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डॉ डी के गर्ग

पौराणिक मान्यता : एक बार ब्रह्मा, बिष्णु में श्रेष्ठता को लेकर विवाद चल रहा था। इस विवाद को सुलझाने के लिए ब्रह्मा, बिष्णु एवं सभी देवी-देवता और ऋषि मुनि भगवान शिव के पास आते हैं। भगवान शिव ने सभी देवी-देवता और ऋषि मुनियों ने से पूछा कि आप ही बताइए सबसे श्रेष्ठ कौन हैं। सभी देवताओं और ऋषि मुनियों ने विचार विमर्श कर इस बात को खोजा कि भगवान शिव ही श्रेष्ठ है। भगवान बिष्णु ने यह बात स्वीकार कर ली और लेकिन ब्रह्माजी को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने भगवान शिव को अपशब्द कह दिए।ब्रह्माजी के अपशब्द कहे जाने पर शिवजी को क्रोध आ गया और इसी क्रोध से कालभैरव का जन्म हुआ।शिवजी के इस रूप को देख सभी देवी-देवता घबरा गए। भैरव ने क्रोध में ब्रह्माजी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया तब ही से ब्रह्मा पंचमुख से चतुर्मुख हो गए। ब्रह्माजी के सर को काटने के कारण भैरव जी पर ब्रह्महत्या का पाप आ गया। ब्रह्मा जी ने भैरव बाबा से माफी मांगी।

विश्लेषण :-उपरोक्त बिना सिर पैर के सुनाई गई अप्रमाणिक गप्प कथा पर सोचा ही ना ही जाये तो अच्छा है।ब्रह्मा ,विष्णु और शिव का शाब्दिक अर्थ क्या है ,शायद इस अज्ञानी लेखक को नहीं मालूम। इसने इन सभी शब्दों को शरीरधारी मनुष्य के समतुल्य बना दिया जिसको क्रोध आता है,अपशब्द बोलते है, अहंकारी है ,जिन्होंने मार काट द्वारा ब्रह्माजी के पांच मुखों में से एक मुख को काट दिया और फिर ब्रह्मा जी ने भैरव बाबा से माफी मांगी।
भैरव का शाब्दिक अर्थ है ‘जो देखने में भयंकर हो’ और या भैरवनाथ का अर्थ है जो इतना शक्तिशाली है की उसके भय मात्र से ही प्राणियों की रक्षा होती है और जिसका भय इतना है की लोग अत्याचार करने से डरते है। जिसके दंड के प्रावधान का निश्चित है ,वो सर्वश्रेष्ठ स्वामी है जिसको साधारण भाषा में भैरवनाथ भी कहा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त वह ऐसा रक्षक स्वामी है कि रोगों के भय से औषधियों द्वारा ,शुद्ध वायु आदि द्वारा प्राणी की रक्षा करता है ,जिसने औषधियां उत्पन की जिनके प्रयोग से जीव स्वस्थ रह सकता है ।
दुष्टों को दंड देने वाला ,प्राणियों की रक्षा करने वाला परमपिता ईश्वर को इस अलोक में भैरवनाथ कह सकते है।

काल का अर्थ है समय -जिस ईश्वर का न्याय वर्तमान काल, भूतकाल और भविष्य काल में किसी न किसी रूप दिखाई देता है और जो ईश्वर तीनो काल में हो जैसे वर्तमान काल, भूतकाल, भविष्य काल में हो ,जो अजन्मा है ।
काल शब्द का एक अर्थ गणना भी है जिस ईश्वर ने सभी जीवधारियों के शरीर के सभी अंगो को गणना के अनुसार संजोया है जैसे हृदय की गति,रक्त का प्रेशर ,स्वांस की गति ,blood group आदि।

और तो और ईश्वर हमारे कर्मो की गणना के अनुसार परिणाम देता है।
गणना का एक अन्य अर्थ भी है कि जिस ईश्वर ने सूर्य चंद्र तारामंडल आदि बनाये और उसी ने इनकी गति आदि का समय भी निश्चित किया है। सूर्य एवं पृथ्वी के पारस्परिक दिन सम्बन्ध का ज्ञान जिससे होता है उसे समय या काल कहते हैं।

संक्षेप में कालभैरव का भावार्थ एक परमपिता से है जो निराकार है ,सर्वशक्तिशाली है ,जीव की रक्षा करता है और जिसके न्याय के डर से अन्याय करने से डरते है। ये ईश्वर अनत ,अजर अमर है ,वह परमात्मा काल भैरव है।

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