वैदिक सम्पत्ति -264 आर्य गृह, ग्राम और नगर

वैदिक सम्पत्ति

(यह लेखमाला हम पंडित रघुनंदन शर्मा जी की वैदिक सम्पत्ति नमक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।)

प्रस्तुति:- देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन ‘उगता भारत’

सा दे सीधे, मिट्टी लकड़ी और घास के छोटे छोटे मकान झाड़ने और लीपने पोतने से नित्य पवित्र हो जाते हैं, परन्तु बड़े ऊंचे और ईंट पत्थर के मकान इतनी जल्दी रोज साफ नहीं हो सकते। ईंट पत्थर के मकान गर्मी में अधिक गर्म और सर्दी में अधिक सर्द तथा वर्षा में अधिक गर्मी उत्पन्न करते हैं, पर मिट्टी लकड़ी और छप्पर के मकान गर्मी में ठंडे, सर्दी में गर्म और वर्षा ऋतु में बड़े ही हवादार हो जाते हैं। वर्षाकाल में घास का छप्पर तो बड़ा ही आनन्ददायक होता है। सादे मकान बहुत ही थोड़े श्रम और खर्च से बन जाते हैं, परन्तु ईंट पत्थर के भव्य भवनों में लाखों रुपया लग जाता है। आज इमारत के व्यर्थ खर्च के कारण नवीन स्कूलों और कॉलेजों का खुलना कठिन हो रहा है। नवीन स्कूल का नाम लेते ही बिल्डिग का प्रश्न सामने आता है और हजारों की बात लाखों में बदल जाती है और सारी स्कीम विभाग में ही पड़ी रह जाती है। परन्तु यदि सादे मकानों का अनुकरण किया जाय तो प्रत्येक तहसील में थोड़ी ही लागत से एक एक कॉलेज खुल सकता है। इसलिए भव्य भवनों से सादे मकान अधिक उपयोगी हैं। सादे मकानों की उपयोगिता उस समय बहुत ही अच्छी तरह समझ में आ जाती है, जब भूकम्प, अग्निकाण्ड, अथवा नदियों के प्रवाह से गाँवों का नाश होता है। ऐसी आपत्तियों में से भूकम्प के कारण तो छप्परवाले मकान गिरते ही नहीं। रहा अग्निकाण्ड और जलप्रवाह, यद्यपि इनसे सादे मकान भी नष्ट होते हैं पर सादे घरों के नष्ट होने में भव्य भवनों की अपेक्षा बहुत ही कम हानि होती है। कम हानि के कारण छोटे मकानवाला दस बीस दिन में ही अपना नया मकान फिर बना लेता है, परन्तु भव्य भवनवाले का तो फिर दूसरा भव्य भवन आजीवन बनवाया ही नहीं बनता। इसका मतलब यह हुआ कि सादे मकान सदैव कायम रहते हैं, पर भव्य भवनों की स्थिरता में सन्देह है। बड़े मकानवालों में स्वाभाविक ही अभिमान और प्रमाद होता है, पर साधारण मकानवाले बहुत ही सरल होते हैं। बड़े मकानों में रहते ही नौकर, फरनीचर, सवारी और अनेक प्रकार की पोशाकों और ठाटबाटों की आवश्यकता अकारण ही उत्पन्न हो जाती है, पर सादे मकानों से ये बातें उत्पन्न नहीं होतीं । भव्य भवनों और सादे मकानों में जो सबसे बड़ा अन्तर है, वह मोह और पैतृक सम्पत्ति का है। सादे मकानबाले जब चाहते हैं तब अपने मकान को छोड़कर सुविधा के साथ दूसरी जगह नया मकान बना लेते हैं और बात की बात में ग्राम, जिला और प्रान्त को भी छोड़ देते हैं, जिसका नमूना हम नित्य खानेबदोशों-नट, कंजर और हबूड़ों में देखते हैं। पर ऊँची हवेलीवाले हजार हजार मुसीबतों के आने पर भी अपनी कोठी के मोह से न कहीं जा सकते हैं और न अमीरत की व्यर्थ बू को दिमाग से निकाल सकते हैं, प्रत्युत उसी पुरानी कोठी को सम्पत्ति मानकर उसी के पत्थरों में पैर रगड़ा करते हैं। इसलिए भव्य भवन और बड़ी कोठियाँ मनुष्य की स्वाभाविक रहन सहन के बिलकुल ही विपरीत हैं। इन्होंने मनुष्य में सबसे पहिले मिलकियत के भावों को उत्पन्न किया है और इन्हींने पैतृक सम्पत्ति के भावों की जड़ जमाई है। इसलिए मोह, अभिमान और आलस्य उत्पन्न करने- बाले ऐसे मकानों को आर्यो ने अपनी सभ्यता में स्थान नहीं दिया। आर्यों के मकानों का आदर्श वर्णन करते हुए अथर्ववेद में लिखा है कि-

तृर्णरावृता पलदान्वसाना रात्रीव शाला जगतो निवेशनी ।
मिता पृथिव्यां तिष्ठसि हस्तिनीव पढ़ती। (अथर्ववेद ११३/१७)

या द्विपक्षा चतुष्पक्षा षट्पक्षा या निमीयते ।
अष्टापक्क्षां दशपक्षां शालां मानस्य पत्नीमग्निर्मर्भ इवा शये। (अथर्ववेद १।३।२१)

अर्थात् तृण से छाई हुई और तोरण बन्दनवारों से सजी हुई हे यशाला ! तू सबको रात्रि के समय शांति देनेवाली है और लकड़ी के खंभों पर हस्तिनी की भाँति थोड़ी सी जमीन में स्थित है। जो शाला दो छप्परवाली, चार छप्पर, बाली छै छप्परवाली और आठ तथा तथा दश छप्परवाली बनाई जाती है, उस इज्ज़त बचानेवाली शाल (घर) में मैं जठराग्नि और गर्भ के समान निवास करता है। वैदिक आर्यों के चरों का यही आदर्श है। इन्हीं घरों में रहकर वे ईश्वर परायण मोक्षाएं भक्तों को आश्रय देते थे और स्वयं उनके सत्सङ्ग से मोक्षसाधन में सदैव रत रहते थे। यही कारण है कि वैश्यवर्ण के द्वारा संशोधित पृथिवीखण्डों में जहाँ का जल वायु उत्तम होता था, पशुओं के लिए चरने योग्य बड़े बड़े चरागाह होते थे और जंगलों तथा ऊँचे पहाड़ों का दृश्य होता था, वहीं वे अपनी वस्ती बसा देते थे । आर्यो के घर मिट्टी, लकड़ी और घास के फूल फलों की वाटिकाओं से घिरी हुई ऊँची भूमि पर, नदी के निकट कूप तड़ागों से आाप्यायित और उर्वरा भूमि पर बनाये जाते थे। मकान बनाते समय इस बात का ध्यान रहता था कि प्रत्येक घर दूर दूर पर उतनी भूमि को छोड़कर बनाया जावे, जिसमें एक कुटुम्ब के योग्य भोजन वस्त्र और पशुचारन उत्पन्न हो सके । मकानों का यह ढंग बंगाल और मध्यप्रदेश में कहीं कहीं अब तक जीवित है।

क्रमशः

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