अफगानिस्तान का हिंदू वैदिक अतीत, भाग – 7 , भारत का सिकन्दर सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड़*

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वीर सावरकर जी हिंदुओं की दिग्विजय के विषय में कहते हैं कि “साधारणतः सन् 550 के बाद हिंदू राजाओं ने सिंधु नदी को विभिन्न मार्गों से लाँघकर आज जिन्हें बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, हिंदूकुश, गिलगित, कश्मीर इत्यादि कहा जाता है और जो प्रदेश सम्राट अशोक के पश्चात् वैदिक हिंदुओं के हाथ से यवन, शक, हूण आदि म्लेच्छों ने छीन कर लगभग 500 वर्ष तक अपने अधिकार में ले रखे थे, वे सिंधु नदी के पार के समस्त भारतीय साम्राज्य के प्रदेश उन सभी म्लेच्छ शत्रुओं को ध्वस्त करते हुए वैदिक हिंदुओं ने फिर से प्राप्त कर लिए। एक समय ऐसा भी था कि जब कश्मीर के उस पार मध्य एशिया के खेतान में भी हिंदू राज्य प्रस्थापित थे। इतिहासकारों के अनुसार गजनी में भी राजा शिलादित्य शासन करते थे।

इतिहासकार स्मिथ ने भी यही कहा है- उनका कथन है कि हिंदुओं के हाथों मिहिरकुल की पराजय तथा शक्ति के संपूर्ण विनाश के उपरांत लगभग 5 शताब्दी तक भारत ने विदेशी आक्रमणों से मुक्ति का अनुभव किया। भारत के राजाओं के विश्व विजयी अभियानों को बड़ी सावधानी से इतिहास से हटा दिया गया है।

आइए! अब इस अध्याय में हम ऐसे ही एक विश्व विजयी हिंदू सम्राट के बारे में विचार करते हैं जिसने विदेशी अरब आक्रांताओं को भारत की पवित्र भूमि से बाहर खदेड़ कर भारत की धर्म ध्वजा अरब और चीन सहित विश्व के बड़े भू-भाग पर फहरायी थी। यह ऐसा हिंदू वीर सम्राट था जिसके सामने विश्व विजेता कहा जाने वाला सिकंदर भी कहीं नहीं टिक पाता। भारत का यह सम्राट ही वास्तविक 'विश्व विजेता' सम्राट कहे जाने योग्य है और इसका नाम था-ललितादित्य मुक्तापीड़।

भारत का सिकन्दर सम्म्राट ललितादित्य मुक्तापीड़

ललितादित्य मुक्तापीड़ कश्मीर का वह राजा था, जिसके नाम को सुनकर ही अरबी और तुर्क के आक्रमणकारियों की नींद उड़ जाती थी और वे रात को शय्या पर सोते सोते भी उछलकर पड़ते थे। भारत के इतिहास की वीर परंपरा से आज हमारे लिए माँ भारती का यह वीर पुत्र दृष्टि से ओझल कर दिया गया है। हमारे इतिहास की पुस्तकों में कहीं पर भी उसका उल्लेख नहीं होता।

अपने ऐसे ही माँ भारती के वीर सपूतों के बारे में वीर सावरकर ने मुसलमान लेखकों को उद्धृत करते हुए एक स्थान पर लिखा है-“प्रबल हिंदू काफिरों के भय से हम अरबों के बाल-बच्चे, स्त्री-पुरुष जंगल जंगल मारे फिरते हैं। हमारे द्वारा जीते गए सिंध प्रांत के अधिकांश भागों को पुनः जीतकर वहाँ हिंदुओं ने अपना राज्य स्थापित कर लिया है। हम निराश्रित अरबों के लिए ‘अल्लाह फजाई’ नामक किला हो एकमात्र शरण का स्थल बचा है। अरबी झंडे के नीचे हमारे हाथ में केवल यही एक स्थान है। केवल राजकीय मोर्चे पर ही हम अरबों को धूल नहीं चाटनी पड़ी है, अपितु राजा दाहर का कत्ल करने के पश्चात् जिन हजारों हिंदुओं को 100 वर्ष के परिश्रम से हमने भ्रष्ट करके मुसलमान बनाया था और हिंदू स्त्रियों को दासी बनाकर मुसलमानों के घर-घर घुसे, उस धार्मिक मोर्चे पर भी हमारी वैसी ही दुर्गति हुई है, हिंदुओं में उत्पन्न क्रांतिकारी एवं प्रभावी आंदोलन के कारण इस्लाम द्वारा भ्रष्ट किए गए समस्त स्त्री पुरुषों ने फिर से अपना काफिर धर्म अपना लिया है।”

