जीव शुभाशुभ कर्म करने में स्वतंत्र और उनका फल भोगने में ईश्वर के अधीन है

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ओ३म्

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून

यदि वेद न होते तो संसार के मनुष्यों को यह कदापि ज्ञान न होता कि मनुष्य कौन है व क्या है? यह संसार क्यों, कब व किससे बना, मनुष्य जीवन का उद्देश्य क्या है और उस उद्देश्य की प्राप्ति के साधन क्या-क्या हैं? वेद एक प्रकार से कर्तव्य शास्त्र के ग्रन्थ हैं जो इस सृष्टि के रचयिता ‘ईश्वर’ ने सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों के हित की दृष्टि से सभी मनुष्यों के अग्रणीय चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को प्रदान किये थे। यह वेद क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद हैं। इन चार वेदों के अतिरिक्त संसार में अन्य जितने भी ग्रन्थ हैं वह सब मनुष्यों द्वारा रचित हैं। ईश्वर के अतिरिक्त संसार में जितने भी मनुष्य, महापुरूष, ऋषि व मत-प्रवर्तक आदि हुए हैं व होंगे, वह सभी अल्पज्ञ होते हैं जिसका अर्थ है कि उनका ज्ञान अपूर्ण, अधूरा व भ्रान्तियुक्त होता है व हो सकता है। ईश्वर सर्वव्यापक, निराकार व अजन्मा होने से कभी जन्म व अवतार नहीं लेता। मनुष्य अपने अल्पज्ञ ज्ञान को वेदों के अध्ययन व योग समाधि आदि के द्वारा सुधार व उन्नत कर सकता है। यदि वेद की सहायता नहीं लेंगे तो अज्ञान, अन्धविश्वास व कुरीतियां आदि मनुष्यों, मनुष्य समाज व देश में लग जायेंगी, जैसा कि अतीत के पांच हजार वर्षों में हुआ। इस कारण मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष को प्राप्त करने में सफल नहीं होंगे। इस प्रकार से यह सभी मनुष्यों व मनुष्य जीवन की बहुत बड़ी हानि होगी और इसका परिणाम उनके जीवन में दुःख के अतिरिक्त और कुछ होने वाला नहीं है।

ईश्वर इस संसार का रचयिता, संचालक और पालक है। मनुष्य व इतर प्राणी सृष्टि भी ईश्वर के द्वारा ही रची गई है। अनादि व नित्य जीवों के सुखों के लिए ही अनादि काल से ईश्वर सृष्टि की रचना व पालन करता आ रहा है और सृष्टि की अवधि पूर्ण होने पर प्रलय भी वही करता है। यद्यपि ईश्वर जीवों को सुख देना चाहता है परन्तु यह जीवों पर निर्भर करता है कि वह सुखों की प्राप्ति के लिए वेदानुसार सद्कर्मों को करें तथा असत्य, अशुभ व पाप कर्म कुछ भी न करें। जीव सुख चाहने और असत्य कर्म न करने की इच्छा रखने पर भी अपने अज्ञान, अविद्या, अपने हित व प्रयोजन की सिद्धी, हठ व दुराग्राह आदि के कारण सत्य को छोड़कर असत्य में प्रवृत हो जातें हैं। इस कारण से मनुष्यों सहित सभी प्राणियों को दुखों की प्राप्ति होती है। शुभ कर्मों का परिणाम सुख है और अशुभ कर्मों का परिणाम दुःख है। शुभ व अशुभ कर्मों को जानने के लिए मनुष्यों को वेद की शरण लेनी होगी। यदि मनुष्य इसके लिए वैदिक संस्कृत का अध्ययन कर अपनी योग्यता बढ़ायें और वेदों के सत्य अर्थों को जान सकें तो यह अत्युत्तम कार्य व तप है। परन्तु यदि वह किन्हीं कारणों से वैदिक संस्कृत-व्याकरण न पढ़ सकें तो उन्हें वेदों पर महर्षि दयान्द और आर्य विद्वानों के हिन्दी भाषा में भाष्य सहित वेदों पर आधारित महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि को अवश्य पढ़ना चाहिये। यह सभी ग्रन्थ मनुष्यों के सच्चे मित्र, आचार्य, गुरू, बन्धु व माता-पिता के समान सच्चे मार्गदर्शक हैं।

इस लेख में हम महर्षि दयानन्द द्वारा सत्यार्थ प्रकाश में दिये गये एक प्रश्न को प्रस्तुत कर रहे हैं जिसमें वह स्वयं ही प्रश्न करते हैं कि क्या परमेश्वर त्रिकालदर्शी है? यदि है तो वह इससे भविष्यत् की भी बातें जानता है। वह जैसा निश्चय करेगा जीव वैसा ही करेगा। इस से जीव स्वतन्त्र नहीं (क्योंकि जीव ने वही किया जो ईश्वर ने उसके लिए निश्चित किया अथवा उसे करने के लिए प्रेरित किया) और ईश्वर जीव को दण्ड भी नहीं दे सकता क्योंकि जैसा ईश्वर ने अपने ज्ञान से निश्चित किया है वैसा ही जीव करता है। इसका उत्तर देते हुए महर्षि दयानन्द कहते हैं कि ईश्वर को त्रिकालदर्शी कहना मूर्खता का काम है। क्योंकि जो होकर न रहे वह भूतकाल और न होके होवे वह भविष्यत्काल कहलता है। क्या ईश्वर को कोई ज्ञान होके नहीं रहता तथा न होके होता है? (यह सत्य नहीं) इसलिये परमेश्वर का ज्ञान सदा एकरस, अखण्डित वर्तमान रहता है। भूत, भविष्यत् जीवों के लिए हैं। हां, जीवों के कर्म की अपेक्षा से त्रिकालज्ञता ईश्वर में है, स्वतः नहीं। जैसी स्वतन्त्रता से जीव कर्म करता है वैसा ही सर्वज्ञता से ईश्वर जानता है और जैसा ईश्वर जानता है वैसा जीव करता है (वा उसने किया होता है) । अर्थात् भूत, भविष्यत्, वर्तमान के मनुष्य के कर्मों के ज्ञान और उन्हें फल देने में ईश्वर स्वतन्त्र है और जीव किंचिंत् वर्तमान काल में कर्म करने में स्वतन्त्र है। ईश्वर का अनादि ज्ञान होने से जैसा कर्म का ज्ञान है वैसा ही दण्ड देने का भी ज्ञान उसको अनादि है। दोनों ज्ञान (कर्म का व दण्ड का) उस के सत्य हैं। क्या कर्मज्ञान सच्चा और दण्ड ज्ञान मिथ्या कभी हो सकता है? (कदापि नहीं हो सकता) इसलिये इस में कोई भी दोष नहीं आता।

महर्षि दयानन्द जी ने अपने वेदों के गहन अध्ययन के आधार पर तर्कपूर्ण भाषा में यह बताया है कि ईश्वर जीवों के कर्मों की अपेक्षा से त्रिकालदर्शी है। सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी होने से वह जीवों के सभी कर्मों का साक्षी वा प्रत्यक्षदर्शी भी है। ईश्वर का कर्मों को जानने व उनका दण्ड का विधान भी उसके त्रिकालज्ञ होने से सत्य व दोषमुक्त है। यहां वस्तुतः ‘अवश्यमेव ही भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभं’ का सिद्धान्त ध्वनित हो रहा है कि जीव जो भी शुभ व अशुभ कर्म करता है उसके फल उसे अवश्यमेव भोगने ही पड़ते हैं। कोई भी कर्म ईश्वर से छुपता नहीं है। अतः इस ज्ञान को हृदयंगम कर जीव वा मनुष्य को अपने जीवन में कोई भी अशुभ कर्म करने का विचार नहीं करना चाहिये अन्यथा उसे उस अशुभ कर्म को मूल व सूद सहित ईश्वरीय दण्ड पाकर चुकाना होगा। इसी प्रकार से अच्छे कर्मों का फल भी ईश्वर की व्यवस्था से यथासमय यथोचित रूप में प्राप्त होता है। यह ईश्वर प्रदत्त वैदिक ज्ञान के अनुसार सर्वथा सत्य है। इसकी जो भी मनुष्य उपेक्षा करेगा, भले ही वह किसी भी मत व धर्म का अनुयायी क्यों न हो, ईश्वर की व्यवस्था से समान रूप से उत्तरदायी ठहराया जायेगा और दण्ड का भागी भी अवश्य होगा।

जब मनुष्य को अपने पूर्वकृत कर्मों का फल मिलता है तो वहां दुःखों से उस मनुष्य को बचाने के लिए कोई भी धर्म गुरू व प्रवर्तक उपस्थित नहीं होता। यह कर्म फल वा दण्ड जीव को मनुष्य व अन्य प्राणी योनियों में जन्म लेकर भोगने पड़ते हैं जिनका हम अपने देश व समाज में साक्षात् अनुभव करते हैं। इसका समस्त उत्तरदायित्व कर्म के कर्ता पर ही होता है। इस रहस्य को जानकर सभी मनुष्यों को शुभ कर्म ही करने चाहिये। महर्षि दयानन्द का सारा जीवन इसका साक्षात उदाहरण है। कर्तव्य के ज्ञान के लिए हमने आरम्भ में ही कहा है कि वेदों का स्वाध्याय व अध्ययन आवश्यक है। वेदों के अनुसार उषाकाल या ब्रह्ममूर्त में उठकर ईश्वर का ध्यान व नियमानुसार समय पर शौच, ईश्वरोपासना, यज्ञ वा अग्निहोत्र करना, माता-पिता-वृद्धों का सेवा सत्कार, विद्वान अतिथियों की सेवा आदि तथा पशु-पक्षियों को यथा सामथ्र्य किंचित भोजन कराना तथा साथ ही अपनी सामथ्र्यानुसार समाज व देशहित सहित सेवा व परोपकार के कार्यों को करना ही शुभ कर्म कहलाते हैं। हम आशा करते हैं कि पाठक इन वैदिक विचारों से सत्कर्मों को करने व असत्कर्मों को छोड़ने की प्रेरणा ग्रहण करेंगे जिससे उनके जीवन दुःख न्यूनातिन्यून हो और वह जीवन मुक्त होकर अवागमन से छूट सकें। सत्य को ग्रहण करना व न करना मनुष्यों का कर्तव्य एवं अधिकार दोनों हंै जिससे मिलने वाले लाभ व हानियों के लिए वह स्वयं ही उत्तरादायी होते हैं। ओ३म् शम्।
-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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