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भयानक राजनीतिक षडयंत्र

तमिलनाडु में चल रहा इसी मिशनरियों का षड्यंत्र

तमिलनाडु के लोगों को अक्सर हिंदी भाषी क्षेत्रों के लोगों से तालमेल की कमी और ईर्ष्या भाव देखा जाता है। तमिल को कई बार राष्ट्रीय भाषा भी बनाने का दबाव बनाया गया। वह लोग कभी भी नोर्थ के लोगों से प्रेमपूर्वक नहीं मिलते, कुछ एक को छोड़कर और सबसे बड़ी बात कि साउथ में खाकर तमिलनाडु में ईसाई मतान्तरण की दर सबसे अधिक है।

इसकी वजह जानने की इच्छा बहुत दिनों से थी। तो आइए हम बताते हैं यह उसी काल में शुरू हुआ, जब आर्यन इन्वेन्शन थियरी का जन्म हुआ। मैक्स मुल्लर ने सबसे पहले इस बात को हवा दी कि आर्य यूरेशिया से आए थे और बाहरी थे। और उसका कारण स्थापित करने के लिए जो इंडोलोजिस्ट तैयार किए गए जॉन मुईर फ़्रेंज बूप्प और भी बहुत सारे उन लोगों ने संस्कृत को तमिल को हिब्रू (भाषा) जैसा बताया।

1801 में हेनरी थॉमस कोलब्रुक ने एक आर्टिकल लिखा कि सभी भारतीय भाषाएं संस्कृत से उतपन्न हुई हैं। और समस्त भारतीय भाषाओं को जोड़ती है।

इसका खंडन किया अलैक्सडर डी कैम्पबेल और फ्रांसिस व्हाईट एलिस, जो मद्रास का कलेक्टर था और मद्रास के फोर्ट सेंट कॉलेज में अच्छा प्रभाव था, जो भारत में आने वाले अंग्रेज अधिकारियो को भारत के बारे में टीचिंग का केंद्र था, ने ये दावा किया कि दक्षिण भारतीय भाषाएं संस्कृत से नही निकली हैं। इन दोनों ने मिलकर 1816 में “तेलगू भाषा का व्याकरण” नामक पुस्तक भी लिखी, जिसमे ये दावा किया गया कि तेलगू और तमिल गैर संस्कृत उत्पत्ति की भाषाएं है।

ऐसा दावा इसके पूर्व किसी ने भी नही किया था। एलिस ने दावा किया कि इन भाषाओं का संबंध हिब्रू और अरब भाषाओ से है। जिसके मूल में बाइबिल के नोह् के संततियों के द्वारा विश्व की पूरी धरती को आबाद करने का सिद्धान्त की स्थापना की गई थी।

उनका तर्क ये था कि विलियम जोहन्स ने चूंकि नूह के बड़े पुत्र की भाषा को संस्कृत प्रमाणित किया है तो वह ही द्रविड़ियन लोगो का पूर्वज रहा होगा। अतः तमिल भाषा का सम्वन्ध हिब्रू और प्राचीन अरब भाषा से है।

उसी समयकाल में मिशनरी रोबर्ट कॉडवेल (1814-91) ने एलिस की कल्पना को समाजशास्त्र से जोड़कर किया कि द्रविड़ एक अलग नश्ल है और भारत में आर्यो के पूर्व से रहती आयी है। उसने Comparative Grammer of Dravidian Race नामक एक पुस्तक लिखी जो आज भी खासी लोकप्रिय है। उस पादरी ने ये दावा किया कि तेलगू भाषा में आर्यों के एजेंट ब्राम्हणो ने धूर्ततापूर्वक संस्कृत घुसेड़ दिया है। और प्रस्तावित किया कि द्रविड़ नश्ल के लोगों को आर्यो के चंगुल से मुक्त करके उनको ईसाइयत के प्रकाश में लाना पड़ेगा और तमिल भाषा से संस्कृत शब्द निकालने होंगे।

दूसरा मोड़ इसमें 1840 में आया जब जॉन स्टीवेंशन नामक पादरी स्कॉटिश मिशनरी और ब्रायन एचएच ने एबोरिजिनल लैंग्वेज का प्रस्ताव रखा और उसमें उसने उन समस्त भाषाओ को समाहित किया जिनको आज द्रविड़ियन और मुंडा फैमिली की भाषाएं कहते है।

बाकी आगे इस झूंठ को आगे बढ़ने का काम पेरियार और दक्षिण भारत के अन्य नेताओं ने किया और आज भी कर रहे है। आज तमिलनाडु ईसाइयत का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है।

तो वस्तुतः दक्षिणभारत में हिंदी विरोध नही होता बल्कि सफेद चमड़ी के हरामियों द्वारा फैलाया हुवा झूंठ और ईसाइयत के फैलाव के लिए आधार बनाने के लिए संस्कृत और ब्रमहिनिस्म का विरोध था, जो आज हिंदी विरोध का रूप धारण कर चुका है।