 हिंदू जाति के भीतर ऐसा गौरवबोध कब हुआ और किसके कारण हुआ? निस्संदेह इसमें ललितादित्य मुक्तापीड़ जैसे हमारे विश्व विजेता सम्राटों का विशेष और प्रशंसनीय योगदान था।

ललितादित्य मुक्तापीड़ कश्मीर के कर्कोटा वंश के हिन्दू सम्राट थे। ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरणों में कश्मीर के तत्कालीन कर्कोटा राज्यवंश के संस्थापक राजा दुर्लभवर्धन का उल्लेख करते हुए बताया है कि वह एक शक्तिशाली राजा था और अपने राज्यारोहण के पश्चात् उसने अपना राज्य कश्मीर से काबुल तक विस्तृत कर लिया था। यद्यपि कनौज के शासक हर्षवर्धन के वर्चस्व को कश्मीर उस समय स्वीकार करता था। इसी राजवंश में चंद्रपीड़ नामक शासक हुआ।

चीन भी झुकता था ललितादित्य के समक्ष

 इतिहासकार गोपीनाथ श्रीवास्तव हमें बताते हैं कि- "यह राजा इतना शक्तिशाली था कि चीन का राजा भी इसकी महत्ता को स्वीकार करता था। भारत की राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता के लिए यह शासक कितना संवेदनशील था, इसका अनुमान आप उसकी कार्य योजना से लगा सकते हैं। 712 ई. में भारत पर मोहम्मद बिन कासिम आक्रमण करता है और 713 ई. में यह राजा अपने दूत को चीन इस आशय से भेजता है कि चीन अरब के विरुद्ध हमारी सहायता करे।"

    राजा की कूटनीति और विवेकशीलता देखिए। चीन हमारे लिए बौद्ध होने के कारण धर्म का भाई था। इसलिए अरब वालों के विरुद्ध चीन से ऐसी सहायता माँगना राजा की सफल कूटनीति का संकेत है। अरबों के आक्रमण सांस्कृतिक विनाश के लिए किए जाने वाले आक्रमण थे। ऐसे में यदि भारत की सांस्कृतिक विरासत लुटती है या मिटती है तो उसका सीधा प्रभाव चीन पर पड़ना स्वाभाविक था, क्योंकि चीन को अपना सारा आत्मिक भोजन और बौद्धिक मार्गदर्शन भारत से ही मिलता था, इसलिए उन परिस्थितियों में चीन भारत का स्वाभाविक मित्र था। इधर राजा ललितादित्य इतना प्रभावशाली था कि चीन उसके सामने स्वयं पानी भरता था। इन दोनों कारणों से चीन ने राजा ललितादित्य को अरबों के आक्रमणों को रोकने के लिए अपनी सहमति देनी उचित मानी।

राजा ललितादित्य मुक्तापीड़ के विषय में नरेंद्र सहगल अपनी पुस्तक ‘धर्मांतरित कश्मीर’ में लिखते हैं- “ललितादित्य ने पंजाब, कनौज, बदख्शाँ और पीकिंग को जीता और 12 वर्ष के पश्चात् कश्मीर लौटा। ललितादित्य जब अपनी सेना के साथ पंजाब कूच पर निकला तो पंजाब की जनता ने उसके स्वागत में पलक पावड़े बिछा दिए। ललितादित्य ने अपने सैन्य अभियानों से बंगाल, बिहार, उड़ीसा तक अपने साम्राज्य का विस्तार किया। यह सैनिक कूच गुजरात, मालवा, मेवाड़ तक सफलतापूर्वक आगे ही आगे बढ़ता गया। ललितादित्य के इन सफल युद्ध अभियानों के कारण भारत ही नहीं समूचे विश्व में कश्मीर की धरती के पराक्रमी पुत्रों का नाम यशस्वी हुआ।”

सचमुच जो वीर सपूत अपनी जाति, अपने देश, अपने धर्म और अपने राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करने को आतुर रहते हैं और उसके लिए उतने ही स्तर के बड़े और महान् कार्य करने में संलग्न हो जाते हैं, उनका नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाता है। ललितादित्य मुक्तापीड़ ऐसे ही महान् शासकों में से एक था। जिसने माँ भारती के सम्मान के लिए विश्व विजयी अभियान निकाले और शत्रुओं को उनकी मांद में घुसा कर जब स्वदेश लौटे तो लोगों ने पलक पावड़े बिछाकर उनका अभिनंदन और स्वागत किया।

