पाकिस्तान – चीन की अफगान नीति के पेंच और भारत की समस्याएं

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जी. पार्थसारथी

अफगानिस्तान में आईएसआई की मदद से सत्तासीन हुए तालिबान से बनती चुनौतियों से निपटने की खातिर भारत ने कभी-कभार अपनाया जाने वाला नैसर्गिक रुख चुना है। कालांतर में भारत ने अफगान मुद्दे पर उसके पश्चिमी पड़ोसी मुल्क, जिनके साथ हमारे संबंध बहुत बढ़िया हैं, निकटता से काम किया है। इनमें ताज़िकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, उज़बेकिस्तान, किर्गीज़स्तान और कज़ाख्स्तान शामिल हैं। कभी पूर्व सोवियत संघ के घटक रहे इन देशों को रूस का समर्थन और सुरक्षा-चक्र उपलब्ध है। पड़ोसी ईरान के साथ भी इनके रिश्ते मधुर हैं। तालिबान से बरतने में भारत, ईरान और रूस के बीच काफी पुराना तालमेल रहा है, यहां तक कि 9/11 वाली आतंकी घटना के बाद अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की आमद से भी पहले। लिहाजा, अफगानिस्तान को लेकर भारत द्वारा बुलाई गई वार्ता के न्योते को रूस और ईरान ने स्वीकार किया, किंतु चीन और पाकिस्तान का रुख सकारात्मक नहीं रहा। पश्तूनों की बहुलता वाला तालिबान संगठन, जिसका अपने पश्तून समुदाय या फिर बाकी अफगानिस्तान में कोई बड़ा राजनीतिक आधार नहीं है, उस देश की कुल जनसंख्या का 55 प्रतिशत से ज्यादा बनते ताजिक, उज़बेक, हज़ारा, बलोच और अन्यों से तगड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

भारत और अफगानिस्तान के पश्चिमी पड़ोसी मुल्कों को चिंता इसलिए है क्योंकि तालिबान ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है कि देश के अल्पसंख्यक, खासकर ताज़िक, साथ लगते देशों में शरण लेना चाहते हैं। शिया हज़ारा समुदाय की निरंतर प्रताड़ना के परिणामवश ईरान भी असहज है। अफगानिस्तान के इन तमाम पड़ोसियों की चिंताओं में इजाफा तालिबान के हत्थे लग चुके अमेरिकन हथियारों की वजह से भी है। उक्त सभी मुल्कों के साथ, जो शंघाई सहयोग संगठन में भी साथी हैं, भारत लगातार संपर्क में है। हालांकि, चीन अब तालिबान का एक उत्साही समर्थक है, बेशक वह ठीक इसी वक्त उसके पड़ोसियों से भी अच्छे संबंध होने का दिखावा कर रहा है। अपनी चिंताओं के बावजूद रूस अफगानिस्तान पर चीन के साथ सीधा टकराव करने से बचना चाहेगा। वहीं पाकिस्तान अफगानिस्तान पर अपनी ‘गहरी सामरिक पैठ’ बनाए रखना चाहता है और अफगान भूमि का इस्तेमाल लश्कर-ए-तैयब्बा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी गुटों की सुरक्षित पनाहगार के लिए करना चाहता है।

तालिबान में आईएसआई की पैठ कितनी गहरी है, इसका सुबूत 15 अगस्त को देखने को मिला, जब इसके तत्कालीन प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय ध्यान का केंद्र बने, उस रोज़, तालिबान काबुल का नियंत्रण अपने हाथ में ले रहा था, तब आईएसआई के ‘सर्वव्यापी’ पूर्व प्रमुख ले. जनरल फैज़ हमीद काबुल पहंुचे, उनका व्यवहार किसी अफगान युवराज सरीखा था। उन्हें अपनी जीत पर नाज़ होना ही था, क्योंकि पहले घोषित प्रधानमंत्री मुल्ला गनी बरादर को इतना मजबूर किया गया कि नामज़द गृहमंत्री और कुख्यात तालिबान हक्कानी गुट के गुंडों के हाथों मारे जाने के डर से काबुल छोड़कर कंधार जाना पड़ा। इसके बाद बरादर की काबुल वापसी बतौर उप-प्रधानमंत्री के निष्प्रभावी पद पर हुई। तालिबान के संस्थापकों में एक मुल्ला मोहम्मद हसन अखुन्द को प्रधानमंत्री घोषित किया गया। उसका नाम संयुक्त राष्ट्र की आतंकी सूची में है। वहीं मुल्ला हिबातुल्लाह अखुन्दज़ादा, जिसे पहले तालिबान के सर्वोच्च नेता नामित किया गया था, वह दरकिनार होकर कंधार में एक तरफ बैठा है।

आज की तारीख में अफगान सरकार में गृह-मंत्री सिराजुद्दी हक्कानी सबसे ताकतवर मंत्री है। वह अफगानिस्तान में अमेरिकी सैनिकों पर हुए हमलों का सबसे ज्यादा जिम्मेवार है। उसका ओसामा बिन लादेन और अल कायदा से भी निकट संबंध रहा है। हक्कानी नेटवर्क की गतिविधियां पाकिस्तान के पश्तून बहुल खैबर पख्तूनवा इलाके के उत्तरी वजीरिस्तान में ड्यूरंड सीमा रेखा के आरपार निर्बाध चलती रहती हैं। काबुल का राजकाज अब सिराजुद्दीन हक्कानी के भाई खलील-उर-रहमान हक्कानी के हाथ में है।

बिन लादेन के बहुत नजदीकी रहे सिराजुद्दीन के सिर पर 50 लाख अमेरिकी डॉलर का इनाम है। सबसे अहम यह कि उसका अपना घर ऐन उत्तरी वजीरिस्तान में पाक-अफगान सीमा को चिन्हित करने वाली ड्यूरंड रेखा पर है। उसके परिवार के सदस्य एक तरह से जन्मजात आईएसआई के चेले हैं!

