राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक श्रीराम 

images (90)

     प्रेमप्रकाश शास्त्री                     
(स्नातक गुरुकुल प्रभात आश्रम मेरठ )                     

जहां एक ओर राष्ट्र शब्द की उत्पत्ति राजृ दीप्तौ धातु और ष्ट्रन् प्रत्यय के योग से  निष्पन्न होती है वहीं दूसरी ओर राष्ट्र में तद्धित शब्द और ईय प्रत्यय के जुड़ने से राष्ट्रीय शब्द बनता है । राष्ट्र केवल एक भूखण्ड का ही नाम नहीं अपितु उसमें रहने वाले असंख्य नर-नारी तथा उनसे संबंधित शिक्षा, संस्कृति, संस्कार, सभ्यता, परम्परा, इतिहास, मर्यादा और सरोकार से है । श्रीराम महर्षि वशिष्ठ के गुरुकुल में वेद-वेदांगों को पढ़कर राष्ट्ररक्षा की दीक्षा से दीक्षित हुए और उन्होंने सदा राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि माना । भगवती श्रुति कहती है कि भूमि मेरी माँ है और मैं उसका पुत्र हूँ । हे भूमि माता ! हम तुम्हारे लिए बलिदान हो जाएं । हे माता ! जब मैं असमर्थ हो जाऊँ तब तू मुझे अपनी गोद में धारण कर लेना। 

 माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या:।। (अथर्ववेद  12/1/12  )
 वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम ।। (-अथर्ववेद  12/1/62  )
 भूमे मातर्निधेहि मा ।। (अथर्ववेद  12/1/63 )                             श्रीराम की इसी राष्ट्रीयता से प्रेरित होकर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के उद्गार हैं “भारत भूमि का टुकड़ा नहीं है,यह जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है । यह अर्पण की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है । यह वंदन की धरती  है,अभिनंदन की धरती  है । इसकी हर एक नदी हमारे लिए गंगा है ।इसका कंकर-कंकर हमारे लिए शंकर है । हम जीएंगे तो इसी भारत के लिए और मरेंगे तो इसी भारत के लिए। मरने के बाद भी गंगाजल में बहती हमारी उन अस्थियों में कोई कान  लगाकर सुनेगा तो एक ही आवाज आएगी “भारत माता की जय” ।”
भगवान्  श्रीरामचन्द्र जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन  इसी राष्ट्रीय भावना के प्रचार-प्रसार में न्योछावर कर दिया, इसलिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए । उनके जीवन का अवलोकन करने से यह स्पष्ट परिलक्षित होता है कि वे राष्ट्रीय अस्मिता को सर्वोपरि मानते थे । इसी विशेष गुण के कारण उन्हें राष्ट्रीय चेतना का पुरोधा कहा जाता है । आदि महाकाव्य रामायण को रचने से पूर्व महर्षि वाल्मीकि ने ब्रह्मर्षि नारद से पूछा था ‘हे मुनिवर! इस समय संसार में कौन ऐसा व्यक्ति है जो गुणवान्,वीर्यवान्,धर्मज्ञ,उपकार को माननेवाला,सत्यवक्ता,दृढ़प्रतिज्ञ,सदाचारी,समस्त प्राणियों का हित  चाहनेवाला, विद्वान्, समर्थवान्, सभी को प्रिय लगनेवाले,मन पर निग्रह करनेवाले,क्रोध को जीतनेवाले,आभामंडित,किसी की निन्दा न करनेवाले आदि दिव्यगुण-सम्पन्न हो।’ तब महर्षि वाल्मीकि को उत्तर देते हुए ब्रह्मर्षि नारद ने कहा था ‘हे  मुनिवर ! आपके इन दुर्लभ गुणों से युक्त इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न विख्यात महान्  पुरुष भगवान राम हैं, जो मन को वश में करनेवाले, महाबलवान्,कांतिमान्, धैर्यवान्, धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, श्रीसम्पन्न, धर्मरक्षक, स्वजनपालक,वेद-वेदांगों के तत्त्ववेत्ता ,धनुर्वेद-प्रवीण तथा नाना शास्त्रविशारद, समदर्शी आदि विरुदावली से विभूषित हैं ।’