देश की सीमाएँ रहीं सुरक्षित

      उन्होंने लद्दाख और बाल्टिस्तान से तिब्बतियाँ राजाओं को भी खदेड़ कर भगा दिया था। कल्हण की 'राजतरंगिनी' में आठवीं शताब्दी के महानायक ललितादित्य मुक्तापीड़ के पराक्रम का जिस ओजपूर्ण शैली में वर्णन किया गया है उसे पढ़कर हर एक देशभक्त का मस्तक गर्वोत्रत हो उठेगा और सीना गर्व से फूल उठेगा। ललितादित्य ने कश्मीर के कर्कोटा साम्राज्य पर लगभग 36 वर्ष 7 महीने 11 दिन शासन किया था। अपने इस दीर्घकालीन शासनकाल में राजा ललितादित्य ने ऐसा प्रबंध कर दिया था कि देश की सीमा पूर्णरूपेण सुरक्षित हो गई थीं।

इतिहासकार आरसी मजूमदार हमें बताते हैं- "भारत से चीन तक के कारवां मार्गों को नियंत्रित करने वाली कराकोरम पर्वत श्रृंखला के सबसे अगले स्थल तक उसका साम्राज्य फैला था। आठवीं शताब्दी के आरंभ से अरबों का आक्रमण काबुल घाटी को चुनौती दे रहा था। इसी समय सिंघ की मुस्लिम शक्ति उत्तर की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही थी। जिस समय काबुल और गांधार का शाही साम्राज्य इन आक्रमणों में व्यस्त था, ललितादित्य के लिए उत्तर दिशा में पाँव जमाने का एक सुंदर अवसर था। अपनी विजयी सेना के साथ वह दर्द देश अर्थात् दर्दीस्तान से तुर्किस्तान की ओर बढ़ा। असंख्य कश्मीरी भिक्षुओं तथा मध्य एशियाई नगरों के कश्मीरी लोगों के प्रयासों के फलस्वरूप पूरा क्षेत्र कश्मीरी परंपराओं तथा शिक्षा से समृद्ध था। अतः यह समझना कठिन नहीं है कि ललितादित्य के मार्गदर्शन में कश्मीरी सेना ने वहाँ सरलता से विजय प्राप्त कर ली। टेंग शासन की समाप्ति तथा भीतरी असैनिक युद्धों के कारण जिन चीनी साम्राज्य के अधीन वे आए थे, वह पहले खंड- खंड हो रहा था। (एनशिएंट इंडिया, पृष्ठ 383) इतिहासकारों ने इस बात का भी बड़े गौरव के साथ वर्णन किया है कि किसी मुस्लिम शासक का इतना बड़ा साम्राज्य नहीं था, जितना बड़ा साम्राज्य हमारे ललितादित्य का था। इतिहासकार बामजई हमें बताता है- "ललितादित्य की सैनिक विजयों को उसके विभिन्न शासनकालीन वर्णनों में महत्त्वपूर्ण स्थान मिला है। आज के समय में भी उसे कश्मीरियों का नायक बताया गया है, परंतु निर्माण में जनकल्याण के उसके महान् कार्य, शिक्षा के प्रति प्रेम, विद्वानों के संरक्षण और दयालु विजेता रूपी गुणों के कारण उसकी गणना कश्मीर के सबसे बड़े शासकों में होती है। ललितादित्य जैसे महान् और पराक्रमी शासकों के कारण ही अरब वालों के आक्रमण रुके और देश में सदियों तक शांति व्यवस्था स्थापित रही। आप अनुमान करें कि जिस देश के शासकों का शासन ईरान और चीन तक स्थापित रहा हो उस देश की सीमाओं पर भला कोई कैसे कुदृ‌ष्टि डाल सकता था?"

 राजा ललितादित्य जैसे महान् शासकों के कारण ही अफगानिस्तान उस समय अपने धर्म, संस्कृति और इतिहास की महान् परंपराओं को सुरक्षित रखने में सफल रहा। ललितादित्य जैसे शासक यदि उस समय ना हुए होते तो यह निश्चित था कि हमारे इस सीमांत प्रांत का धर्मांतरण बहुत शीघ्र अर्थात् इस्लाम के आगमन के आरंभिक काल में ही हो गया होता। आज यदि भारतवर्ष में हिंदुत्व जीवित है तो उसके पीछे इन जैसे महान् शासकों का पराक्रम ही एकमात्र कारण है। जिन देशों में ललितादित्य जैसे महान् शासक नहीं थे, इस्लाम वहाँ पर तेजी से फैल गया और उनके धर्म, संस्कृति और इतिहास को सबको खाकर समाप्त कर पचाकर बैठ गया। इस दृष्टिकोण से यदि अपने इस महान् शासक का मूल्यांकन किया जाए तो इसके सामने निश्चित रूप से नतमस्तक हुए बिना कोई भी व्यक्ति रह नहीं पाएगा।

