अधिकार से पहले कर्तव्य , अध्याय – 11, पति और पत्नी के एक दूसरे के प्रति कर्त्तव्य

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मनुष्य का जीवन कुछ इस प्रकार का है कि इसमें जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत किसी ना किसी का सहारा लेना आवश्यक हो जाता है। जन्म लेते ही प्राकृतिक रूप से हमारी माँ हमारे लिए सहारा बन जाती है। हमारे जन्म के कुछ समय पश्चात ही माता के साथ – साथ इसी कार्य को पिता भी करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में इन दोनों को हमारा प्राकृतिक संरक्षक माना गया है। इसके पश्चात हमको गुरु का सहारा मिलता है । यौवन की दहलीज पर पैर रखते ही युवक और युवकियों को भी अपने किसी जीवनसाथी की आवश्यकता अनुभव होती है । उस समय शरीर में विकसित हुईं प्राकृतिक शक्तियां भी इस ओर बढ़ने के लिए इन दोनों को प्रेरित करती हैं । इसका कारण यही होता है कि ईश्वर भी सृष्टि क्रम को चलाने के लिए उनके शरीर में कुछ ऐसे परिवर्तन करता है जिससे वे स्वाभाविक रूप से एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं ।

इस अवस्था में दोनों ही जिन सपनों में खोए रहते हैं उनमें एक दूसरे का सहारा बनकर रहने और एक घनिष्ठ मित्र की भांति जीवन व्यतीत करने के संकल्प भी बनते रहते हैं । दोनों की इच्छा होती है कि हम एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और एक दूसरे की भावनाओं को समझकर प्रेमपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करेंगे। सपनों में चलने वाली इन बातों और भावों में ही विवाह से पहले विवाह के बाद के प्रेमपूर्ण जीवन की आधारशिला रख दी जाती है। मानसिक रूप से इस प्रकार के भावों में खोए रहने के कारण जैसे ही किसी युवक-युवती का मिलन विवाहोपरांत पति पत्नी के रूप में होता है तो वे आजीवन एक दूसरे के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार करने और जीवन को रसमय बनाकर जीने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं लगता कि जैसे दो अजनबी एक दूसरे से मिल रहे हों । सपनों में एक दूसरे का चित्र पहले से ही खींच लेने के कारण उन्हें ऐसा लगता है कि जैसे हम जन्म जन्मों से एक दूसरे को जानते हैं।
ऐसे पवित्र संबंध को हमारे पूर्वजों ने भली प्रकार समझा । उन्होंने इस ‘प्रेम’ नाम के सर्वाधिक सरस प्रवाह को यूं ही पशुवत बहने से रोकने का प्रबन्ध किया । उन्होंने प्रेम का नाम सृजन रखा। प्रेम की पराकाष्ठा को उन्होंने धर्म बना दिया । प्रेम का मानवतावादीकरण करते हुए पति और पत्नी के बीच इसे कुछ इस प्रकार स्थापित किया कि यह दोनों ही विधाता की साक्षात मूर्ति बन गए । सृष्टि के संचालन के लिए फूटी इस प्रेम नाम की पंखुड़ी ने पति और पत्नी दोनों को ही एक दूसरे के लिए देवता और देवी बना दिया ।
