ओ३म् “परमात्मा ने संसार सत्पुरुषों के सुख व आत्म कल्याण के लिये बनाया है”

images (16)

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
हमारा यह संसार स्वतः नहीं बना और न ही यह पौरुषेय रचना है। इस संसार को मनुष्य अकेले व अनेक मिलकर भी नहीं बना सकते। हमारा यह सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, सौर मण्डल तथा ब्रह्माण्ड अपौरुषेय और ईश्वर से रचित हैं। प्रश्न किया जा सकता है कि परमात्मा ने यह संसार क्यों बनाया है? परमात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप सत्ता होने से ज्ञान एवं कर्म करने वाली सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान सत्ता है। परमात्मा अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अनन्त है। ईश्वर के अनादि होने से उसने इस सृष्टि को पहली बार नहीं रचा अपितु उसने ऐसी ही सृष्टि को इससे पूर्व भी अनन्त बार रचा है। यह सृष्टि वह सृष्टि के उपादान कारण प्रकृति से बनाता है। सृष्टि का उपादान कारण प्रकृति भी अनादि व नित्य होने सहित अविनाशी व अभाव को प्राप्त न होने वाली है। सच्चिदानन्दस्वरूप ईश्वर, त्रिगुणात्मक सत्व, रज व तम गुणों वाली जड़ प्रकृति के अतिरिक्त संसार में चेतन जीवों का भी अस्तित्व है। जीव सत्य व चित्त, अत्यल्प परिमाण, एकदेशी, समीम, जन्म-मरण धर्मा, कर्मफल के बन्धनों में बंधा हुआ है। यह तीनों सत्तायें वा पदार्थ अनादि, नित्य एवं अविनाशी हैं। परमात्मा अपनी प्रजा जीवों के लिये ही इस सृष्टि को बनाता व चलाता है। वह एक पल के लिये भी निद्रा को प्राप्त नहीं होता और न ही थकान दूर करने के लिये विश्राम करता है। शास्त्रों के अनुसार उसका एक दिन 4.32 अरब वर्षों का होता है। इस अवधि में वह सृष्टि को बनाता है और इसको चलाता है।

सृष्टि बनने के बाद जीवात्माओं को उनके पूर्व कल्प व जन्मों के अनुसार उपयुक्त व योग्य जन्म मिलता रहता है। यदि हमारे पाप व पुण्य बराबर होते हैं तो हमें मनुष्य का जन्म मिलता है। यदि हमारे पाप कर्म पुण्य से किंचित भी अधिक होते हैं तब हमें मनुष्य का जन्म न मिलकर पशु, पक्षी आदि नीच प्राणी योनियों में जन्म प्राप्त होता है। जन्म व मृत्यु की व्यवस्था हमारे कर्मानुसार परमात्मा करता है। हमारा अच्छा स्वास्थ्य व रोग भी हमारे ज्ञान पूर्वक कर्म व भोजन आदि पर निर्भर करते हैं। ईश्वर ने इस सृष्टि को सभी अनन्त जीवों के कल्याण वा सुख भोग के लिये बनाया है। हमारे शुभ व पुण्य कर्मों का फल सुख होता है और हमारे पाप व अशुभ कर्मों का फल दुःख होता है। हमारे देश व विश्व में बहुत से मत ऐसे हैं जो ईश्वर के सत्यस्वरूप व उसके कर्म फल के विधान को नहीं जानते। इस अज्ञान के कारण वह ईश्वर की इच्छा व भावना के विरुद्ध अनैतिक, अशुभ व पाप कर्म करते हैं। वह मूक व हमारे लिये उपयोगी गाय, बकरी, भेड़, गधा, घोड़ा, मछली, मुर्गी-मुर्गा आदि प्राणियों को अनावश्यक व अनुचित रूप से शारीरक कष्ट देते हैं। यहां तक की अपनी जीभ के स्वाद व पेट भरने के लिये पशुओं का वध तक कर डालते हैं। यह परमात्मा को न जानने और उसे भली प्रकार से न समझने के कारण से होता है। परमात्मा ने इन पशु व पक्षियों को मनुष्यों के ही समान अपने पूर्वजन्म के कर्मों का भोग करने के लिये जन्म दिया है। हमें इन जीवात्माओं से युक्त सभी पशुओं को उनके जीवनयापन में सहयोग करना चाहिये। वैदिक धर्मी इस व्यवस्था को जानते हैं और परमात्मा की वेदनिहित आज्ञा के अनुसार कर्तव्यों का पालन करते हैं परन्तु बहुत से लोग जो नाना मतों को मानते हैं वह ईश्वर की इच्छा व भावनाओं के विपरीत इनकी हत्या व इनके मांस का भक्षण करते हैं। ऐसा करने से उनका स्वभाव हिंसा से युक्त होकर वह समाज में घृणा व क्रोध के वशीभूत होकर धर्म व कर्तव्य का पालन तथा सत्य धर्म वेद का आचरण करने वालों को भी पीड़ा व दुःख देते हैं। ऐसा अनुचित काम कोई भी मनुष्य करता है तो वह मनुष्य नहीं अपितु मनुष्य के विपरीत दुष्टाचारी ही कहा जा सकता है। मनुष्यों को मनुष्यता का ही व्यवहार करना चाहिये। इसी से उसकी समाज में शोभा होती है। दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों को सुधारना आसान काम नहीं है। कुछ थोड़े से लोग अपने विचारों में परिवर्तन करते रहते हैं परन्तु एक बहुत बड़ी जनसंख्या सात्विक विचारों से दूर होने के कारण रज व तमों गुणों से प्रभावित व्यवहारों को करती है और अपने जीवन को नरक के समान व्यतीत कर मृत्यु होने पर अधम कोटि की प्राणी योनियों में जन्म लेकर अनेक जन्मों तक दुःखों को भोगते हुए ईश्वर की करुणा व दया के कारण पुनः मनुष्य योनि में जन्म प्राप्त करती हैं। 

