम अंकित प्राप्य है। उनमें से कुछ का संविधान गणराज्यों का संघीय रूप था। कुछ स्थानों पर मूलत: राजतन्त्र था, जो बाद में गणतन्त्र में परिवर्तित हुआ।। कुरु और पांचाल जनों में भी पहले राजतंत्रीय व्यवस्था थी, जिन्होंने ईसा से लगभग चार या पांच शताब्दी पूर्व उन्होंने गणतंत्रीय व्यवस्था अपनाई। महाभारत के सभा पर्व में अर्जुन द्वारा अनेक गणराज्यों को जीतकर उन्हें कर देने वाले राज्य बनाने की बात अंकित है। हालांकि यह गणतन्त्र पर राजतन्त्र की जीत थी, लेकिन इस घटना के बाद भी महाभारत के युद्ध में ही अनेक गणराज्यों ने धर्म के पक्ष में युद्ध कर रहे पाण्डवों का साथ दिया था। महाभारत में इन गणराज्यों की व्यवस्था की भी विशद विवेचना है। उसके अनुसार गणराज्य में एक जनसभा होती थी, जिसमें सभी सदस्यों को वैचारिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। गणराज्य के अध्यक्ष पद पर जनता ही किसी नागरिक का निर्वाचन करती थी। कभी-कभी निर्णयों को गुप्त रखने के लिए मंत्रणा को, केवल मंत्रिपरिषद तक ही सीमित रखा जाता था। शान्ति पर्व में गणतन्त्र की कुछ त्रुटियों की ओर भी इंगित किया गया है। यथा, गणतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी बात कहता है और उसी को सत्य मानता है। इससे पारस्परिक विवाद में वृद्धि होती है और समय से पूर्व ही बात के फूट जाने की आशंका बनी रहती है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी लिच्छवी, बृजक, मल्लक, मदक और कम्बोज आदि जैसे गणराज्यों का उल्लेख मिलता है। उनसे भी पहले पाणिनी ने कुछ गणराज्यों का वर्णन अपने व्याकरण में किया है। पाणिनी की अष्टाध्यायी में जनपद शब्द का उल्लेख अनेक स्थानों पर आया है, जिनकी शासनव्यवस्था जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों के हाथों में रहती थी। महाभारत के बाद महात्मा बुद्ध के काल में भी देश में गणराज्य प्रणाली जीवन्त अवस्था में थी। लिच्छवी और वैशाली जैसे गणतांत्रिक राज्य विश्व के लिए उन दिनों अनुकरणीय हुआ करते थे। वैशाली में तो उन दिनों विश्व की पहली संसद भी बैठती थी और वहां पर विशाल संसद भवन भी था, जिसके अवशेष वर्तमान में भी पाए जाते हैं। वैशाली की संसद में 7707 सांसदों के बैठने की व्यवस्था थी, जो अपने-अपने क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते थे। यहां 7707 बहुमंजिला इमारतें, 7707 अट्टालिकाएं, 7707 ही उपवन तथा कमलसरोवर भी शोभायमान थे। भारतीय इतिहास में ऐसे ही अनेक गणराज्यों के बारे में विस्तृत उल्लेख प्राप्त होते हैं, इससे यह स्पष्ट होता है कि गणराज्य व्यवस्था निश्चित रूप में विश्व को भारतवर्ष की ही देन है। 450 ईस्वी पूर्व के आस-पास पिप्पली वन के मौर्य, कुशीनगर और काशी के मल्ल, कपिलवस्तु के शाक्य, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी आदि के गणराज्य वैभवशाली थे, तो 300 ईस्वी पूर्व के आस-पास गणराज्यों में अटल, अराट, मालव और मिसोई अपने आपमें बेहद जनजांत्रिक प्रणाली पर आधारित थे एवं 350 ईस्वी के आस-पास पँजाब, राजपूताना और मालवा में अनेक गणराज्यों की चर्चा हमें इतिहास में पढऩे को मिलती है, जिनमें यौद्धेय, मालव और वृष्णि संघ आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। आगरा और जयपुर के क्षेत्र में विशाल अर्जुनायन गणतन्त्र था, जिसकी मुद्राएँ भी खुदाई में मिली हैं। यह गणराज्य सहारनपुर -भागलपुर-लुधियाना और दिल्ली के बीच फैला था। इसमें तीन छोटे गणराज्य और शामिल थे, जिससे इसका रूप संघात्मक बन गया था। गोरखपुर और उत्तर बिहार में भी अनेक गणतन्त्र थे। इन गणराज्यों में राष्ट्रीय भावना अत्यन्त प्रबल हुआ करती थी और किसी भी राजतंत्रीय राज्य से युद्घ होने पर, ये मिलकर संयुक्त रूप से उसका सामना करते थे। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने भी क्षुदक, मालव और शिवि आदि गणराज्यों का वर्णन किया है। सिकन्दर के भारतवर्ष अभियान के समय भारत के सोमबस्ती नामक स्थान का उल्लेख करते हुए लिखा है कि वहां पर शासन की गणतांत्रिक प्रणाली थी, न कि राजशाही। डायडोरस सिक्युलस ने अपने ग्रंथ में भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में अनेक गणतंत्रों की उपस्थिति का उल्लेख किया है। एक अन्य स्थान पर वह लिखता है कि अधिकांश नगरों (राज्यों) ने गणतांत्रिक शासन-व्यवस्था को अपना लिया था, और उसको बहुत वर्ष बीत चुके थे, यद्यपि कुछ राज्यों में भारत पर सिकंदर के आक्रमण के समय भी राजशाही कायम थी। लेकिन कालांतर में राजशाही तो विश्वभर से ही इतिहास के पन्नों में सिमट गई। भारतवर्ष में वर्तमान में सहस्त्राब्दियों पुरानी उसी गणराज्य की व्यवस्था है, जिसके बारे में जानकर गर्व के साथ हर भारतीय का सीना चौड़ा हो जाता है। दरअसल हम बौद्ध और जैन धर्म के आविर्भाव के पश्चात से सत्य और अहिंसा के पुजारी बनकर रह गए हैं और हमारी इसी अवधारणा को विदेशियों ने कमजोरी समझकर सदियों पहले हमें परतंत्र बनाया अर्थात परवश किया, लेकिन सदियों तक परतंत्रता में रहने के बाद भी स्वाधीनता हेतु असंख्य बलिदानियों के बलिवेदी पर न्योछावर हो जाने के पश्चात विभाजित भारतवर्ष के कर्ता-धर्ताओं ने पुरातन गौरवमयी भारतवर्ष की प्राचीन गणतांत्रिक प्रणाली को ही सर्वोपरि मानते हुए एक संविधान की रचना की एवं 26 जनवरी 1950 को संविधान को लागू कर देश को सदियों बाद एक बार फिर से गणतन्त्र घोषित कर दिया, ताकि हम नित नूतन उन्नति करते हुए देश और मानवमात्र के कल्याण मार्ग के पथिक बनकर नित्य नवीन कृतियाँ गढ़ते हमेशा-हमेशा के लिए आगे बढ़ते रहें।

 

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