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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से राजनीति

दक्षिण विजय के लिए भाजपा को क्या करना होगा ?

गंगोत्री से गंगासागर तक अपना विशाल साम्राज्य खड़ा करने वाली भाजपा के लिए दक्षिण अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मजबूत करने का मनोविज्ञान मजबूत करने वाली भाजपा के लिए यह आवश्यक है कि वह दक्षिण को भी भगवा ध्वज के नीचे लाए। अभी हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों ( असम, पांडिचेरी, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु ) के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जहां असम और पश्चिम बंगाल में धुआंधार मचाई है और पांडिचेरी में भी सरकार बनाने में सफल हुई है, वहीं केरल और तमिलनाडु में उसकी पराजय सचमुच चुभने वाली है। इन दोनों ही प्रदेशों ने भाजपा के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को रोक दिया है। निश्चित रूप से भाजपा को अंतरमंथन करना ही होगा। यह इसलिए भी आवश्यक है कि भाजपा संपूर्ण देश को एक इकाई के रूप में स्थापित करने का संकल्प व्यक्त करती है। साथ ही वह सारे संसार को यह दिखाना चाहती है कि हमारे यहां का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भाषा ,प्रांत ,क्षेत्र, जाति, संप्रदाय आदि की सारी संभावनाओं और विसंगतियों को पीछे छोड़कर ‘एक’ होने की क्षमता रखता है।

दक्षिण भारत के 6 राज्यों अर्थात कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भाजपा को विशेष ध्यान देना है। इन आधा दर्जन राज्यों में कांग्रेस के द्वारा भाषा के नाम पर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया जाता रहा है। उन्हें यह बताया जाता रहा है कि भाजपा हिंदी- हिंदू- हिंदुस्तान की बात करती है। यदि यह सत्ता में बनी रहेगी और स्थानीय लोग अपनी भाषाई पहचान को छोड़कर भाजपा के ‘ हिंदी – हिंदुस्तान ‘ के साथ जाने का मन बनाएंगे तो एक दिन ऐसा आएगा जब भाजपा इन प्रांतों की स्थानीय भाषाओं को मिटा देगी। इससे दो बातें स्पष्ट होती हैं -एक तो यह कि भारत में भाषाई पूर्वाग्रह है। इसके लिए हम चाहे कितना ही यह दिखाने और कहने का प्रयास करें कि हम भाषा के नाम पर बंटे हुए नहीं हैं ,परन्तु सच यह है कि भाषा हमें दूसरे प्रान्तों के लोगों से अलग करती है। दूसरी बात यह है कि भारत में भाषाओं के नाम पर यदि प्रान्तों का विभाजन किया गया है तो भाषा राजनीति में एक वैधानिक आधार प्राप्त कर चुकी है अर्थात भाषा के नाम पर प्रान्तों का विभाजन करना भाषाई विवाद को वैधानिकता प्रदान करता है।

भाजपा को अपनी रणनीति में इस बात को सम्मिलित करना पड़ेगा कि वह संस्कृतनिष्ठ हिंदी की समर्थक है और दक्षिणी की सभी भाषाओं के संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हिंदी शब्दों के रूप में स्वीकृति देने को तैयार है। इसी मत के प्रतिपादक सावरकर जी थे। भाजपा को दक्षिण के लोगों को यह भली प्रकार समझाना होगा कि कांग्रेस उर्दूनिष्ठ खिचड़ी भाषाओं की समर्थक रही है। कांग्रेस की इसी नीति का विरोध दक्षिण भारत करता है। लोगों को मान्यता है कि भाजपा की हिंदी का अभिप्राय कांग्रेस की इसी उर्दूनिष्ठ हिंदी से है अर्थात दक्षिण भारत उस उर्दूनिष्ठ खिचड़ी हिन्दी का विरोधी है, जो उसकी अपनी भाषाओं से कहीं भी मेल नहीं खाती है। भाजपा को ध्यान रखना चाहिए कि उसके अंग्रेजी या उर्दू के नारे दक्षिण भारत के लोगों को रास नहीं आते हैं।