संसार में अनन्त संख्या में जीवात्मायें हैं। यह सभी जीवात्मायें स्वरूप व गुणों में समान हैं। सभी जन्म व मरणधर्मा हैं जिसका आधार इनके पूर्वजन्म के कर्म हुआ करते हैं। परमात्मा सभी जीवों का माता-पिता, आचार्य, राजा और न्यायधीश है। इसी कारण परमात्मा अपनी जीवरूप प्रजा के लिये इस सृष्टि को बनाकर उनको पूर्वजन्मों के अनुसार उनकी जाति, आयु और सुख व दुःख रूपी भोग निर्धारित कर विभिन्न प्राणी योनियों में जन्म देता रहता है। परमात्मा ऐसा जीवों के प्रति अपनी दया एवं करूणा के स्वभाव के कारण करता है। हमें भी परमात्मा के इस गुण को ग्रहण कर अपने परिवार व समाज के सभी लोगों के प्रति ऐसा ही सेवाभाव, आचरण व व्यवहार रखते हुए सहयोग एवं उनकी पीड़ाओं को दूर करने का कार्य करना चाहिये। ऐसे सत्कर्मों को करने से ही पुण्य अर्जित करते हैं जिनका परिणाम जन्म-जन्मान्तर में आत्मा की उन्नति के साथ मनुष्य व देव योनि में जन्म की प्राप्ति होती है। मनुष्य जन्म की प्राप्ति से मनुष्य के मोक्ष और जन्म-मरण से मुक्ति का मार्ग खुलता है। यदि मनुष्य वेदों की शरण में आकर सभी प्रलोभनों पर विजय प्राप्त कर ले और योग्य विद्वानों व आचार्यों से विद्या प्राप्त कर योगाभ्यास करे तो वह मोक्ष मार्ग का पथिक बन जाता है जिससे इसी जन्म व कुछ जन्मों बाद उसकी मुक्ति व मोक्ष की आशा की जा सकती है। हमारे सभी ऋषि-मुनि तथा योगी इसी मार्ग का अनुशरण करते थे। आधुनिक युग में 137 वर्ष पूर्व ऋषि दयानन्द ने भी इसी मार्ग का अनुशरण किया था। उन्होंने मानव जाति के उपकार के इतने कार्य किये हैं जितने पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के पश्चात किसी ऋषि  व विद्वान ने संसार में नहीं किये। हमारा सौभाग्य है कि हम भारत में पैदा हुए और हमें यहां आर्यसमाज से जुड़ने का अवसर मिला है जिससे हम मनुष्य जाति के सभी कर्तव्यों को जानने सहित इस संसार में अनादि तीन पदार्थों को जान सके हैं। इसके साथ ही हम ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना उपासना सहित परोपकार व दान आदि कर्मों का महत्व भी जान सकें हैं। ईश्वर की उपासना की सत्य विधि जिससे ईश्वर का साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति होती है, वह भी महर्षि दयानन्द ने हमें बताई है। 

हमारा यह संसार अपौरुषेय रचना है। मनुष्य वा पुरुष भी रचना करते हैं परन्तु मनुष्य जो रचना करता है वह अल्पसामथ्र्य युक्त रचनायें होती हैं। उन रचनाओं में सूर्य, चन्द्र, पृथिवी, ग्रह-उपग्रह तथा लोक-लोकान्तरों की रचना सम्भव नहीं है। यह रचना परमैश्वर्यवान परमात्मा जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान एवं सृष्टि का कर्ता है, उसी से होनी सम्भव है। संसार को बने हुए 1.96 अरब वर्ष हो चुके हैं। महाभारत युद्ध के समय तक सभी इस बात से सहमत थे कि ईश्वर ही सृष्टिकर्ता है और उसने अपनी शाश्वत प्रजा जीवों के कल्याण के लिये इस सृष्टि को रचा है। महाभारत युद्ध के बाद भी यही विचारधारा वैदिक मत व अन्य मतों में कुछ भेदों के साथ चलती रही। ऐसे भी मत हैं जो इस सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय को नहीं मानते। विज्ञान इस मान्यता का खण्डन करता है और विज्ञान की यह बात विद्वानों द्वारा स्वीकार्य भी है। विज्ञान की एक न्यूनता यह है कि वह अभी तक ईश्वर नाम की सत्ता का अनुसंधान नहीं कर पाया। यूरोप के किसी वैज्ञानिक ने वेदों का यथार्थस्वरूप व उसमें निहित ज्ञान को जाना व समझा नहीं है। यदि वह वेद और वैदिक साहित्य का अध्ययन करें और योगाभ्यास द्वारा ईश्वर की उपासना करें तो वह सत्य रहस्यों को जान सकते हैं। विद्वान जो भी खोज करते हैं उसके लिये उन्हें अध्ययन, ध्यान व चिन्तन सहित प्रयोग करने होते हैं। वैज्ञानिकों का अध्ययन केवल भौतिक पदार्थों तक ही सीमित होता है। आत्मा और परमात्मा के अध्ययन की वह उपेक्षा करते हैं। जब वह अलौकिक विषयों, पदार्थों सहित आध्यात्म विज्ञान का अध्ययन करेंगे ही नहीं तो उन्हें उनके विषय में ज्ञान व जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है अर्थात् प्राप्त नहीं हो सकती। हमारे सभी ऋषि व योगी भी वैज्ञानिक ही हुआ करते थे। वह आध्यात्मिक ज्ञान के वैज्ञानिक थे और हमारे वर्तमान वैज्ञानिक केवल भौतिक पदार्थों व उससे सम्बन्धित विज्ञान के ही वैज्ञानिक हैं। इनका समन्वय वेद और वैदिक साहित्य में मिलता है। यह सत्य सिद्धान्त है कि ईश्वर ने जीवात्माओं को जन्म देकर उन्हें मनुष्य व पशु-पक्षियों आदि योनियों के दर्शन करायें हैं। उसने जीवों के कल्याण व कर्मों का फल व भोग प्रदान करने सहित जीवों की आत्मा की उन्नति के लिये ही सृष्टि को बनाया है। यहां हम यह भी उल्लेख करना चाहिये हैं कि ईश्वर एक चेतन, ज्ञानवान, सर्वज्ञ, सृष्टिकर्ता व सर्वशक्तिमान सत्ता है। हम सच्चे हृदय से जो प्रार्थना करते हैं उसे सर्वव्यापक तथा सर्वान्तर्यामी ईश्वर सबका साक्षी होने से पूरा व सफल करता है। अतः हमें उसकी उपासना ऋषि दयानन्द व योगदर्शन प्रदर्शित वैदिक विधि से ही करनी चाहिये। ऐसा करने से ही हमारा जीवन सफल होगा। ओ३म् शम्। 
-मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः 9412985121

Comment:

betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
Kolaybet Giriş
bettilt giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
bettilt giriş
Betgaranti
betgaranti
betgaranti giriş
kolaybet
onwin
onwin
bettilt giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
betkanyon
Betgaranti Giriş
holiganbet
holiganbet
sahabet
Kolaybet Giriş
Kolaybet Giriş
Kolaybet giriş
sahabet
sahabet
onwin
onwin
sahabet
sahabet
onwin giriş
onwin giriş
betgaranti giriş
holiganbet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
perabet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
onwin giriş
sahabet giriş
bettilt giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
bettilt giriş
onwin giriş
sahabet giriş
betnano giriş
Kolaybet
kolaybet giriş
grandpashabet giriş
betnano giriş
bettilt giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş