मोहम्मद बिन तुगलक के 26 वर्ष के शासनकाल में हिंदुओं ने किए थे 20 स्वतंत्रता आंदोलन

मोहम्मद बिन तुगलक का शासनकाल भारतवर्ष में 1325 ईसवी से 1351 ईसवी तक 26 वर्ष का माना जाता है । हमें इतिहास में इस प्रकार पढ़ाया जाता है कि जैसे उसके शासनकाल में पूर्णरूपेण शांति रही और हिंदू पूर्णतया मरी हुई जाति के रूप में अपने आत्मसम्मान को बेचकर चुपचाप उसके शासनादेशों का पालन करता रहा । परंतु सच यह है कि उसके शासनकाल में सर्वत्र हिंदू वैसे ही स्वतंत्रता के लिए आंदोलन करता रहा जैसे किसी अन्य मुस्लिम शासक के शासनकाल में करता रहा था।

कराजल के अभियान में हिंदुओं ने उसे ऐसी धूल चटाई थी कि जीवन भर उसे वहां के कटु अनुभव जब भी याद आते थे तो वह सिहर उठता था । 1338 में उसने नगरकोट को जीतने की योजना बनाई। उस समय नगरकोट पर पृथ्वीचंद नाम का हिंदू शासक शासन कर रहा था । यद्यपि नगरकोट को जीतने में एक बार तुगलक को सफलता मिली , परंतु शीघ्र ही नगरकोट के हिंदू वीरों ने उसे आजाद करा लिया।

नगरकोट के लोग अपनी स्वाधीनता के लिए निरंतर क्रांति करते रहें । यह मुस्लिमकालीन इतिहास का यह एक कटु सत्य है कि हमारी क्रांति या स्वतंत्रता आंदोलनों को इसमें विद्रोह ,बगावत या छोटे-मोटे उपद्रव के नाम से उल्लिखित किया गया है । जबकि सच्चाई यह थी कि ये सारी की सारी क्रांतियां थीं , जो देश में प्रत्येक वर्ष , प्रत्येक माह व प्रत्येक दिन कहीं ना कहीं चलती रहीं ।

इसी समय मेवाड़ के शासक हम्मीर ने भी अपने राज्य के लिए स्वतंत्रता आंदोलन चलाया और उसे स्वतंत्र कराने में सफलता प्राप्त की । यह घटना भी 1338 की ही है। लगभग इसी समय 1336 ईसवी में हरिहर और बुक्काराय नाम के दो हिंदूवीरों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की और उस पर बहुत मजबूती के साथ शासन करना आरंभ किया। इतिहास का यह भी एक बहुत ही रोमांचकारी तथ्य है कि हरिहर व बुक्काराय के द्वारा स्थापित इस हिंदू राज्य को अगले 300 वर्ष तक कोई भी मुस्लिम शासक उखाड़ नहीं पाया था। इतिहास के इस तथ्य और सत्य को बहुत दुष्टता के साथ इतिहास में छुपाने का प्रयास किया गया है। इसीलिए योगी श्री अरविंद ने कहा है कि भारत में हम एक स्वार्थी और निर्जीव शिक्षा के द्वारा अपनी प्राचीन संस्कृति और परंपरा की सभी जड़ों से काट दिए गए हैं।

हिंदू वीरों की वीरता यहीं पर नहीं रुकी । मोहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में ही वारंगल के हिंदू योद्धाओं ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। इतिहास का यह भी एक रोचक सत्य है कि इसके पश्चात वारंगल फिर कभी इन सुल्तानों के नियंत्रण में नहीं आ सका । बरनी ने इसके विषय में लिखा है कि जब सुल्तान दिल्ली में था वारंगल में हिंदुओं का विद्रोह हुआ। इस प्रदेश में कन्हैया नामक व्यक्ति शासक बन बैठा। वारंगल का राज्यपाल इस विद्रोह का दमन नहीं कर सका और वह दिल्ली भाग गया

। वारंगल और निकटवर्ती क्षेत्र में हिंदुओं की सत्ता स्थापित हो गई और वारंगल पूर्ण रूप से सुल्तान के हाथों से निकल गया।

यह भी एक अद्भुत संयोग था कि दक्षिण में जिस समय स्वतंत्रता की धूम मची थी उसी समय कम्पिला ने भी सुल्तान के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन आरम्भ कर दिया। हम इसे दक्षिण की क्रांति के रूप में मानते हैं । कम्पिला का राज्यपाल कन्हैया नाम के उपरोक्त वारंगल नरेश का संबंधी था। कम्पिला के स्वतंत्रता आंदोलन और वारंगल के स्वतंत्रता आंदोलन को इस प्रकार समझने की आवश्यकता है कि जब यह दोनों शासक आपस में संबंधी थे तो एक योजना के अंतर्गत ही ये अपनी स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ रहे होंगे।

मोहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में किसानों ने भी विद्रोह किया और सुल्तान को कर देने से इनकार कर दिया। इतना ही नहीं उसके शासन काल में कई स्थानों पर मुस्लिम शासक थी विद्रोही हो गए थे।

हिंदू इतिहास को गौरवान्वित करने वाला यह भी एक रोमांचकारी तथ्य है कि मोहम्मद बिन तुगलक के 26 वर्षीय शासन काल में 20 स्वतंत्रता आंदोलन हुए अर्थात लगभग हर वर्ष ही कहीं ना कहीं हिन्दू स्वतंत्रता का आंदोलन चलता रहा। जिससे तुगलक बहुत अधिक दुखी रहता था। उसने अपने दरबारी लेखक जियाउद्दीन बरनी से बहुत निराश होकर कहा था कि मेरा राज्य रुग्ण हो गया है । कोई औषधि इसका उपचार नहीं कर पा रही है। यदि सिर के दर्द का उपचार किया जाता है तो बुखार आ जाता है और बुखार का उपचार किया जाता है तो कोई और रोग हो जाता है।

हिंदू स्वतंत्रता आंदोलनकारियों से मोहम्मद बिन तुगलक कितना दुखी हो गया था ? इसका पता जियाउद्दीन बरनी से उसके द्वारा कहे गए इस कथन से चलता है कि मैं लोगों अर्थात हिंदुओं के विद्रोह से दुखी हो चुका हूं । मैं उन्हें तब तक कुचलता रहूंगा जब तक यह मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो जाते हैं ।

अब तनिक कल्पना करें कि इतने क्रूर अत्याचारों के उपरांत भी जिस हिंदू जाति के हमारे वीर पूर्वजों ने अपनी स्वतंत्रता के लिए आंदोलन निरंतर जारी रखे वह कितने बहादुर , कितने वीर , कितने शौर्य संपन्न रहे होंगे ? उन्हें स्वतंत्रता कितनी प्रिय रही होगी और अपने धर्म के लिए अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देना उनके लिए कितनी छोटी बात हो गई होगी ?

निश्चय ही हमें अपने ऐसे पूर्वजों पर गर्व होना चाहिए। साथ ही अपने इस गौरवपूर्ण इतिहास का उल्लेख करने में गर्व और गौरव की अनुभूति होनी चाहिए ।

इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने परस्पर के संवाद में , सोशल मीडिया पर , समाचार पत्रों में , विचार गोष्ठियों में या जहां भी जैसे भी जिस मंच पर भी संभव हो , हम इतिहास के इन गौरवपूर्ण तथ्यों को अपने हिंदू साथियों को बताने का प्रयास करें। क्योंकि शत्रु आज भी षड्यंत्र में लगा हुआ है ।15 करोड़ 100 करोड़ पर भारी — इस बात का अर्थ समझने की आवश्यकता है कि किस सोच के अंतर्गत ऐसा कहा जा रहा है और यदि वह ऐसा कह रहे हैं तो उन्हें बताना होगा कि हम भी किन शौर्यसंपन्न वीर योद्धाओं के उत्तराधिकारी हैं ?

हम सब यह बात मान लें कि पृथ्वी चंद , हम्मीर , कन्हैया , हरिहर – बुक्का राय आदि यह सभी हमारे पूर्वज थे । इनकी संतान होने के कारण उनका इतिहास सहेजना और उसे सम्मानपूर्ण दृष्टिकोण से देखना ही हम सबका राष्ट्रीय कर्तव्य है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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