दक्षिण भारत के लोग भी संभवतः इस गहरी शाजिश से अपरिचित हैं। उत्तर भारतीयों के प्रति उनके अजीब रवैये (विशेषकर तमिलनाडु) को आप इसी पृष्ठिभूमि में समझ सकते हैं। (रेफ़्रेन्स; ब्रैकिंग इंडिया, डॉक्टर त्रिभुवन सिंह जी की हिंदी दिवस की पोस्ट) इस पूरे षड्यंत्र ने दक्षिण भारत विशेषकर तमिलनाडु की भूमि को भारत और भारतीयता से लगभग काट दिया और यह सिद्धांत ईसाइयत को बढ़ावा देने में अहम रहा।

पेरियार एक वामपंथी और अंगरेजो का एजेंट था जिसने इस विचार धारा का प्रचार प्रसार सबसे अधिक किया। ख़ुद के प्रकाशन से जो कि अंगरेजो द्वारा वित्तपोषित था उसने अनेको पत्र पत्रिकाओं और अख़बार का सम्पादन किया। यहाँ तक की सच्ची रामायण नाम से उसने एक पुस्तक लिखी जो तुलसी रचित रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण के विरुद्ध ईसाईयों का अजेंडा फैलाने के लिए ही लिखी गई थी।

सच्ची रामायण नाम से लिखी गई पुस्तक में इतनी अभद्रता और भोंडापन है कि अश्लीलता और हीनता की हर पराकाष्ठ को पार कर जाए। उस पुस्तक को विभिन्न भाषाओं में प्रकाशित कर और छोटी छोटी टिकाओ के रूप में जनमानस में फैलाया गया। प्रभु श्री राम को दक्षिण भारत में न मानने वालों की भारी संख्या की वजह मुख्यतः यही है।

उत्तर भारत में इनका प्रभाव अधिक नहीं हो पाया जबकि पेरियार ललई यादव नामक व्यक्ति ने इसकी नक़ल कर यहाँ भी वही करने का प्रयास किया परंतु वह अधिक सफल नहीं हुआ। हाँ JNU जैसे संस्थान ज़रूर इन विचारधाराओं और व्यक्तियों की कृत्यों को आधार बनाकर आने वाली नशलो के द्वारा इसको फैलाने का काम कर रहे हैं। लाखों रुपए की छात्रवृत्तियाँ इसी काम में ख़र्च की जा रही हैं। ऐसे बहुत लोगों को जानता हूँ जो इन पर शोध लिखकर दुबारा यही ज़हर बोने का काम कर रहे हैं जिसके पीछे जातिगत राजनीति करने वालों का हाथ है।

अब आप पूछेंगे की दक्षिण भारत को ही इस तरह क्यूँ टार्गट किया गया? क्यूँ कार्य कुशल लोगों की तदात वहाँ अधिक थी। शैक्षणिक संस्थान (गुरुकुल और महाविद्यालय) वहाँ अधिक थे जो मैन्युफ़ैक्चरिंग की शिक्षा देते थे। आप दक्षिण भारत के पुराने मंदिरो या अन्य आर्किटेक्चर को देखकर उनकी कार्यकुशलता का अंदाज़ा स्वयं लगा सकते हैं। उस तरह की बिल्डिंग पूरे विश्व में कम जगह पर हैं या नहीं हैं।

आज भी इसी को आधार बनाकर भारी मात्रा में मत परिवर्तन और ईसाई बनाने का काम चल रहा है। बक़ायदा वैटिकन से फ़ंडेड प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है। DFA (ऐफ़्रो दलित प्रोजेक्ट) उनमें मुख्य है। वैसे तो छोटी बड़ी मिलाकर लगभग ६००० से अधिक मिशनरीज़ अकेले तमिलनाडु में सक्रिय हैं। जिनमे एक मुख्य मिशनरी वह भी है जिसने रातों रात गौरी लंकेश प्रकरण में देश भर के लोगों को बैनर और पोस्टर छापकर पहुँचा दिया था और उसके प्रभाव की वजह से पूरे राजकीय सम्मान से लंकेश का अंतिमसंस्कार हुआ। हालाँकि जबसे क़ातिल का नाम आया था सबको साँप सूंघ गया था।

आज वहाँ हालात ऐसे हैं कि बच्चों को अगर ढंग के स्कूल में पढ़ाना है तो ईसाई बनना पड़ेगा। ऐसे बहुत लोगों से मेरी बात हो चुकी है। मतान्तरण की शर्त पर अड्मिशन होता है और छूट दी जाती है। लोग मजबूर हैं क्योंकि अधिकतम अस्पताल और स्कूल आज मिशनरीज़ के ही हैं। कुछ जगह पर सारी ज़मीन उन्होंने ख़रीद ली है और आप उनकी मानने के आल्वा कुछ नहीं कर सकते हैं।

केंद्र सरकार ने मिशनरीज़ की कमर तोड़ी ज़रूर है लेकिन उस स्तर पर नहीं जिस पर होना चाहिए, हालाँकि यह लोग कन्वर्ट करके ईसाई बन तो जाते हैं लेकिन मुख्य ईसाई इन्हें कभी स्वीकार नहीं करते हैं और न ही इन्हें कैथोलिक चर्च कोई महत्व देता है, माने मिलाजुला कर यह लोग वही करिया वाले (हैम के शापित वंशज) हलेलुइया बन रहे हैं।

तो क्रिसमस नज़दीक है विभिन्न प्रकार के प्रलोभन और षड्यंत्र चरम पर हैं।
डॉविवेकआर्य

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