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भारतीय संस्कृति

स्वामीनारायण छपिया मंदिर परिसर के प्रसादी स्थल

आचार्य डॉ. राधेश्याम द्विवेदी

उत्तर भारत के अवध प्रान्त (उत्तर प्रदेश) के अयोध्या धाम से कुछ ही किमी की दूरी पर गोंडा नामक एक अत्यन्त पिछड़े जिले में यह पावन भूमि स्थित है। स्वामी नरायन छपिया, गोंडा जिला मुख्यालय से 50 किलोमीटर दूरी पर मनकापुर तहसील में पड़ता है। यहां स्वामी नरायन मंदिर प्रशासन यात्रियों के रहने व खाने के लिए खास इंतजाम करता है। परिसर में ही वातानुकूलित कक्ष के साथ ही अन्य इंतजाम भी हैं। छपिया स्वामी नारायण संप्रदाय के प्रर्वतक घनश्याम महाराज की जन्म और बचपन की कर्मस्थली है।

   हर साल कार्तिक पूर्णिमा और चैत्र पूर्णिमा (कार्तिक और चैत्र मास की पूर्णिमा) पर मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से लाखों लोग आते हैं। अस्थायी दुकानें 5 किलोमीटर के दायरे में फैली होती हैं।

   हर साल दुनिया के हर हिस्से से तीर्थयात्री इस स्थान पर आते हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं जैसे उचित सड़क और रेल संपर्क, संचार के साधन, हेलीपैड, पानी और जल निकासी कनेक्शन, आवास और भोजन की सुविधा आदि उपलब्ध हैं।

जन्मस्थली परिसर के प्रमुख आकर्षण

  1. छपिया का मुख्य मंदिर

मंदिर 20 एकड़ भूमि पर फैला हुआ है और इसमें किसी भी समय 25,000 तीर्थयात्रियों के लिए व्यवस्था है। तीन शिखर वाला यह मुख्य मंदिर की छवि निराली है। दूर से आने पर प्रवेश भाग का यह मुख्य आकर्षण है।तीन मंडप में दस छवियां प्रदर्शित होती हैं। बाएं मंडप में भगवान कुंज बिहारी और बासुदेव नारायण विराजमान हैं। मध्य भाग के मंडप में भक्ति माता,धर्म पिता, श्री घन श्याम महाराज और आदि आचार्य श्री अयोध्या प्रसाद जी महाराज विराजमान हैं। तीसरे सबसे दाएं तरफ़ के मंडप में रेवती बलदेव जी और हरिकृष्ण जी महाराज की सुन्दर झांकी अलंकृत होती है। सभी छवियों के शीर्ष पर इनके नाम हिंदी और गुजराती भाषा में विद्युत रोशनी द्वारा फ्लैस होते रहते है। लोग स्वयं दर्शन कर अपने को धन्य करते हैं।ना कोई पुजारी इन छवियों का स्पष्ट पहचान बताता है और ना ही किसी प्रकार के चढ़ावे को प्रेरित करता है।भक्त अपनी इच्छा से दानपात्र में भेट अर्पित करने को स्वतंत्र है।

  1. घनश्याम का धर्मभक्ति भवन:

स्वामीनारायण की जन्मस्थली पर स्थित एक सुंदर स्मारक बना हुआ है। यहां पहले धर्मभक्ती का भवन था।1830 में स्वामी नारायण के निधन के बाद 1863 में आचार्य श्री अयोध्याप्रसादजी महाराज ने इस स्थान पर एक मंदिर बनवाया था। बाद में, 47 वर्षों के बाद 1910 में आचार्य श्री पुरुषोत्तमप्रसादजी महाराज ने एक और बड़ा मंदिर बनवाया।इसका संगमरमर से पुनर्निर्माण किया जा रहा है, यह परियोजना आचार्य श्री तेजेंद्रप्रसादजी महाराज ने 2004 में शुरू की थी। इसे धर्मभक्ति का भवन कहा जाता है ।

