टैरिफ युद्ध का भारतीय अर्थव्यवस्था पर नहीं होगा अधिक प्रभाव

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– प्रहलाद सबनानी

दिनांक 2 अप्रेल 2025 को अमेरिकी राष्ट्रपति श्री डॉनल्ड ट्रम्प द्वारा, विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले आयातित उत्पादों पर की गई टैरिफ सम्बंधी घोषणा के साथ ही अंततः अमेरिका द्वारा पूरे विश्व में टैरिफ के माध्यम से व्यापार युद्ध छेड़ दिया गया है। अभी, अमेरिका ने विभिन्न देशों से अमेरिका में होने वाले आयात पर विभिन्न दरों पर टैरिफ लगाया है। अब इनमें से कई देश अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर टैरिफ लगाने की घोषणा कर रहे हैं, जैसे चीन ने अमेरिका से चीन में आयात होने वाले उत्पादों पर दिनांक 10 अप्रैल 2025 से 34 प्रतिशत की दर से टैरिफ लगाने की घोषणा की है। टैरिफ के माध्यम से छेड़े गए व्यापार युद्ध का भारत पर कोई बहुत अधिक विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावना कम ही है। दरअसल, अमेरिका ने विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर अलग अलग दर से टैरिफ लगाने की घोषणा की है और साथ ही कुछ उत्पादों के आयात पर फिलहाल टैरिफ की नई दरें लागू नहीं की गई हैं। टैरिफ की यह दरें 9 अप्रैल 2025 से लागू होंगी।

विभिन्न देशों से अमेरिका में आयात होने वाले उत्पादों पर 10 प्रतिशत की दर से न्यूनतम टैरिफ लगाया गया है। साथ ही, कुछ अन्य देशों यथा चीन से आयातित उत्पादों पर 34 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने की है। इसी प्रकार, वियतनाम से आयातित उत्पादों पर 46 प्रतिशत, ताईवान पर 32 प्रतिशत, थाईलैंड पर 36 प्रतिशत, भारत पर 26 प्रतिशत, दक्षिण कोरिया पर 25 प्रतिशत, इंडोनेशिया पर 32 प्रतिशत, स्विट्जरलैंड पर 31 प्रतिशत, मलेशिया पर 24 प्रतिशत, कम्बोडिया पर 49 प्रतिशत, दक्षिणी अफ्रीका पर 30 प्रतिशत, बांग्लादेश पर 37 प्रतिशत, पाकिस्तान पर 29 प्रतिशत, श्रीलंका पर 44 प्रतिशत और इसी प्रकार अन्य देशों से आयातित वस्तुओं पर भी अलग अलग दरों से टैरिफ लगाने की घोषणा अमेरिकी राष्ट्रपति ने की है। कुछ उत्पादों जैसे, स्टील, एल्यूमिनियम, ऑटो, ताम्बा, फार्मा उत्पाद, सेमीकंडक्टर, एनर्जी, बुलीयन एवं अन्य महत्वपूर्ण मिनरल्स को अमेरिका में आयात पर टैरिफ के दायरे से बाहर रखा गया है।

अमेरिका का मानना है कि वैश्विक स्तर पर अन्य देश अमेरिका में उत्पादित वस्तुओं के आयात पर भारी मात्रा में टैरिफ लगाते हैं, जबकि अमेरिका में इन देशों से आयात किए जाने वाले उत्पादों पर अमेरिका द्वारा बहुत कम दर पर टैरिफ लगाया जाता है अथवा बिलकुल नहीं लगाया जाता है। जिससे, अमेरिका से इन देशों को निर्यात कम हो रहे हैं एवं इन देशों से अमेरिका में आयात लगातार बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रकार, अमेरिका का व्यापार घाटा असहनीय स्तर पर पहुंच गया है। इसके साथ साथ, अमेरिका में विनिर्माण इकाईयां बंद होकर अन्य देशों में स्थापित हो गई हैं और इससे अमेरिका में रोजगार के नए अवसर भी निर्मित नहीं हो पा रहे हैं। अब ट्रम्प प्रशासन ने अमेरिका को पुनः विनिर्माण इकाईयों का हब बनाने के उद्देश्य से अमेरिका को पुनः महान बनाने का आह्वान किया है और इसी संदर्भ में विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर भारी मात्रा में टैरिफ लगाने का निर्णय लिया गया है ताकि अमेरिका में आयातित उत्पाद महंगे हों और अमेरिकी नागरिक अमेरिका में ही निर्मित वस्तुओं का उपयोग करने की ओर प्रेरित हों।