कलाओं का भी किया विस्तार

 सम्राट ललितादित्य अपने आप में कलाओं के भी ज्ञाता थे। उन्होंने कश्मीर का प्रसिद्ध मार्तंड मंदिर निर्मित कराया था। अपनी पुस्तक 'ट्रांसलेशन ऑफ राजतरंगिणी' में इतिहासकार स्टैन हमें बताता है- 'मार्तंड के भव्य मंदिर के अवशेष जिसे सम्राट ने इसी नाम के तीर्थ स्थल पर बनवाया था, आज भी प्राचीन हिंदू निर्माण कला का सबसे अनूठा नमूना है। अपनी वर्तमान क्षत अवस्था में भी इन भग्नावशेषों को उनके आकार-प्रकार की निर्माण कला संबंधी डिजाइन में सुंदरता के लिए सराहा जाता है।

इतिहास लेखक यंग हसबैंड तो इस मंदिर के विषय में यहाँ तक कहते हैं- इसे विश्व के सर्वोत्कृष्ट स्थल पर बनने का गौरव प्राप्त है। पार्थीनान, ताजमहल, सेंट पीटर्सबर्ग से भी उम्दा स्थलों पर हम इसे शेष सभी महान् भवनों का प्रतिनिधि या इनके सभी गुणों का जोड़ मान सकते हैं। यह अवशेष सज्जा व सबलता के विषय में मिस्र से और वैभव में यूनान से दूसरे नंबर पर है। आसपास के यूनानी तर्ज के स्तंभों से मंदिर को अद्वितीय भव्यता और सौम्यता मिली है।

  जो लोग स्थापत्य कला में भारतीयों को पिछड़ा हुआ मानते हैं और यह कहते हुए तनिक भी लज्जा अनुभव नहीं करते कि भारतीयों को स्थापत्य कला का बोध विदेशियों के संपर्क में आने के बाद हुआ। उनके मुँह पर उपरोक्त इतिहासकारों की यह टिप्पणी एक करारा तमाचा है।

सम्राट ललितादित्य का साम्राज्य पूर्व में बंगाल तक, दक्षिण में कोंकण तक पश्चिम में तुर्किस्तान और उत्तर-पूर्व में तिब्बत तक फैला हुआ था।

पुराणों में जिस राजा नल और दमयंती की कहानी आती है, वह राजा नल- दमयंती राजा ललितादित्य के वंश से ही संबंध रखते हैं। उल्लेख नल-दमयंती कहानी में है।

हमें अपने विश्व सम्राट हिंदू राजाओं के विषय में यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उनके साम्राज्य में कभी जनता के विद्रोह नहीं हुए। जहाँ पर विद्रोह शब्द का प्रयोग किया गया है, वहाँ पर समाज विरोधी लोगों के द्वारा मचाए गए उपद्रव से उसका अभिप्राय लेना चाहिए। जिसे राजा के द्वारा या उसके सैनिकों के द्वारा समय आने पर समाप्त कर दिया गया। यह विद्रोह किसी भी स्थिति में उन विद्रोहों की भाँति नहीं थे, जो हमारे देश में मुस्लिम सल्तनत काल या मुगलकाल या उसके पश्चात् ब्रिटिश काल में शासक वर्ग के विरुद्ध भारत की जनता की ओर से होते रहे थे। स्वतंत्रता के आंदोलन के रूप में इनको स्थापित नहीं किया जा सकता, अपितु यह स्वतंत्रता के हनन करने वाले लोगों के द्वारा किए जाने वाले विद्रोह या उपद्रव थे। जिन्हें समाप्त करना राजा का परम धर्म माना जाता था।

ललितादित्य मुक्तापीड़ एक ऐसा शासक था, जिसका नाम न केवल कश्मीर के इतिहास में अपितु विदेशों में भी बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है, परंतु दुर्भाग्य का विषय है कि इस महान् शासक को भारत के इतिहास से एक षड्यंत्र के अंतर्गत मिटा दिया गया है।

कल्हण की ‘राजतरंगिणी’ की साक्षी है कि महाराज ललितादित्य मुक्तापीड़ के विजय दिवस को कश्मीर के लोग हर वर्ष बड़े श्रद्धा, उल्लास और उत्साह के साथ मनाया करते थे।

