भारतीय आर्थिक दर्शन के अनुरूप हो इस वर्ष का बजट

images (93)

वित्तीय वर्ष 2024-25 का पूर्णकालिक बजट माननीय वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा भारतीय संसद में 23 जुलाई 2024 को पेश किया जा रहा है। वर्तमान में भारत सहित विश्व के लगभग समस्त देशों में पूंजीवादी नीतियों का अनुसरण करते हुए अर्थव्यवस्थाएं आगे बढ़ रही हैं। परंतु, हाल ही के वर्षों में पूंजीवादी नीतियों के अनुसरण के कारण, विशेष रूप से विकसित देशों को, आर्थिक क्षेत्र में बहुत भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है और यह देश इन समस्याओं का हल निकाल ही नहीं पा रहे हैं। नियंत्रण से बाहर होती मुद्रा स्फीति की दर, लगातार बढ़ता कर्ज का बोझ, प्रौढ़ नागरिकों की बढ़ती जनसंख्या के चलते सरकार के खजाने पर बढ़ता आर्थिक बोझ, बजट में वित्तीय घाटे की समस्या, बेरोजगारी की समस्या, आदि कुछ ऐसी आर्थिक समस्याएं हैं जिनका हल विकसित देश बहुत अधिक प्रयास करने के बावजूद भी नहीं निकाल पा रहे हैं एवं इन देशों का सामाजिक तानाबाना भी छिनभिन्न हो गया है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत चूंकि व्यक्तिवाद हावी रहता है अतः स्थानीय समाज में विभिन्न परिवारों के बीच आपसी रिश्ते केवल आर्थिक कारणों के चलते ही टिक पाते हैं अन्यथा शायद विभिन्न परिवार एक दूसरे से रिश्तों को आगे बढ़ाने में विश्वास ही नहीं रखते हैं। कई विकसित देशों में तो पति-पत्नि के बीच तलाक की दर 50 प्रतिशत से भी अधिक हो गई है। अमेरिका में तो यहां तक कहा जाता है कि 60 प्रतिशत बच्चों को अपने पिता के बारे में जानकारी ही नहीं होती है एवं केवल माता को ही अपने बच्चे का लालन-पालन करना होता है, जिसके कारण बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित हो रहा है एवं यह बच्चे अपने जीवन में आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, समाज में हिंसा की दर बढ़ रही है तथा वहां की जेलों में कैदियों की संख्या में तीव्र वृद्धि देखी जा रही है। इन देशों के नागरिक अब भारत की ओर आशाभारी नजरों से देख रहे हैं एवं उन्हें उम्मीद है कि उनकी आर्थिक एवं सामाजिक क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं का हल भारतीय सनातन संस्कृति में से ही निकलेगा। अतः इन देशों के नागरिक अब भारतीय सनातन संस्कृति की ओर भी आकर्षित हो रहे हैं।

भारत में वर्ष 1947 में राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात कुछ हद्द तक वामपंथी नीतियों का अनुसरण करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को विकास की राह पर ले जाने का प्रयास किया गया था। परंतु, वामपंथी विचारधारा पर आधारित आर्थिक नीतियों ने बहुत फलदायी परिणाम नहीं दिए अतः बहुत लम्बे समय तक यह नीतियां आगे नहीं बढ़ सकीं। हालांकि बाद के खंडकाल में तो वैश्विक स्तर पर वामपंथी विचारधारा ही धराशायी हो गई एवं सोवियत रूस कई टुकड़ों में बंट गया। आज तो रूस एवं चीन सहित कई अन्य देश जो पूर्व में वामपंथी विचारधारा पर आधारित आर्थिक नीतियों को अपना रहे थे, ने भी पूंजीवादी विचारधारा पर आधारित आर्थिक नीतियों को अपना लिया है।

भारत का इतिहास वैभवशाली रहा है एवं पूरे विश्व के आर्थिक पटल पर भारत का डंका बजा करता था। एक ईसवी से लेकर 1750 ईसवी तक वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत के आसपास बनी रही है। उस समय पर भारतीय आर्थिक दर्शन पर आधारित आर्थिक नीतियों का अनुपालन किया जाता था। मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी, ऋण का बोझ, वित्तीय घाटा, बुजुर्गों को समाज पर बोझ समझना, बच्चों का हिंसक होना, सामाजिक तानाबाना छिनभिन्न होना आदि प्रकार की समस्याएं नहीं पाई जाती थीं। समाज में समस्त नागरिक आपस में भाईचारे का निर्वहन करते हुए खुशी खुशी अपना जीवन यापन करते थे।

प्राचीन काल में भारत के बाजारों में विभिन्न वस्तुओं की पर्याप्त उपलब्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता था, जिसके चलते मुद्रा स्फीति जैसी समस्याएं उत्पन्न ही नहीं होती थी। ग्रामीण इलाकों में कई ग्रामों को मिलाकर हाट लगाए जाते थे जहां खाद्य सामग्री एवं अन्य पदार्थों की पर्याप्त उपलब्धता रहती थी, कभी किसी उत्पाद की कमी नहीं रहती थी जिससे वस्तुओं के दाम भी नहीं बढ़ते थे। बल्कि, कई बार तो वस्तुओं की बाजार कीमत कम होती दिखाई देती थी क्योंकि इन वस्तुओं की बाजार में आपूर्ति, मांग की तुलना में अधिक रहती थी। माननीय वित्तमंत्री महोदय को भी देश में मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के लिए बाजारों में उत्पादों की उपलब्धता पर विशेष ध्यान देना चाहिए न कि ब्याज दरों को बढ़ाकर बाजार में वस्तुओं की मांग को कम किए जाने का प्रयास किया जाए। विकसित देशों द्वारा अपनाई गई आधुनिक अर्थशास्त्र की यह नीति पूर्णत असफल होती दिखाई दे रही है और इतने लम्बे समय तक ब्याज दरों को ऊपरी स्तर पर रखने के बावजूद मुद्रा स्फीति की दर वांछनीय स्तर पर नहीं आ पा रही है। भारत को इस संदर्भ में पूरे विश्व को राह दिखानी चाहिए एवं आधुनिक अर्थशास्त्र के मांग एवं आपूर्ति के सिद्धांत को बाजार में वस्तुओं की मांग कम करने के स्थान पर वस्तुओं की आपूर्ति को बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए अर्थात आपूर्ति पक्ष पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे मुद्रा स्फीति तो कम होगी ही परंतु साथ ही अर्थव्यवस्था में विकास की दर भी और तेज होगी क्योंकि वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ते रहने से विनिर्माण इकाईयों में गतिविधियां बढ़ेंगी, रोजगार के नए अवसर निर्मित होंगे। परंतु यदि वस्तुओं की मांग में कमी करते हुए मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के प्रयास होंगे तो उत्पादों की मांग में कमी होने के चलते उत्पादों का निर्माण कम होने लगेगा, विनिर्माण इकाईयों में गतिविधियां कम होंगी एवं देश में बेरोजगारी की समस्या बढ़ेगी। मांग में कमी करने के प्रयास सम्बंधी सोच ही अमानवीय है।

इसी प्रकार, प्राचीन भारत में ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्र के साथ ही कुटीर एवं लघु उद्योगों पर विशेष ध्यान दिया जाता था। कई ग्रामों को मिलाकर हाट लगाए जाते थे, इन कृषि उत्पादों के साथ ही इन कुटीर एवं लघु उद्योगों में निर्मित उत्पाद भी बेचे जाते थे। अतः ग्रामीण इलाकों से शहरों की पलायन नहीं होता था तथा नागरिकों को रोजगार के अवसर ग्रामीण इलाकों में ही उपलब्ध हो जाते थे। आज की परिस्थितियों के बीच कृषि क्षेत्र तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि ग्रामीण इलाकों में ही रोजगार के अधिक से अधिक अवसर निर्मित हो सकें।

जनता पर करों के बोझ को कम करने के सम्बंध में भी विचार होना चाहिए। भारत के प्राचीन शास्त्रों में कर सम्बंधी नीति का वर्णन मिलता है जिसमें यह बताया गया है कि राज्य को जनता पर करों का बोझ उतना ही डालना चाहिए जितना एक मधुमक्खी फूल से शहद निकालती है। अर्थात, जनता को करों का बोझ महसूस नहीं होना चाहिए। अतः वित्तीय वर्ष 2024-25 वर्ष के लिए प्रस्तुत किए जाने बजट में भी आवश्यक वस्तुओं पर लागू करों की दरों को कम करने के प्रयास होने चाहिए। साथ ही, मध्यमवर्गीय परिवारों को भी करों में छूट देकर कुछ राहत प्रदान की जानी चाहिए ताकि उनकी उत्पादों को खरीदने के क्षमता बढ़े। इससे अंततः अर्थव्यवस्था को ही लाभ होता है। मध्यमवर्गीय परिवारों की खरीद की क्षमता बढ़ने से विभिन्न उत्पादों की मांग बढ़ती है और अर्थव्यवस्था का चक्र और अधिक तेजी से घूमने लगता है। यदि किसी देश में अधिक से अधिक आर्थिक व्यवहार औपचारिक अर्थव्यवस्था के अंतर्गत किए जाते हैं और अर्थव्यवस्था का चक्र भी तेज गति से घूम रहा है तो ऐसी स्थिति में करों के संग्रहण में भी वृद्धि दर्ज होती है। अतः कई बार करों की दरों में कमी किए जाने के बावजूद कर संग्रहण अधिक राशि का होने लगता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि माननीया वित्त मंत्री जी के पास वित्तीय वर्ष 2024-25 के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले बजट के रूप में एक अच्छा मौका है कि भारतीय आर्थिक दर्शन के अनुरूप आर्थिक नीतियों को लागू कर पूरे विश्व को पूर्व में अति सफल रहे भारतीय आर्थिक दर्शन के सम्बंध में संदेश दिया जा सकता है।

प्रहलाद सबनानी

सेवानिवृत्त उपमहाप्रबंधक,

भारतीय स्टेट बैंक

Comment:

Latest Posts

hititbet giriş
betgaranti giriş
hititbet giriş
hititbet güncel giriş
hititbet giriş
Hititbet Giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
tuzla cilt bakım merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Hititbet
hititbet giriş
Tuzla Cilt Bakım
Tuzla Cilt Bakım Merkezi
Tuzla İpek Kirpik
Tuzla İpek Kirpik
hititbet giriş
hititbet
betgaranti giriş
Hititbet Giriş
Hititbet
Hititbet Güncel Giriş
Hititbet Yeni Giriş
Hititbet Resmi Gİriş
betyap giriş
hititbet giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
hititbet
hititbet giriş
hititbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti güncel giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
xslot giriş
betkom giriş
hitbet giriş
hitbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
betpas giriş
betpas giriş
betkom giriş
betpas giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
hititbet
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betgaranti güncel giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
xslot giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino
vdcasino
vdcasino
vdcasino
hititbet giriş
kolaybet giriş
betkom giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
meritbet giriş
betnano
betnano
betnano