आज ईसाई नववर्ष है । अंग्रेजों के राजा किंग जॉर्ज का जन्म दिवस है । जिसे अंग्रेजों के डोमिनियन रहे अधिकांश देश 1752 से इसी रूप में मनाते चले आ रहे हैं । भारत में भी जिनके मन मस्तिष्क से गुलामी अभी उतरी नहीं है , वे इस दिवस को बड़ी धूमधाम से मना रहे हैं । ऐसे लोग वे हैं जो पहली जनवरी को नए वर्ष के रूप में मना कर इसे अपनी प्रगतिशीलपरक बुद्धि के साथ जोड़कर प्रस्तुत करते हैं । परंतु इसकी वास्तविकता क्या है ? इस पर विचार नहीं करते।
हमारा नव वर्ष चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि से प्रारंभ होता है और यही वह तिथि है , जिसे संपूर्ण भूमंडल के सभी देश किसी न किसी रूप में पिछली दो-तीन शताब्दी पूर्व तक मनाते रहे । इतना ही नहीं , आज भी किसी न किसी रूप में मना रहे हैं । यह विचारणीय है कि 1 जनवरी को ऐसी ना तो कोई खगोलीय घटना होती है और ना ही कोई ऐसी ऐतिहासिक घटना कभी हुई , जिसने सारे विश्व को प्रभावित किया हो , परंतु इसके उपरांत भी हम 1 जनवरी को नए वर्ष को मनाने की मूर्खता करते चले आ रहे हैं।
रोमन काल में सूर्य या चंद्र ग्रहण की सूचना देने के लिए वहां के मंदिरों का पुजारी घंटा बजाकर या चिल्लाकर लोगों को इस खगोलीय घटना की सूचना किया करता था ।जिसे ‘ कॉल इट ‘ शब्द दिया जाता था। जब बाद में विज्ञान के माध्यम से उनके पास भारतीय पंचांग की जानकारी पहुंची तो उन्होंने उस का सहारा लेना आरंभ किया । जिससे ‘ कॉल इट ‘ ‘कॉल एंड ‘ हो गई। जिस पंचांग के माध्यम से यह कॉल एंड हुई उसी को उन्होंने ‘कॉल – एंडर ‘ अर्थात कैलेंडर कहा । कैलेंडर के आने से पुजारी के द्वारा चिल्लाकर या घंटा बजाकर लोगों को चंद्रग्रहण आदि की सूचना देने की प्रथा समाप्त हो गई। यद्यपि पंचांग और कैलेंडर में फिर भी भारी अंतर रह गया । क्योंकि हमारा पंचांग पांच अंगों से अर्थात तिथि , वार , नक्षत्र , करण और योग से मिलकर बनता है , जबकि उनके कैलेंडर में तिथि और वार ही होते हैं।
700 ईसा पूर्व से पहले 1 मार्च से नववर्ष मनाने की परंपरा यूरोपियन देशों में भी थी । उस समय वहां पर वर्ष में 10 माह होते थे । जुलाई के महीने को क्वांटलिस और अगस्त के महीने को सिक्सटीलिस के नाम से जाना जाता था । इसके पश्चात सप्तम अर्थात सातवां महीना सितंबर , ऑक्टो से आठवां अक्टूबर-नवम से नवंबर और दशम से दिसंबर बना । स्पष्ट है कि यह सारे नाम संस्कृत मूलक शब्दों से बने।
नवा पोम्पलिस नाम के शासक ने वर्ष के 10 महीनों के साथ 2 महीने और जोड़ दिए । इन दो महीनों के नाम उन्होंने अपने जेनस नाम के देवता पर जनवरी और फेब्रा के नाम पर फरवरी रखा , परंतु वर्ष का आरंभ फिर भी मार्च से ही होता रहा । मार्च का अभिप्राय भी आगे बढ़ना ही है । जैसे फ्लैग मार्च शब्द है , इसी प्रकार वर्ष का जहां से आरंभ हुआ , वर्ष आगे बढ़ी , उसी को उन्होंने मार्च कहा । यह शुद्ध भारतीय परंपरा थी।
46 ईसा पूर्व में रोमन साम्राज्य का शासक जूलियस सीजर बना । जिसने प्रचलित कैलेंडर में कुछ परिवर्तन किया । उसने क्वांटलिस नाम के महीने के स्थान पर उसका नाम परिवर्तन कर इस माह को अपने नाम से कर दिया ।जिससे जूलियस से जुलाई माह बना। इसके बाद आगस्टन किंग ने सिक्सटीलिस नाम के महीने का परिवर्तन किया और उसे अपने नाम से अगस्त कर दिया । उसने भी जूलियस की जुलाई की भांति अपने महीने को भी 31 दिन का रखने का सरकारी आदेश जारी किया । इस वर्ष सिक्सटीलिस नाम के महीने में लगा सिक्स स्पष्ट संकेत देता था कि यह उस समय वर्ष का छठा महीना था। यूरोप के इन दोनों महान शासकों के द्वारा कैलेंडर में की गई इस प्रकार की छेड़छाड़ से तब यह समस्या खड़ी हुई कि वर्ष को सुव्यवस्थित रखने के लिए 2 दिन कहां से काटे जाएं ? तब अगस्टिन नाम के शासक ने इसका समाधान देते हुए स्पष्ट कर दिया कि फरवरी के महीने से 2 दिन काट लिये जाएं । यहां से फरवरी 28 या 29 दिन की होनी आरंभ हो गई। यहीं पर यह भी समझ लेना चाहिए कि जुलाई और अगस्त 31- 31 दिन के क्यों होते हैं ?
