*सरस्वती पूजा रहस्य*और वेद

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डॉ डी के गर्ग

भाग 1

पौराणिक मान्यता:

सरस्वती ज्ञान, संगीत, बहते पानी, प्रचुरता और धन, कला, भाषण, ज्ञान और सीखने की हिंदू देवी है। देवी लक्ष्मी और पार्वती के साथ त्रिदेवियों में से एक हैं ।
देवी के रूप में सरस्वती का उल्लेख ऋग्वेद में है ।देवी की चार भुजाएं है ,जिनमें चार प्रतीक हैं: एक पुस्तक, एक माला, एक पानी का बर्तन और एक संगीत वाद्ययंत्र जिसे वीणा कहा जाता है । वसंत पंचमी का त्योहार को सरस्वती पूजा और सरस्वती जयंती के रूप में भी जाना जाता है) उनके सम्मान में मनाया जाता है। परंपरागत रूप से, इस दिन को छोटे बच्चों को वर्णमाला के अक्षर लिखना सीखने में मदद करने के लिए मनाया जाता है।

विष्लेषण: देश भर में “सरस्वती पूजन” के अवसर पर सरस्वती देवी की पूजा करता हैं। सरस्वती पूजा का वैदिक पक्ष इस अवसर पर पाठकों के स्वाध्याय हेतु प्रस्तुत है। विद्यालयों में सरस्वती गान किया जाता है।

सरस्वती का अर्थ

सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में सरस्वती की परिभाषा करते हुए स्वामी दयानंद लिखते है कि जिसमें अखंड रूप से विज्ञान विद्यमान है उस परमेश्वर का नाम सरस्वती है। जिसमें विविध विज्ञान अर्थात शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, प्रयोग का ज्ञान यथावत होने से उस परमेश्वर का नाम सरस्वती हैं।(सृ गतौ) इस धातु से ‘सरस्’, उससे मतुप् और ङीप् प्रत्यय होने से ‘सरस्वती’ शब्द सिद्ध होता है। ‘सरो विविधं ज्ञानं विद्यते यस्यां चितौ सा सरस्वती’ जिसको विविध विज्ञान अर्थात् शब्द, अर्थ, सम्बन्ध प्रयोग का ज्ञान यथावत् होवे, इससे उस परमेश्वर का नाम ‘सरस्वती’ है।

वेद के अर्थ समझने के लिए हमारे पास प्राचीन ऋषियों के प्रमाण हैं। निघण्टु में वाणी के 57 नाम हैं, उनमें से एक सरस्वती भी है। अर्थात् सरस्वती का अर्थ वेदवाणी है। ब्राह्मण ग्रंथ वेद व्याख्या के प्राचीनतम ग्रंथ है। वहाँ सरस्वती के अनेक अर्थ बताए गए हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं-

1- वाक् सरस्वती।। वाणी सरस्वती है। (शतपथ 7/5/1/31)

2- वाग् वै सरस्वती पावीरवी।। ( 7/3/39) पावीरवी वाग् सरस्वती है।

3- जिह्वा सरस्वती।। (शतपथ 12/9/1/14) जिह्ना को सरस्वती कहते हैं।
4- सरस्वती हि गौः।। वृषा पूषा। (2/5/1/11) गौ सरस्वती है अर्थात् वाणी, रश्मि, पृथिवी, इन्द्रिय आदि। अमावस्या सरस्वती है। स्त्री, आदित्य आदि का नाम सरस्वती है।
5- अथ यत् अक्ष्योः कृष्णं तत् सारस्वतम्।। (12/9/1/12) आंखों का काला अंश सरस्वती का रूप है।
6- अथ यत् स्फूर्जयन् वाचमिव वदन् दहति। ऐतरेय 3/4, अग्नि जब जलता हुआ आवाज करता है, वह अग्नि का सारस्वत रूप है।
7- सरस्वती पुष्टिः, पुष्टिपत्नी। (तै0 2/5/7/4) सरस्वती पुष्टि है और पुष्टि को बढ़ाने वाली है।
8-एषां वै अपां पृष्ठं यत् सरस्वती। (तै0 1/7/5/5) जल का पृष्ठ सरस्वती है।
9-ऋक्सामे वै सारस्वतौ उत्सौ। ऋक् और साम सरस्वती के स्रोत हैं।
10-सरस्वतीति तद् द्वितीयं वज्ररूपम्। (कौ0 12/2) सरस्वती वज्र का दूसरा रूप है।
ऋग्वेद के 6/61 का देवता सरस्वती है। स्वामी दयानन्द ने यहाँ सरस्वती के अर्थ विदुषी, वेगवती नदी, विद्यायुक्त स्त्री, विज्ञानयुक्त वाणी, विज्ञानयुक्ता भार्या आदि किये हैं।

ऋग्वेद 10/17/4 ईश्वर को सरस्वती नाम से पुकारा गया है। दिव्य ज्ञान प्राप्ति की इच्छा वाले अखंड ज्ञान के भण्डार “सरस्वती” भगवान से ही ज्ञान की याचना करते है, उन्हीं को पुकारते है। तथा प्रत्येक शुभ कर्म में उनका स्मरण करते हैं। ईश्वर भी प्रार्थना करने की इच्छा पूर्ण करते हैं। सभी मिलकर ज्ञान के सागर ईश्वर के महान विज्ञान रूपी गुण अर्थात “सरस्वती” का पूजन करे। वर्ष में एक दिन ही क्यों सम्पूर्ण जीवन करें।

क्या वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख है ?