इस प्रकार हमारे यहां के गृहस्थी का संचालन प्रेम नाम के देवता से आरंभ हुआ और अंत में जब अपनी पराकाष्ठा को प्राप्त होकर धर्म को प्राप्त हुआ तो गृहस्थी का सारा चक्र इसी प्रेम नाम की पराकाष्ठा में अर्थात धर्म में समाविष्ट हो गया। इस प्रकार हमारे देश में प्रेम और धर्म दोनों एक हैं । दोनों मिलते हैं तो सनातन हो जाते हैं । दोनों अलग-अलग होते हैं तो सृजन और मर्यादा का प्रतीक बन जाते हैं। नदी के दो किनारे बन जाते हैं । जिनके बीच में रहते हुए गृहस्थी के शीतल जल को प्रवाहित होना है।
पत्नी का भरण पोषण पति का पहला कर्तव्य
ऋग्वेद (10 . 85. 36) में व्यवस्था की गई है कि पत्नी के भरण-पोषण की पूर्ण व्यवस्था करना पति का सर्वप्रथम कर्तव्य है। ऋग्वेद का मंत्र कहता है कि पति सौभाग्य के लिए पत्नी का पाणिग्रहण करता है और वह यह कहता है कि मैं इसके पालन-पोषण का उत्तरदायित्व लेता हूं : गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तम्। प्रेम की पहली शर्त है नि:स्वार्थ भाव से किसी को अपना लेना । बदले में कुछ लेना नहीं है , बल्कि देना है और यह देना ही वह कर्तव्य है जिसके सहारे यह संसार चलता है । यदि वेद पति पत्नी के बीच देने की बात न करके इसके स्थान पर लेने की बात करने लगता तो यहां प्रेम स्वार्थ पूर्ण हो जाता। कलंकित हो जाता। उस का रस मर जाता । वह नीरस को जाता। जो लोग भी वहां को एक संस्कार न मानकर एक संविदा मानते हैं , उनके यहां पर यह जिम्मेदारी नहीं उठाई जाती कि पति ही पत्नी का भरण – पोषण अनिवार्य रूप से करेगा। जिससे पति – पत्नी दोनों आत्मिक रूप से एक दूसरे के साथ नहीं आ पाते । दोनों एक संविदा करते हैं , मैं अपने ढंग से कमाऊँ खाऊंगा और तुम अपने ढंग से कमाओ खाओगे। वासना और शारीरिक भूख की पूर्ति के लिए हम दोनों एक साथ चलते हैं । जब कहीं हमारा एक दूसरे से मन भर जाएगा तो इस संविदा को तोड़ देंगे । इन लोगों का विवाह के प्रति ऐसा दृष्टिकोण विवाह को संस्कार नहीं बनाता और परिवार को एक संस्था नहीं बनाता।
पति ने पत्नी के प्रति अपने पहले कर्तव्य को स्वीकार करते हुए यह मान लिया कि वह इसका भरण पोषण करेगा । पर भरण पोषण का अभिप्राय केवल इतना ही नहीं है कि वह उसको भोजन वस्त्र की समय पर पूर्ति कराएगा । इससे आगे भी कुछ इसका अर्थ है। इसको स्पष्ट करते हुए ऋग्वेद (10 .71. 4) में बताया गया है कि पति का अपनी पत्नी के प्रति यह भी कर्तव्य है कि वह उसके जीवन स्तर को ऊंचा करने का भी हरसंभव प्रयास करेगा । जीवन स्तर तभी उन्नत और ऊंचा होता है जब पत्नी सुसंस्कारित और सुशिक्षित हो । इसका अभिप्राय हुआ कि पत्नी के अंदर इन दोनों चीजों का समावेश करने के लिए पति उसके लिए ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करेगा , जिसमें वह सुसंस्कृत और सुशिक्षित हो सके । अतः वेद ने पति का यह कर्तव्य घोषित किया है कि वह ऐसी सभी सुख सुविधाएं अपनी पत्नी को प्रदान करे जिनमें से वह प्रसन्न रह सके और पति के प्रति आत्मसमर्पण के लिए उद्यत रहे । वेद की व्यवस्था है कि :- उतो त्वस्मै तन्वं वि सस्रे, जायैव पत्य उषती सुवासा:।
आजकल पति पत्नी के बीच सम्बन्धों में तनाव का एक कारण यह है कि पति या पत्नी एक दूसरे से छुपकर कुछ रहस्यमयी कार्य करते रहते हैं । जिनकी जानकारी होने पर एक दूसरे का क्रोध लावा बनकर फूट पड़ता है । ऐसे शक संदेह पैदा करने वाले कोई भी कार्य घर गृहस्थी में किया जाना पूर्णतया अपराध है । पति – पत्नी को भी एक दूसरे के बीच ऐसा कोई रहस्य बनाकर नहीं रखना चाहिए जिससे उनके सम्बन्धों की पवित्रता भंग होती हो । आजकल न्यायालय में जितने भी वाद-विवाद पत्नी और पति के मध्य प्रस्तुत होते हैं या प्रस्तुत किए जाते हैं उन सब का एक कारण अनावश्यक संदेहों को हवा देने वाली कार्यशैली भी होती है । यदि पति – पत्नी को कार्यशैली को ठीक कर अपने आप को उससे बचाएं तो ऐसी स्थिति उत्पन्न ही नहीं हो सकती।
पति संयमी और तेजस्वी हो
वैद्य ने पति के लिए संयमी और तेजस्वी होने का विशेष गुण बताया है । संयमी और तेजस्वी पति ही पत्नी का सम्मान कर सकता है और उसे सुयोग्य संतान भी दे सकता है । अथर्ववेद में पति के लिए यम: (संयमी), राजन (तेजस्वी एवं सम्पन्न), असित: (बंधनों से मुक्त), कश्यप:(दृष्टा विचारक), गय: (प्राणशक्ति सम्पन्न) जैसे विशेषण प्रयोग किये गये हैं। यदि इन विशेषणों पर विचार किया जाए पति के अंदर बहुत गंभीरता , संयमशीलता , तेजस्विता और बंधनों से मुक्त रहने की शक्ति , विचारक के रूप में उसका गहन चिंतन और प्राणशक्ति संपन्नता जैसे गुणों का होना अनिवार्य है। जहां पति के अंदर ऐसे गुण होंगे वहां असंयम , अमर्यादा , अनैतिकता जैसी चीजों के लिए स्थान नहीं होगा और ऐसा न होने से घर में स्वैर्गिक वातावरण स्वयं ही उत्पन्न हो जाएगा । वेद ऐसे ही गुणी व्यक्ति को पति होने का सम्मान प्रदान करता है।
संस्कृत में सुभाषित है कि ‘ न गृहं गृहमित्याहुर्गृहणी गृहमुच्यते।’ – अर्थात गृहिणी को ही घर कहा जाता है। गृहिणी को हमारे यहां पर वैदिक संस्कृति में गृहस्वामिनी का सम्मान दिया गया है। परंतु उसे घर कहना तो उसके लिए और भी बड़े सम्मान की बात है। क्योंकि घर परिवार का प्रतीक है और परिवार एक संस्था है। उस संस्था को यदि एक व्यक्ति में केंद्रित किया जाए तो वह गृहिणी है । इस प्रकार गृहिणी का एक संस्था का प्रतीक बन जाना सचमुच उसकी महिमा में चार चांद लगाना है। इसका अभिप्राय यह भी हुआ कि गृहस्वामिनी या पत्नी का यह कर्तव्य है कि वह ऐसे व्यवहार और आचरण को निष्पादित करने वाली हो जिससे वह स्वयं ही ‘घर’ बन जाए।
गृहस्वामिनी होती है ‘घर’
किसी भी संस्था का मुखिया होने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी योग्यता या पात्रता प्राप्त करनी ही पड़ती है। स्पष्ट है कि यदि गृहस्वामिनी ‘घर’ बनना चाहती है तो उसके लिए अपेक्षित साधना शक्ति भी उसके पास हो। पत्नी की साधना शक्ति को बढ़ाने में उसका संयमी और तेजस्वी पति भी सहभागी और सहयोगी बने । पति का सद्भाव सदा अपनी पत्नी के प्रति इस बात को लेकर बना रहे कि वह अपनी साधना कर परिवार को स्वर्ग बनाने के लिए आतुर रहे।
