चेतना और परम चेतना के रहस्य को समझकर हम पा सकते हैं कोरोना पर विजय

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कुछ विद्वान साथी ऐसा भी सुझाव दे रहे हैं कि कोरोना की वर्तमान वैश्विक महामारी (जो हमारे देश भारतवर्ष में भी फैली हुई है ) की भयावहता की जानकारी सोशल मीडिया पर अधिक न दी जाए, जिससे कि भय का वातावरण कम से कम निर्मित हो पाए और समाज में सकारात्मकता का वातावरण उत्पन्न हो।


अपने सभी विद्वान साथियों के इस सदपरामर्श के उपरांत भी मैं यह मानता हूं कि अपने परिजनों, प्रियजनों के साथ अथवा समाज में, राष्ट्र में क्या घट रहा है? किसके साथ क्या हो रहा है? इसकी जानकारी होना भी महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इसके लिए हम तथ्यों और चर्चाओं को भयावहता का स्वरूप न देकर यथार्थवादी सकारात्मक चिंतन अपनाकर अपनी बात को कह सकते हैं और दूसरों को उसे मानने के लिए बाध्य कर सकते हैं। यदि जागरूकता के नाम पर सोए रहने की प्रवृत्ति को अपनाया गया तो भी गलत होगा।
अपने साथियों की विचारधारा को सहज रूप से स्वीकार करते हुए सकारात्मकता का प्रचार प्रसार करने के दृष्टिकोण से मैं कुछ विचार संकलित करके प्रस्तुत कर रहा हूं, जो निम्न प्रकार हैं :-

हमारे मन में अक्सर अनेकों प्रकार के प्रश्न जिज्ञासावश उठते रहा करते हैं । जैसे यह क्या है ? ये विज्ञान का विषय है, मैं कौन हूं ? ये आध्यात्मिकता का विषय है।
इसी प्रकार के अनेकों प्रश्न मन में उठना स्वाभाविक है। प्रश्न उठना बुद्धि का लक्षण है, प्रगति का लक्षण है। यह इस बात का भी द्योतक है कि चेतना जब बहिर्मुखी होती है तो प्रश्न उठता है कि यह क्या है ? तथा चेतना जब अंतर्मुखी होती है तो प्रश्न उठता है कि मैं कौन हूं ? जब “मैं से मैं की बात” हो तब समझिए कि चेतना अंतर्मुखी होकर ज्ञान गंगा में गोते लगा रही है और जब मैं से बाह्य जगत की बात हो तो तब समझिए कि चेतना बहिर्मुखी होकर कहीं बाहर बह रही है। निश्चित रूप से अंतर्मुखी चेतना का स्तर ही सर्वोच्च होता है।
ज्ञान नितान्त औपचारिक वातावरण में पनप नहीं सकता ।प्रज्ञा की जागृति होनी हो तो एक घरेलू वातावरण चाहिए, एक आत्मीयता की आवश्यकता होती है,जो हमें खुद पैदा करनी है। कोई हमारे लिए पैदा नहीं कर सकता।

