राम मंदिर और देश के छद्दम कालनेमि बन रहे राजनीतिज्ञ

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लेखक
संपादक उगता भारत
डॉ राकेश कुमार आर्य
श्रीरामचन्द्र जी और कृष्णा भगवान के चरित्रों का अध्ययन करने पर एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि अपने जीवनकाल में इस दोनों को ही अनेक बार जनता ने ही अपमानित किया। लेकिन उनका अंत किस तरह हुआ, उससे हमें शिक्षा लेनी चाहिए। रावण, कंस और हिरणकश्यप अपवाद को छोड़, क्योकि इनका अंत जगत के पालनहार विष्णु के हाथों ही लिखा था। खैर, हमारे पालनहार कहते हैं संयम रखो, अब कोई सत, त्रेता या द्वापर युग नहीं, कलयुग है, इनका भी ऐसा ही अंत होगा कि इनकी भावी पीढ़ियां इनको स्वीकार नहीं करेंगी। सनातन विरोधियों का समय भी निकट आ रहा है। क्योकि इन सनातन विरोधियों को राजनीति नहीं सियासत आती है। राजनीति और सियासत में उतना अंतर है जितना धरती और आकाश में। जिस दिन इस गूढ़ रहस्य को समझ जाएगें स्वतः आभास होगा कि क्या अनर्थ कर रहे थे। 4 अरब वर्षों पुराने सनातन का विनाश करने कितने आये और गए सनातन आज भी अमर है और रहेगा। लेकिन सनातन विरोधियों का नामोनिशान नहीं रहेगा। ध्यान रखो ‘बुझता दीया हमेशा टिमटिमाता है’ ठीक वही स्थिति सनातन विरोधियों, चाहे वह नेता है या इनके समर्थक, की है चाहे वह किसी धर्म या मजहब से हो। सत्य विचलित हो सकता है पराजित नहीं।

केवल एक उदाहरण शेष अपने आप सोंचिये। याद करिए 7 नवम्बर 1966, जब गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेलते, पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली लाल हो गयी थी, तब श्रद्धये कृपालु जी महाराज ने कहा था “इंदिरा जिस तरह गोपाष्टमी के दिन हम निहत्ते साधु-संतों से खून की होली खेली गयी है, तेरी भी गोपाष्ठमी के दिन मृत्यु होगी और हुआ भी वही, 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्ठमी थी।

यद्यपि विदेशी इतिहासकारों और देश के भीतर बैठे गद्दार इतिहासकारों ने एक षड्यंत्र के अंतर्गत रामचंद्र जी और श्री कृष्ण जी जैसे महापुरुषों को भारत में कल्पनिक माना है और अपने इस षडयंत्रपूर्ण कुचक्र को सिरे चढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया है कि भारत का प्राचीन गौरव किसी भी रूप में स्थापित ना होने पाए, परंतु अब यह पूर्णतया सिद्ध हो चुका है कि श्री रामचंद्र जी महाराज और श्री कृष्ण जी महाराज जैसे महापुरुष काल्पनिक ना होकर हमारे इतिहास नायक और इस देश की वैदिक संस्कृति के महानतम नक्षत्र हैं। श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और उनके जन्मस्थान पर कभी एक भव्य मन्दिर विराजमान था । जिसे 1528 ई0 में मुगल आक्रमणकारी बाबर ने तोड़कर वहाँ एक मस्जिद बना दी थी । हिंदू पक्ष की दृष्टि में इस अनधिकृत ,अवैध और भारतीय इतिहास को कलंकित करने वाली मस्जिद को हटाने के लिए और वहां पर श्री रामचंद्र जी का भव्य मंदिर पुनः स्थापित करने के लिए भारत में 1528 ई0 से लेकर 1947 तक अनेक युद्ध लड़े गए और हिंदू समाज ने अनेक युद्धों में लाखों की संख्या में अपने बलिदान दिए । इसका कारण केवल यही था कि श्री रामचंद्र जी को भारत के लोग जिस श्रद्धा भाव से देखते थे उसके अनुरूप वह उन्हें उनके जन्म स्थल पर बने भव्य मंदिर में विराजमान भी देखना चाहते थे।
देश जब स्वतंत्र हुआ तो सरदार पटेल जी के सक्षम और कुशल नेतृत्व के कारण सोमनाथ के मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। तब यह आशा बलवती हुई थी कि सरदार पटेल की दृष्टि श्री राम जन्म भूमि की ओर भी जाएगी और वह इसका जीर्णोद्धार भी सोमनाथ मंदिर की भांति कराएंगे , परंतु सरदार पटेल को देश के एकीकरण की चिंता उस समय सबसे अधिक थी। दूसरे स्वतंत्रता के पश्चात वह अधिक देर स्वस्थ नहीं रह पाए। यही कारण रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग ढाई वर्ष पश्चात ही उनका देहावसान भी हो गया । उसके पश्चात उनके जीवनकाल में ही हिंदू महासभा के एक कर्मठ नेता विशारद जी ने श्री राम जन्मभूमि पर पूजा पाठ कराने की प्रार्थना के साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से प्रारंभ किए गए इस वाद ने कालांतर में जाकर नया मोड़ लिया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में इस स्थान को मुक्त करने एवं वहाँ एक नया मन्दिर बनाने के लिये एक लम्बा आन्दोलन चला। 6 दिसम्बर सन् 1992 को यह विवादित ढ़ांचा गिरा दिया गया और वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया।
