कोरोना वायरस के सामुदायिक प्रसार का पता लगाएगी स्वदेशी किट

योगेश कुमार गोयल

सेरो सर्वे का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक संक्रमण का पता लगाना होता है, जिसमें किसी विशेष इलाके में एक साथ कई लोगों के ब्लड सीरम टेस्ट किए जाते हैं, जिससे पता चल जाता है कि संक्रमण किस स्तर पर फैल रहा है।

भारत सहित पूरी दुनिया कोरोना के कहर से त्रस्त है और पूरी दुनिया में कोरोना के लिए वैक्सीन बनाने के प्रयासों के अलावा कोरोना की जांच के लिए भी सस्ती और कारगर तकनीकों की ओर कदम बढ़ाए जा रहे हैं। भारतीय वैज्ञानिक भी कोरोना वैक्सीन बनाने के अलावा नई-नई स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल कर इस मिशन में सफलतापूर्वक आगे बढ़ रहे हैं। कोविड-19 से निजात पाने के सफल प्रयासों की इसी कड़ी में भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड के साथ मिलकर आईसीएमआर ने देश में ही कोरोना वैक्सीन तैयार करने के लिए काम शुरू कर दिया है, वहीं कोरोना जांच को लेकर भी भारत द्वारा सफलताएं हासिल की जा रही हैं।

महामारी के सामुदायिक प्रसार की जांच के लिए चीन तथा कोरिया की कोरोना जांच किट फेल होने के बाद भारत ने स्वदेशी तकनीक पर आधारित पहली कोरोना जांच किट विकसित कर बड़ी सफलता हासिल की है। इन किटों के लिए अब भारत की विदेशों पर निर्भरता कम हो जाएगी। भारतीय वैज्ञानिकों ने केवल एक महीने में ही यह किट विकसित करने का करिश्मा कर दिखाया। देश की यह पहली स्वदेशी ‘एंटीबॉडी डिटेक्शन किट’ पुणे स्थित वायरोलॉजी से जुड़े शोध की तमाम उच्चतम सुविधाओं से सम्पन्न देश की सर्वोच्च प्रयोगशाला ‘राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थान’ (एनआईवी) के वैज्ञानिकों द्वारा बनाई गई है, जो भारत में कोरोना संक्रमण के प्रसार पर नजर रखने में सहायक होगी। पिछले दिनों देश के 83 हॉट-स्पॉट जिलों में 26 हजार से भी ज्यादा लोगों की जांच की गई और काफी सकारात्मक परिणाम सामने आए। इसी को देखते हुए कोरोना महामारी के सामुदायिक प्रसार की जांच के लिए हरियाणा सरकार द्वारा भी अब राज्य के सभी जिलों में ‘कोविड कवच एलिसा’ नामक टेस्ट के लिए सेरो सर्वे (किसी विशेष इलाके में एक साथ कई लोगों के ब्लड सीरम टेस्ट) कराने का निर्णय लिया गया है। पहले दौर में यह सर्वे दिल्ली से सटे गुरुग्राम तथा फरीदाबाद के अलावा हॉट-स्पॉट और हाई रिस्क इलाकों में किया जाएगा, जिसमें एनसीआर के डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ, पैरामेडिकल स्टाफ, पुलिस तथा दूसरे फ्रंटलाइन वर्कर्स को जांच में प्राथमिकता दी जाएगी। इस टेस्ट से कोरोना से लड़ने के लिए शरीर में बनने वाली एंटीबॉडी तैयार होने का पता चलता है और रक्त की जांच से व्यक्ति के कोरोना संक्रमित होने या होकर चले जाने की जानकारी भी मिलती है। अब हरियाणा भी इस तरह की जांच कराने वाले देश के कुछ चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा।

सेरो सर्वे का मुख्य उद्देश्य सामुदायिक संक्रमण का पता लगाना होता है, जिसमें किसी विशेष इलाके में एक साथ कई लोगों के ब्लड सीरम टेस्ट किए जाते हैं, जिससे पता चल जाता है कि संक्रमण किस स्तर पर फैल रहा है। यदि आबादी में कोरोना संक्रमण है तो इस जांच से पता चल जाएगा और संक्रमित व्यक्ति में एंटीबॉडी विकसित होती है, इसकी जानकारी भी मिल जाएगी। कोविड-19 के एंटीबॉडी का पता लगाने वाली इस स्वदेशी जांच किट को ‘कोविड कवच एलिसा’ नाम दिया गया है। एलिसा का अर्थ है ‘एंजाइम-लिंक्ड इम्युनोसॉरबेंट एसे’। यह आमतौर पर जैव नमूनों में एंटीबॉडी, एंटीजन अथवा प्रोटीन और ग्लाइकोप्रोटीन जैसे अन्य यौगिकों को मापने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली प्रक्रिया है। यह एंटीबॉडी टेस्ट किट बनाने के लिए ही पहले एनआईवी के वैज्ञानिकों को मरीजों में कोविड-19 का कारण बनने वाले सार्स-कोव-2 वायरस को अलग करना पड़ा था। उसके बाद ही वैज्ञानिकों द्वारा कोविड-19 के लिए एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए एलिसा परीक्षण विकसित किया गया।