‘घर’ बनने की साधना के लिए गृहस्वामिनी को प्रत्येक परिजन का विश्वास जीतना होता है । सब उसके प्रति स्वाभाविक रूप से श्रद्धा रखने वाले हों । सब उसके अनुशासन में चलने वाले हों और सब उसके आदेशों को मानने वाले हों । यह तभी संभव है कि जब वह निष्पक्ष , न्यायशील , धर्मानुसार कार्य करने वाली हो । पक्षपातशून्य ह्रदय रखते हुए परिवार में समरसता की गंगा बहाने में समर्थ हो। एक अच्छी गृहस्वामिनी जहाँ परिवार के ज्येष्ठजनों के प्रति सेवाशील , श्रद्धा रखने वाली और उनके सम्मान मान मर्यादा का ध्यान रखने वाली होती है वहीं वह छोटों के प्रति अत्यधिक सहिष्णु , उदार और प्रेम करने वाली होती है । जहाँ पति घरेलू हिंसा से या किसी भी प्रकार के मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न से महिलाओं को कष्ट देते हैं वहां पर महिलाओं की ऐसी साधना सफल नहीं हो पाती । वहाँ घर में कलेश रहता है । इसलिए पति का यह दायित्व है कि वह पत्नी को किसी भी प्रकार के मानसिक या शारीरिक कष्ट में न रखे ।
अथर्ववेद (14 . 17 – 18 ) में आया है — ‘अधोस्चक्षु: सुयमा वीरसू:, देवकामा, शिवा पशुभ्य:।’ यहां पर वेद बड़े पते की बात कह रहा है। वेद का कहना है कि एक अच्छी गृहस्वामिनी के भीतर मृदुता जैसा मधुर भाव हो , कुटिलता न हो । वह परिवार को सुख देने वाली हो । वीर संतान को जन्म देने वाली हो । देव भक्त और आस्तिक हो । उसमें सौमनस्यता हो । वह पति की हित चाहने वाली हो। संयम पूर्ण जीवन शैली उसका श्रंगार हो । तेजस्विनी बनकर परिवार का पालन करने वाली हो और पशुओं आदि के प्रति उसका व्यवहार बहुत ही उदार , सहिष्णु और उत्तम हो। एक प्रकार से वेद ने इन सारे गुणों के पत्नी के भीतर समाहित होने की अनिवार्यता को घोषित कर यह भी स्पष्ट कर दिया है कि उसके व्यवहार और आचरण में इन्हीं गुणों का संपादन होता हुआ झलकना चाहिए अर्थात इन गुणों को वह अपने भीतर लाए , यह उसका कर्तव्य है।
पत्नी पति के आदेशों का पालन करने वाली और चरित्रवान हो
अथर्ववेद (2. 36 .4 ) व्यवस्था करता है कि :- संप्रिया पत्याविराधयन्ती। अर्थात पत्नी का यह भी कर्तव्य है कि वह अपने पति के आदेशों का पालन करने वाली हो और उसके मन के अनुसार कार्य करना अपना कर्तव्य कर्म स्वीकार करती हो । इस प्रकार के गुणों से परिवार का परिवेश बहुत सामंजस्यपूर्ण बना रहता है । साथ ही प्रेम के लिए अनिवार्य समर्पण का गुण ही ऐसे परिवेश में बहुत अच्छी प्रकार से पुष्पित और पल्लवित होता है। जिसका परिणाम यह होता है कि बच्चों को भी ऐसे परिवेश में अच्छे संस्कार मिलते हैं और वह परिवार आदर्श परिवार की श्रेणी में गिना जाता है। आज परिवारों के टूटन और विखंडन का एक कारण यह है कि पत्नी अपने पति के आदेशों का पालन करना अपने लिए एक बाधा मानती है । उसकी सोच ऐसी बन गई है कि जैसे यह उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करने के लिए पुरुष प्रधान समाज द्वारा उस पर डाला गया बंधन का एक घेरा है। जिसे वह एक झटके में तोड़ देना चाहती है। जहां महिला इस तथाकथित बंधन को तोड़ने में सफल हो रही है , वहीं – वहीं हम देख रहे हैं कि परिवार नाम की संस्था टूट रही है । इसका घातक परिणाम यह आ रहा है कि लोगों के दिल एक दूसरे के प्रति टूटे टूटे हैं , रूठे रूठे हैं , और फूटे-फूटे हैं । जिससे लग रहा है कि सारी दुनिया के सारे रिश्ते झूठे – झूठे हैं। फ़लस्वरूप न्यायालय में पति – पत्नियों के झगड़ों , विवादों और उनकी एक दूसरे पर की गई हिंसक वारदातों के मामलों के ढेर लगे हैं। सरकारों को इन विवादों के सुलझाने के लिए पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना करनी पड़ी है । जिनमें इस प्रकार के मामले नित्य प्रति बढ़ते ही जा रहे हैं । हमारे पारिवारिक और सामाजिक मूल्य तेजी से उजड़ रहे हैं । इस प्रकार के मामलों के निस्तारण के लिए लोग न्यायालयों में तो जा रहे हैं परंतु घर में बैठकर समस्याओं के समाधान की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं । ना ही उस शिक्षा की ओर ध्यान दिया जा रहा है जिसमें पति – पत्नी के बीच सौमनस्यता का भाव रखने के लिए आवश्यक नैतिक संस्कार प्रदान किए जाने की कोई व्यवस्था नहीं है।
तिस्रो मात्रा गन्धर्वाणां, चतस्रो गृहपत्नया:। ,( —अथर्व 3.24.6) यहां पर वेद का संदेश है कि पत्नी को चरित्रवान होना चाहिए। उसकी चरित्रशीलता उसे सबके सम्मान का पात्र बनाती है। नारी या पत्नी का चरित्रशील होना पूरे परिवार को मर्यादित और संतुलित बनाए रखता है । किसी को भी मर्यादाहीन आचरण करने की छूट तब मिलती है जब गृह स्वामिनी स्वयं चरित्रहीन हो। उसके विचार भ्रष्ट हों और कार्य निकृष्ट हों ।
ऐसी गृहस्वामिनी घर पर नियंत्रण स्थापित करने में असफल हो जाती है। घर पर नियंत्रण न रख पाने के कारण उसका प्रशासन अस्त-व्यस्त हो जाता है और परिवार रूपी सारी संस्था अराजकता का शिकार हो जाती है । इन सारी विपरीत परिस्थितियों से परिवार रूपी नैया को बचाए रखने के लिए नारी का संयमी और चरित्रवान होना बहुत आवश्यक है अर्थात उसका यह कर्तव्य है कि वह स्वयं चरित्रवान बनकर पूरे परिवार के चरित्र की रक्षा करे । परिवार रूपी संस्था में किसी भी प्रकार की अराजकता को पनपने से रोकना भी किसी गृहस्वामिनी के लिए तभी संभव है जब वह स्वयं संयमित और अनुशासित जीवनशैली को अपना पर चलने वाली हो। इससे परिवार रूपी संस्था ही नहीं बल्कि राष्ट्र रूपी संस्था भी अनुशासित और मर्यादित रहेगी।
पति – पत्नी के सामूहिक कर्तव्य
वेद पति पत्नी दोनों के लिए कुछ सामूहिक कर्तव्य निर्धारित करता है । जिन्हें अपनाने से गृहस्थ की गाड़ी बहुत संतुलित होकर चलती है। ऐसे सदगृहस्थी दंपति का अन्य लोग अनुसरण करते हैं । कलह कटुता उनके घर से दूर रहते हैं और सर्वत्र शांति का वास होता है । वेद पति – पत्नी से अपेक्षा करता है कि वे दोनों जीवन को कर्मठ बनाने , सत्य भाषण करने , पारस्परिक सौहार्दभाव (समापो हृदयनि नौ) रखने वाले होंगे । वे परस्पर मृदु भाषण कर एक दूसरे का सम्मान करने वाले होंगे । संयमी होकर दूसरों के लिए मिसाल बनने की योग्यता रखते हुए जीवन यापन करेंगे तथा खुले हाथों से दान करने वाले होंगे ।
जिन दंपतियों के भीतर ऐसे गुण मिलते हैं वे जीवन को स्वर्ग बना डालते हैं। अथर्ववेद कहता है कि दोनों के हृदय परस्पर मिले हुए हों, वे दोनों एक-दूसरे का ही चिंतन करें : अन्त: कृणुष्व मां हृदि। —अथर्व. 7.36.1