श्री राम जन्मभूमि का संक्षिप्त इतिहास यहां जानना आवश्यक होगा । अब अनेक ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि 1528 में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत के अन्य अनेकों ग्रंथों से भी ऐसे साक्ष्य मिलते हैं कि श्री राम जन्म भूमि ही वह स्थल है जहां दशरथ नंदन श्री राम का जन्म हुआ था ।1853 में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस भूमि को लेकर पहली बार विवाद हुआ।1859 में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा। वास्तव अंग्रेजों ने उस समय कूटनीति से काम लिया था ।उन्होंने स्पष्ट यह न कहकर कि यह जन्मभूमि हिंदुओं की है और इस पर उन्हें अपनी पूजा पाठ करने का पूरा अधिकार है , इसको मुसलमानों को भी देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वह मुसलमानों के भी शुभचिंतक हैं। यदि अंग्रेज उसी समय इसका निस्तारण कर हिंदुओं को यह स्थान सौंप देते तो फिर उन्हें मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध प्रयोग करने की स्वतंत्रता न मिल पाती। 1949 में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।सन् 1986 में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया।
मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की। यह कांग्रेस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासन काल का वह समय था , जिस समय सरकार शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सामने झुक गई थी ।उसी समय बाबरी एक्शन कमेटी का अस्तित्व में आना यह दिखाता है कि मुसलमानों ने बाबरी एक्शन कमेटी का गठन भी इसीलिए किया था कि सरकार को देर सवेर उसी प्रकार झुका लिया जाएगा जिस प्रकार वह शाहबानो वाले प्रकरण में झुक गई थी।1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी भूमि पर राम मंदिर के निर्माण का आन्दोलन आरंभ किया ।6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई। उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार काम कर रही थी। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।
उस समय की राजनीति मंडल और कमंडल के चक्रव्यूह में फंसी हुई थी , परंतु राम मंदिर के प्रकरण ने जिस प्रकार देश की जनता को झकझोर कर रख दिया था , उससे लगता था कि भाजपा और अन्य हिंदूवादी दल श्री राम के मंदिर निर्माण के प्रति हृदय से आस्थावान हैं और यदि भविष्य में उसकी सरकार केंद्र में आती है तो वह निश्चय ही श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम का मंदिर बनाने की ऐतिहासिक पहल करेंगी ।राम जन्मभूमि पर खड़ी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दस दिन बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को अर्थात तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 वर्ष लगाए। 30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपी। सरकार ने इस जांच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया था।
यह कहना कठिन है कि आयोग को अपने निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए वास्तव में इतने समय की आवश्यकता थी या फिर यह किसी सुनियोजित षड्यंत्र के अंतर्गत बार-बार अपनी रिपोर्ट सौंपने में असफल हो रहा था। 31 मार्च 2009 को समाप्त हुए लिब्रहान आयोग का कार्यकाल को अंतिम बार तीन महीने अर्थात् 30 जून तक के लिए बढ़ा गया।2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह भाग निर्मोही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायाधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई भाग मुसलमान गुटों को दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वास्तव में न्यायालय ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा की । जिनसे यह स्पष्ट हो रहा था कि यहां पर श्री राम का भव्य मंदिर रहा है ।