मर्यादा पुरुषोत्तम छोटे-बड़े,राजा-रंक,अमीर-गरीब,स्वामी-सेवक,नर-नारी,,गुरु-शिष्य,शत्रु -मित्र,आदि सब के हैं । उनके लिए कोई पराया नहीं है | महर्षि वाल्मीकि ने इसी उदात्त भावना का जिक्र करते हुए निषादराज गुह से श्रीराम की मित्रता का वर्णन कर उनके राष्ट्रीय एकता का जो परिचय दिया है ,वह अनुपम है।

 तत्र राजा गुहो नाम रामस्यात्मसम:सखा ।
निषादराजो बलवान् स्थपतिश्चेति विश्रुत:।।
(अयोध्याकांड सर्ग 50 श्लोक 33 )

शृंगवेरपुर में निषादराज गुह राज्य करता था । वह श्री रामचन्द्र जी का प्राणों के समान प्रिय मित्र था । उसका जन्म निषादराजकुल में हुआ था । वह शारीरिक शक्ति और सैनिक दृष्टि से भी बलवान्  तथा वहाँ के निषादों का सुविख्यात राजा था । श्रीराम के आने की खबर सुनकर वह अत्यंत आकुल होकर दल-बल सहित उनके श्री चरणों में उपस्थित होता है ।     

    स श्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं रामं विषयमागतम् ।
  वृद्धै: परिवृतोsमात्यैर्ज्ञातिभिश्चाप्युपागत:।।

    ततो निषादाधिपतिं दृष्ट्वा दूरादुपस्थितम् ।
 सह सौमित्रिणा रामः समागच्छद् गुहेन स:।।
( अयोध्याकांड सर्ग 50 श्लोक34,35 )   
            निषादराज को दूर से आया हुआ देख श्री रामचन्द्र जी लक्ष्मण के साथ आगे बढ़कर उससे मिले और अपनी उदारता दिखलाई । वनों में,कन्दराओंमें रहनेवाले समस्त वनवासियों एवं प्राणियों के साथ मित्रता व आत्मीयता उनकी समदर्शिता  का अपूर्व द्योतक है।
मर्यादा पुरुषोत्तम ने महात्मा भरत को कुशल समाचार पूछने के बहाने राजनीति का जो उपदेश दिया है वह उनकी दूरदर्शिता, राष्ट्रीय अस्मिता और चेतना का प्रतीक है । राजसूय एवं अश्वमेध आदि यज्ञों को सम्पन्न करनेवाले,धर्मपरायण,सत्यनिष्ठ राजा दशरथ कुशल तो हैं ? अपने पिताजी के माध्यम से अपनी कुल परंपरा की चर्चा करते हुए राजसूय एवं अश्वमेध आदि यज्ञों का उल्लेख इस बात का संकेत  है कि उनके पिताजी का चक्रवर्ती साम्राज्य निष्कंटक था ।

     कच्चिद् दशरथो नाम कुशली सत्यसंगर:।।   राजसूयाश्वमेधानामाहर्ता धर्मनिश्चित:।।
(अयोध्या. सर्ग,100 श्लोक,8 )

 “मातृदेवो भव,पितृदेवो भव,आचार्यदेवो भव,अतिथिदेवो भव,राष्ट्रदेवो भव” का जो आदर्श प्राचीन ऋषि-मुनियों ने स्थापित किया था वह श्रीराम के जीवन में पल- पल दिखाई देता है।

      स कच्चिद् ब्राह्मणो विद्वान् धर्मंनित्यो महाद्युति: । इक्ष्वाकूणामुपाध्यायो यथावत् तात ! पूज्यते।। (अयोध्या. सर्ग,100 श्लोक,9  )        

माता कौसल्या,कैकेयी,सुमित्रा,नित्यप्रति अग्निहोत्र करनेवाले, विद्वान्,देवजन,पितर,नौकर-चाकर,पिता के समान वानप्रस्थी ,वृद्धजन तथा वैद्यों का समाचार पूछने के बाद राजनीति में किसी भी राजा के लिए विजय का मूलमंत्र देते हुए कहते हैं —

      मंत्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव !
      सुसंवृत्तो मंत्रिधुरैरमात्यै: शास्त्रकोविदै:।।
(अयोध्या. सर्ग,100 श्लोक,16)  

हे रघुकुल में उत्पन्न भरत ! जिस राजा के राज्य में शास्त्र को जानने वाले श्रेष्ठ मंत्रियों के द्वारा मंत्र (विचार) को गोपनीय रखा जाता है उस राजा की जीत सुनिश्चित मानी जाती है।

कच्चिन्निद्रावशं नैषि कच्चित् काले अवबुध्यसे।       कच्चिच्चापररात्रेषु  चिंतयस्यर्थनैपुण्यम् ।। (अयोध्या. सर्ग,100 श्लोक,17  )

                      हे भरत ! राजा को अत्यधिक निद्रा के वश में नहीं होना चाहिए और समय से अवश्य जगना चाहिए | रात्रि  की चौथी पहर में उठकर राजलक्ष्मी के बारे में चिंतन करना चाहिए ।      कच्चिन्मंत्रयसे नैक: कच्चिन्न बहुभि: सह ।
      कच्चित्ते मंत्रितो मंत्रो राष्ट्रं न परिधावति ।। 
( अयोध्या. सर्ग,100 श्लोक,18 )

हे भरत ! राष्ट्र संबंधी विचार की मंत्रणा अकेले तो नहीं करते हो ? या फिर बहुतों के साथ  तो नहीं करते ? कहीं तुम्हारे द्वारा विचार किया हुआ गोपनीय तथ्य दूसरे राज्य तक तो नहीं पहुंचता ?
इस प्रकार राजनीति की विशद चर्चा करते हुए, वेद की आज्ञा का उपदेश देते हुए भरत के माध्यम से जो राजधर्म का मर्म बतलाते हैं वह हम सब के जीवन में आज भी प्रासंगिक हैं।

   कच्चित्ते सफला: वेदा: कच्चित्ते सफला: क्रिया: ।
   कच्चित्ते सफला: दारा: कच्चित्ते सफलं श्रुतम्।।
(अयोध्या.सर्ग,100 श्लोक,72)

हे भरत ! तुम्हारा जीवन वेदानुकूल तो है ? तुम जो कार्य कर रहे हो वह सफल तो है ? तुम्हारे राज-परिवार की नारियां कुशल से तो हैं ? तुम जो शास्त्र पढ़े हो उसका जीवन में सफल विनियोग तो कर रहे हो ?

इतना ही नहीं समुद्र तट पर वानरों की सेना लंका पर आक्रमण करने के लिए तत्पर है। ऐसी विषम परिस्थिति में नीति कुशल प्रभु राम ही हैं जिन्होंने शत्रु के भाई को भी गले लगाकर राष्ट्रीय अखंडता का परिचय दिया।
न वयं तत्कुलीनाश्च राज्यकांक्षी च राक्षस:।       पंडिता हि भविष्यन्ति तस्माद् ग्राह्यो विभीषण:।। (युद्ध कांड सर्ग,18 श्लोक,13 )
हम लोग इसके कुटुंबी तो हैं नहीं और यह राक्षस राज्य पाने का अभिलाषी है । इन राक्षसों में बहुत से लोग बड़े विद्वान भी होते हैं इसलिए विभीषण को अपने पक्ष में मिला लेना चाहिए ।

ततस्तु सुग्रीववचो निशम्य तद्                      हरीश्वरेणाभिहितम् नरेश्वर:।                            विभीषणेनाशु जगाम संगमं                                  पतत्रिराजेन यथा पुरंदर: ।।     
( युद्ध कांड सर्ग,18 श्लोक,39 )

तदनंतर वानरराज सुग्रीव की कही हुई वह बात सुनकर राजा श्रीराम शीघ्र आगे बढ़कर विभीषण से मिले, मानो देवराज इन्द्र पक्षीराज गरुड़ से मिल रहे हों।
इस प्रकार निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि श्रीराम का जीवन “ऋग्वेद के संगठन सूक्त   “संगच्छध्वं संवदध्वं संवो मनान्सि जानताम्” ।।  (ऋग्वेद 10/191/1 ) मंत्रों की जीवंत व्याख्या है जो सार्वभौमिक,सार्वकालिक और सर्वग्राह्य है ।    
ईश्वर हम सभी को सामर्थ्य प्रदान करे कि उनकी राष्ट्रीय अस्मिता को समझ सकें और अपने राष्ट्र में ओजस्विता और तेजस्विता का संचार कर सकें।

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
kolaybet
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş