देश का वास्तविक गद्दार कौन : गांधी नेहरू या सावरकर ? भाग-2

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देश की राष्ट्रभाषा हिंदी के साथ कांग्रेस की दोगली और राष्ट्रद्रोही मानसिकता प्रारंभ से ही रही। वह यह निर्णय नही कर पाई कि इस देश की राष्ट्रभाषा और राजभाषा हिंदी ही रहेगी और उसे धीरे-धीरे संस्कृतनिष्ठ बनाकर देश की अन्य भाषाओं के उन शब्दों का संस्कृत मूल खोजकर भी उसमें डाला जाएगा जो थोड़े बहुत परिवर्तनों के साथ अन्य भाषाओं में प्रचलित हैं। फलस्वरूप देश में भाषाई समस्या आज भी बनी हुई है। यदि कांग्रेस वीर सावरकर जी की नीति का पालन करती तो सारे देश में आज जिस प्रकार भाषाई दंगे होते रहते हैं, व ना होते।

कांग्रेस ने अपने जन्मकाल से ही अंग्रेजों की चाटुकारिता करनी आरंभ कर दी थी, कदाचित इसी के लिए उसका जन्म भी हुआ था। कांग्रेस हमारे क्रांतिकारियों को हेयदृष्टि से देखती थी। अंग्रेजों से पूर्व जब देश के एक भाग पर मुगल शासन कर रहे थे, तब यहां विदेशी लोग बड़ी संख्या में आते रहे। उन दिनों देश में अपने राज्य के लिए मुगलों ने अरबी को राजभाषा बनाया था। अत: अरबी के विद्वान बाहर से बुलाये जाते थे, इतना ही नही कई बड़े सैन्य अधिकारी और बहुत से सैनिकों को भी मुगल लोग बाहर से ही बुलाया करते थे। मुगल दरबार में जो हिंदुस्तानी अधिकारी या कर्मचारी होते थे, उनकी अपेक्षा विदेशी भाषा अरबी के इन्हीं विद्वानों का और अधिकारियों व कर्मियों का वर्चस्व होता था। ऐसी परिस्थितियों में हमारे देश की मूल संस्कृति की और वास्तविक भाषा की उन दिनों पूर्ण उपेक्षा की गयी। जब अंग्रेज आये तो उन्होंने अपनी भाषा अंग्रेजी को यहां लागू किया। उनके सामने मुगलकालीन अधिकारियों में से अधिकांश ने आत्मसमर्पण कर दिया। 1857 की क्रांति के समय मुगल दरबार के या मुगलराज के ऐसे बहुत से अधिकारी थे जिन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों से बहुत से अंग्रेजों की प्राणरक्षा की थी। उनके इस कार्य के लिए अंग्रेजों ने उन पर अपनी विशेष कृपा दिखाते हुए उन्हें जागीरें व अन्य उपाधियां प्रदान की थीं। जिन मुगलों ने या देश के गद्दार लोगों ने अंग्रेजों की उस समय प्राणरक्षा की थी। अंग्रेजों ने उन्हीं लोगों को इस देश की मूलधारा का व्यक्ति माना। जो 1857 की क्रांति में विद्रोही थे-वे अंग्रेजों की दृष्टि में राजद्रोही या अपराधी थे। कालांतर में कांग्रेस ने भी अंग्रेजों की दृष्टि से इस देश की मूलधारा में विश्वास न रखने वाले लोगों के साथ प्रेमभाव प्रदर्शित किया। यहीं से अंग्रेजों की कृपापात्र कांग्रेस व मुगलिया मूलधारा के लोगों ने मिलकर देश में एक काल्पनिक ‘गंगा-जमुनी संस्कृति’ का अतार्किक निर्माण कर लिया। वास्तव में यह प्रयास भारत की उस मूल विचारधारा और संस्कृति को मारने के उद्देश्य से प्रेरित होकर किया गया था जो युग-युगों से इस देश की मूलधारा कही जा रही थी। विदेशी सत्ताधारियों के विरूद्घ भारत की यही मूलधारा भारतवासियों को क्षोभ और आक्रोश से भरकर सदैव आंदोलित किये रखती थी। 1857 की क्रांति के समय सर सैय्यद अहमद खां बिजनौर के मुंसफ थे। उन्होंने वहां उस पद पर रहते हुए कुछ अंग्रेजों की प्राणरक्षा की थी। जिससे प्रसन्न होकर अंग्रेज सरकार ने उन्हें भी जागीर देनी चाही थी। पर उन्होंने अंग्रेजों का यह प्रस्ताव बड़ी सावधानी से ठुकरा दिया था। अंग्रेजों ने उन्हें प्रोन्नति दी। 1868 में वह बनारस में जज थे। वहां से अंग्रेज उन्हें छुट्टी दिलाकर विलायत ले गये। वहां उन्हें पूर्ण प्रशिक्षण दिया गया। 1870 में जब गांधीजी कठिनता से एक वर्ष के थे तब भारत के विभाजन की नींव रखते हुए अंग्रेजों ने सर सैय्यद अहमद खां को विलायत से पुन: भारत भेज दिया। तब उन्होंने भारत में आकर ‘तहजीबुल-इखलाख’ नाम की उर्दू पत्रिका निकालनी आरंभ की। उद्देश्य यही था कि भारत की अपनी भाषा संस्कृत को कैसे समाप्त किया जाए? इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने ‘सामासिक संस्कृति’ और दो राष्ट्रों के सिद्घांत का प्रचार करना आरंभ किया। उन्होंने इस देश की सामासिक संस्कृति उर्दू संस्कृति को बनाने का प्रयास किया। इसमें कहीं पर भी सर सैय्यद अहमद खां का भारत के प्रति राष्ट्रप्रेम नही झलकता। इसके विपरीत वह राष्ट्र के विघटन की बात कर रहे थे, पर कांग्रेस ने आगे चलकर उनके इन कार्यों पर राष्ट्रवाद की मुहर लगा दी। वीर सावरकर कांग्रेस के ऐसे कार्यों को उसकी राष्ट्रद्रोही मानसिकता का प्रतीक मानते थे और कांग्रेस उन्हें ऐसा करने से रोकने के कारण अपना घोर शत्रु मानती थी।सर सैय्यद अहमद खां ने हिंदी की अपेक्षा हर स्थान पर उर्दू लाने की मांग करनी आरंभ की। 1887 ई. में उन्होंने मेरठ में एक जनसभा में कहा था-‘मान लीजिए अब सारे अंग्रेज और उनकी समूची सेना भारत से चली जाती है। वे अपनी तोपें, शानदार हथियार और हरेक चीज साथ ले जाते हैं, तब हिंदुस्तान का शासक कौन होगा? उन हालात में क्या यह संभव है कि दो कौमें-हिंदू और मुसलमान-एक तख्त पर एक साथ बैठें, और वे सत्ता में बराबर हों? नही, बिलकुल नही। यह जरूरी है कि उनमें से एक दूसरी को हराकर नीचे धकेल दे। यह आशा करनी कि वे दोनों समान भाव से रह सकती हैं, असंभव की इच्छा करना है, और ऐसा सोचा ही नही जा सकता।’’(‘क्वेस्ट’-दिसंबर 1970)कहा जाता है कि सर सैय्यद अहमद खां का यह भाषण अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के अंग्रेज प्रिंसीपल थियोडोर बैक ने तैयार किया था। जिसने अपनी धूत्र्तता को सर सैय्यद अहमद खां के मुंह से कहलवाया था।

जब गांधीजी ने राजनीति का क, ख, ग सीखना आरंभ किया तो मानो उन्होंने यह सौगंध उठायी कि वह अंग्रेजों के हितों को आहत करने वाली किसी भी गतिविधि में सम्मिलित नही होंगे। और यह सत्य भी है कि गांधीजी ने अपना यह वचन आजीवन निभाया। इसीलिए जस्टिस मार्कन्डेय काटजू ने गांधीजी को अंग्रेजों का एजेंट कहा है। जिस समय गांधीजी राजनीति में प्रवेश कर रहे थे उस समय तक अंग्रेज और सर सैय्यद अहमद खां जैसे लोग मिलकर भारत की हिंदी भाषा को मिट्टी में मिलाने की तैयारी कर चुके थे। गांधीजी की कांग्रेस उस षडय़ंत्र में सम्मिलित थी। अपनी आत्मकथा के पृष्ठ 33 पर गांधीजी ने लिखा है-‘आज तो मैं यह मानता हूं कि भारतवर्ष के उच्च शिक्षणक्रम में अपनी भाषा के सिवाय राष्ट्र भाषा हिंदी, संस्कृत, फारसी, अरबी और अंग्रेजी को स्थान मिलना चाहिए। इतनी भाषाओं की संख्या से डरने का कारण नही है। यदि भाषाएं ढंग से सिखाई जाएं और सब विषय अंग्रेजी द्वारा ही पढऩे, समझने का बोझ हम पर न हो तो उपर्युक्त भाषाओं की शिक्षा भार रूप न होगी, बल्कि उनमें बहुत रस मिलेगा,…उर्दू को मैंने अलग भाषा नही माना है, क्योंकि उसके व्याकरण का समावेश हिंदी में हो जाता है।’’हंसराज रहबर जी इस कथन की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि गांधीजी के नजदीक अंग्रेजी सीखना इसलिए आवश्यक है कि उसे अंग्रेजी शासकों ने हम पर आरोपित किया है। इसके अतिरिक्त फारसी और अरबी सीखना संभवत: इसलिए आवश्यक है कि मुसलमानों ने इनके साथ अपना धार्मिक संबंध जोड़ रखा है, इन्हें सीखे बिना अच्छी उर्दू सीखना संभव नही है।’इस प्रकार गांधीजी भाषा के विषय को लेकर समझौतावादी हो गये, जिसे वीर सावरकर कतई स्वीकार नही करते थे। एक राष्ट्रवादी को छद्म राष्ट्रवाद प्रिय नही होता और एक समझौतावादी छद्मराष्ट्रवादी को शुद्घ राष्ट्रवादी प्रिय नही होता। यह ठीक है कि गांधीजी कई वर्ष तक हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष रहे, परंतु कालांतर में जब मुस्लिम लीग ने उग्र होकर हिंदी का विरोध करना आरंभ किया तो समझौतावादी गांधी ने अपने पद से ही त्यागपत्र दे दिया। उन्हें राष्ट्रवाद के स्थान पर तुष्टिकरण अच्छा लगा और वह देश के हितों का समझौता करते चले गये। यहीं से गांधीजी हिंदी, हिन्दू और हिंदुस्तान के विरोधी होते चले गये। इस प्रकार हिंदी को स्वतंत्र भारत में जो सम्मान मिलना चाहिए था उसकी भू्रण हत्या गांधीजी ने ‘हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष’ पद से त्याग पत्र देकर कर दी। हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए नागपुर में 1937 में एक सम्मेलन बुलाया गया था। उससे लौटकर मौलवी अब्दुल हक ने 18 सितंबर 1937 को मियां बसीर अहमद संपादक ‘हुमायूं’ लाहौर के लिए पत्र लिखा-‘अनायतनामा पहुंचा। बहुत शुक्रगुजार हूं। मेरे और राजेन्द्रबाबू के बयान में कहीं हिन्दी का जिक्र नही हमने ‘हिंदुस्तानी’ शब्द इस्तेमाल किया है और हिंदुस्तानी की मुजमल तारीफ (उपयुक्त व्याख्या) भी कर दी है। यानी वह जुबान जो शमाली हिन्द (उत्तरी भारत) में बोली जाती है। हिन्दी से मुताल्लिक बहस नही, झगड़ा सिर्फ रस्म रवत का है, अगर हमारे बयान के मुताबिक हिन्दुस्तानी हिंदुस्तान के तमाम सूबों की दफ्तरी और तालीमी जुबान हो जाए तो इसमें सरासर हमारी जीत है।’’ इस कथन में ‘सरासर हमारी जीत है’ शब्दों पर ध्यान देने की आवश्यकता है इनसे पता चलता है कि ‘हिन्दुस्तानी’ को एक षडय़ंत्र के अंतर्गत इस देश के लिए लाया गया था। उर्दू के शब्द इस भाषा में भरकर यह संदेश दिया गया कि हिंदी अपने आप में एक पूर्ण भाषा नही है, और उसे तहजीब सीखने के लिए उर्दू की शरण लेनी पड़ेगी। परिणामस्वरूप आज हिंदी के ऐसे बहुत से कवि हैं, जिनकी कविताओं में उर्दू शब्दों की भरमार होती है। उन्हें यह पता ही नही होता कि तुम हिंदी की सेवा कर रहे हो या फिर उर्दू की सेवा कर रहे हो। दूसरी बात यह भी विचारणीय है कि 1947 में जब देश साम्प्रदायिक आधार पर विभाजित हो गया था और उर्दू समर्थकों ने अपना अलग देश ले लिया था तो उसके पश्चात भी देश में ‘हिंदुस्तानी’ को ही प्रचलन में क्यों लाया गया? क्या ऐसा केवल वीर सावरकर को नीचा दिखाने के लिए किया गया था? और यदि हां, तो क्या यह सीधे देश के साथ विश्वासघात नही था? गांधीजी ने एक बार सरदार पटेल से भी कह दिया था कि तुम्हें उर्दू सीखनी चाहिए। तब सरदार पटेल ने उनसे कहा था कि -‘गांधीजी! अब यह मेरा शरीर 68 वर्ष की अवस्था का हो गया है, अब क्या उर्दू सीखेंगे? पर एक बात बताओ, आपने उर्दू सीखकर क्या उनका (मुस्लिम लीगियों या देश का विभाजन करने की मांग करने वाले लोगों का) हृदय परिवर्तन करने में सफलता प्राप्त की? गांधीजी के चेहरे की भाव भंगिमा देखने योग्य थी।

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