वर्तमान में बढ़े हुए टैरिफ का बोझ अमेरिकी नागरिकों को उठाना पड़ेगा और उन्हें अमेरिका में महंगे उत्पाद खरीदने होंगे, क्योंकि नई विनिर्माण इकाईयों की स्थापना में तो वक्त लग सकता है, विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन तुरंत तो बढ़ाया नहीं जा सकता अतः जब तक नई विनिर्माण इकाईयों की अमेरिका में स्थापना हो एवं इन विनिर्माण इकाईयों में उत्पादन शुरू हो तब तक अमेरिकी नागरिकों को महंगे उत्पाद खरीदने हेतु बाध्य होना पड़ेगा। इससे अमेरिका में एक बार पुनः मुद्रा स्फीति की समस्या उत्पन्न हो सकती है एवं ब्याज दरों के कम होने के चक्र में भी देरी होगी, बहुत सम्भव है कि मुद्रा स्फीति को कम करने की दृष्टि से एक बार पुनः कहीं ब्याज दरों के बढ़ने का चक्र प्रारम्भ न हो जाए। लम्बे समय में जब अमेरिका में विनिर्माण इकाईयों की स्थापना हो जाएगी एवं इन इकाईयों में उत्पादन प्रारम्भ हो जाएगा तब जाकर कहीं मुद्रा स्फीति पर अंकुश लगाया जा सकेगा। विभिन्न देशों से आयातित उत्पादों पर टैरिफ सम्बंधी घोषणा के साथ ही, डॉलर पर दबाव पड़ना शुरू भी हो चुका है एवं अमेरिकी डॉलर इंडेक्स घटकर 102 के स्तर पर नीचे आ गया है जो कुछ समय पूर्व तक लगभग 106 के स्तर पर आ गया था। इसी प्रकार अमेरिका में सरकारी प्रतिभूतियों की 10 वर्ष की बांड यील्ड पर भी दबाव दिखाई दे रही है और यह घटकर 4.08 के स्तर पर नीचे आ गई है, यह कुछ समय पूर्व तक 4.70 के स्तर से भी ऊपर निकल गई थी। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपए की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़नी प्रारम्भ हो गई है एवं यह पिछले चार माह के उच्चतम स्तर, लगभग 85 रुपए प्रति अमेरिकी डॉलर, पर आ गई है। ट्रम्प प्रशासन के टैरिफ सम्बंधी लिए गए निर्णयों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक असर लम्बी अवधि में तो हो सकता है परंतु छोटी अवधि में तो निश्चित ही यह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विपरीत रूप से प्रभावित करते हुए दिखाई दे रहा है। अमेरिकी पूंजी बाजार (शेयर बाजार) केवल दो दिनों में ही लगभग 10 प्रतिशत तक नीचे गिर गया है और अमेरिकी निवेशकों को लगभग 5 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का नुक्सान हुआ है। इतनी भारी गिरावट तो वर्ष 2020 में कोविड महामारी के दौरान ही देखने को मिली थी। यदि यही स्थिति बनी रही तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था कहीं मंदी की चपेट में न आ जाय। यदि ऐसा होता है तो पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था भी विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। अतः ट्रम्प प्रशासन का टैरिफ सम्बंधी उक्त निर्णय अति जोखिम भरा ही कहा जाएगा।

जब पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था विपरीत रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी तो भारत की अर्थव्यवस्था पर भी कुछ तो विपरीत असर होगा ही। इस संदर्भ में किए गए विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आ रहा है कि बहुत सम्भव है कि ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से आयातित वस्तुओं पर लगाए गए 26 प्रतिशत के टैरिफ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर बहुत अधिक विपरीत प्रभाव नहीं हो। क्योंकि, एक तो भारत से अमेरिका को निर्यात बहुत अधिक नहीं है। यह भारतीय सकल घरेलू उत्पाद का मात्र लगभग 3-4 प्रतिशत ही है। वैसे भी भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यात पर निर्भर नहीं है एवं यह विभिन्न उत्पादों की आंतिरक मांग पर अधिक निर्भर है। भारत से सकल घरेलू उत्पाद का केवल लगभग 16 प्रतिशत (वस्तुएं एवं सेवा क्षेत्र मिलाकर) ही निर्यात किया जाता है। दूसरे, भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाने कुछ उत्पादों को उक्त टैरिफ व्यवस्था से फिलहाल मुक्त रखा गया है, जैसे फार्मा उत्पाद, सेमीकंडक्टर, स्टील, अल्यूमिनियम, ऑटो, ताम्बा, बुलीयन, एनर्जी आदि। संभवत: इन उत्पादों के भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर कुछ भी असर नहीं होने जा रहा है। तीसरे, भारतीय कम्पनियों (26 प्रतिशत टैरिफ) को रेडीमेड गर्मेंट्स के अमेरिका को निर्यात में पड़ौसी देशों, यथा, बांग्लादेश (37 प्रतिशत टैरिफ), पाकिस्तान (29 प्रतिशत टैरिफ), श्रीलंका (44 प्रतिशत टैरिफ), वियतनाम (46 प्रतिशत टैरिफ), चीन (34 प्रतिशत टैरिफ), इंडोनेशिया (32 प्रतिशत टैरिफ), आदि के साथ अत्यधिक स्पर्धा का सामना करना पड़ता है। परंतु, उक्त समस्त देशों से अमेरिका को होने वाले रेडीमेड गार्मेंट्स के निर्यात पर भारत की तुलना में अधिक टैरिफ लगाए जाने की घोषणा की गई है। अत: इन देशों से रेडीमेड गार्मेंट्स के अमेरिका को निर्यात भारत की तुलना में महंगे हो जाएंगे, इससे रेडीमेड गार्मेंट्स के क्षेत्र में भारत के लिए लाभ की स्थिति निर्मित होती हुई दिखाई दे रही है। इसी प्रकार, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कृषि उत्पादों के निर्यात भी भारत से अमेरिका को बढ़ सकते हैं। यदि किन्ही क्षेत्रों में भारत को नुक्सान होता हुआ दिखाई भी देता है तो भारत के विश्व के अन्य देशों के साथ बहुत अच्छे राजनैतिक संबंधो के चलते भारत को अपने उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशने में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा। वैसे भी, अमेरिका सहित भारत के यूरोपीयन देशों, ब्रिटेन एवं खाड़ी के देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौतों को सम्पन्न करने हेतु वार्ताएं लगभग अंतिम दौर में पहुंच गईं हैं, इसका लाभ भी भारत को होने जा रहा है।

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा शीघ्र ही मोनेटरी पॉलिसी के माध्यम से रेपो दरों में परिवर्तन की घोषणा की जाने वाली है। भारत में चूंकि मुद्रा स्फीति की दर लगातार गिरती हुई दिखाई दे रही है अतः भारत में रेपो दर में 75 से 100 आधार बिंदुओं की कमी की घोषणा की जा सकती है। यदि ऐसा होता है तो विभिन्न उत्पादों की उत्पादन लागत में कुछ कमी सम्भव होगी, जिसके चलते भारत में निर्मित उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। हालांकि, केवल ब्याज दरों के कमी करके पूंजी की लागत को कम करने से काम चलने वाला नहीं है, भारत को भूमि एवं श्रम की लागतों को भी कम करने की आवश्यकता है तथा उत्पादकता में सुधार करने की भी आवश्यकता है ताकि भारत में निर्मित होने वाले उत्पादों की कुल लागत में कमी हो एवं यह उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा में अन्य देशों के मुक़ाबले में टिक सकें। वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक, सामरिक, रणनीतिक, राजनैतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों में आमूल चूल परिवर्तन होता हुआ दिखाई दे रहा है, परिवर्तन के इस दौर में भारतीय कम्पनियां कितना लाभ उठा सकती हैं यह भारतीय कम्पनियों के कौशल पर निर्भर करेगा। साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा शीघ्रता से अपने आर्थिक सुधार कार्यक्रमों को गति देकर भी वैश्विक स्तर पर निर्मित हुई उक्त परिस्थितियों का लाभ उठाया जा सकता है।

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