आईसीएमआर तथा एनआईवी के वैज्ञानिकों ने कोविड-19 से जुड़े एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए आईजीजी एलिसा टेस्ट को विकसित करने और मान्यता देने के लिए कड़ी मेहनत की। किट की सेंसिटिविटी और गुणवत्ता परखने के लिए मुम्बई में दो जगहों पर यह टेस्ट किए गए, जो काफी सफल रहे। विशेषज्ञों के अनुसार इस जांच किट में ऐसी उच्च संवेदनशीलता तथा सटीकता है, जिसके जरिये ढाई घंटों में एक साथ 90 सैंपल टेस्ट किए जा सकते हैं तथा इस किट से जिला स्तर पर भी एलिसा आधारित परीक्षण आसानी से संभव है। कुछ समय पहले सही परिणाम नहीं देने के कारण आईसीएमआर द्वारा चीन से करीब पांच लाख कोविड-19 रैपिड एंटीबॉडी टेस्ट किट का ऑर्डर रद्द कर दिया गया था, इसलिए सटीक परिणाम देने वाली स्वदेशी रैपिड टेस्टिंग किट की जरूरत महसूस की जा रही थी। ‘कोविड कवच एलिसा’ रैपिड टेस्टिंग किट के ही समान है, जिससे बड़े पैमाने पर लोगों की जांच की जा सकती है। मानव शरीर में कोरोना वायरस के एंटीबॉडी की मौजूदगी का पता लगाने वाली इस स्वदेशी जांच किट की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि सटीक परिणाम देने के साथ ही इससे कम समय में जांच संभव होगी और यह बड़ी आबादी वाले इलाकों में कोरोना संक्रमण के खतरे को लेकर निगरानी में अहम भूमिका निभाएगी।

कोरोना संक्रमण की जांच के लिए आरटी-पीसीआर कराना जरूरी होता है लेकिन विकसित की गई तकनीक एंटीबॉडी टेस्ट है। शरीर में कोरोना वायरस के संक्रमण का पता लगाने के लिए आरटी-पीसीआर टेस्ट किया जाता है, जिसमें लोगों का स्वैब सैंपल लिया जाता है। एंटीबॉडी टेस्ट में उंगली से एक-दो बूंद रक्त लेकर उस नमूने की जांच की जाती है, जिससे पता लगाया जाता है कि शरीर के रोग प्रतिरोधक तंत्र ने कोरोना वायरस को बेअसर करने के लिए एंटीबॉडीज बनाए हैं या नहीं। कोई व्यक्ति किसी वायरस का शिकार होता है तो उसके शरीर में वायरस से लड़ने वाले एंटीबॉडीज बन जाते हैं। इन्हीं एंटीबॉडीज का पता लगाने के लिए रैपिड टेस्ट की जरूरत पड़ती है, जिसके परिणाम काफी कम समय में आ जाते हैं जबकि कोरोना जांच के लिए आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट में करीब 24 घंटे लगते हैं। आरटी-पीसीआर टेस्ट को सर्वोत्तम टेस्ट माना जाता है लेकिन किसी आबादी में कितने लोगों का सामना वायरस से हुआ है, यह समझने के लिए एंटीबॉडी टेस्ट महत्वपूर्ण है। इसमें आरटी-पीसीआर किट की तुलना में वॉयो-सेफ्टी और वॉयो-सिक्योरिटी की जरूरत भी न्यूनतम ही होती है और यह अन्य रैपिड टेस्ट किट की तुलना में भी अधिक प्रभावी है।

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योगेश कुमार गोयल

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा कई पुस्तकों के लेखक हैं, उनकी हाल ही में पर्यावरण संरक्षण पर 190 पृष्ठों की पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ प्रकाशित हुई है)

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