क्या आर्य समाज एक अलग पंथ या संप्रदाय है ?

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आर्य समाज एक क्रन्तिकारी आन्दोलन है जिसका मुख्य उद्देश्य समाज में फैले विभिन्न-प्रकार के पाखंड, मत-मतान्तर,जाति-पाती, अनेक-प्रकार के सम्प्रदायो ,मूर्ति-पूजा,आदि अन्धविश्वास को दूर करने वाला एक विश्वव्यापी आन्दोलन है इसके प्रवर्तक भगवतपात महर्षि देव दयानन्द सरस्वती है !
आर्यसमाज के बारे में भ्रान्तिया:
1 .आर्यसमाजी ईश्वर को नहीं मानते?
उत्तर:- गलत।
आर्य समाजी ही ईश्वरवादी होतें है।
आर्य सिर्फ एक ईश्वर की उपासना करतें हैं।(अन्य तो किसी गुरु, पाषाण, वृक्ष, प्रतिमा या मज़ार की पूजा करते है ईश्वर
की नहीं।)
2 .आर्यसमाज एक अलग पंथ या सम्प्रदाय है?
उत्तर:- गलत।
आर्यसमाज हिन्दू धर्म का शुद्धतम रूप है। अंधविश्वासों के विरुद्ध चलने वाला आंदोलन है कोई अलग पंथ या सम्प्रदाय नहीं।
3 .आर्यसमाजियों का धार्मिक ग्रन्थ “सत्यार्थ प्रकाश ” है?
उत्तर:- गलत।
आर्य समाजियों का धार्मिक ग्रन्थ सिर्फ वेद हैं। वेद सर्वोच्च हैं। महर्षि दयानंदजी द्वारा रचित सत्यार्थ प्रकाश मूलतः वेदों की ओऱ लौटने में सहायक एक ग्रन्थ है इस से हम मार्गदर्शन प्राप्त करतें है किन्तु ये धार्मिक ग्रन्थ की श्रेणी में नहीं है।
4 आर्यसमाज राम और कृष्ण को नहीं मानता?
उत्तर:- गलत।
आर्यसमाज प्रभु राम और योगेस्वर कृृष्ण को महापुरुष की श्रेणी में रखता है। अपना आदर्श मानता है। अपना पूर्वज मानता है। उनके बताये रास्ते पर चलने
का आग्रह करता है। किन्तु इनकी मूर्ति बना कर पूजने को इन महापुरुषों का अपमान मानता है। और ये महापुरुष भी परमपिता परमात्मा की ही उपासना करते थे!
5. आर्यसमाज ऋषि दयानंद के अतिरिक्त किसी अन्य महर्षि को महत्त्व नहीं देता?
उत्तर:- गलत।
महर्षि ने स्वंय कहा की यदि मै ऋषि कणाद या ऋषि जैमिनी के काल में होता तो उनके समक्ष मैं अपने आप को कुछ भी नहीं मानता हूँ। यानी ऋषि के हर्दय में अपने सभी वैदिक ऋषियों के प्रति असीम सम्मान था। आर्यसमाज भी समस्त वैदिक ऋषियों के प्रति सम्मान
रखता है। इसमें आदिगुरुशंकराचार्य
जी भी है जिन्होंने वैदिक धर्म
की पुनरिस्थापना की और समाज को अवैदिक[अर्थात् पाखण्ड से] मार्ग पे जाने से बचाया।
6 .आर्यसमाज अन्य विचारधारों का सम्मान नहीं करता?
उत्तर:- गलत।
आर्यसमाज अन्य विचारधाराओं का सम्मान करता है एवं उनकी उपयोगिता से परिचत है। आर्यसमाज समझता है
की मनुष्य का एक ही धर्म है जो वैदिक
आलोक में हो किन्तु समाज में एक सी बुद्धि न होने के कारन विचारधारा भिन्न हो सकती है। आर्यसमाज वेदों का विरोध करने वाले बुद्ध को भी “महात्मा” बुद्ध कहता है। अनीश्वरवादी जैन धर्म के प्रवर्तक को भी “भगवान” महावीर कहता है। किन्तु किया असत्य को असत्य न कहा जाये ??? समाज को न बताया जाए की सही मार्ग (वैदिक मार्ग ही उचित है) क्या है ???
सत्य कटु होने के कारण लोगों को चुभता है। सत्य कहने के लिए
साहस चाहिये जिसमे आर्यसमाज हमेशा आगे है।
7 . आर्यसमाज ऋषि दयानंद को गुरु मानता है।
उत्तर:- गलत।
हमारे गुरु मात्र वेद है। हम अपना दिशा निर्देशन वेदों से प्राप्त करतें है। जो जो वैदिक हो उसे ग्रहण करते है और अवैदिक का त्याग करते हैं। ऋषि दयानंद जी के प्रति अपने हर्दय में सम्मान रखतें हैं किन्तु कभी भी कहीं भी ऋषि की पूजा नहीं करते हम उनके द्वारा दिखाए गए सत्य मार्गो का अनुसरण करते है
हमारा संकल्प है विश्व को आर्य बनाना,,,🙏🌷🌹🙏

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