यदि हमारे जीवन में नीरसता है तो इसका अभिप्राय है कि हमने अपनापन खो दिया है। आत्मीयता का वह भाव हम से विलुप्त हो गया है जो हमें परिवार के रूप में, समाज के रूप में और फिर संसार के रूप में बांधता है। आत्मीयता का यही भाव हमें परिवार से संसार की ओर चलने के लिए प्रेरित करता है और हमें विश्व बंधुत्व की पवित्र भावना से परस्पर बांध देता है।
प्रेम का तात्पर्य है कि दूसरे में भगवान को देखना । दूसरे में भगवान को देखने की यही पराकाष्ठा धर्म की वह पवित्र अवस्था है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है और सारे संसार के मनुष्यों को ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र को भी एक ही माला का मोती बना कर रख देती है।
ध्यान का तात्पर्य है कि खुद में भगवान को देखना ।
उसकी ज्योति से अपने आपको ज्योतित समझना। आलोकित समझना। उसकी पवित्रता और उत्कृष्टता को स्वीकार करना ।
इस संभावना को सदा ध्यान में रखो कि व्यक्ति व व्यवस्था किसी भी समय बदल सकते हैं । आप अपने फैसले पर अड़े मत रहो। अपने आप को सुसंगत और सुसंस्कृत बनाए रखने का प्रयास करते रहना चाहिए।
सुसंगत वह है जो आनंद, उत्साह, सेवा, प्रेम, विश्वास और ज्ञान की तरफ उठाता है। इसके लिए कुसंगत से अपने आप को बचाना बहुत आवश्यक है।
कुसंगत – जो संदेह , निरुत्साह, शिकायत, क्रोध, भ्रम ,कामना की तरफ नीचे खींचती है।
निष्कपट रहो। परमात्मा और उसकी बनाई हुई सृष्टि के साथ ज्यादा चालाकी मत करो। समझ लीजिए कि निष्कपट ह्रदय में ही परमात्मा का वास होता है। वह किसी प्रकार की कपट, चालाकी, छल या प्रपंच को न तो पसंद करता है और ना ही ऐसे हृदय में वास करने को उचित मानता है।
जब तुम दायित्व लेते हो तो बाधाएं आती हैं । इसलिए उस अदृश्य शक्ति के समक्ष समर्पण को याद रखो।
“आज “ईश्वर से मिला उपहार है इसलिए इसे प्रजेंट उपहार कहते हैं।’ विश्वास दिमाग का विषय है जबकि भक्ति हृदय का विषय है । ध्यान दिमाग एवम हृदय दोनों को जोड़ता है।मन में धैर्य और मार्ग में गतिशीलता ही उचित उपाय है।
तुम इसलिए विशेष हो क्योंकि तुम्हारे दृष्टिकोण में निरीक्षण एवं अभिव्यक्ति का विकास हुआ है।
भावनाओं का निरीक्षण करना कि सकारात्मक है या नकारात्मक है। घृणा या प्रेम, क्रोध या दया, दुख या सुख, इसी में निरीक्षण शक्ति का बोध है।
संसार में बहुत कम लोग आप की आंतरिक उन्नति को पहचान सकते हैं परंतु तुम्हारा बाहरी आचरण ही सबको नजर आता है। जैसे बादल का सागर बनना प्रत्यक्ष है परंतु सागर का बादल बनना रहस्य है।
अपनी मुस्कान को सस्ता बनाओ और क्रोध को कीमती अर्थात क्रोध को देर से लाओ।
हमें अपने अनुशासन को आजाद व स्वतंत्रता को अनुशासित करना है।संपूर्ण संतुलन तलवार की धार की तरह है वह सिर्फ आत्मा में ही पाया जा सकता है।
अपने शरीर को जल से व आत्मा को ज्ञान से, प्राणायाम से तथा सुदर्शन क्रिया और ध्यान से शुद्ध करो।

नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें, नई रातें।सृष्टि अंधकार में ही होती है माता के गर्भ में या मिट्टी के अंतर स्थल में ।
गर्भ के 9 महीने 9 लंबी रातों के समान हैं जिसमें आत्मा मन व शरीर धारण करती है।अपनी आंतरिक गहराई में रहना ही निष्कपटता है।नकारात्मकता का बीज और संघर्ष करने की तुम्हारी प्रवृतियां का अंत केवल साधना द्वारा ही संभव है।
तुम्हारी चेतना एक मकई के दाने की तरह है। जैसे ज्ञान की गर्मी से चेतना पॉपकॉर्न की तरह फूट कर खिल उठती है, उज्जवल और हल्की हो जाती है।
जब कोई तुम्हारे साथ असभ्य और रूखा व्यवहार करता है तो तुम क्या करते हो?
विचलित हो जाते हो।
रूखापन से जवाब देते हो।
निराश हो जाते हो।
उस व्यक्ति व स्थिति से भाग जाते हो।
दूर रहने लगते हो।
उस व्यक्ति पर आरोप लगाते हो।
उसे उचित व्यवहार की शिक्षा देते हो।
इसमें से कोई सा भी तुम्हें किसी भी तरह सशक्त नहीं बनाता है।
तो फिर उसका उपाय क्या है ?
असभ्य व्यवहार को निम्न तरह से देखो।

1 रूखा व्यवहार किसी कार्य के प्रति उनके तीव्र लग्न को इंगित करना है।

2 उनका व्यवहार उनके तनाव और असंवेदनशीलता को प्रकट करता है।
3. उनके पालन पोषण को, व्यवहार ,शिक्षा और संस्कार को दर्शाता है।
4. उसमें ज्ञान का अभाव दर्शाता है।
5 – चित् और उसकी अनुभूतियों के प्रति निरीक्षण का अभाव दर्शाता है।
6 – उनका व्यवहार तुम्हें बताता है कि दूसरों से ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए।
7 – तुम्हारे लिए स्वीकार करने का सुअवसर है।
8 – यह तुम्हारे मन को सबल करता है।
9 – तुम्हारा निरपेक्ष प्रेम स्वरूप व्यक्त होता है केवल मुस्कुरा कर स्वीकार कर लो।
यदि तुम जीवन जीने की कला सीखना चाहते हो तो
जीवन जीने की कला है – त्याग ।
पांच चीज हमेशा ध्यान रखें –
प्रथम अस्ति _ जिसका तात्पर्य “होना” या “है “होता है।
द्वितीय आरती – जिसका तात्पर्य ज्ञान और अभिव्यक्ति होता है।
तृतीय प्रीति – अर्थात प्रेममय है।
चतुर्थ – नाम
और पांचवा है – रूप।
नाम और रूप जड़ है।
प्रथम तीन चेतना के पहलू हैं। लेकिन भक्ति और समर्पण बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं।

उत्कृष्ट श्रद्घाभावना के साथ जो लोग ईश भजन करते हैं-उनके लिए गीता का कहना है कि उन्हें मैं (भगवान) बुद्घि भी ऐसी प्रदान करता हूं कि जिसके द्वारा वे मेरे पास ही पहुंच जाते हैं। उन पर अपनी अनुकम्पा करने के लिए मैं उनके आत्मा के भाव अर्थात उनकी बुद्घि में स्थित होकर ज्ञानरूपी प्रकाशमय दीपक से अज्ञान से उत्पन्न होने वाले अन्धकार को नष्ट कर देता हूं।
हिय सिंहासन विराजते हों जिनके भगवान।
अन्धकार सारा मिटे और रह जाता है ज्ञान।।
जब हृदय सिंहासन पर प्रभु विराजते हैं अर्थात भक्त के द्वारा पूर्ण समर्पण के साथ हृदय ईश्वर को सौंप दिया जाता है तो उस समय इसमें सांसारिक विषयों के लिए स्थान रहता ही नहीं है। कबीर कहते हैं-
जब मैं था तब हरि नहीं जब हरि हैं हम नाहीं।
प्रेम गली अति सांकरी ता में दो न समाहीं।।
इसलिए श्रीकृष्णजी कह रहे हैं कि हृदय मुझे सौंप दोगे तो मैं तुम्हारे हृदय में विद्यमान अन्धकार को नष्ट कर दूंगा। ऐसा करने से तुम हल्के हो जाओगे और तुम्हारे भार को मैं उठा लूंगा।
अर्जुन की आंखें खुलीं
श्रीकृष्णजी अपनी अनोखी और अद्भुत शैली में अर्जुन को अपने प्रवचनों के माध्यम से झकझोरने का कार्य कर रहे हैं। उसे जगाना चाहते हैं। अर्जुन को उसका लक्ष्य बता देना चाहते हैं। भटके हुए अर्जुन को सही मार्ग पर ले आना चाहते हैं। इतनी सुन्दर और प्रवचनात्मक शैली में कही गयी बातों को सुनकर अर्जुन की आंखें खुलती हैं। अब गीताकार उसकी चेतना से उठते प्रश्न की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करता है।
अर्जुन कहता है कि-‘हे परमपिता परमेश्वर! इस सृष्टि का आदिकारण तू परब्रह्म है, परम पवित्र है, शाश्वत दिव्य पुरूष है, आदिदेव है, अज है और विभु है। हमारे अब तक के ऋषियों ने भी हमें ऐसा ही बताया है जैसा आज श्रीकृष्णजी ने बताया है। तब वह कहता है कि हे केशव! जो कुछ तूने मुझे बताया है इस सबको मैं सत्य समझ रहा हूं। सचमुच भगवान के व्यक्तित्व को न देव जानते हैं और न दानव अर्थात तेरे व्यक्तित्व को न देव जानते हैं और न दानव।’
हे पुरूषोत्तम! हे जड़ चेतन के उत्पन्न करने हारे, हे जड़ चेतन के स्वामी, हे देवों के देव, हे जगत के स्वामी तू स्वयं ही अपने द्वारा अपने आपको जानता है।
यहां अर्जुन ईश्वर की विशालता का बोध कर रहा है। वह समझ गया है कि ईश्वर काल से भी विशाल है और इतना विशाल है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। वह इस पृथ्वी लोक, अन्तरिक्ष लोक और द्युलोक सभी से विशाल है और फिर भी दिखता नहीं, इन सबको धार रहा है पर फिर भी देहधारी नहीं है। उसकी विभूति का रहस्य अर्जुन पर प्रकट होने लगा है कि वह इस पृथ्वी में रहता हुआ भी इससे अलग है और पृथ्वी उसका शरीर सा है।
जब ऐसी अवस्था हम जैसे साधारण लोगों की हो जाती है तब समझना चाहिए कि हमारी चेतना जागृत हो चुकी है।
आज अपनी चेतना को उस परम चेतना के साथ जोड़ने की नितांत आवश्यकता है , क्योंकि आज का सारा संसार दिग्भ्रमित है । भौतिकवाद की आग में जल रहे लोगों के अंतर्मन में कहीं भी दूर दूर तक शांति दिखाई नहीं देती। कोरोनावायरस से उभरने के लिए चेतना और परम चेतना के इस मेल के सत्य को समझने की आवश्यकता है। जितनी ऊर्जा या इम्यूनिटी पावर हमें इस चेतना और परम चेतना के तत्व और सत्य को समझकर मिल सकती है उतनी किसी अन्य औषधि से नहीं । इसलिए अपने ऋषियों की संस्कृति को अपनाकर उसकी शरण में जाना वर्तमान समस्या का सबसे बड़ा समाधान है।

संकलनकर्ता एवं प्रस्तोता : देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट चेयरमैन उगता भारत समाचार पत्र

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