वैदिक सम्पत्ति – 341 *जाति,आयु और भोग*

Devendra singh arya

(ये लेखमाला हम पं. रघुनंदन शर्मा जी की ‘वैदिक संपत्ति’ नामक पुस्तक के आधार पर सुधि पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहें हैं)

प्रस्तुतिः देवेन्द्र सिंह आर्य (चेयरमैन ‘उगता भारत’)

गतांक से आगे ….

इस पर प्रायः लोग कहते हैं कि यदि परमेश्वर को किसी की अकाल मृत्यु मंजूर न होती, तो वह वर्षा ऋतु में पानी बरसाकर, जंगलों में अग्नि जलाकर और ब आंधी तूफान को उत्पन्न करके क्यों करोड़ों प्राणियों को अकाल में ही मराता और क्यों व्याघ्रादि हिस्र प्राणियों को उत्पन्न करके लाखों प्राणियों का अकाल में ही संहार करता ? इसका उत्तर बहुत ही सरल है। हम गत पृष्ठों में कर्मानुसार चेतन सृष्टि के उत्पत्तिक्रमों का वर्णन करते हुए दो प्रकार के सृष्टचत्पत्तिक्रमों का वर्णन कर आये हैं। पहिला क्रम सतोगुण, रजोगुण बौर तमोगुण के अनुसार खड़ी, आड़ी और उलटी सृष्टि की उत्पत्ति का है और दूसरा आपत्कालक्रम है, जो सृष्टि की अस्वाभाविकता को रोकने के लिए काम में लाया जाता है। अर्थात जब मनुष्य अपनी हिंसावृत्ति से प्राणियों का संहार यहाँ तक बढ़ा देता है कि उनको अपने कर्मफलों के भोगने के लिए पूरी आयु तक जीना भी कठिन हो जाता है और जब मनुष्य समाज जंगलों को काटकर, पहाड़ों को तोड़कर, समुद्रों को हटाकर और भौगर्भिक पदायों को निकालकर सृष्टि में व्यतिक्रम उत्पन्न कर देता है, जिससे सृष्टि के नियमों में बाधा पड़ती है, और प्राणियों को कष्ट होता है, तब परमात्मा उन अत्याचारी मनुष्यों को कीड़े-मकोड़े और कीट-पतंग बनाकर उन्हीं वर्षा, अग्नि और तूफान आदि प्राकृतिक घटनाओं के द्वारा प्रतिवर्ष मार देता है, जिनको उन्होंने जंगल आदि काटकर बिगाड़ा था। इसी तरह मांसाहारी मनुष्यों को पशु बनाकर और पीड़ित पशुओं को हिंस्र प्राणी बना देता है और उन्हें अत्याचार का प्रतिफल दिला देता है। जिस प्रकार ये दोनों प्रबन्ध होते हैं, उसी तरह जब प्राणियों का नाश इतना अधिक हो जाता है कि जीवों को जन्म धारण करने के लिए पूरे मातापिताओं की भी कमी हो जाती है तब इन थोड़े से ही माता-पिताओं में ही अधिक सन्तान उत्पन्न होने लगती है। परन्तु जब थोड़े से मातापिता भी सब जीवों को उत्पन्न नहीं कर सकते तब परमेश्वर उस अत्याचारी मनुष्य समाज के नाश करने के लिए उन्ही आनेवाले प्राणियों को ऐसा जहरीला बना देता है कि वे नाना प्रकार की बीमारी के जर्म्स बनकर मनुष्यों का नाश कर देते हैं और ऐसे वृक्षों को भी उत्पन्न कर देता है, जो मनुष्यादि प्राणियों को पकड़ पकड़कर खा जाते हैं और पशुयों तथा जगलों की रक्षा कर लेते हैं। यह सारा प्रबन्ध सृष्टि के नियमों की रक्षा करने के लिए किया जाता है। सुष्टि के ये नियम अनादि है। क्योंकि पूर्व सृष्टि के अत्याचारियों को प्रतिफल दिलाने के लिए परमात्मा आदिसृष्टि में भी मकड़ी और बतकों की भाँति कुछ ऐसी व योनियाँ उत्पन्न कर देता है, जो स्वभावतः भी प्राणियों का नाश करती हैं। इसलिए मनुष्य को यह उचित नहीं है कि यह परमेश्वर के अपराधियों को अपने अपराधो समझकर उन्हें सताए। जिस प्रकार कोई अपराधी या ऋणी न्यायधीश के ही हुक्म से सजा पा सकता है, वादी की ओर से नहीं, उसी प्रकार वर्षा, आग ,आंधी और भूकम्प के द्वारा अथवा सिंहव्याघ्र आदि हिंस्त्र पशुओं के द्वारा परमेश्वर ही प्राणियों का अकाल में संहार कर सकता है, धन्य कोई नहीं।

            इसलिए ईश्वरीय न्यायव्यवस्था का तात्पर्य यह नहीं निकाला जा सकता कि जब परमेश्वर लाखों प्राणियों को अकाल में मार देता है, तो मनुष्य भी उनको अकाल में मार डाले। प्रत्युत यह तात्पर्य तो अवश्य निकलता है कि मानुषी दुरवस्था के कारण परमेश्वरीय व्यवस्था को छोड़कर, जिन प्राणियों ने दूसरे प्राणियों को अकाल में मारकर खाने का अभ्यास कर लिया है, उस अभ्यास के छुड़ाने का प्रयत्न मनुष्य अवश्य करें।

हम चेतन सुष्टि की उत्पत्ति में लिख आये हैं कि परमात्मा ने पूर्वसृष्टि के बचे हुए दुष्टों के दुष्कर्मों का फल देने के लिए मकड़ी और बतक आदि थोड़ी सी ऐसी भी योनियाँ उत्पन्न की हैं, जो स्वभावतः जिन्दा प्राणियों को मारकर खाती हैं और शेष सिंह आदि मांसाहारी प्राणी तो मुर्दों का मांस खाकर केवल संसार की सफाई करने के हो लिए बनाए गये हैं, जिन्दा प्राणियों को मारकर मांस खाने के लिए नहीं। साथ ही हम यह भी लिख आये हैं कि उनमें जिन्दा प्राणियों को पकड़कर खानेवाले तभी उत्पन्न होते हैं जब मनुष्यों में प्राणिसंहार की प्रवृत्ति अत्यधिक बढ़ जाती है। मनुष्यों को उचित है कि वे प्राणियों का मारना और उनका माँस खाना छोड़ दें, जिससे हिंस्र जन्तुओं से हिंसा करने का स्वभाव जाता रहे। क्योंकि जब मनुष्य अन्य प्राणियों का वध करके उनका मांस खाता है, तो उन पशुओं की खुराक में कमी उत्पन्न होती है, जिनकी खुराक संसार की सफाई के उद्देश्य से मृत प्राणियों का मांस बनाई गई है। खुराक में कमी होने से ही वे चोर और डाकुओं की भांति दूसरे जिन्दा प्राणियों को चोरी से मारकर खाते हैं। ऐसी दशा में यही कहना पड़ता है कि जिन्दा पशुषों को पकड़कर खाने की आदत उनकी स्वाभाविक नहीं है, प्रत्युत मनुष्यों के कारण से हुई है। यहाँ हम हिंस्र पशुधों के स्वभाव से सम्बन्ध रखने बाली दो एक घटनाओं का वर्णन करके दिखलाते हैं कि जिन्दा जानवरों को पकड़ कर खाने की आदत उनकी स्वाभाविक नहीं है।
क्रमशः

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