  संगमरमर से सजा कमरा भूतल पर है। मंदिर का यह भाग में श्री हरि का जन्म स्थान है। यहां ठाकुर जी के लीला चरित्र, बाल लीला दर्शन तथा  तत्कालीन  घर गृहस्थी के प्रयोग में लाए गए वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। यहां तत्कालीन भारत के ग्राम्य वातावरण की सुंदर छवि हृदय की गहराइयों में अतीत के सादे जीवन की जीवंत झांकी प्रस्तुत करती है। शुद्धमन से दर्शन करने पर दिव्य अनुभूति तथा मन में अदभुत शान्ति मिलती है।

23 जुलाई 2024 अमृत विचार की विज्ञप्ति के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पर्यटन स्थल के रुप मे सवारने और विकसित करने की योजना चला रही है।

विकास कार्य के लिए 22.18 करोड रुपए की धनराशि स्वीकृत की गई है। राज्यपाल ने शासन के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए 8 करोड़ रुपए की पहली किस्त 23 जुलाई 2024 को जारी कर दी है।

कार्यदायी संस्था सी एंड डी एस ने इस स्थल के विकास के लिए 24.85 करोड़ रुपये की डिमांड की थी। इस प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए प्रदेश सरकार ने इस स्थल को सजाने संवारने के लिए 22.18 करोड़ रुपये की धनराशि स्वीकृत की है और पहली किश्त के रूप में 8 करोड़ रुपये का बजट जारी कर दिया है। 

नूतन भव्य जन्मस्थान भवन

पूरी दुनिया को मानवता व अध्यात्म का संदेश देने वाले स्वामी नारायण सम्प्रदाय के आराध्य देव बाल स्वरूप घनश्याम प्रभु की जन्मस्थली छपिया में नूतन भव्य जन्म स्थान स्मारक भवन का निर्माण पूरा हो गया है। यह भवन अपने आप में पूरी दुनिया में अनूठा स्मारक है, जो अपनी नक्काशी व स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है। इस भवन की विशेषता यह है कि इसमें 36 गुणे 36 का गर्भगृह बिना खम्भे के निर्मित है। एक लाख घन फुट श्वेत मकराना संगमरमर से बने चार मंजिला वाले स्मारक के निर्माण में तीस करोड़ रुपये की लागत लगी है।

    मंदिर के महंत ब्रह्मचारी स्वामी वासुदेवानंद जी महराज और ब्रह्मचारी स्वामी हरि स्वरूपानंद महाराज ने बताया कि भव्य जन्मभूमि स्मारक का शिलान्यास मोटा महाराज तेजेन्द्र प्रसाद के संकल्प से सन 2006 में नर नारायण देव गादीपति आचार्य कौशलेन्द्र प्रसाद महाराज ने किया था। मंदिर की नींव मेटल से तैयार की गई है। जन्मभूमि स्मारक का निर्माण गुजरात के सोमपुरा जय डिक्स आर्ट ने किया है। आर्किटेक्ट सुरेश भावेश और कन्हैया लाल की देखरेख में निर्माण चला। महंत स्वामी ने बताया कि जन्मभूमि स्मारक का निर्माण मंदिर सम्प्रदाय के हरिभक्तों  सहयोग से किया गया है। 

स्मारक की विशेषतायें

चार मंजिले भवन में एक लाख घन फुट संगमरमर पत्थरों से निर्माण किया गया है। संगमरमर पत्थर गुजरात सोमपुरा से मंगवाया गया। स्मारक भवन में 800 खम्भे, 1500 कमान, 100 बड़ी खिड़कियां, 51 झरोखा, 151 छत, पूर्व उत्तर व पश्चिम दिशा में 4500 बड़ी मूर्तियां एवं 2500 छोटी मूर्तियां, तीन सीढ़ियां गौ माता गोमती के स्वरूप की 201 मूर्तियां, 3300 भगवान के बाल चरित्र स्वरूप का निर्माण, सूर्य रूप शिव रूप रुद्र रूप व नीलकंठ वर्णी धर्मकुल भक्तिकुल स्वरूप संगीतकार मुद्रा वाले संत गणपति चौकीदार 3000 हाथी, 200 गाय स्वरूप स्वर्ण सुकसैया स्वर्ण मुख्य द्वार, स्वर्ण कलश, स्वर्ण ध्वजदंड, स्वर्ण सिंहासन, सूतिका गृह का कलात्मक निर्माण किया गया है।

किस तल पर क्या है

नूतन जन्म स्थान स्मारक भवन के विभिन्न तलों का अलग-अलग स्वरूप दिया गया है।

भूतल-

इस मंदिर के प्रवेश द्वार के मध्य एक पतले गलियारे से सोपान से उतर कार प्रवेश करने पर जन्मभूमि गर्भ गृह अपनी दिव्य आभा प्रसारित करता है।

प्रथम तल-

इस मंदिर के प्रवेश द्वार के मध्य एक पतले गलियारे के आजू बाजू दोनो

तरफ सोपान से इस भाग में प्रवेश करने पर बाल स्वरूप घनश्याम प्रभु का मनभावन विग्रह का दर्शन होता है।

द्वितीय तल-

प्रथम तल के भाग में प्रवेश करके सोपान के माध्यम से द्वितीय तल पर पहुंचा जा सकता है। इसे छप्पर पलंग शयन खंड नाम से जाना जाता है।

तृतीय तल-

द्वितीय तल के बाद सीढ़ियों से तृतीय

प्रसाद भंडार तल पर पहुंचा जा सकता है।

चतुर्थ तल- संग्रहालय

तृतीय तल के बाद सीढ़ियों से चतुर्थ तल पर पहुंचा जा सकता है।इस तल पर

भगवान द्वारा उपयोग में लायी गयी वस्तुओं का संग्रहालय बनाया गया है।

स्वामीनारायण मंदिर की विशेषताएं

स्वामीनारायण मंदिर, जो स्वामीनारायण संप्रदाय के आध्यात्मिक संस्थानों की एक प्रमुख स्थली है, विभिन्न कारणों से प्रसिद्ध है। यहां कुछ मुख्य कारणों को निम्नांकित किया गया है –

1.आध्यात्मिक महत्व: स्वामीनारायण मंदिर एक आध्यात्मिक स्थल है जहां संप्रदाय के अनुयाय अपने आध्यात्मिक उन्नति के लिए आते हैं। यहां प्रवचन, पूजा, ध्यान और धार्मिक आयोजनों का आयोजन होता है।

  1. स्थापत्य शैली की श्रेष्ठता: स्वामीनारायण मंदिरों की विशेषता उनके आकर्षक स्थापत्य शैली में होती है। इन मंदिरों की निर्माण में भारतीय और स्थानीय स्थापत्य कला के अंशों का उपयोग किया जाता है और इसलिए वे कला और संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं।
  2. सेवा और सामाजिक कार्य: स्वामीनारायण मंदिर सेवा और सामाजिक कार्यों को महत्व देते हैं। इन मंदिरों में विभिन्न सामाजिक परियोजनाओं को संचालित किया जाता है, जैसे शिक्षा, आरोग्य, पेयजल, वन संरक्षण, विधवा कल्याण, ग्राम विकास आदि।

  3. संप्रदायिक समागम: स्वामीनारायण मंदिरों में लोग अलग-अलग धर्मों और संप्रदायों से आकर्षित होते हैं। यहां सभी लोगों का स्वागत किया जाता है और धार्मिक तथा सामाजिक एकता को प्रमोट किया जाता है।

  4. प्रशासनिक नियमितता: स्वामीनारायण मंदिरों के प्रशासनिक नियमितता का ध्यान रखा जाता है जो उन्हें व्यवस्थित और सुविधाजनक बनाता है। इससे लोगों को विश्राम का मौका मिलता है और उन्हें शांति और सकारात्मक वातावरण का अनुभव करने का अवसर मिलता है।

    ये कुछ मुख्य कारण हैं जो स्वामी नारायण मंदिर को प्रसिद्ध बनाते हैं। इन मंदिरों का महत्वपूर्ण आयोजन और उनकी सेवाओं के कारण लोग इन्हें आध्यात्मिकता, शांति और सेवा के प्रतीक के रूप में मान्यता देते हैं।

3.प्रसादी की छतरी

(इमली का चबूतरा)

जन्मस्थली का धर्मभक्ति भवन के सामने एक इमली का वृक्ष था जिस पर मिट्टी का चबूतरा बना हुआ था। इस पर धर्म पिता रोज पूजा अर्चना करते थे। इसी स्थान पर घन श्याम महाराज ने अनेक लीलाएं की है।

 एक दिन इमली के नीचे बेदी पर बैठे थे । देवों द्वारा इसी स्थान पर घन श्याम महाराज को अगणित देव कुमकुम और सुनहले रंग के रेशम का धागा लेकर टीका की रस्म करने आए थे। देव गण बाल प्रभु को टीका लगाते थे। वहां पर तीन मन कुमकुम एकत्र हो गया था जो लोगों के आश्चर्य कुतुहल का कारण बन गया था। 

एकबार धर्मपिता द्वारा तुलसी के पत्ते पूजा के लिए मागे गए। उस समय प्रभु ने इमली के पत्ते को लाकर पिता को दे दिया। वे इमली की जगह तुलसी का वृक्ष दिखा दिया। इमली को तुलसी रूप में बदल कर चमत्कार दिखाने पर सभी लोग आश्चर्य चकित हो गए।

 एक दिन कर्ण छेदन के समय मां इसी चबूतरे पर बालक को लेकर बैठी। जब विधि प्रारम्भ हुआ तो प्रभु मां की गोद से अदृश्य होकर इसी वृक्ष पर चढ़ गए। उनके बड़े भाई राम प्रताप इमली पर चढ कर उन्हें उतारने गए। वे पुनः मां के गोद में आ गए कुछ समय बाद राम प्रताप नीचे आ गए तो घन श्याम फिर इमली के पेड़ पर दिखाई दिए और मां की गोद में भी दिखाई दिए। वे मां से गुड़ मांगे। उसे वे खाते जा रहे हैं और कर्ण छिदवाते जा रहे हैं। ऐसे अनन्त चरित इस इमली के वृक्ष के नीचे हुए हैं। वर्तमान समय में वृक्ष नहीं है? इस स्थान पर छतरी बनी हुई है।
  1. गंगाजल वाला कुंवा

धर्म भक्ति घनश्याम भवन के भूतल कोरिडोर और प्रथम तल के प्रवेश द्वार का बाएं तरफ यह दिव्य कूप दूर से ही परिलक्षित होता है। इस पर ऊंची मुडेरी बनी हूई है। यह लोहे के जाली से ढका हुआ है। इसमें एक हैंड पंप भी लगा हुआ है। जिससे जल निकाल कर श्रद्धालु आचमन भी करते हैं और अपने साथ बोतल में भरकर घर भी ले जाते हैं। प्रभु के चरणों से स्पर्शित गंगाजल से अधिक पवित्र है। गंगा जी और यमुना जी सोने के पात्र में जल लाकर भगवान को स्नान करवाई थी। ऐसा भाभी को दिखाई दिया था। इस सेवा से खुश होकर भगवान ने कहा था कि गंगाजी को नारायण घाट साबरमती गंगा में तथा यमुनाजी को गढहा धेला की नदी में स्थपित करूंगा। ऐसा आशीर्वाद वचन दिया था।

एक बार की बात है भक्ति माता अपने पुत्र घनश्याम को बैठा उन्हें अपने भाई की बेटी बलवंता बाई को सौप कर रसोई में खाना बनाने चली गई थी। बलवंता बच्चे को वहीं छोड़ कर अपने घर चली गई थी। घनश्याम गंगाजल वाले कुंए में गिर गए थे। पाताल लोक से सहस्त्र फंड वाले शेष नाग आकर बालक के ऊपर अपने फंड से सुरक्षा घेरा बना लिए थे। उसी समय भक्ति माता खोजते खोजते कुंए पर आ गई। भाई ने कहा कि बालक कुंए के पत्थर पर बैठे थे कुंए में ना गिरे हों। भक्ति माता ने देखा कि घनश्याम पानी के ऊपर बैठा है। वह अत्यंत खुशी में राम प्रताप भाई को भी बुला लीं।

  उस समय राम प्रताप और धर्म देव कुवे के चबूतरे पर बैठे हुए थे। भक्ति माता के साथ जब तीनों ने झांका तो वहां प्रकाश पुंज में घन श्याम शेषशैय्या पर विराजमान थे। लक्ष्मी जी पैर दबा रही थी। अनन्त पार्षद स्तुति कर रहे थे। इसे देख लोग हर्षित हो गए। उसी समय धर्म भक्ति को वृंदावन वाले श्री कृष्ण भगवान का दर्शन हुआ। यह बात उन्हें याद आई।

इसके बाद घनश्याम ने हाथ बढ़ाया। माता भक्ति उन्हें बाहर खींच ली। ऐसा दृश्य इस कुंए में दिखा था। ये बात पूरे गांव में फैल गई। धर्म देव के घर और आंगन का ये महातीर्थ स्वरुप कुंवा आज भी अखण्ड रूप में लोगों को दर्शन दे रहा है।

  1. नारायण सरोवर

स्वामी नारायण मंदिर छपिया धाम के ठीक सामने पूरब दिशा में श्री स्वामी नारायण मंदिर घनश्याम भवन के पास पवित्र नारायण सरोवर स्थित है। नारायण सरोवर वह झील है जहाँ स्वामी नारायण स्नान किया करते थे । जिसमें अनेक बार घनश्याम प्रभु ने लीला की है। इसमें स्नान करplने और इसके तट पर जप तप और श्राद्ध करने से 68 तीर्थ यात्रा का पुण्य अर्जित होता है। इस पवित्र नारायण सरोवर में स्नान करने वाले मनुष्य को भौतिक पापों से छुटकारा मिल जाता है।

  किवदंती है कि इस सरोवर की स्थापना त्रेता युग में कश्यप ऋषि व माता अदिति की तपस्या से प्रसन्न हो कर स्वयं नारायण ने की थी। कहते हैं कि त्रेता युग के महान ऋषि कश्यप व उनकी धर्म पत्नी अदिति ने साक्षात नारायण को पुत्र रूप में प्राप्त करने के लिए गोनार्द( गोण्डा) की पावन धरती छपिया धाम के इस स्थान पर कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जब भगवान उन्हें दर्शन देने के लिए प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो सबसे पहले कश्यप व अदिति ने सभी 68 तीर्थों का जल लाकर इस स्थल पर एक सरोवर का निर्माण करने का वरदान मांगा। 

  एक अन्य विवरण में कहा गया है    कि धर्म देव अपने पुत्रों के साथ नारायण सरोवर गए थे। इस समय पानी कम था। मछली और अन्य जल के जीवों को मरता देख कर धर्म देव के मन में दया आ गई । वे बोले, भगवन अभी वर्षा मे देर है। ये जीव गर्मी से मर रहे हैं। अपने पिता का संकल्प देखकर घनश्याम महराज (नारायण) ने अपनें दाएं अंगूठे से पृथ्वी को दबाकर पाताल गंगा को प्रकट किया और सभी 68 तीर्थों के साथ इसकी स्थापना की।स्वयं नारायण द्वारा स्थापित किये जाने से इस सरोवर का नाम नारायण सरोवर पड़ा।

 धर्मदेव उस प्रवाह को ऊंचा उछलता देखकर आश्चर्य चकित हो गए। हे दादा आपके अंतःकरण को देखकर पाताल घाट से गंगा जी को हमने ही बुलाया है। आप की जब तक इच्छा हो तब तक यहां पर रहने दें। श्री हरि की बात सुनकर धर्म देव अति प्रसन्न होकर बोले तीन धनुष पानी हो जाय तो अच्छा है।

  इस तरह नारायण सरोवर में पानी भर जानें से जय जयकार होने लगा। हजारों प्यासे पशु पक्षी भगवान का प्रसादी मानकर तत्काल आकर अपनी प्यास बुझाई। अपनी अपनी वाणी में प्रभु को खुश करने लगे। 

 इनमें से कई तोता मैना चतुर प्राणियों को देखकर घन श्याम महराज ने कहा, हे दादा इन तोतों में तोते का रुप धारण करके शुकदेव जी ने अपने स्वरूप में आकर हमारे दर्शन किए हैं। 

यह सुन कर तोता रूपी शुकदेव जी धर्म कुंवर के पास आकर बैठ गए। उस तोते को अपने हाथ में लेकर पूरी शरीर पर हाथ फेरते हुए वे बोले, हे शुकदेव जी, आप फिर सत्संग में आना। आपको शुकमुनि का नाम रखकर हम अपने पास सदैव रखेंगे। 

यह कह कर तोते को छोड़ दिए। सभी के सामने तत्काल तोता अदृश्य हो गया। ऐसा देख कर धर्म देव आदि जो तालाब पर आएं थे,सभी आश्चर्य चकित हो गए। नारायण सरोवर में जो व्यक्ति स्नान करेगा वह 68 तीर्थ में स्नान करने का फल प्राप्त करेगा।

स्वामी नारायण संप्रदाय के लोग पवित्र जल-निकाय में स्नान करके पापों से मुक्ति पाने के लिए यहाँ आते हैं। अपने पिता को इसकी महिमा बताते हुए प्रभु ने कहा था, “नारायण सरोवर आदि की महिमा शेष शारदा आदि करोड़ों कल्प तक कहें तो भी महिमा का पार नहीं पा सकते हैं।”
  1. नारायण सरोवर के किनारे स्थित भूतों वाला पीपल का पेड़

चोरों और भूतों के प्रति दयालु भाव रखने वाले धर्मदेव के घर और नारायण सरोवर के पास ही फलों और फूलों की एक खेती की जाती थी। गांव के कुछ शरारती लोग उस खेती के फलों को चुराकर खाना पसंद करते थे। कटहल के पर निवास करने वाले भूतों ने इन शरारती चोरों को दण्ड दिलवाया और भूतों को मुक्ति हेतु

घन श्याम प्रभु ने बद्रिकाश्रम भिजवा दिया।

धर्मदेव के आंगन में एक कटहल का पेड़ था। वर्षा ऋतु आरम्भ होने के पूर्व में ही इस पर फल लग जाते हैं। वर्षा काल में ये पकते थे। घनश्याम प्रभु को कटहल बहुत प्रिय है। प्रभु की सेवा हेतु यह पेड़ बहुत फल देता था।

एक रात्रि की बात है। आकाश बादलों से घिर गया और वर्षा होने लगी थी। धर्म देव राम प्रताप भाई और घन श्याम घर के अन्दर सो रहे थे। उस समय बहुत से कटहल के फल पकते थे। ऐसे ही दो-तीन षडयंत्रकारी लोग सुबह-सुबह कटहल के फल चुराने के लिए इस खेती में घुस गए। जैसे ही उन्होंने कटहल के फलों को छुआ, वैसे ही धर्मदेव एक पानी का घड़ा और बबूल के पेड़ से काटा हुआ एक दातून लेकर वहां पहुंचे। रामप्रतापभाई और युवा घनश्याम अपने पिता धर्म देव घर में सो रहे थे।चोरों को अच्छा अवसर मिला। वे धर्म देव के घर आए। इसके बाद चोर छिप छिपकर कटहल के पेड़ से फल तोड़ कर ढेर लगा लिए। इसके बाद फल लेकर चोर प्रस्थान किए।

  चोर कटहल का गट्ठर बना कर धर्म पिता के घर के बाहर आ गए। ये लोग नारायण सरोवर के किनारे जा रहे थे। वहां पीपल के पेड़ पर भूत रहते थे। नारायन प्रभु की प्रेरणा से भूत अपना भयंकर रूप धारण करके चोरों को डरवाने लगे। भूत बोले,पापियों यह कटहल तो प्रभु को खाने के लिए है। यादि तुम खाओगे तो तुम्हारा विनाश हो जाएगा।

चोर रंगे हाथों पकड़े जाने पर थर थर कांपने लगे। गठरी नीचे गिर गई।इसलिए वे डर से कांपने लगे। उन्होंने विनती की, "हे भाई साहब कृपया हमें बचाओ। अब हम चोरी नही करेंगे।

भूत बोले इस तरह हम तुम्हें नही जानें देंगे। पहले जहां से फल लाए हो चुपके से वहां रख आओ। तभी तुमको जानें देंगे। भय के मारे चोर कटहल की गठरी धर्म देव के घर रख आए ।

घनश्याम ने चोरों से कहा। "तुम कटहल के फल खाना चाहते हो न? मैं तुम सबको एक-एक फल देता हूं। इसे ले लो और घर जाओ। इसे परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बांटना।" उसने उनमें से प्रत्येक को एक कटहल का फल दिया। चोरों ने धर्मदेव और दोनों भाइयों को प्रणाम किया और फिर एक कटहल का फल लेकर घर चले गए। ऐसा था युवा घनश्याम चोरों के प्रति भी दयालु! भगवान सदैव सभी पर दयालु होते हैं।

घनश्याम महराज भूतों को दर्शन देकर कहा, तुमने हमारी सेवा किया है। इसलिए बरदान देता हूं। तुम लोग मुक्ति हेतु

बद्रिकाश्रम जाओ और तपस्या करके अपने पापो से मुक्ति पाकर हमारे धाम में आओ। यह वही पुण्य स्थल है। उसका श्रद्धालु दर्शन कर अपने को धन्य मानते हैं।

7.महुआ वृक्ष की महिमा

छपिया मुख्य मंदिर के सामने नारायण सरोवर स्थित है उसके किनारे एक महुआ

का वृक्ष हुआ करता था।एक बार इस पेड़ के नीचे घनश्याम महराज विराजमान थे। उसी समय वहां नव योगेश्वर संत आकर प्रभु की स्तुति किए थे। उस दिन एकादसी का दिन था। बाल प्रभु अपने बड़े भाई के साथ नारायण सरोवर स्नान के लिए गए थे। स्नान के बाद महुआ के पेड़ के नीचे घनश्याम महराज बैठ गए थे। उसी समय वहां नव योगेश्वर संत आकर प्रभु की स्तुति करने लगे थे।भाई के पूछने पर उत्तर मिला कि इनकी प्रभु से पुरानी जान पहचान है । भाई ने उन सब से घर आने का आग्रह किया। सभी लोग घर आए। धर्म देव तुरन्त पहचान गए कि ये लोग नव योगेश्वर संत हैं। धर्म देव ने इन नवों अतरिक्ष,हरि, कवि, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविरहोत्र क्रुमिल , चमस और करभाजन

आदि की पूजा की। योगेश्वरों को लोग वेद के मंत्रों से पूजा किए थे। घनश्याम महाराज ने भी उनकी सेवा याचना किए थे और बोले थे,”आप लोग कुछ साल बाद गुजरात में आ जाना। वहां पर आप लोगों को सन्त बना कर अपने पास रखूंगा। अभी यहां भोजन कर प्रस्थान कीजिए।”

घनश्याम महाराज के आमंत्रण को कोई भी व्यक्ति नही छोड़ता है। योगेश्वर प्रसन्न हुए। देखते ही देखते ने भोजन खिलाकर उन सबको खुश कर दिया। वे आकाश मार्ग से लुप्त हो गए।

  1. धर्म देव और भक्ति माता का स्मारक , तेंदुवा रानीपुर छपिया

यह स्थान नारायन सरोवर के समाने वाले किनारे पूर्व दिशा में स्थित है । यहां धर्म देव और भक्ति माता के अस्थि पर समाधि बाल प्रभु के बड़े भाई राम प्रताप भाई ने बनवाया था।

 घनश्याम ने अपने माता-पिता की अंतिम सांस तक सेवा की। भक्तिमाता गंभीर रूप से बीमार हो गई थीं। घनश्याम ने भक्तिमाता को मोक्ष का आध्यात्मिक ज्ञान दिया और जो उपदेश उन्होंने अपनी मां को दिया, वह हरि-गीता के नाम से जाना जाता है। हरि गीता सुनने पर भक्तिमाता समाधि में चली गईं और यहीं पर घनश्याम ने खुद को अक्षरधाम में रहने वाले श्रीहरि के रूप में प्रकट किया। जागने पर उन्होंने घनश्याम को अपने सामने खड़ा देखा और उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि श्रीहरि ने उनके अपने पुत्र के रूप में जन्म लिया है। घनश्याम ने अपना हाथ भक्तिमाता के माथे पर रखा; उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और घनश्याम ने उन्हें अक्षरधाम भेज दिया। भक्तिमाता ने कार्तिक सुदी 10 संवत 1848 को मानव शरीर छोड़ दिया।

भक्तिमाता के निधन के सात महीने बाद धर्मदेव भी बीमार पड़ गए। घनश्याम ने भी अपने पिता को सच्चा ज्ञान दिया और खुद को 'परमेश्वर' के रूप में अपने दिव्य रूप में प्रकट किया। धर्मदेव अब मानते हैं कि उनका बेटा घनश्याम मानव रूप में भगवान है। धर्मदेव ने रामप्रताप और इच्छाराम को बुलाया और उनसे कहा कि हम जिस श्री कृष्ण की प्रार्थना कर रहे हैं, वह कोई और नहीं बल्कि आपके भाई घनश्याम हैं। "घनश्याम 'परमेश्वर' हैं और उन्हें घनश्याम की प्रार्थना और पूजा करनी चाहिए, जो आपको मोक्ष प्रदान करने वाले एकमात्र हैं। उन्होंने रामप्रताप को घनश्याम की देखभाल करने का निर्देश भी दिया। रामप्रताप अपने पिता के अनुरोधों का पालन करने का वादा किया।

   धर्मदेव के अनुरोध पर, सात दिनों तक भगवद्गीता का पाठ किया गया। पाठ में लीन होने के कारण धर्मदेव का स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया, लेकिन पाठ सुनने और भगवान के दर्शन करने के बाद, धर्मदेव को तृप्ति का अनुभव हुआ और वे जेष्ठ वदी 4 संवत 1848 को इस दुनिया को छोड़कर अक्षरधाम में रहने चले गए।

भक्तिमाता और धर्मदेव अब दुर्वासा ऋषि के शाप से मुक्त हो गए।

लेखक परिचय:-

(लेखक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारी पद से सेवामुक्त हुए हैं। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के बस्ती नगर में निवास करते हुए सम सामयिक विषयों,साहित्य, इतिहास, पुरातत्व, संस्कृति और अध्यात्म पर अपना विचार व्यक्त करते रहते हैं।

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