देवधर मंदिर समीक्षा* — (क्या देवघर मंदिर ही देवताओं का निवास है ? )

images (62)

डॉ डी के गर्ग

भाग-२

देव किसे कहते है ? ये भी समझना चाहिए —
देवो दानाद्वा, दीपनाद्वा घोतनाद्वा, घुस्थानो भवतीति व । । : निरुक्त अ० ७ । खं० १५
दान देने से देव नाम पड़ता है । और दान कहते है अपनी चीज दुसरे के अर्थ दे देना ।
दीपन कहते है प्रकाश करने को, धोतन कहते है सत्योपदेश को, इनमें से दान का दाता मुख्य एक ईश्वर ही है कि जिसने जगत को सब पदार्थ दे रखे है , तथा विद्वान मनुष्य भी विधादि पदार्थों के देने वाले होने से देव कहाते हैं।
दीपन अर्थात सब मूर्तिमान द्रव्यों का प्रकाश करने से सुर्यादि लोकों का नाम भी देव है ।
देव शब्द में ‘तल्’ प्रत्यय करने से देवता शब्द सिद्ध होता है ।
नैनद्देवा आप्नुवन्पूर्वमर्शत् : यजुर्वेद अ० ४० । मं० ४
इस वचन में देव शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण होता है । जोकि श्रोत्र , त्वचा , नेत्र , जीभ , नाक और मन , ये छ : देव कहाते है । क्योकि शब्द , स्पर्श, रूप, रस, गंध , सत्य तथा असत्य आदि अर्थों का इनके प्रकाश होता है अर्थात इन्ही ६ इन्द्रियों से हमें उपरोक्त ६ लक्षणों (शब्द , स्पर्श, रूप ,रस, गंध , सत्य तथा असत्य आदि) का ज्ञान होता है ।
परन्तु उपरोक्त को देव कहने का अभिप्राय ये नहीं की श्रोत्र , त्वचा , नेत्र आदि पूजनीय हो गये ।

प्रश्न है की पूजनीय देव कौन से है ?
१)व्यवहार के देव —
माता, पिता, आचार्य, अतिथि और पति-पत्नी से संसार के व्यवहार सिद्ध होते हैं । इसलिए ये पाँचों ‘व्यवहार के देव‘ कहलाते हैं । तैत्तिरीय उपनिषद ( 1-11- 2 ) के अनुसार — ‘‘ मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव ‘‘ अर्थात माता पिता , आचार्य और अतिथि भी पालन , विद्या और सत्योपदेशादि के करने से चेतन देव कहाते है।इस प्रकार तो सभी मनुष्य देव हो गये ! देव-कोटि इतनी सामान्य नहीं अपितु बहुत विशेष है । सम्बन्ध मात्र से देव-कोटि प्राप्त नहीं होती । एक पिता जब जेब काटता है तब जेब काटते समय वह देव नहीं होता । एक स्त्री जब अपने पुत्र से पक्षपात करते हुए किसी अन्य से विवाद करती है तब माता होते हुए भी वह देव-कोटि में नहीं आती । वास्तव में इनमें जितना-जितना गुण, अच्छापन, भलापन, बड़प्पन, देने का शुद्ध भाव और उच्चता है, उतना ही देवपन है । देवपन के समय ही ये पूजनीय हैं ।

इस अलोक में साथियों बात अगर हम वृद्धजनों के सम्मान व मूल्यों संबंधित धार्मिकता श्लोकों की करें तो, वृद्धजनों की सेवा के संबंध में यह श्लोक महत्वपूर्ण है :
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन: चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥
यानें वृद्धजनों को सर्वदा अभिवादन अर्थात सादर प्रणाम, नमस्कार, चरण स्पर्श तथा उनकी नित्य सेवा करने वाले मनुष्य की आयु, विद्या, यश और बल-ये चारों बढ़ते हैं।वैसे ही सूर्यादि लोकों का भी जो प्रकाश करने वाला है ये जड़ देवता कहते है लेकिन ईश्वर ही सब मनुष्यों को उपासना करने के योग्य इष्टदेव है , अन्य कोई नहीं । इसमें कठोपनिषद का भी प्रमाण है :
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं * नेमा विधुतो भान्ति कुतोSयमग्नि : ।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति । । -कठ ० वल्ली ५ । मं ० १५*
२)जड़ देवता : ‘देव‘ का लक्षण है ‘दान‘ अर्थात देना । जो सबके हितार्थ अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु और प्राण भी दे दे, वह देव है । देव का गुण है ‘दीपन‘ अर्थात प्रकाश करना । सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि को प्रकाश करने के कारण देव कहते हैं । आचार्य देव का कर्म है – ‘द्योतन’ अर्थात सत्योपदेश करना | जो मनुष्य सत्य माने , सत्य बोले और सत्य ही करे , वह देव कहलाता है | देव की विशेषता है ‘द्युस्थान’ अर्थात ऊपर स्थित होना | ब्रह्माण्ड में ऊपर स्थित होने से सूर्य को, समाज में ऊपर स्थित होने से विद्वान को, और राष्ट्र में ऊपर स्थित होने से राजा को भी देव कहते हैं । इस प्रकार ‘देव‘ शब्द का प्रयोग जड़ और चेतन दोनों के लिए होता है। हाँ, भाव और प्रयोजन के अनुसार अर्थ भिन्न – भिन्न होते हैं ।सूर्य , चन्द्रमा , तारे , बिजली और अग्नि ये सब परमेश्वर में प्रकाश नहीं कर सकते , किन्तु इन सबका प्रकाश करने वाला एक वही है क्योकि परमेश्वर के प्रकाश से ही सूर्य आदि सब जगत प्रकाशित हो रहा है । इसमें यह जानना चाहिए कि ईश्वर से भिन्न कोई पदार्थ स्वतंत्र प्रकाश करने वाला नहीं है, इससे एक परमेश्वर ही मुख्य देव है ।देवताओ का निवास: पूरी सृष्टि ही ईश्वर के नियमों के अनुसार देवताओं का निवास है इसके लिए कोई अलग से निवास बनाने की जरुरत नहीं है। इसलिए देवघर नामक स्थान की शिव का निवास बताना पाखंड है। यहाँ रात्रि में पण्डे शिव की मूर्ति के आगे ताला लगाकर अपने अपने घर चले जाता है और जो भी चढ़ावा आता है ,उसको मूर्ति ग्रहण नहीं करती ,बल्कि आपस में बाँट दिया जाता है।
३) सबका इष्टदेव —
ऊपर वर्णित तैंतीस देवों में आंशिक या सीमित देवपन है । इनसे सुख मिलता है किन्तु दुःख भी मिल सकता है । अग्नि देव है किन्तु भड़क जाए, अतिथि देव है किन्तु शत्रु बन जाय , राजा देव है किन्तु कुपित हो जाय तो दुखदायी हो जाता है । इस कारण ये सदुपयोग और सत्कार की मर्यादाओं से बँधे हैं सूर्य-चन्द्र और नदी-पर्वतों का सदुपयोग करना मर्यादा है ।
माता, पिता, आचार्य और अतिथियों की सेवा करना धर्म है । पूर्वज महापुरुषों का अनुसरण, संविधान का पालन और देश की रक्षा करना सब मनुष्यों का कर्तव्य है किन्तु इनमें से कोई उपासना का देव नहीं है । उपासना का देव तो केवल परमात्मा है ।
महर्षि दयानन्द ( ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, वेदविषय विचारः ) के अनुसार–‘‘परमेश्वर एवेष्टदेवोेस्ति ‘‘ अर्थात परमेश्वर ही सब मनुष्यों का इष्टदेव है जो लोग भिन्न-भिन्न देवताओं को पूजते हैं वे कल्याण का वृथा यत्न करते हैं । ईश्वर के अतिरिक्त कभी कोई किसी का उपास्य देव नहीं हो सकता । उसकी उपासना में ही सबका कल्याण है ।
सारांश:
तैंतीस या बहुत से देव बताना तो ‘देव‘ शब्द की व्याख्या एवं इसका विस्तृत अर्थ समझाने के लिए है । किसी विषय को ठीक से समझने-समझाने के लिए उसकी गहराई, विस्तार, सीमा , शंका एवं समाधान की आवश्यकता होती है । इसी पुनीत उद्देश्य से वेद एवं उपनिषद में यह विषय दर्शनीय है । इस ज्ञान का फल यह है कि उपासक का ईश्वर में विश्वास मजबूत होता है। इस सृष्टि का सब कालों एवं परिस्थितियों में पूर्णतम देव तो एक ही है और वह है परमात्मा। वही पूर्णमहान होने से महादेव है।उसी की उपासना करना मनुष्य का धर्म है ।
संभवता, किसी ने ३३ कोटि को ३३ करोड़ समझ लिया और सदियों से हम यही मानते आए कि वैदिक धर्म ३३ करोड़ देवी देवता हैं। सब कुछ कपोलकल्पित ही हैं!

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
sahabet giriş
betgaranti
betgaranti giriş
onwin giriş
onwin giriş
kolaybet
betgaranti giriş
sahabet
sahabet
marsbahis giriş
onwin
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
betkanyon
betkanyon
sahabet giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
marsbahis giriş
marsbahis giriş
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş