07 सितंबर गणेश चतुर्थी पर्व पर विशेष-   सभी विघ्नों के हर्ता भगवान श्री गणेश

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        – सुरेश सिंह बैस शाश्वत 

एवी के न्यूज सर्विस

 

सभी देवताओं में प्रथम पूजे जाने का अधिकार विघ्नाशक श्री गणेश के पास है। शंकर पार्वती के कनिष्ठ पुत्र जिनका सर गज का है। इसीलिये इन्हें गजानन भी कहा जाता है। एक बार क्रोध में आकर पिता शंकर ने श्री गणेश का सर ही अपने त्रिशुल से काट डाला था। बाद में अपने ही पुत्र की हत्या करने की जानकारी होने पर भगवान शंकर ने गज का सर जोड़कर गणेशजी को पुर्नजीवन प्रदान किया एवं उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया कि सभी देवताओं और मुझसे भी पहले तुम्हारी पूजा करने में ही बाकी देवताओं की पूजा करने पर  सबकी पूजा सार्थक होगी। इस अवसर पर उपस्थित माँ पार्वती एवं अनेक देवताओं ने भी उन्हें अनेक वर देकर अभिभूषित किया। आज हमारे देश में ही नही वरन विदेशों में भी गणेश चतुर्थी आने पर उनकी प्रतिमा स्थापना कर उनकी आराधना करने का चलन सर्व प्रचलित हो चुका है । गाँव गाँव और शहरों में प्रायः हर गली मुहल्ले में साज सजावट और पंडाल बनाकर युवाजन गणेश प्रतिमा की स्थापना बड़े जोशो खरोश और उत्साह से करते हैं। इस अवसर पर अनेक स्थानों में सांस्कृतिक और संगीत कार्यक्रम भी आयोजित किये जाते हैं। यह उत्सव दस दिन चलता है उसके बाद अनंत चतुर्दशी को “गणपति बाप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” के नारों के साथ गणेश की प्रतिमा को नदी जलाशयों में विसर्जित कर दिया जाता है। श्री गणेश प्रतिमा की स्थापना का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है, आजादी पूर्व जब देश अंग्रेज शासकों की गुलामी में देशवासी सिसक रहे थे। चारों ओर अंग्रेजों का आतंक और फूट डालो राज करो की नीति का साम्राज्य व्याप्त था। ऐसी विषम परिस्थितियों में स्वतंत्रता के महान सेनानी “बाल गंगाधर तिलक” ने इस परम्परा का बीजारोपण किया। उन्होंने सर्वप्रथम गणेश की प्रतिमा की स्थापना कर लोगों के बीच भाईचारे संगठन और एकता का संदेश फैलाने के उद्देश्य से गणेशोत्सव का शुभारंभ किया। यह परम्परा धीरे धीरे बम्बई पुणे से फैलते – फैलते पूरे मराठवाड़ा में फैल गया। उसके बाद जल्दी ही यह सारे राष्ट्र का पर्व बन गया। और अब सारी दुनिया में इसे बड़े उत्साह से स्थापित कर हिन्दूओं द्वारा उत्साह का प्रदर्शन किया जाता है।

वैसे उत्तर भारत में मुख्यतः शिव पार्वती की पूजा ज्यादा प्रचलित हैं, किन्तु दक्षिण में शिव पार्वती के साथ गणेश और उनके अग्रज भ्राता कार्तिकेय की पूजा भी बड़े उत्साह के साथ की जाती है। गणेश जी की पूजा दीपावली में भी लक्ष्मी जी के साथ अनिवार्यतः मानी गई है। वहीं कार्तिकेय की पूजा विजयादशमी के अवसर पर दुर्गा की मूर्ति के साथ स्थापित कर उन्हें पूजा जाता है। गणेशजी अधिकांशतः शुभ और लाभ के अवसर पर स्थान पाते हैं। जिस प्रकार शिव के अनेक पर्याय व नाम हैं, उसी प्रकार श्रीगणेश की भी अनेक नामों से चर्चा हुई है। उदाहरणार्थ ऋग्वेद संहिता में गणेश की स्तुति इस प्रकार की गई है। 

