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डॉ डी के गर्ग

निवेदन : ये लेखमाला 20 भाग में है। इसके लिए सत्यार्थ प्रकाश एवं अन्य वैदिक विद्वानों के द्वारा लिखे गए लेखों की मदद ली गयी है। कृपया अपने विचार बताये और उत्साह वर्धन के लिए शेयर भी करें।
भाग-14

जैन मत में गपोड़े
कृपया ध्यान दे ;–
विवेकसार पृष्ठ १०१ में—एक नन्दीषेण ने दश पूर्व तक भोग किया। एक मुनि वेश्या के घर में रहा, भोग किया, फिर मुनि की दीक्षा ले, स्वर्ग को गया। और स्थूलभद्र मुनि भी ऐसा ही काम करके स्वर्ग को गया।
विवेकसार पृष्ठ २२८ में —एक पुरुष ने कोशा वेश्या का भोग किया, पश्चात् त्यागी होकर स्वर्ग को गया।
विवेकसार पृष्ठ १०१ में— अर्णकमुनि चरित्र से चूक, कई वर्ष दत्त सेठ के घर में भोग किया, पश्चात् देवलोक को गया।
विवेकसार पृष्ठ १०६ में—श्रीकृष्ण तीसरे नरक में गये।
विवेकसार पृष्ठ १४५ में— धन्वन्तरि वैद्य नरक को गया।
और देखो विचित्र लीला! विवेकसार पृष्ठ १०६ में—श्री कृष्ण के पुत्र ढण्ढण मुनि को स्यालिया उठा ले गया और खा गया, पश्चात् देवता हुआ।
जैनियों के सर्व तीर्थङ्कर और उनके गण तथा उनके शिष्य और जैनमतस्थ मनुष्य क्रोडान् क्रोड कोई शिवपुर, कोई सिद्धशिला, कोई देवलोक और कोई स्वर्ग में गये, परन्तु श्रीकृष्णादि और अन्य भी अनेक नरक को गये और जायगें।
समीक्षक—भला! अब विचारिये कि ये बातें! क्या जैनियों के ही हाथ में स्वर्ग-नरक की कुंजी है? इनको ऐसा महाझूठ लिखते बोलते लज्जा भी नहीं आई कि श्रीकृष्णादि महात्मा नरक में गये और इनके रण्डीबाज भी स्वर्ग और मुक्ति को चले गये।
रत्नसार पृष्ठ १४९—वनस्पति के एक शरीर में अनन्त जीव होते हैं, वे साधारण वनस्पति कहाती हैं। जो कि कन्दमूलप्रमुख और अनन्तकायप्रमुख होते हैं, उनको साधारण वनस्पति के जीव कहने चाहिएँ। उनका आयुमान अन्तर्मुहूर्त्त होता है परन्तु यहाँ पूर्वोक्त इनका मुहूर्त्त समझना चाहिए।
और एक शरीर में जो ‘एकेन्द्रिय’ अर्थात् स्पर्श इन्द्रिय इनमें है और उसमें एक जीव रहता है, उसको प्रत्येक-वनस्पति कहते हैं। उसका देहमान एक सहस्र योजन अर्थात् पुराणियों का योजन ४ कोश का परन्तु जैनियों का योजन १०००० दश सहस्र कोशों का होता है, ऐसे चार सहस्र कोश का शरीर होता है, उसका आयुमान अधिक से अधिक दश सहस्र वर्ष का होता है।
अब दो इन्द्रिय वाले जीव अर्थात् एक उनका शरीर और एकमुख जो शङ्ख, कौड़ी और जूं आदि होते हैं, उनका देहमान अधिक से अधिक अड़तालीस कोश का स्थूल शरीर होता है और उनका आयुमान अधिक से अधिक बारह वर्ष का होता है।
यहाँ बहुत ही भूल गया क्योंकि इतने बड़े शरीर का आयु अधिक लिखता, और अड़तालीस कोश की स्थूल जूं जैनियों के शरीर में पड़ती होगी और उन्हीनेंदेखी भी होगी, और का भाग्य ऐसा कहाँ, जो इतनी बड़ी जूं को देखें!!!
रत्नसार भाग १ पृष्ठ १५० —और देखो इनका अन्धाधुन्ध! बीछू, बगाई, कसारी और मक्खी एक योजन के शरीर वाले होते हैं। इनका आयुमान अधिक से अधिक छः महीने का है।
देखो भाई! चार-चार कोश का बीछू अन्य किसी ने देखा न होगा। जो आठ मील तक का शरीरवाला बीछू और मक्खी भी जैनियों के मत में होती है। ऐसे बीछू और मक्खी उन्हीं के घर में रहते होंगे और उन्हीं ने देखे होंगे, अन्य किसी ने संसार में नहीं देखे होगें। कभी ऐसे बीछू किसी जैनी को काटें तो उसका क्या होता होगा?
जलचर मच्छी आदि के शरीर का मान एक सहस्र योजन अर्थात् १०००० कोश के योजन के हिसाब से १,००,००,००० एक करोड़ कोश का शरीर होता है और एक करोड़ पूर्व वर्षों का इनका आयु होता है।
वैसा स्थूल जलचर सिवाय जैनियों के अन्य किसी ने न देखा होगा।
और चतुष्पात् हाथी आदि का देहमान दो कोश से नव कोशपर्य्यन्त और आयुमान चौरासी सहस्र वर्षों का इत्यादि।
ऐसे बड़े-बड़े शरीरवाले जीव भी जैनी लोगों ने देखे होंगे और मानते हैं। और कोई बुद्धिमान् नहीं मान सकता।
रत्नसार भाग १ पृष्ठ १५१—जलचर गर्भज जीवों का देहमान उत्कृष्ट एक सहस्र योजन अर्थात् १००००००० एक क्रोड़ कोशों का और आयुमान एक क्रोड़ पूर्व वर्षों का होता है।
इतने बड़े शरीर और आयुवाले जीवों को भी इन्हीं के आचार्यों ने स्वप्न में देखे होंगे! क्या यह महा झूठ बात नहीं कि जिसका कदापि सम्भव न हो सके?

समीक्षा –समीक्षा की कोई आवश्यकता नहीं , ये हम पाठको के विवेक पर छोड़ देते है।।

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