विष्णु क्षीर सागर में रहते हैं*

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Dr D K Garg

ये एक अलंकारिक चित्रण है। विष्णु का तात्पर्य परमपिता परमात्मा से है जो महान रचनाकार हैं,चारो तरफ फैली रंग बिरंगी प्रकृति उसका श्रृंगार है,और आकाश से सूर्य की सतरंगी करने ,कलरव करती नादिया, ऊंचे ऊंचे पहाड़ जो तरह तरह के खनिज अपने में समेटे है। ईश्वर ने केवल सृष्टि ही नहीं रचाई ,बल्कि मानव को 100 वर्ष की आयु प्रदान करते हुए उसके लिए सभी सुख साधन भी प्रदान किए , वनस्पति के माध्यम से औषधियां प्रदान की ।इसलिए ईश्वर का एक अन्य नाम विष्णु भी है।
मानव जीवन एक कर्म योनि है ताकि मनुष्य कर्म करते हुए जीवन यापन करे।इसके लिए मानव को विलक्षण बुद्धि प्रदान की है और अपनी बुद्धिमत्ता के माध्यम से वह ईश्वर की अपार रचना को समझते हुए उसका लाभ लेने का प्रयास करता है।जैसे की आज का मानव ने समुंद्र की गहराई में भी यात्रा करता है तो आकाश में भी वायुयान से यात्रा कर सकता है। उसे सभी पंच तत्वों के दोहन में सफलता मिली है जैसे की जल से विद्युत बन रही हैं,सौर ऊर्जा से भी ,और खनिज से निकले कोयले से भी। मनुष्य ने अपनी बुद्धि के कारण पशु पक्षियों से प्रेम करके उनके साथ रहना और उनका अपने जीवन में सदुपयोग करना सीख लिया।
बुद्धि ,मेधा ,प्रज्ञा और ऋतम्भरा ये चार अमूल्य निधि मनुष्य को विष्णु रूपी ईश्वर ने प्रदान की है , जहां यह चारो प्रकार की निधि विद्यमान होती है उसे अक्षय क्षीर सागर कहते है ।बुद्धि ये निश्चित करती है की नाना प्रकार के तारामंडल है,यह ब्रह्मांड है ।हमारे ऋषि ,वैज्ञानिक ,साहित्यकार इसी निधि के कारण महान कहलाए।
ऐसा महान व्यक्ति इस क्षीर सागर के सदुपयोग से ईश्वर के करीब पहुंच जाता है और सच्चा ईश्वर पुत्र कहलाने का अधिकार प्राप्त कर लेता है।
इसी आलोक में अलंकार की भाषा में कहा गया है कि विष्णु क्षीर सागर में रहते हैं।

लक्ष्मी के पैर दबाने का तात्पर्य क्या है?

ये एक भ्रम है की लक्ष्मी का भावार्थ केवल धन दौलत से है । मनुष्य की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी बुद्धि है और उसका सदुपयोग ।जिसके कारण वह सभी सांसारिक बाधायो को पार करते हुए मुक्ति प्राप्त कर लेता है। उसको इस जन्म में ही नही परलोक में भी सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है।
संसार के सभी ऐश्वर्य उसके सामने गौण हो जाते है।इस आलोक में अलंकार की भाषा में कहा गया है की लक्ष्मी विष्णु के पैर दबा रही है।

फिर ये पांच फन वाला शेष नाग क्या है?
यह पांच फन से तात्पर्य मनुष्य के पांच अवगुणों से है ,ये है : काम ,क्रोध ,लोभ , मोह और अहंकार । जो इन पर काबू पा लेता है वह समस्त ऐश्वर्य का स्वामी कहलाता है।इसलिए लक्ष्मी के रूप में विष्णु के पैर दबाते हुए दिखाया जाता है।जहा लक्ष्मी उसकी दासता कर रही है।जो व्यक्ति मेधावी,रजोगुणी और जितेंद्रिय होता है उसके यहां लक्ष्मी का वास होता है,उसको जीवन का भरपूर आनंद प्राप्त होता है,जैसे की लक्ष्मी स्वयं उसके पैर दबा रही है।
इसके विपरीत काम ,क्रोध,लोभ , मोह और अहंकार के चक्र मृत्यु की तरफ ले जाने वाला होता है।जो ऋषि इन पर विजय प्राप्त कर लेता है वह शेषनाग कहलाता हैं,वही विष्णु कहलाता हैं और वही इन पांच फन पर लेटकर विश्राम करने लगता है,फिर नारद जी वीणा बजाने लगते हैं जो अत्यंत आनंददायक और मनोहारी लगता है।
चित्र के माध्यम से चित्रकार ने यही समझाया है।

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