तर्क -इस विषय में एक वेद मंत्र में आये गंगा ,यमुना आदि शब्दों द्वारा सिद्ध करने का प्रयास किया जाता है की वेद में सरस्वती नदी का उल्लेख है।
उत्तर : ये भ्रान्ति वेद मंत्रो के गलत भाष्य और उनको ठीक से ना पढ़ने के कारण हुई है , वेद मंत्र इस प्रकार है —
सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।

ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ।। ऋग्वेद १०/७५/५
(गङ्गे) हे गमनशील समुद्र तक जानेवाली नदी ! (यमुने) हे अन्य नदी में मिलनेवाली नदी ! (सरस्वति) हे प्रचुर जलवाली नदी ! (शुतुद्रि) हे शीघ्र गमन करनेवाली या बिखर-बिखर कर चलनेवाली नदी ! (परुष्णि) हे परुष्णि-परवाली भासवाली-दीप्तिवाली इरावती कुटिलगामिनी (असिक्न्या) कृष्णरङ्गवाली नदी के स्थल (मरुद्धृधे) हे मरुतों वायुओं के द्वारा बढ़नेवाली फैलनेवाली नदी (वितस्तया) अविदग्धा अर्थात् अत्यन्त ग्रीष्म काल में भी दग्ध शुष्क न होनेवाली नदी के साथ (आर्जीकीये) हे विपाट्-किनारों को तोड़-फोड़नेवाली नदी (सुषोमया) पार्थिव समुद्र के साथ (मे स्तोमं सचत-आ-शृणुहि) मेरे अभिप्राय को या मेरे लिये अपने-अपने स्तर को सेवन कराओ तथा मेरे लिये जलदान करो ॥
ग्रंथ प्रामाण्य विषय में प्रश्न हुआ- गंगा, यमुना, सरस्वती आदि का वर्णन वेदों में भी है, फिर आप उनको तीर्थ के रूप में क्यों नहीं मानते।
जब किसी वस्तु की नदी से उपमा दी गई है तो उसके कुछ गुण तो नदी से मिलते ही हैं। लेकिन वेद का तात्पर्य भौगोलिक स्थितियों का वर्णन करने से नहीं है।
‘नदी’ वह है जो ‘नाद’ करती है। (नदति) ये शरीर की नाडि़याँ हैं। जिनमें से एक के ही गुणों के कारण कई नाम हैं। स्वामी दयानन्द ने ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका में इस पर बहुत सुन्दर प्रकाश डाला है।

स्वामी दयानन्द लिखते हैं- हम मानते हैं कि उनकी नदी संज्ञा है, परन्तु वेग आदि तो नदियाँ हैं। उनसे जल, शुद्धि आदि से जो उपकार होता है उतना मानता हूँ। वे पापनाशक और दुःखों से तारने वाली नहीं हैं, क्योंकि जल, स्थल आदि में वह सामथ्र्य नहीं है।इसी प्रकार ‘सितासिते यत्र संगमे तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति।’ इस परिशिष्ट वचन से भी कुछ लोग गंगा और यमुना का ग्रहण करते हैं और ‘संगमे’ इस पद से गंगा-यमुना का संगम प्रयाग तीर्थ यह ग्रहण करते हैं। वेद के अनुसार यह ठीक नहीं है। यहाँ पर दयानन्द एक मौलिक तर्क देते हैं कि गंगा और यमुना के संगम अर्थात् प्रयाग में स्नान करके देवलोक को नहीं जाते किन्तु अपने अपने घरों को आते है। इससे स्पष्ट होता है कि वह तीर्थ कोई और ही है जहाँ स्नान करने से देवलोक अर्थात् मोक्ष प्राप्त किया जाता है।
स्वामी दयानन्द के अनुसार यहाँ भी सित शब्द से इडा का और असित शब्द से पि›ला का ग्रहण है। इन दोनों नाडि़यों का सुषुम्णा में जिस स्थान में मेल होता है, वह संगम है। वहाँ स्नान करके परमयोगी लोग ‘दिवम्’ अर्थात् प्रकाशमय परमेश्वर, मोक्ष नाम सत्य विज्ञान को प्राप्त करते हैं।
इस संक्षिप्त विवेचन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि-
1- वेद में सरस्वती नाम अनेक स्थानों पर आया है।
2- वेद में सरस्वती का उल्लेख नदी के रूप में भी आया है।
3- वेद में सरस्वती का उल्लेख धरती के किसी स्थान विशेष पर बहने वाली नदी के रूप में नहीं आया है। न ही वेद में सरस्वती से संबंधित किन्हीं व्यक्तियों का इतिहास है।
4- सरस्वती नदी की ऐतिहासिकता को वेद से प्रमाणित करने का प्रयास वेद का अवमूल्यन करना है।
५ गंगा और यमुना के संगम अर्थात् प्रयाग में स्नान करके देवलोक को नहीं जाते किन्तु अपने अपने घरों को आते है। इससे स्पष्ट होता है कि वह तीर्थ कोई और ही है जहाँ स्नान करने से देवलोक अर्थात् मोक्ष प्राप्त किया जाता है।

सरस्वती ऐतिहासिक नदी : इसमें कोई दो राय नहीं है की सरस्वती नदी ऐतिहासिक है। इसका कारण है की सांसारिक वस्तुओं के नाम वेद से लेकर रखे गए हैं, न कि इन नाम वाले व्यक्तियों या वस्तुओं के बाद वेदों की रचना हुई है। जैसे किसी पुस्तक में यदि इन पंक्तियों के लेखक का नाम आता है तो वह इस लेखक के बाद की पुस्तक होगी। इस विषय में मनु लिखते है –

सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।

वेद शब्देभ्यः एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे।।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि इस धरती पर सरस्वती नाम की नदी बहती थी।कहा जाता है कि महाभारत में सरस्वती नदी का 235 बार उल्लेख है और इसमें इसकी स्थिति को भी प्रदर्शित किया गया है। 3/83 के अनुसार कुरुक्षेत्र सरस्वती के दक्षिण में है और दृषद्वती के उत्तर में है। प्राचीन पुराणों, नवीन पुराणों, भारत, रामायण आदि ग्रंथों में सरस्वती के अनुसंधान करने चाहिएँ, वेद में नहीं। भारतीय इतिहास ग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से नदी है।
सरस्वती का काल्पनिक स्वरूप

सरस्वती के काल्पनिक स्वरूप का कारण विभिन्न वेद मंत्रो में प्रयुक्त सरस्वती शब्द के विभिन्न भावार्थ है। जिनको कलाकार द्वारा अपनी कल्पना की उड़ान द्वारा एक नारी में समस्त गुणों की छवि दिखाने का सफल प्रयास किया है। लेकिन दुर्भाग्य ये है की वास्तविकता समझने के बजाय काल्पनिक कहानिया लिख दी और सरस्वती नामक मूर्ति की पूजा होने लगी।
सरस्वती के एक मुख, चार हाथ हैं। इसका भावार्थ चारो वेद का ज्ञान और चारो दिशाओं के विज्ञानं का ज्ञान होने के लिए प्रेरित करता है।
वाहन राजहंस -सौन्दर्य एवं मधुर स्वर का प्रतीक है। इनका वाहन राजहंस माना जाता है और इनके हाथों में वीणा, वेद होती है। जो संगीत के माध्यम से वेद मंत्रो के मधुर गायन की प्रेरणा देता है। हंस ज्ञान और अद्भुत का प्रतीत होता है। मां सरस्वती सिर पर मुकुट पहने होती हैं, और बिना को बजाते हुए दिखाई देती हैं, मुकुट उनकी राय सत्ता और शक्ति को प्रतिष्ठित करता है जबकि वीणा उनकी कला और संगीत का प्रतीक है।

माँ सरस्वती की पूजा क्या है?
इसका भावार्थ है कि हमे किसी भी प्रकार से, वाणी का दुरुपयोग नहीं करना या स्वार्थ पूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं करना। शिक्षा के प्रति जन-जन के मन-मन में अधिक उत्साह भरने-लौकिक अध्ययन और आत्मिक स्वाध्याय की उपयोगिता अधिक गम्भीरता पूवर्क समझने के लिए भी ईश्वर के सरस्वती स्वरूप के पूजन दिवस की परम्परा है। पूजन का भावार्थ धूपबत्ती जलना ,आरती उतरना ,भोग लगाना नहीं बल्कि एक चर्चा दिवस ताकि बुद्धिमत्ता को बहुमूल्य सम्पदा समझा जाय और ज्ञान के अर्जन द्वारा धन कमाने, बल बढ़ाने, साधन जुटाने पर अधिक ध्यान दिया जाये। महाशक्ति गायत्री मंत्र उपासना के अंतर्गत एक महत्त्वपूर्ण धारा सरस्वती की मानी गयी है।
ऋग्वेद 10/17/4 ईश्वर को सरस्वती नाम से पुकारा गया है। दिव्य ज्ञान प्राप्ति की इच्छा वाले अखंड ज्ञान के भण्डार “सरस्वती” भगवान से ही ज्ञान की याचना करते है, उन्हीं को पुकारते है। तथा प्रत्येक शुभ कर्म में उनका स्मरण करते हैं। ईश्वर भी प्रार्थना करने की इच्छा पूर्ण करते हैं। सभी मिलकर ज्ञान के सागर ईश्वर के महान विज्ञान रूपी गुण अर्थात “सरस्वती” का पूजन करे। वर्ष में एक दिन ही क्यों सम्पूर्ण जीवन करें।

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