“हे ब्रम्हणस्पति, तुम देवों में गणपति और तुम्हारा अन्न सर्वोच्च और अमानभूत है।

तुम प्रशंसनीय लोगों में राजा और मंत्रों के स्वामी हो। हम तुम्हें बुलाते हैं।

तुम हमारी स्तुति सुनकर आश्रय प्रदान करने के लिये यज्ञ ग्रह में बैठो।”

 इस स्तुति में ब्रम्हणस्पति का अर्थ वाक्पति अर्थात वाणी का स्वामी से है। और गणपति का अभिप्राय: है गुणों – का पति । महाहस्ती, एकदंत, वक्रतुण्ड तथा – दन्ती आदि नामों से भी उन्हें पुकारा जाता है। यजुर्वेद में भी गणपति की स्तुति इस  प्रकार की गई है।

“नमो गणेक्यो गणपतिभ्यश्व”

अर्थात गणों को और आप गणपतियों को प्रणाम है। इसके अतिरिक्त यजुर्वेद का यह निम्न मंत्र आज ज्यादा लोकप्रिय हो रहा है।

         “गणानां त्वां गणपति हबागडे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वां निधिपति हवाम हे वसो मम्।।”

         अर्थात हम मनुष्यादि के गण के अधिष्ठाता के रूप में विद्यमान तुम्हारा आह्वान करते हैं। संसार के समस्त पदार्थों में सर्वाधिक प्रिय होने के कारण गज रूप होने के कारण हम आपका आव्हान करते हैं। जिसमें सभी प्राणी निवास करने हैं, ऐसे वसु नामक परमात्मन् आप मेरी भी रक्षा करें। वह स्तुति गणेश के वर्तमान स्वरूप के अधिक निकट बैठती है, क्योंकि आज भी गणेश को विघ्नविनाशक तथा ‘समृद्धि के रक्षक देवता के रूप में ही माना जाता है।

अनंत चतुर्दशी का पर्व भी हालांकि गणेश पूजा से ही संबंधित है पर इस दिन भगवान विष्णु की कथा सुनी जाती है। इस पर्व (व्रत) के नाम से ही बोध होता है कि यह दिन उस अंतहीन सृष्टि के रचयिता निर्गुण ब्रम्ह की भक्ति का दिवस है। इस दिन भक्तगण अन्य कार्यों को त्याग कर ईश्वर भक्ति में बिताते हैं। इस दिन वेदग्रंथों का पाठ करके भक्ति की स्मृति का डोरा बांधा जाता है, जिसे अनंता कहते हैं। इस व्रत की पूजा दोपहर को की जाती है। इस दिन व्रती लोग स्नान करके कलश की स्थापना करते हैं। कलश पर अष्टदल कमल के समान बने बर्तन में कुशा से निर्मित अनन्त की स्थापना की जाती है। इसके पास कुमकुम, केशर या हल्दी रंजित चौदह गांठों वाला अनंत भी रखा जाता है। कुशा के अनंत की वंदना करके, उसमें विष्णु भगवान का आह्वान तथा ध्यान करके गंध, अक्षत, पुष्प, धूप तथा नैवेद्य से पूजन किया जाता है। इसके बाद अनंत  का पुनः ध्यान करके शुद्ध अनंत को अपनी दाहिनी भुजा पर बांधना चाहिये। यहं डोरा भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला तथा अनन्त फलदायक माना गया है। यह व्रत धन, पुत्रादि की कामना से किया जाता है। इस दिन नवीन सूत्र के अनंत को धारण करके पुराने को त्याग देना चाहिये। इस व्रत का पारण ब्राम्हण को सम्मान व दक्षिणा दे करके करना चाहिये। अनंत की चौदह गांठे चौदह लोगों की प्रतीक है। उनमें अनंत भगवान विद्यमान है। इस व्रत की कथा सामूहिक रूप से परिवार जनों के बीच सुनी जानी चाहिये।

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 ‌           – सुरेश सिंह बैस”शाश्वत”

एवी के न्यूज सर्विस

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