1582 ईस्वी में ग्रेगोरी नाम के व्यक्ति ने कैलेंडर को और शुद्ध किया । तब से इस कैलेंडर को ग्रेगोरियन कैलेंडर के नाम से जाना जाने लगा । लेकिन इसके उपरांत भी मार्च के महीने में 25 मार्च से नए वर्ष को मनाए जाने की परंपरा ब्रिटेन सहित यूरोप के अन्य देशों में यथावत बनी रही । इसका अभिप्राय है कि 1582 तक भी यूरोप में 25 मार्च अर्थात हमारे चैत्र माह से ही नए वर्ष को मनाने की परंपरा जारी रही। क्योंकि 25 मार्च के आसपास ही हमारा चैत्र महीना आरंभ होता है।
1751 में ब्रिटिश संसद ने कैलेंडर में फिर छेड़छाड़ की और उसने विधिवत एक कैलेंडर एक्ट पारित किया ।तब तक अंग्रेज भारत के संपर्क में आ चुके थे। उन्होंने यहां पर युधिष्ठिर संवत , शक संवत , विक्रमी संवत आदि संवतों को देखा था । जिनमें किसी न किसी महान शासक की स्मृतियां उनके प्रचलन के साथ जुड़ी हुई थीं । भारत की नकल करते हुए अंग्रेजों ने भी यह निर्णय लिया कि हम अपने राजा किंग जॉर्ज के जन्मदिवस अर्थात 1 जनवरी को अपने सभी उपनिवेशों में नए वर्ष के रूप में मनाने की प्रथा आरंभ करेंगे । इस प्रकार 1752 की 1 जनवरी से अंग्रेजों के सारे उपनिवेशों में नया वर्ष मनाया जाना आरंभ हुआ । इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि भारत की नकल करते हुए अंग्रेजों ने 1 जनवरी को नए वर्ष के रूप में मनाना आरंभ किया और आज इंडिया के नकलची अपने आकाओं की नकल कर रहे हैं । अपने मूल को भूल गए और दूसरों की दी हुई परंपराओं को ढो रहे हैं । शर्म आती है ऐसे तथाकथित प्रगतिशील काले अंग्रेजों को देखकर।
1751में ब्रिटिश संसद द्वारा पारित किए गए इस कैलेंडर एक्ट में स्पष्ट लिखा हुआ है कि अब से आगे हम नया वर्ष 1 जनवरी से प्रारंभ करेंगे 25 मार्च से नहीं । ” 25 मार्च से नहीं “– का अभिप्राय है कि 1751 तक ब्रिटेन में 25 मार्च अर्थात भारत के चैत्र महीने से ही नया वर्ष मनाया जा रहा था । जिसे उसने बदलकर अपने राजा के नाम से आरंभ किया।
कुछ लोग हमारे भारतीय सृष्टि संवत को हिंदू नव वर्ष का नाम देते हैं । हमें यह याद रखना चाहिए कि हिंदु नाम तो हमको बहुत बाद में दिया गया है । वास्तव में जिस नववर्ष को हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनाते हैं वह सृष्टि संवत है ।जो भारतवर्ष का वैदिक सृष्टि संवत कहा जाता है और यही वैदिक सृष्टि संवत है जिसने संपूर्ण भूमंडल को 1751 तक अपनी मान्यताओं से शासित किया । अभी भी मार्च के महीने में कई यूरोपियन देशों में कुछ चीजें जलाकर नए वर्ष की खुशियां मनाई जाती हैं । यह कुछ वैसा ही है जैसा कि हम अपने यहां पर होली दहन के समय देखते हैं। टूटी फूटी भारतीय वैज्ञानिक परंपराएं यूरोप का आज भी मार्गदर्शन कर रही हैं और भारत अपना सब कुछ भुला देने को तैयार है।
हमें अपने वैदिक सृष्टि संवत या हिंदू नव वर्ष को चैत्र महीने में मनाने पर गर्व होना चाहिए । क्योंकि यह पूर्णतया वैज्ञानिक है । उस समय पूरी प्रकृति अपना रूप परिवर्तित कर नए काल में प्रवेश करती हुई स्पष्ट दिखाई देती है ।
– – – – – तो मित्रो आज नहीं , अपने चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष की प्रथमा तिथि को ही हम और आप एक दूसरे को नव वर्ष की शुभकामनाएं देंगे । अपने विचारों से अवश्य अवगत कराएं । धन्यवाद।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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