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जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी

महावीर स्वामी ने मानव के जीवन का अंतिम उद्देश्य मोक्ष की प्राप्ति को स्वीकार किया है । अपने ज्ञान किरणों के द्वारा महावीर स्वामी ने जैन धर्म का प्रवर्तन किया। इस धर्म के पांच मुख्य सिद्धान्त हैं-सत्य, अहिंसा, चोरी न करना, आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना और जीवन में शुद्धिकरण। उनका कहना था कि इन पांचों सिद्धांतों पर चलकर ही मनुष्य मोक्ष या निर्वाण प्राप्त कर सकता है। उन्होंने सभी से इस पथ पर चलने का ज्ञानोपदेश दिया। उन्होंने छुआछूत व भेदभाव आदि को मानवता के विरुद्ध अपराध माना।भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थकर के रूप में आज भी सश्रद्धा और ससम्मान पूज्य और आराध्य हैं।

बौद्ध धर्म के प्रवर्तक महात्मा बुद्ध

पं. धर्मदेव जी लिखते हैं कि पक्षपातरहित दृष्टि से विचार करने पर स्पष्ट ज्ञात होता है कि महात्मा बुद्ध के समय में अनेक सामाजिक और धार्मिक विकार उत्पन्न हो गये थे, लोग सदाचार, आन्तरिक शुद्धि, ब्रह्मचर्यादि की उपेक्षा करके केवल बाह्य कर्मकाण्ड व क्रिया-कलाप पर ही बल देते थे। अनेक देवी देवताओं की पूजा प्रचलित थी तथा उन देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिये लोग यज्ञों में भेड़ों और बकरियों, घोड़ों की ही नहीं, गौओं की भी बलि चढ़ाते थे। महात्मा बुद्ध ने वर्ण व्यवस्था के शुद्ध वैदिक और वैज्ञानिक स्वरूप को लेकर लोगों से सीधा संवाद किया और उन्हें बताया कि यह जन्मगत न होकर कर्मगत है।…
महात्मा बुद्ध ने इन सब विकारों के विरुद्ध क्रांति का सूत्रपात किया और वेद धर्म की स्थापना करने का साहसिक कार्य किया।

संसार के सबसे पहले कुलपति ऋषि शौनक

नैमिषारण्य में स्थापित किए गए शिक्षा केंद्र के कुलपति के रूप में यदि ऋषि शौनक को विशेष सम्मान के दृष्टिकोण से देखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का परिशीलन किया जाए तो पता चलता है कि उनके पश्चात जब भारतवर्ष में तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई तो उनके मूल प्रेरणा स्रोत के रूप में ऋषि शौनक का ही नाम लिया जाना चाहिए। वर्तमान शिक्षा प्रणाली के दोषों को थोड़ी देर अलग कर और आधुनिक शिक्षा केंद्रों में व्याप्त विलासिता पूर्ण परिवेश को भी कुछ देर के लिए उपेक्षित करके देखा जाए तो पता चलता है कि ऋषि शौनक द्वारा स्थापित किए गए भव्य भवन की आधारशिला पर ही उसकी अनुकृति के रूप में ये शिक्षा केंद्र आज काम कर रहे हैं।

च्यवनप्राश के निर्माता महर्षि च्यवन

महर्षि च्यवन ने ‘च्यवनप्राश’ जैसी स्वास्थ्य वर्धक औषधि को बनाने में विटामिन सी से भरपूर आंवला को एक महत्वपूर्ण और मुख्य घटक के रूप में मान्यता प्रदान की है। इससे पता चलता है कि हमारे ऋषि पूर्वज विटामिन सी के बारे में पूरी जानकारी रखते थे और उन्हें पता था कि आंवला में यह विटामिन भरपूर मात्रा में मिलता है। आंखों की ज्योति के लिए और शरीर की अनावश्यक गर्मी को समाप्त करने में भी आंवला का महत्वपूर्ण उपयोग होता आया है। आंवला पेट की अनेक बीमारियों की औषधि भी है। इसीलिए त्रिफला चूर्ण को लेकर लोग स्वास्थ्य लाभ लेते हैं, जिसमें आंवला की भी मात्रा होती है। वास्तव में आंवला हमारे शरीर की रक्षा प्रणाली को शक्ति प्रदान करता है।

ऋषि उद्दालक

ऋषि उद्दालक भारतवर्ष में उपनिषद काल के तत्वदर्शी चिंतनशील मूर्धन्य विद्वानों में गिने जाते हैं। गौतम गोत्रीय आरुणि ऋषि इनके पिता थे , इसीलिए इनको आरुणि के नाम से भी जाना जाता है। महाभारत में जिन धौम्य ऋषि के द्वारा युधिष्ठिर और द्रोपदी का विवाह संस्कार कराया गया था, वही धौम्य ऋषि इनके गुरु थे। आजकल विद्यालयों में विज्ञान के विद्यार्थियों से प्रयोग कराने के लिए जिन प्रयोगशालाओं का प्रयोग किया जाता है वास्तव में शिक्षा के क्षेत्र में इस प्रकार के प्रायोगिक संस्कार की स्थापना करने वाले सबसे पहले वैज्ञानिक ऋषि उद्दालक ही थे। हमारे इस महान ऋषि की विज्ञान के क्षेत्र में इस विशेष देन को ग्रीक संत थेल्स के नाम कर दिया गया है।

गायत्री मंत्र दृष्टा ऋषि विश्वामित्र

ऋषि विश्वामित्र को गायत्री का मंत्र दृष्टा ऋषि कहा जाता है। अपने जीवन में कई प्रकार के दोषों के उपरांत भी उन्होंने अपनी बुद्धि को सन्मार्ग में ले चलने की कठोर साधना की। यही गायत्री का वह रहस्य था जो उन पर प्रकट हुआ। गायत्री के इस महान रहस्य को समझकर उनके जीवन में व्यापक परिवर्तन हुए। इसलिए उनको गायत्री का मंत्र दृष्टा ऋषि कहा जाता है। उन्होंने इस मंत्र के रहस्य को जाना और अपने जीवन में अंगीकार किया। इसके पश्चात उन्होंने गायत्री के फल को भोगकर अपने जीवन को सार्थक बनाया। ऋषि विश्वामित्र का प्रेरक व्यक्तित्व और कृतित्व आज भी हम सबके लिए प्रेरणादायी है। उनके जीवन से हम यही प्रेरणा ले सकते हैं कि प्रत्येक प्रकार के उत्पात को समाप्त करने के लिए गायत्री का जप अर्थ सहित करना चाहिए।

अन्याय का विरोध करने वाले महर्षि परशुराम

परशुराम जी ने उन लोगों का विनाश करने का संकल्प लिया जो वेद विरुद्ध आचरण कर रहे थे , समाज विरोधी हो गए थे और न्यायशील , तपस्वी विद्वानों और ऋषियों को भी अपमानित करने का काम कर रहे थे । इस कार्य को करना वेद धर्म के अनुकूल नहीं है । कहा जाता है कि “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” अर्थात वेद की हिंसा हिंसा नहीं होती , क्योंकि वह हिंसा करने वाले को समाप्त करने के लिए की जाती है । जिस पर समाज के सभी लोगों की सहज स्वीकृति प्राप्त होती है। प्राचीन काल में भारत की ‘विधि’ यही थी। जिसे सब लोग जानते वह मानते थे। यही कारण था कि वेद विरुद्ध आचरण करने वाले और क्षत्रिय धर्म से पतित हुए हैहयवंशी शासकों का साथ उस समय के किसी भी वेदधर्मी क्षत्रिय शासक ने नहीं दिया।

महान पशु चिकित्सक शालिहोत्र

भारत के एक महान पशु चिकित्सक शालिहोत्र नाम के ऋषि हुए हैं। इनका जन्म 800 ईसा पूर्व माना जाता है। उन्होंने पशु चिकित्सक के रूप में अपने समय में विशेष ख्याति अर्जित की थी। घोड़े और उनके अनेक प्रकार के रोगों के विषय में उनकी जानकारी बहुत ही विलक्षण थी। हम सबके लिए यह गर्व और गौरव का विषय है कि पशु चिकित्सा के क्षेत्र में और विशेष रूप से घोड़ों की चिकित्सा के क्षेत्र में उनके ग्रंथ को संसार के पशु चिकित्सक आज भी उल्लिखित करते हैं। उन्होंने आजकल की एकेडमिक डिग्री लेने के बजाय साधना में ऊंचाई प्राप्त करने को प्राथमिकता दी थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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