जैसे कोई भक्त अपने भगवान का अनन्य भाव से ध्यान करता है वैसे ही पति पत्नी एक दूसरे के प्रति अनन्य भाव रखने वाले हों । अनन्य भाव की इस पवित्र भावना से उनके ह्रदय में एक दूसरे के प्रति असीम प्रेम भरा रहता है।
इसके अतिरिक्त पति पत्नी दोनों का यह भी पवित्र कर्तव्य है कि वे एक दूसरे की भावना का सम्मान करने वाले हों। एक दूसरे को गहराई से समझने का प्रयास करें और समय आने पर एक दूसरे की रुचि , इच्छा और भावनाओं का सम्मान करने का हरसंभव प्रयास करें । इससे संबंधों में मधुरता बनी रहती है और किसी भी स्थिति – परिस्थिति का दोनों मिलकर सफलतापूर्वक सामना करने में भी सफल होते हैं।
अपने ही विचारों की दुनिया में खोए रहना कई पुरुषों का काम होता है तो कई महिलाएं भी इसी प्रकार की प्रवृत्ति को अपनाने वाली होती हैं । इससे दोनों में अनावश्यक दूरी पैदा होती है। एक दूसरे के प्रति दोनों असहिष्णु बनने का प्रयास करते हैं और धीरे-धीरे उनकी यह प्रवृत्ति न चाहते हुए भी उन्हें टूटन की ओर ले जाती है।
विवाह के उपरांत समाज पति और पत्नी दोनों से जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार करने की अपेक्षा करता है। इसलिए दोनों का यह कर्तव्य बन जाता है कि वह अपने आप को जिम्मेदार और गंभीर जीवनसाथी के रूप में प्रस्तुत करें । छोटी-छोटी बातों को तूल देकर अपने संबंधों को तोड़ने की स्थिति तक ले जाना उनकी गंभीरता का परिचायक न होकर उनके बचपने और लड़कपन का प्रतीक है । जिससे उन्हें बचना चाहिए । समाज ने जब उन्हें विवाह सूत्र में बंधते हुए देखा था तो अपनी साक्षी और अपनी गरिमामय उपस्थिति इसलिए प्रकट की थी कि अब तुम गुड्डे गुड़िया नहीं रह गए हो , बल्कि अब तुम जिम्मेदार और गंभीर मनुष्य बन चुके हो । गुड्डे गुड़ियों के खेल में या उनके विवाह में कभी ना तो बारात जाती है और ना कभी समाज के जिम्मेदार गंभीर लोगों की उपस्थिति ही हो पाती है। जिम्मेदार , गंभीर और समझदार लोग युवाओं की परिपक्व अवस्था में होने वाले विवाह समारोहों में ही सम्मिलित होते हैं। इसका कारण यही है कि वे नवदंपति को आज से पति-पत्नी का प्रमाण पत्र दे रहे हैं । उन्हें उस गंभीर जिम्मेदारी को निभाने के लिए अपना आशीर्वाद दे रहे हैं , जिससे यह संसार गतिशील बना रहता है।
युवावस्था में परिपक्वता आ जाना इसलिए भी आवश्यक और अपेक्षित है कि प्रत्येक युवक और युवती विवाह के उपरांत अपने जीवनसाथी को परिपक्व रूप में ही देखना चाहते हैं । यदि विवाह के उपरांत इन दोनों में से कोई एक अपरिपक्वता का परिचय देने वाला होता है तो इससे गृहस्थ की गाड़ी सफलतापूर्वक आगे बढ़ नहीं पाती है।
अपनी परिपक्वता का परिचय देने के लिए पति पत्नी को समय-समय पर एक दूसरे की प्रशंसा करने से भी नहीं चूक ना चाहिए । क्योंकि संसार के प्रत्येक व्यक्ति की यह दुर्बलता होती है कि वह दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनना ही चाहता है । जहां पति और पत्नी दोनों एक साथ रहते हैं यदि वहां वे एक दूसरे की प्रशंसा करने में कंजूसी करते हैं या चूक कर जाते हैं तो इससे भी संबंधों में ठहराव आने लगता है। इसलिए संबंधों को गतिशील और प्रेमपूर्ण बनाए रखने के लिए इस बात का सदा ध्यान रखें कि जब भी कोई उचित अवसर आए तो वे एक दूसरे की प्रशंसा अवश्य कर दें । विवाह के उपरांत पति पत्नी से सारा समाज अपेक्षा करता है कि वे दोनों गंभीरता का परिचय देंगे। अतः समाज की इस अपेक्षा पर खरा उतरना भी उन दोनों का कर्तव्य है।
अच्छे गुणों का विकास करने के लिए आवश्यक है कि सदग्रंथों का अध्ययन करने की रुचि पति और पत्नी दोनों में ही होनी चाहिए । उनके भीतर धार्मिक संस्कार हों और ईश्वर भक्ति उनमें कूट कूटकर भरी हो। ईश्वर के प्रति आस्था और धर्म ग्रंथों के प्रति श्रद्धा के भाव से वह दुर्गुणों से बचे रहते हैं। इन दोनों गुणों से उनके भीतर असीम धैर्य विकसित होता है । जिससे एक दूसरे के प्रति झुंझलाहट जब कड़वाहट उन्हें छू तक भी नहीं जाती है। ईश्वर के प्रति आस्था और श्रद्धा ग्रंथों के प्रति श्रद्धा भाव से अपनी जिम्मेदारियों का गंभीरता से निर्वाह करने वाले बन जाते हैं । एक दूसरे को समझने की उनकी शक्ति का विकास होता है । बच्चों के प्रति दोनों अपने – अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने वाले बनते हैं । साथ ही परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं । धार्मिक और अनुशासित होते हैं।
जहां पत्नी का यह कर्त्तव्य है कि वह पति के पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों का आदर करे तथा उनकी सुविधा का ध्यान रखे , वहीं उसके लिए यह भी आवश्यक है कि वह कभी भी अपने पीहर में ससुराल वालों की निंदा या बुराई न करे। कभी भी पति के प्रति कटु, तीखे एवं व्यंग्यात्मक शब्दों का प्रयोग न करें। इस बात का ध्यान रखे कि तलवार का घाव भर जाता है, पर बात का नहीं भरता है । एक आदर्श पत्नी का यह भी कर्त्तव्य है कि पति के सामने कभी भी ऐसी मांग न रखे जो पति की सामर्थ्य के बाहर हो।
पैसे का अपव्यय न करे। पति से परामर्श करके ही संतुलित एवं आय के अनुसार ही व्यय की व्यवस्था करे। पति के साथ अपने सम्बन्ध को पैसे का आधार नहीं बनाकर सहयोग की भावना से गृहस्थी चलानी चाहिये। कभी – कभी छोटी – छोटी बातें भी वैवाहिक जीवन में आग लगा देती हैं, हरे – भरे गृहस्थ जीवन को वीरान बना देती हैं। आपसी सामंजस्य, एक दूसरे को समझना, किसी के बहकावे में न आना, अपितु अपनी बुद्धि से काम लेना ही वैवाहिक जीवन को सुन्दर, प्रेममय व महान बनाता है। अपने किसी भी मामले को लेकर एक दूसरे के खिलाफ पंच पंचायत ना करें और ना ही कोर्ट कचहरी में जाकर किसी प्रकार का केस डालने का प्रयास करें । पुलिस थाने में जाकर भी एक दूसरे का अपमान करने से बचें। समय के अनुसार ‘सब सामान्य’ होने की प्रतीक्षा करें । धैर्य और विवेक का परिचय देते हुए अपने बच्चों के भविष्य का ध्यान रखकर एक दूसरे के साथ अच्छा सामंजस बनाकर चलने के लिए सदा प्रयास करते रहें ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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