दयानंद वेद योग और ब्रह्मचर्य की शक्तियों से देदीप्यमान थे

ओ३म्

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ऋषि दयानन्द संसार के सभी मनुष्यों व महापुरुषों से अलग थे। उनका जीवन वेदज्ञान, योग सिद्धि तथा ब्रह्मचर्य की शक्तियों से देदीप्यमान था। महाभारत के बाद इन सभी गुणों का विश्व के किसी एक महापुरुष में होना विदित नहीं होता। इन गुणों ने ही उन्हें विश्व का महान महापुरुष बनाया। वेदज्ञान ने उन्हें ईश्वर, जीवात्मा तथा सृष्टि विषयक सभी प्रकार के ज्ञान व रहस्यों से परिचित कराया था। योग विद्या से वह समाधि को प्राप्त हुए थे और समाधि के उद्देश्य व लक्ष्य ईश्वर साक्षात्कार को उन्होंने प्राप्त किया था। ब्रह्मचर्य मनुष्य के जीवन में अमृत के समान है। ब्रह्मचर्य मनुष्य को ज्ञान प्राप्ति में सहायक होता है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है। ब्रह्मचर्यविहीन मनुष्य ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते। ब्रह्मचर्य से शारीरिक शक्तियों में वृद्धि एवं पूर्णता प्राप्त होती है। इतिहास में ब्रह्मचर्य के लिये प्रसिद्ध वीर हनुमान, भीष्म पितामह तथा भीम आदि महापुरुष हो चुके हैं। इनकी यशगाथायें रामायण एवं महाभारत ग्रन्थों में जानने को मिलती है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य मृत्यु के पार जा सकता है। ब्रह्मचर्य का नाश जीवन का नाश है। महर्षि दयानन्द ने स्वयं यह बताया है कि उन्होंने अपने को जीवन भर इतना व्यस्त रखा कि ब्रह्मचर्य विरोधी विचार बाहर खड़े होकर प्रतीक्षा करते रहे। उन्हें ऋषि दयानन्द के मन में प्रवेश करने अवसर प्राप्त नहीं हो सका। आधुनिक युग में ऋषि दयानन्द के समान ब्रह्मचर्य का सेवन करने वाला दूसरा महापुरुष नहीं हुआ। उनके शिष्यों ने भी उनके इस गुण को अपने जीवन में धारण किया परन्तु वह उन उपलब्धियों को प्राप्त नहीं कर सके जो उपलब्धियां ऋषि दयानन्द को प्राप्त हुईं थीं।

ऋषि दयानन्द के समय देश के लोग वेदों को विस्मृत कर चुके थे। उन दिनों वेद प्राप्त भी नहीं होते थे। वेदों की संहितायें सुलभ नहीं थी। वेदों के प्रामाणिक भाष्य भी उनके समय में उपलब्ध नहीं थे। वेदों की महत्ता का किसी को ज्ञान नहीं था। वेद विस्मृत कर दिये गये थे और इसके स्थान पर वेदों का स्थान 18 पुराणों ने ले लिया था। सभी पुराण महाभारत के बाद मध्यकाल में अविद्या व अन्धविश्वासों से युक्त वातावारण में लिखे गये। जिन लोगों ने पुराणों की रचना की, वह समाज में प्रतिष्ठित विद्वान नहीं थे। इसी कारण उन्होंने अपने वास्तविक नामों से इन ग्रन्थों को प्रचारित न कर महाभारतकालीन महर्षि वेदव्यास जी के नाम से प्रचारित किया। अन्धविश्सावों को प्रचलित करने के लिये किसी प्रतिष्ठित विद्वान के नाम का सहारा लेना आवश्यक होता है। ऋषि दयानन्द की सत्यान्वेषी बुद्धि से यह रहस्य छिप न सका। उन्होंने अपनी दिव्य शक्तियों व सत्यासत्य अन्वेषी बुद्धि से पुराणों के रचनाकारों को जाना और उसका उल्लेख अपने साहित्य में किया है। पुराणों के अनेक विवरण अविश्वसनीय व अप्रामाणिक हैं। उनका उल्लेख उनके पूर्ववर्ती रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में नहीं मिलता। रामायण एवं महाभारत में भी अनेक प्रक्षेप किये गये हैं। इसके अनेक प्रमाण भी मिलते हैं। किसी एक लेखक के ग्रन्थ में परस्पर विरुद्ध मान्यतायें एवं सिद्धान्त नहीं पाये जाते जबकि प्रक्षिप्त ग्रन्थों में एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा प्रक्षेप करने से ऐसा देखा जाता है।

परस्पर विरुद्ध कथनों व सिद्धान्तों से युक्त ग्रन्थ अवश्य ही मूल ग्रन्थकार के विरोधी विचार वाले लोगों के प्रक्षिप्त अंशों से युक्त होते हैं। उनको यदि शुद्ध करना हो तो उसमें वेदविरुद्ध अंश को हटा कर ही ऐसा किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द को इस बात का गौरव प्राप्त है कि उन्होंने सत्यासत्य की परीक्षा की कसौटी हमें प्रदान की। उन्होंने अनेक मत-मतान्तरों की मान्यताओं की बुद्धि, तर्क तथा सृष्टिक्रम की अनुकूलता के आधार पर परीक्षा भी की जिसको उनके ग्रन्थों के अध्येता स्वीकार करते हैं। सत्य व असत्य की परीक्षा कर ही ऋषि दयानन्द ने वेदों को ईश्वरीय ज्ञान स्वीकार किया और उसका देश देशान्तर में प्रचार किया। उन्होंने सभी मतों के आचार्यों को चुनौती भी दी थी कि वह उनकी सभी मान्यताओं पर उनसे शास्त्रार्थ व धर्म चर्चा कर सकते हैं। किसी विद्वान व आचार्य को उनसे उनके किसी सिद्धान्त पर शास्त्रार्थ करने का कभी साहस नहीं हुआ। अपने वेदज्ञान के आधार पर ही ऋषि दयानन्द ने मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, ईश्वर का अवतार, जन्मना जातिवाद आदि को चुनौती दी व उनका प्रबल खण्डन कर ईश्वर के सत्यस्वरूप तथा सत्य सामाजिक मान्यताओं को समाज में प्रतिष्ठित किया। जन्मना जातिवाद भी एक वेदविरुद्ध तथा मनुष्य जति पर कलंक के समान मिथ्या व हानिकारक मान्यता है। इसने हिन्दू समाज को कमजोर करने के साथ इसके शत्रुओं के बल को बढ़ाया है। हिन्दू जाति की विधर्मी शत्रुओं से पराजय का कारण सदैव इसकी जातीय व्यवस्था तथा शत्रुओं पर भी अनुचित दया व अहिंसा की अतार्किक नीति रही जिसके कारण हमारी जाति के पुरुषों व मातृशक्ति को भीषण अपमान एवं यातनाओं का जीवन व्यतीत करना पड़ा। आज भी हिन्दू जाति पर पूर्व के समान अपनी रक्षा के खतरे छाये हुए हैं। वर्तमान व्यवस्थायें हिन्दुओं की रक्षा करने में समर्थ नहीं हैं।

ऋषि दयानन्द ने हिन्दू समाज सहित सभी मत-मतान्तरों से अज्ञान व अन्धविश्वासों को दूर करने का प्रयत्न किया। उन्होंने अपनी सभी मान्यताओं को वेदज्ञान पर अवलम्बित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि सम्पूर्ण वेद ही अखिल विश्व का धर्म है। धर्म को उन्होंने सभी मानवीय गुणों को धारण करने सहित वेदाचरण से जोड़ा। उन्होंने बताया कि वेदविहित कर्तव्यों का पालन ही धर्म तथा वेदनिषिद्ध कर्मों का त्याग ही धर्म है। वेद विहित कर्मों का करना पुण्य होता है तथा वेद निषिद्ध कर्मों का करना ही पाप कहलाता है। वेदों में ही ईश्वर व जीवात्मा आदि का सत्यस्वरूप उपलब्ध होता है जिसका विस्तार व व्याख्या उपनिषदों में कथानकों आदि के द्वारा सरस रूप में उपलब्ध होती है। वेदमय जीवन धर्मयुक्त जीवन का पर्याय होता है। वेद ईश्वर की उपासना, यज्ञ एवं सत्कर्मों के प्रेरक हैं। वेदमय जीवन संसार में सबसे अधिक उपकारी जीवन होता है। जो लोग वेदों से दूर होते हैं वह धर्म के मर्म व रहस्यों को नहीं जान सकते। मत-मतान्तरों में वेद विरुद्ध अनेक मान्यतायें पायी जाती हैं जिनसे मानव समाज में परस्पर द्वेष उत्पन्न होता है। इसी से आपस में संघर्ष व हिंसा होती है। मत-मतान्तरों की वेदविरुद्ध हानिकारक मान्यताओं का त्याग करना आवश्यक है अन्यथा समाज में समरसता उत्पन्न नहीं हो सकती। जो मत व उसके आचार्य अपने मत का प्रचार करते हुए प्रचार में छल, बल व लोभ का प्रयोग करते हैं, भोले भाले लोगों का मतान्तरण वा धर्मान्तरण करते हैं वह सच्चे मनुष्य नहीं है।

ऋषि दयानन्द ने हिन्दू समाज को सत्य से परिचित होने के साथ वेदमत के शत्रुओं से भी परिचित कराया था। जो हिन्दू मत के अनुयायियों का स्वार्थों व साजिशों के कारण छल, बल व लोभ से धर्मान्तरण करते हैं वही वस्तुतः हिन्दु मत के विरोधी व शत्रु हैं। इनसे सावधान रहने के साथ हिन्दुओं को अपने सभी मतभेद व कुरीतियां दूर कर संगठित होने की आवश्यकता है। ऋषि दयानन्द ने ही वैदिक धर्म के महत्व से परिचित होने तथा इन्हें अपनाने के लिए विधर्मियों के लिये वैदिक धर्म के द्वार खोले थे जिससे अनेक मतों के लोगों ने वेदों से प्रभावित होकर वेद मत को अपनाया था। ऐसा कार्य ऋषि दयानन्द से पूर्व किसी वेदाचार्य व धर्माचार्य ने नहीं किया था। वेद विश्व को श्रेष्ठ गुणों से युक्त मनुष्य, जिनका गुणवाचक नाम आर्य है, बनाने की प्रेरणा करते हैं। सद्गुणों से युक्त मनुष्य ही आर्य होता है। देश के लिये यह दुखद है कि ऋषि दयानन्द व वेद के अनुरूप सद्गुणों से युक्त मनुष्यों का निर्माण नहीं हो सका। इसी कारण हमारा समाज आज भी अनेक जातियों, गुरुडमों, मूर्तिपूजकों तथा भिन्न भिन्न विचारों व आस्थाओं के अनुयायियों में बंटा हुआ है। सारा समाज आज भी ईश्वरीय ज्ञान वेद व उसकी आज्ञाओं के विपरीत आचरण कर रहा है। इससे संसार का उपकार होना सम्भव नहीं है। यदि देश व विश्व के सभी लोगों ने वेद की विचारधारा को अपनाया होता तो विश्व की जो अवस्था वर्तमान में है, वह न होती। आज विश्व के सामने विश्वयुद्ध होने जैसी आशंकायें भी उपस्थित हैं। कुछ देश लोगों में रोग फैलाकर एवं देशों के शोषण के द्वारा विश्व पर अपना अधिकार जमाना चाहते हैं। ऐसे देशों के अपने स्वार्थों के कारण अनेक गुट बने हुए हैं। आने वाले समय में उनके विरोध व मतभेद क्या रूप लेंगे, कहा नहीं जा सकता। इन सब बातों को वेद के सिद्धान्तों को अपनाकर ही हल किया जा सकता है। इसी कारण वेद एवं ऋषि दयानंद के विचार आज भी सर्वाधिक प्रासांगिक हैं।

ऋषि दयानन्द ईश्वरीय ज्ञान वेद के ज्ञान में अतुलनीय विद्वान व ऋषि थे। उन्होंने वेदों का पुनरुद्धार किया। वेदों के प्रचार के लिये सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, ऋग्वेद-यजुर्वेदभाष्य ग्रन्थ दिये। वेद प्रचारार्थ आर्यसमाज की स्थापना की। वैदिक धर्म को सत्य, तर्क व युक्ति का दृढ़ आधार दिया। वेदों का प्रचार कर उन्हें पूरे विश्व में लोकप्रिय किया। उपासना के क्षेत्र में भी उन्होंने योग दर्शन निहित विधि को अपनाया और अष्टांग योग को अपने जीवन में सिद्ध किया। उसी का प्रचार उन्होंने सन्ध्या पुस्तक व ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्रस्तुत किया। वह स्वयं समाधि अवस्था को प्राप्त योगी थे। समाधि वह अवस्था है जिसमें मनुष्य की आत्मा का ईश्वर से साक्षात्कार, प्रत्यक्ष व भ्रान्तियों से रहित अनुभव होता है। उपासक व योगी की सभी भ्रान्तियां व आशंकायें दूर हो जाती है। उसके जीवन से सभी दुर्गुण नष्ट हो जाते हैं और वह संसार के सभी मनुष्यों को एक ईश्वर की सन्तान तथा विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में देखता है। वेदों में ब्रह्मचर्य की महिमा गाई गई है। ऋषि दयानन्द ब्रह्मचर्य के आदर्श स्वरूप को धारण किये हुए ब्रह्मचारी थे। वह सदैव ब्रह्म में स्थिर रहते थे। ब्रह्म उनकी आत्मा में प्रकाशित रहता था। वह कोई काम परमेश्वर की आज्ञा के विरुद्ध नहीं करते थे। उनके लिये अपना देश व उसके लोग प्रमुख थे और निजी सुख-सुविधायें गौण। ईश्वर पर उनका असीम विश्वास था। ब्रह्मचर्य की शक्ति से ही उन्होंने पूरे विश्व को वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया था और मिथ्या मतमतान्तरों में निहित अविद्या का प्रकाश किया था। उन्होंने सत्यार्थप्रकाश में स्वराज्य का मन्त्र दिया था। स्वदेशी राज्य को विदेशी राज्य की तुलना में उत्तम व श्रेष्ठ बताया था। सबको वेदमत को ग्रहण करने का सत्परामर्श भी दिया था। ऋषि दयानन्द का जीवन हम सबके लिये प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय है। उनके बताये मार्ग को अपनाकर ही मनुष्य जीवन सफल होता है। वेदज्ञान, योगमय जीवन एवं ब्रह्मचर्य का पालन ही सफल जीवन के मूल सूत्र व मन्त्र हैं। इनको अपनाकर ही मनुष्य जन्म व उसका परजन्म निश्चय ही सुधरता है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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