हमें मनुष्य जन्म वेद धर्म के पालन और मोक्ष की प्राप्ति के लिए मिला है

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ओ३म्
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संसार में बहुत कम मनुष्य ऐसे हैं जो अपने जीवन के उद्देश्य पर विचार करते हैं। यदि वह ऐसा करते हैं और उन्हें सौभाग्य से कोई सद्गुरु या सत्साहित्य प्राप्त हो जाये, तो ज्ञात होता है कि हमें हमारा यह जन्म परमात्मा ने हमारे पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर शुभ व अशुभ कर्मों का भोग करने सहित श्रेष्ठ कर्मों व धर्म का पालन करते हुए मोक्ष प्राप्ति के लिये दिया है। वर्तमान समय में देश देशान्तर के लोगों को मत-पन्थों का तो ज्ञान है परन्तु सद्धर्म का ज्ञान नहीं है। संसार में केवल एक ही परमात्मा है जिसने इस संसार को बनाया है। इस संसार को बनाने का कारण भी सृष्टि की तीन अनादि व नित्य सत्ताओं में से एक जीवों को उनके पूर्वजन्मों के कर्मानुसार उनके पाप व पुण्य कर्मों का फल देना होता है। मनुष्य योनि अन्य सब योनियों में श्रेष्ठ व ज्येष्ठ होती है। मनुष्य के पास परमात्मा ने कर्म करने के लिये दो हाथ तथा सोच विचार करने के लिये बुद्धि दी है। मनुष्य के शरीर की रचना भी अन्य सब प्राणियों से अनेक प्रकार से भिन्न व उत्तम है। मनुष्य ही ऐसे प्राणी हैं जो चिन्तन व मनन कर सकते हैं, अध्ययन व अध्यापन सहित सत्य व असत्य का विचार कर सत्य का ग्रहण व असत्य का परित्याग कर सकते हैं।

परमात्मा ने कृपा करके सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न चार अग्नि, वायु, आदित्य तथा अंगिरा आदि ऋषियों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। यह ज्ञान हमें हमारी आत्मा के सत्यस्वरूप सहित ईश्वर, सृष्टि एवं हमारे कर्तव्यों का बोध कराता है। मनुष्य को वेद वर्णित ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव व स्वरूप को जानकर उसकी स्तुति, प्रार्थना तथा उपासना अवश्य करनी चाहिये तथा वेद निर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन करते हुए वेदों का स्वाध्याय एवं योगाभ्यास कर ईश्वर के साक्षात्कार का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य को ऐसा करते हुए पाप कर्मों का ज्ञान व उनसे विरक्ति हो जाती है। वह वेद प्रतिपादित उत्तम श्रेष्ठ कर्मों को ही करता है तथा अशुभ व पाप कर्मों का त्याग करता है। ऐसा करते हुए जीवन व्यतीत करने से वह धर्म पालन करते हुए जन्म व मरण से होने वाले सभी दुःखों पर विजय पाकर मोक्ष को प्राप्त होता है। यही जीवन पद्धति सार्थक व उत्तम है। मत मतान्तरों की शिक्षायें अपूर्ण व अधूरी होने के कारण मनुष्य सत्यधर्म तथा मोक्ष के लिये किये जाने वाले कर्तव्यों व व्यवहारों से वंचित ही रहता है। मनुस्मृति में धर्म के जिन दस लक्षणों का विधान मिलता है वैसा मत-मतान्तरों की शिक्षाओं में कहीं एक स्थान पर सुनने व पढ़ने को नहीं मिलता। वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन कर मनुष्य धर्म को पूर्णता से जान पाता है और उसे ईश्वर के प्रति अपने उपास्य-उपासक, साध्य-साधक, स्वामी-सेवक सहित व्याप्य-व्यापक संबंधों का ज्ञान भी होता है। वैदिक साहित्य से उपासना व देवयज्ञ अग्निहोत्र सहित पंचमहायज्ञों की सत्य विधि का ज्ञान भी होता है जो मनुष्य की शारीरिक, आत्मिक तथा सामाजिक उन्नति कराकर उसके मनुष्य जीवन व उसके उद्देश्य को सफल करती व प्राप्त कराती हैं। अतः मनुष्य जन्मधारी प्रत्येक जीवात्मा को वेदों का अध्ययन कर उसकी शिक्षाओं से लाभ उठाना चाहिये। मत-मतान्तर इसमें बाधक बन रहे हैं जिससे मनुष्यों की हानि हो रही है और वह अनेक प्रकार से धर्म, ईश्वरोपासना व यज्ञादि कर्म करने तथा इनसे होनो वाले लाभों की प्राप्ति से वंचित रह जाते हैं।

ईश्वर प्रदत्त वेद ज्ञान से हमें विदित होता है कि हम जीवात्मा हैं। हमारा आत्मा सत्य तथा चेतन है। यह एक स्वल्प अणु परिमाण, एकदेशी, ससीम, अल्पज्ञ, जन्म-मरण धर्मा, शुभाशुभ कर्मों को करने वाला तथा उनके फलों का भोक्ता है। हमारी आत्मा की सत्ता अनादि, नित्य, अमर व अविनाशी है। ईश्वर को जानकर उसकी उपासना व यज्ञादि श्रेष्ठ कर्मों को कर यह जन्म मरण के बन्धनों से छूट कर मोक्ष को प्राप्त होता है। जिस मनुष्य को जन्म मिला है यदि उसने वेदों को न जाना तो वह जीवन उत्थान विषयक आवश्यक ज्ञान तथा उसके पालन से होने वाले अनेक लाभों से वंचित रह जाता है। इस कारण उसका मनुष्य जन्म लेना सार्थक नहीं हो पाता। वेदाध्ययन तथा वैदिक ग्रन्थों से हमें ज्ञात होता है कि हम अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, शाश्वत तथा सनातम चेतन अल्पज्ञ सत्ता हैं। हमें पुण्य कर्मों को कर सुख प्राप्त करने चाहिये। पूर्व कृत शुभाशुभ कर्मों का भोग करते हुए मोक्ष के लिये किये जाने वाले कर्मों को भी करके हमें जन्म मरण से छूट कर मोक्ष को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये। मोक्ष में मनुष्यात्मा को किसी प्रकार का किंचित भी दुःख नहीं होता और मुक्तात्मा हर क्षण ईश्वर के सान्निध्य में सुख व आनन्द का भोग करता है। वह ईश्वर से अनेक शक्तियों को प्राप्त होकर ब्रह्माण्ड में स्वेच्छापूर्वक विचरण करता है और मुक्तात्माओं से मिलता व उनसे वार्तालाप भी करता है। मोक्ष अवस्था में मुक्तात्मा को अपने पूर्वजन्म की स्मृति भी बनी रहती है, ऐसा हमने अधिकारी विद्वानों के उपदेशों से जाना है। यह मोक्ष की अवस्था ही सभी मनुष्यों के लिये प्राप्तव्य है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में ऋषि दयानन्द ने मनुष्य जन्म एवं मोक्ष विषय पर सारगर्भित अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी विचार प्रस्तुत किये हैं।

मनुष्य को अविद्या व विद्या के सत्यस्वरूप को जानना चाहिये। इस विषय में ऋषि दयानन्द ने सार रूप में बहुत ही उत्तम विचार प्रस्तुत किये हैं। वह कहते हैं जो मनुष्य विद्या और अविद्या के स्वरूप को साथ ही साथ जानता है वह अविद्या अर्थात् कर्मोपासना से मृत्यु को तर के विद्या अर्थात् यथार्थ ज्ञान से मोक्ष को प्राप्त होता है। अविद्या का लक्षण बताते हुए वह कहते हैं कि जो अनित्य संसार और देह आदि में नित्य अर्थात् जो कार्य जगत् देखा व सुना जाता है, सदा रहेगा, सदा से है और योगबल से देवों का यही शरीर सदा रहता है, वैसी विपरीत बुद्धि होना अविद्या का प्रथम भाग है। वह आगे कहते हैं कि अशुचि अर्थात् मलमय स्त्री आदि के शरीर और मिथ्याभाषण, चोरी आदि अपवित्र में पवित्र बुद्धि रखना, दूसरा अत्यन्त विषयसेवनरूप दुःख में सुख बुद्धि आदि तीसरा, अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या का चैथा भाग है। यह चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहलाता है।

इस अविद्या के विपरीत अनित्य में अनित्य और नित्य में नित्य, अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्र, दुःख में दुःख, सुख में सुख, अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है। जिससे पदार्थों का यथार्थ स्वरूप बोध होवे वह विद्या और जिस से तत्वस्वरूप न जान पड़े अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहाती है। अर्थात् कर्म और उपासना अविद्या इसलिये हैं कि यह बाह्य और अन्तर क्रिया विशेष का नाम हैं, ज्ञानविशेष नहीं। इसी कारण बिना शुद्ध कर्म और परमेश्वर की उपासना के मृत्यु दुःख से पार कोई नहीं होता। अर्थात् पवित्र कर्म, पवित्रोपासना और पवित्र ज्ञान ही से मुक्ति और अपवित्र मिथ्याभाषणादि कर्म पाषाणमूर्ति आदि की उपासना और मिथ्याज्ञान से बन्ध अर्थात् जन्म व मरण होता है।

मुक्ति और बन्ध का वर्णन करते हुए ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में लिखा है कि जिस से मनुष्य का छूट जाना हो उस का नाम मुक्ति है। मनुष्य जिससे छूट जाने की इच्छा करते हैं वह दुःख होता है। अतः समस्त दुःखों से छूटने का नाम मुक्ति है। मनुष्य दुःखों से छूट कर किसको प्राप्त होता है, इसका उत्तर है कि वह दुःख से छूट कर सुखों को प्राप्त होता है। दुःखों से छूट कर सुख को प्राप्त होकर मनुष्य सर्वव्यापक ईश्वर में रहता है। मुक्ति व बन्ध किन कारणों से होता है इसका उल्लेख करते हुए ऋषि कहते हैं कि परमेश्वर की आज्ञा पालने, अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसनों से अलग रहने और सत्यभाषण, परोपकार, विद्या, पक्षपातरहित न्याय, धर्म की वृद्धि करने, वेद विधि से परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना और उपासना अर्थात् योगाभ्यास करने, विद्या पढ़ने, पढ़ाने और धर्म से पुरुषार्थ कर ज्ञान की उन्नति करने, सब से उत्तम साधनों को करने और जो कुछ करे वह सब पक्षपातरहित न्याय-धर्मानुसार ही करें। इन साधनों से मुक्ति और इन से विपरीत ईश्वराज्ञाभंग करने आदि काम से बन्ध होता है। मुक्ति से जुड़े अन्य अनेक प्रश्नों व शंकाओं का भी ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में समाधान किया है। अतः सभी मनुष्यों को सत्यार्थप्रकाश व इसके सातवें से दशम् समुल्लास का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये। इस अध्ययन से वह लाभ होगा जो अन्य किसी साधन व उपाय से कदाचित नहीं होता।

मुक्ति व मोक्ष के साधन क्या क्या हैं?, इसको जानना भी हमारे लिये आवश्यक है। ऋषि बताते हैं कि जो मनुष्य मुक्ति प्राप्त करना चाहें वह जीवनमुक्त अर्थात् जिन मिथ्याभाषणादि पाप कर्मों का फल दुःख है, उन को छोड़ सुखरूप फल को देने वाले सत्यभाषणादि धर्माचरण अवश्य करे। जो कोई मनुष्य दुःख से छूटना और सुख को प्राप्त होना चाहैं वह अधर्म को छोड़ धर्म अवश्य करें। क्योंकि दुःख का पापाचरण और सुख का धर्माचरण मूल कारण है। इसके साथ ही ऋषि यह भी बताते हैं कि मोक्ष चाहने वाले मुमुक्षुओं को सुखी जनों में मित्रता, दुःखी जनों पर दया, पुण्यात्माओं से हर्षित होना तथा दुष्टात्माओं में न प्रीति और न वैर करना चाहिये। नित्यप्रति नयून से न्यून दो घण्टे पर्यन्त सभी मुमुक्षु ध्यान अवश्य करें जिस से भीतर के मन आदि पदार्थ साक्षात हों। ऋषि दयानन्द ने मोक्ष विषय को समस्त वैदिक वांग्मय का अध्ययन कर अत्यन्त सरल व सुबोध शब्दों में सत्यार्थप्रकाश में प्रस्तुत किया है। इस सब वर्णन को इस लेख में प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है। अतः सबको सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिये। यदि इसका अध्ययन नहीं किया तो मनुष्य मुक्ति से तो वंचित होगा ही, उसके ज्ञान से भी वंचित रहेगा। यदि ज्ञान ही प्राप्त कर लें तो यह भी कम बड़ी बात नहीं होगी। न जानें किसी जन्म में यह मनुष्य के काम आये व मुक्ति का लाभ प्राप्त हो सके।

यह सुनिश्चित है कि हमें मनुष्य जन्म परमात्मा से सत्य विद्याओं को प्राप्त होकर आत्मा की उन्नति करने, श्रेष्ठ आचरणों को करने तथा मोक्ष प्राप्ति के लिये ही मिला है। कर्म फल भोग भी मनुष्य जन्म का कारण है परन्तु यह मुक्ति व मोक्ष के समस्त तुच्छ लाभ है। हम सबको मोक्ष के लिये प्रयत्न करने चाहियें और इसके लिए वेद और सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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