तालिबान पाकिस्तान को ‘गहरी सामरिक पैठ’ मुहैया करवा रहा है, जिससे वह भारत के विरोधी जिहादियों को प्रशिक्षण और सशस्त्र कर पाएगा। इसके अलावा तालिबान ने ब्रिटिश द्वारा खींची ड्यूरंड रेखा के आधार पर पाकिस्तानी दावों पर कभी सवाल नहीं उठाया है। हालांकि पाकिस्तान को तहरीक-ए-तालिबान, जो कि मुख्य तालिबान का एक घटक है, उससे गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि वह ड्यूरंड रेखा को नकारता है। उसका दावा है कि अफगानिस्तान की वास्तविक सीमा सिंधु नदी के तट पर स्थित अट्टक तक है। पश्तूनों की भावना उस वक्त आहत हुई जब पाकिस्तानी थल सेना ने, वायुसेना की मदद से, पश्तून शहरों और गांवों पर बमबारी कर भारी तबाही मचाई थी। पश्तून कबीले के हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर भागना पड़ा था। भले ही अफगानी तालिबान पाकिस्तान सरकार और तहरीक-ए-तालिबान के बीच वार्ता करवाने में मदद कर रहे हैं, लेकिन पश्तून अपने ऊपर हुई जालिमाना कार्रवाई को कैसे भुला देंगे।

भारत और अफगानिस्तान के पड़ोसी पांच मध्य एशियाई मुल्कों की कैफियत अब एक जैसी है, जिन्हें पाकिस्तान की नीतियों से गंभीर चिंता सता रही है। भारत में 10 नवम्बर को हुई बैठक में जोर देकर कहा गया कि अफगानिस्तान अपनी भूमि को आतंकियों की पनाहगार, प्रशिक्षण केंद्र या पैसा प्राप्त करने का अड्डा न बनने दे। सबसे अहम यह कि मध्य एशियाई देशों और ईरान ने कहा है कि अफगान लोगों के सभी वर्गों तक निर्बाध एवं भेदभाव रहित मानवीय मदद पहुंचनी चाहिए। अफगानिस्तान में फिलवक्त लोगों को भोजन और मेडिकल आपूर्ति की सख्त किल्लत है। भारत ने पहलकदमी करते हुए, अफगान जनता के लिए 50,000 टन गेहूं और जरूरी दवाएं देने की पेशकश की है। खाद्यान्न वहां पहंुचाने हेतु पाकिस्तान को रास्ता देने को कहा है। अनमने पाकिस्तान ने कुछ दिनों तक टाल-मटोल करने के बाद अनौपचारिक संकेत दिया है कि राहत सामग्री को गुजरने की इजाज़त मिल सकती है।

तालिबान ने भारत द्वारा 50000 टन गेहूं देने की पहल का स्वागत किया है और पाकिस्तान से कहा है कि वह अपनी भूमि से होकर यह आपूर्ति गुजरने की इजाजत दे। उन्हें चीनियों की महत्वाकांक्षा का भी भान है, जो लगभग 1 ट्रिलियन मूल्य वाली उसकी प्राकृतिक संपदा का दोहन करना चाहते हैं। इन स्रोतों में मूल्यवान पत्थर, यूरेनियम, क्रोमियम, तांबा, लिथियम, बॉक्साइट, कोबाल्ट और लोहा अयस्क शामिल हैं। चीन इसका ज्यादा से ज्यादा हिस्सा पाने को राजनीतिक और सामरिक पैंतरे अपना सकता है। लेकिन इसमें मुख्य अड़चन रहेगी, उसके अपने शिनजियांग प्रांत में मुस्लिमों से किया जाने वाला क्रूर बर्ताव। तालिबान जो खुद को दुनियाभर के मुस्लिम हितों का चैंपियन बता रहे हैं, कब तक इस मुद्दे पर आंख फेर कर रखेंगे, वह भी जो ठीक बगल में हो रहा है? अफगानिस्तान और उसकी सीमाओं पर आगामी लंबे समय तक अस्थिरता, अफरा-तफरी और हिंसा बनी रहेगी। इसी बीच इमरान खान पर बन आई समस्याओं को गिनाते हुए वरिष्ठ पाकिस्तानी पत्रकार हमीर मीर ने हाल ही में कहा ‘इमरान खान किसी भी कीमत पर दूसरी बार प्रधानमंत्री की कुर्सी पक्की करने को कृतसंकल्प है, उधर सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा भी अपना कार्यकाल बढ़वाना पसंद करेंगे तो वहीं ले. जनरल हमीद उनकी जगह लेना चाहेंगे। लेकिन जल्द ही इन दोनों जनरलों का वजूद एक साथ संभव न होगा।
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