भाजपा ने भाषा के नाम पर तुष्टिकरण का खेल खेलते हुए दक्षिण को उन्हीं की अपनी भाषा में संबोधित करने का क्रम चलाया है अर्थात पार्टी हंस की चाल चली तो अपनी चाल भूल गई। भाजपा को सावरकर जी के भाषा संबंधी चिंतन को क्रियान्वित करने के लिए ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे कि दक्षिण की सभी भाषाओं के संस्कृतनिष्ठ शब्दों को हिंदी के संस्कृतनिष्ठ स्वरूप के साथ समन्वित किया जा सके। कांग्रेस ने भाषा को अभिव्यक्ति का माध्यम मान लिया है। जबकि भाषा राष्ट्रीय एकता की सजग प्रहरी होती है। इसी स्वरूप में भाजपा को अपना भाषा संबंधी चिंतन स्पष्ट करना चाहिए।

हमें ध्यान रखना चाहिए कि दक्षिण भारत के इन 6 राज्यों में लोकसभा की 130 सीटें आती हैं। जिनमें से भाजपा के पास ढाई दर्जन भी नहीं हैं। इससे पता चलता है कि भाजपा को दक्षिण में पैर जमाने के लिए अभी बहुत कुछ करना होगा।
कर्नाटक में भाजपा के लिए बहुत अनुकूल अवसर हैं। वहां पर उसकी सरकार भी रही है। भविष्य में वहां पर भाजपा की सरकार आने की प्रबल संभावनाएं हैं। कर्नाटक को आधार बनाकर दूसरे प्रान्तों को जीतने की एक सफल योजना बनाई जा सकती है। कर्नाटक को एक मॉडल के रूप में विकसित किया जाए। जिसमें विशेष रूप से भाषा के प्रति उदार दृष्टिकोण रखा जाए। कर्नाटक के लोगों को यह विश्वास दिलाया जाए कि भाजपा ‘ सर्वजन हिताय और सर्वजन सुखाय’ में विश्वास रखती है और वह भाषा को राष्ट्रीय एकता का सशक्त माध्यम मानती है। तमिलनाडु में जिस प्रकार से वहां के स्थानीय दल सत्ता में आते रहे हैं, उससे पता चलता है कि यहां के लोग क्षेत्रीय पार्टियों को प्राथमिकता देते हैं। अब उन्होंने तमिलनाडु में टीवीके को एक विकल्प के रूप में स्वीकार कर लिया है। भारतीय जनता पार्टी को इन तीनों के विकल्प के रूप में अपने आप को स्थापित करना है। इसके लिए भाजपा को चाहिए कि वह जिस प्रकार बंगाल को लगभग डेढ़ लाख छोटी-छोटी बैठकों का आयोजन करके विजय करने में सफल हुई है, उसी प्रकार उसे तमिलनाडु में भी करना होगा। मंचों पर दिए गए भाषणों से अधिक यह छोटी-छोटी बैठकर प्रभावशाली होती हैं। भाजपा को तमिलनाडु के लोगों को भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में इस प्रान्त के महत्वपूर्ण योगदान से परिचित कराना होगा। यह भी दिखाना होगा कि राम हमारी आस्था के और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं। उन्हें स्थानीय स्तर पर तमिलनाडु के लोग रावण के दृष्टिकोण से देखना बंद करें। दक्षिण में जिस प्रकार भाजपा के पास लोकसभा के लिए सीटों का अकाल पड़ा हुआ है, वह इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि यहां के लोगों ने भाजपा को अभी कांग्रेस जैसा भी सम्मान देना ठीक नहीं माना है। यही कारण है कि दक्षिण भारत के लोग भाजपा को वोट भी बहुत कम देते हैं। यह भी एक तथ्य है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में आंध्र प्रदेश में बीजेपी को मात्र एक प्रतिशत वोट मिले थे।

ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत के लोग सनातन से दूर हैं, वहां पर कार्यरत ईसाई मिशनरीज स्थानीय लोगों को भारत के सनातनी स्वरूप से दूर ले जाने का हर संभव प्रयास करती रही हैं, परंतु इसके उपरांत भी बहुसंख्यक लोग भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में आस्था रखते हैं। भाजपा को इसी आस्था को पकड़ना चाहिए। वहां के मंदिरों के माध्यम से लोगों को जोड़ने का प्रयास करना चाहिए। मंदिरों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर अच्छे भाषण करने वाले लोगों को वक्ता के रूप में स्थापित किया जाए। इनका विशेष कार्य उत्तर दक्षिण का भेद मिटाना होना चाहिए।

डॉ राकेश कुमारआर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं)

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