मनाया जाता रहा विजय दिवस

विदेशी यात्री अलबेरूनी ने भी इस तथ्य को पुष्ट किया है कि कश्मीरी लोग द्वितीय चैत्र के दिन को ललितादित्य के विजय दिवस के रूप में मनाते थे। ललितादित्य के प्रति लोगों की इतनी श्रद्धा भावना का एकमात्र कारण यही था कि उन्होंने अफगानिस्तान की ओर से प्रवेश करने वाले विदेशी अरब आक्रमणकारियों को देश की सीमा में प्रवेश करने से रोक दिया था। यदि कहीं से भी किसी विदेशी आक्रांता के भारत सीमा में प्रवेश करने की कोई संभावना दिखाई देती थी या कोई भनक उन्हें लगती थी तो वह तुरंत देशरक्षक के रूप में वहाँ जाकर खड़े हो जाते थे और उनके कदमों की आहट को सुनकर ही शत्रु भाग जाता था। राजा ललितादित्य विजय अभियानों में आजीवन इतने अधिक व्यस्त रहे कि इतिहासकारों का यह मानना है कि उनकी मृत्यु भी सैनिक अभियानों के मध्य ही हुई थी। कुछ लोगों का कहना है कि अफगानिस्तान अभियान के दौरान हिमस्खलन के नीचे दब जाने के कारण उनकी मृत्यु हुई थी। वहीं कुछ और लोगों का कहना है कि वे सेना से बिछड़ गये थे और स्वयं को विदेशी आक्रमणकारियों के हाथ लगने से बचाने के लिए उन्होंने आत्महत्या कर ली थी।

नरेंद्र सहगल लिखते हैं-“इतिहास जानता है कि काबुल (कंधार) के बहादुर हिंदू राजाओं और वहाँ की शूरवीर हिंदू प्रजा ने 400 वर्षों तक निरंतर अरबों और अन्य मुस्लिम आक्रमणकारियों का साहस के साथ सामना किया, परंतु एक दिन भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। भारत इस कालखंड (667 ई. से 1021 ई. तक) में अपनी उत्तर-पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित रख सका।”

  भारत को सदा विदेशियों के सामने लड़ने के लिए प्रेरित करने वाली भावना कौन सी थी ? कौन सा ऐसा गौरवबोध था जो उन्हें विदेशियों से भिड़ने और लड़ने के लिए प्रेरित करता रहता था? इस विषय पर यदि चिंतन किया जाए तो अलबेरूनी का यह कचन पूर्णतया सत्य जान पड़ता है- "हिंदू प्रायः हर बात में हम से भिन्न है। उनकी भाषा भित्र है और भाषा की भिन्नता अरबों के साथ उनकी निकटता में सबसे बड़ी बाधा है। धर्म की दृष्टि से भी वह हमसे भिन्न हैं। जिन बातों पर उनका विश्वास है हम उनमें से किसी को भी नहीं मानते। इसी प्रकार हमारे जो धार्मिक विश्वास हैं, उनमें से कोई भी उन्हें मान्य नहीं है।... हिंदुओं और मुसलमानों में रहन- सहन, खान-पान और आचार-विचार की भी बहुत भिन्नता है। यह भिन्नता इस सीमा तक है कि हिंदू लोग अपने बच्चों को हमारे नाम से, हमारे वस्त्रों से और हमारे तौर-तरीकों तक से डराते हैं और हमें शैतान की संतान बताकर हमारे प्रत्येक कार्य को उन सभी कार्यों के विरुद्ध बताते हैं, जिन्हें वे अच्छा और समुचित मानते हैं। हिंदुओं में आत्मगौरव की भावना इतनी गहरी है कि वह अन्य सब को अपने से हीन मानते हैं। उनका विश्वास है कि पृथ्वी पर उनके देश के समान कोई देश नहीं है, उनके समान कोई जाति नहीं है, उनके समान कोई धर्म नहीं है और उनके शास्त्रों के समान कोई शारण नहीं है।"

हमारे देश के वैदिक धर्मी आर्यों या हिंदुओं की यह पवित्र भावना ही थी जो यहाँ पर उन्हें एक से एक बढ़कर 'ललितादित्य' देती रही और इसी भावना के वशीभूत होकर प्रत्येक 'ललितादित्य' अपने देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए प्राणपण से कार्य करता रहा। हम अपने ऐसे महान् सम्म्राट ललितादित्य मुक्तापीड़ के ऋणी हैं, जिसके कारण उस समय हम अपने अफगानिस्तान और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में अपनी संस्कृति, अपने धर्म और धार्मिक मान्यताओं की रक्षा कर सकने में सफल हो सके।

क्रमशः

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