इससे हिंदू पक्ष को यह कहने का अवसर मिला कि न्यायालय ने तुष्टीकरण का सहारा लेते हुए मुस्लिम पक्ष को उक्त भूमि का एक तिहाई भाग दिया है।उच्चतम न्यायालय ने 7 वर्ष पश्चात निर्णय लिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायाधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया और 70 वर्ष बाद 30 मार्च 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जिसमें मस्जिद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित अर दिया गया था।अब इस प्रकरण को लेकर हम देश में राजनीति को एक बार फिर गरमाती देख रहे हैं ।भाजपा ने प्रारंभ से ही श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम का भव्य मंदिर बनाने को अपने चुनावी घोषणा पत्र में स्थान दिया है और भाजपा के नेताओं ने मंचों से भी जनता को यह आश्वासन और विश्वास दिलाने में कभी कमी नहीं छोड़ी कि यदि वह सत्ता में आए तो वे राम मंदिर अवश्य बनाएंगे । श्री राम के नाम को उन्होंने राजनीति में इस प्रकार प्रयोग किया कि भारत की राजनीति राममय हो गई ।
जनता और विशेषत: देश के हिंदू मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता इस आशा और अपेक्षा के साथ सौंपी कि आप सत्ता में बैठिये और श्री राम मंदिर का निर्माण कीजिए । यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भाजपा ने जनमानस की मानसिकता को समझने में चूक की और वह जब भी सत्ता में पहुंची तो सत्ता में जाकर वह अपने वादों से भटक गई ।यही कारण रहा कि उसने राम मंदिर निर्माण के संकल्प को चुनावों तक सीमित करके देखना ही उचित समझा।अब जबकि भाजपा की मोदी सरकार सत्ता में है तो 2014 से ही देश के लोगों को इस सरकार से यह विशेष अपेक्षा थी कि श्री मोदी के नेतृत्व वाली यह सरकार राम जन्मभूमि पर श्री राम जी का भव्य मंदिर अवश्य बनायेगी। परंतु देश के लोगों ने देखा कि इस बार भी भाजपा राम मंदिर निर्माण के विषय में कोई गंभीर और सकारात्मक कदम नहीं उठा पा रही थी ।तब देश के लोगों ने अपने असंतोष को किसी न किसी प्रकार सरकार तक पहुंचा दिया । इतना ही नहीं देश के संत भी नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से अप्रसन्न अधिक दिखाई देने लगे। योग गुरु बाबा रामदेव जी ने भी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया कि वह अपने किए गए वादों को ध्यान में रखें।
अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 67 एकड़ जमीन को हिंदू संगठनों को देकर राम मंदिर निर्माण की दिशा में पहला और ठोस कदम उठाने का सराहनीय कार्य किया है । विपक्षी राजनीतिक दल श्री मोदी के इस निर्णय को चुनावों के दृष्टिगत उठाया गया कदम बता कर इसकी आलोचना कर रहे हैं । उनकी आलोचना में बल हो सकता है ,परंतु उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि वह श्री मोदी के और उनकी सरकार के इस कदम की आलोचना कर रहे हैं तो वह भी तो राजनीति ही कर रहे हैं । अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने का जितना अधिकार विपक्षी दलों को है, उतना ही केंद्र की मोदी सरकार और उनकी भाजपा को भी है। अतः चाहे आलोचना हो रही है चाहे इस काम को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य हो रहा है – राजनीति तो दोनों ओर से हो रही है , परंतु राजनीति भी सही दिशा में होने लगे तो वह भी देशहित में ही कही जाती है। अच्छा हो कि राजनीति में लगे ये लोग देश के लिए राजनीति करना सीखें।
अब देश हित में यही उचित है कि पिछले 70 वर्ष से अधिक समय से चले आ रहे इस विवाद का निस्तारण करने में सभी दल अपनी – अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें और सकारात्मक भूमिका निभाते हुए राष्ट्रहित में राम मंदिर का निर्माण होने दें। न्यायालयों में रोड़े अटका – अटका कर इस वाद को लंबा खींचने से अब कोई लाभ नहीं है। देश की जनता समझ चुकी है कि कौन रोड़े अटका रहा है और कौन रोड़े अटकाने वालों को और उनके रोड़ों को हटाने का काम कर रहा है ? देश की जनता यह भी समझ रही है कि कौन सा निर्णय रोडे अटकाने वाला है और कौन सा रोड़े हटाने वाला है ? रोड़े अटकाने के इस खेल को बंद कर ‘ रोड़ों ‘ को ही श्री राम जी के मंदिर की नींव में रखकर सदा के लिए समाप्त कर देना समय की आवश्यकता है । अच्छा हो कि भारत के राजनीतिज्ञ पूर्ण सकारात्मकता से काम करते हुए देश के जनमानस को एक अच्छा संदेश दें।

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