हम तारों की धूल है’*

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आर्य सागर खारी

मानव शरीर अपने आप में एक समूचा ब्रह्मांड है। यह जिन तत्वों से मिलकर बना है यह तत्व निसंदेह पृथ्वी पर पाए जाते हैं लेकिन पृथ्वी इन्हें नहीं बनाती बल्कि खुद पृथ्वी इन तत्वों के विविध संयोगों से बनी है। पृथ्वी पर पाए जाने वाले 118 में से 21 तत्व मानव शरीर में पाए जाते हैं जो मानव देह का आधार है। मानव शरीर 65 फ़ीसदी ऑक्सीजन, 18 फीसदी कार्बन 10 फीसदी हाइड्रोजन 3 फ़ीसदी नाइट्रोजन से मिलकर बना है शरीर के द्रव्यमान का 99% इन्हीं 4 तत्वों से मिलकर बना है । यही चार तत्व ब्रह्मांड में सर्वाधिक क्रियाशील है अभी तक के ज्ञात इस ब्रह्मांड के मोस्ट रिएक्टिव एलिमेंट है यह चार तत्व। 70 किलो वजनी किसी इंसान के शरीर में 43 किलो ऑक्सीजन, 16 किलो कार्बन, 7 किलो हाइड्रोजन 1.8 किलो के नाइट्रोजन होती है।

शेष 2 किलो में 1 किलो के लगभग कैल्शियम होता है जिससे हड्डियां बनती हैं शेष बचे 1 किलो में सल्फर ,फास्फोरस ,मैग्नीशियम आयरन ,पोटैशियम, क्लोरीन, जिंक जैसे 17 तत्व शामिल होते हैं। इनमें भी तांबा महज 72 मिलीग्राम, आयोडीन 13 मिलीग्राम, जिंक 2000 मिलीग्राम ही केवल पाया जाता है,यह मात्रा भी यदि ज्यादा हो गई तो यही तत्व शरीर के लिए घातक हो जाते हैं।

मानव शरीर के आधार इन 21 तत्वों में महज 11 ही अति आवश्यक है और इन सभी का निर्माण सुदूर ब्रह्मांड में लाखों करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर हमारे सूर्य से भी विशाल आकार के तारों की भट्टी में हुआ है। पृथ्वी पर जितने भी तत्व पाए जाते हैं चाहे यूरेनियम जैसा प्रचंड ऊर्जावान तत्व हो या सोने जैसी पीली बहुमूल्य धातु इन सभी का निर्माण सूर्य से लाखों गुना बड़े सुपरनोवा तारों में होता है ।

आधिदैविक भाव से पृथ्वी को माता सूर्य को पिता वैदिक संस्कृति में मानने का यही आधार है वहीं जहां पृथ्वी जीवन के लिए उपयोगी दशा उपलब्ध कराती है वही सूर्य जीवन के लिए आधारभूत तत्वों का निर्माता है और जहां सूर्य की स्तुति की गई है वहां सूर्य से मतलब हमारे सूर्य से ही नहीं है। सूर्य के असंख्य नाम है उनमें एक नाम जातवेद है अर्थात उत्पन्न करने वाला।

हमारा सूर्य नाइट्रोजन से ऊपर किसी भी भारी तत्व को उत्पन्न नहीं कर पाता लेकिन विशालकाय तारे यूरेनियम सोना लोहा जैसे भारी तत्वों को बनाते हैं। मानव शरीर में चार से पांच ग्राम के बीच लोहा पाया जाता है अचरज तो देखिए सूर्य से कुछ बड़े तारों के लिए लोहा मौत बन जाता है। सूर्य के गर्भ में हाइड्रोजन से हीलियम हीलियम से लिथियम बेरिलियम नाइट्रोजन तक ही तत्वों का निर्माण हो पाता है आमतौर पर सूर्य जैसे आकार के तारों में लोह तत्व का निर्माण नहीं हो पता। लोहा सोना यूरेनियम जैसी भारी तत्वों का निर्माण सूर्य से लाखों करोडो गुना विशाल तारों के गर्भ में होता। है। यह सिद्ध है हमारे शरीर में पाए जाने वाला लोहा व कॉपर ,जिंक आयोडिन जैसा तत्व सूर्य से बड़े सुदूर तारों में निर्मित हुए हैं।

मानव शरीर 100 खरब कोशिकाओं से मिलकर बना है और एक कोशिका 100 खरब परमाणुओं से मिलकर बनी है मानव शरीर में यूं तो सर्वाधिक अधिकता ऑक्सीजन तत्व की है लेकिन परमाणु की संख्या के आधार पर देखें तो सर्वाधिक परमाणु हाइड्रोजन तत्व के ही पाए जाते हैं मानव शरीर एक अद्भुत रचना है। जिसमें पाए जाने वाले प्रत्येक तत्व अरबों वर्ष पहले तारों के सुपरनोवा विस्फोट से बने हैं और जहां हमारे शरीर में ऑक्सीजन नाइट्रोजन कार्बन सरीखे कुछ तत्व एक मन से लेकर 1 किलो तक की भारी मात्रा में पाए जाते हैं तो कुछ तत्व महज कुछ मिलीग्राम तो कुछ नैनोग्राम की उपस्थिति में ही पाए जाते हैं ।इसमे पाए जाने वाले 21 तत्वों में से तो कुछ तत्वों को ट्रेस करना बेहद जटिल होता है।

यह शरीर मिट्टी का पुतला नहीं है हवा का बुलबुला है ऑक्सीजन हाइड्रोजन जैसे तत्वों की अधिकता यही सिद्ध करती है फिर भी हमें यह ठोस प्रतीत होता है तत्वों का रसायनिकी इसे बेजोड़ बना रही है परम वैज्ञानिक रचयिता ईश्वर की यह अनूठी रचना है।

हमारा शरीर कॉस्मिक डस्ट है अर्थात तारों की धूल है। खगोल शास्त्री प्रसिद्ध साइंस कम्युनिकेटर कार्ल सैगन ने भी यही कहा था “हमारे दातों का कैल्शियम हमारे डीएनए की नाइट्रोजन हमारे रक्त का लोहा हमारी पृथ्वी पर नहीं सुदूर आकाशगंगाओं में तारों की नाभिकीय भट्ठियों में खरबों डिग्री सेल्सियस में करोड़ों अरबों वर्षों में निर्मित हुआ है । हम ब्रह्मांड के अंदर नहीं है ब्रह्मांड हमारे अंदर है।”

वैदिक साक्षात धर्म ऋषियों ने तो एक कदम आगे बढ़कर यह कहा है कि यह भौतिक शरीर एक दिन सत्व रज तम रुपी कारण शरीर में लीन हो जाएगा। महर्षि व्यास के अनुसार प्रकृति के गति संस्कार के दौरान अर्थात कार्य रूप जगत में यह कारण शरीर ही स्थूल शरीर बन जाता है।

जैमिनी पतंजलि गौतम कणाद व महर्षि दयानंद सरीखे वैदिक ऋषि ब्रह्मांड व शरीर की एकरूपता, एकसूत्रता को न केवल समझते थे अपितु दिन प्रतिदिन इसे जीते भी थे उन्होंने वैदिक धर्मी आर्यों की उपासना पद्धति वैदिक संध्या के मंत्रों में वेदों की उन चुनिंदा ऋचाओं का विनियोग किया जो शरीर से ब्रह्मांड की एकरूपता तारतम्यता को उल्लिखित करते हैं उद्घाटित करते हैं। जिनमें शरीर से विचार यज्ञ करते हुए ब्रह्मांड को समझने और अंत में ब्रह्मांड के निर्माता ब्रह्म को प्राप्त करने के लिए के लिए जबरदस्त उत्तेजना उहा पोह की गई है।

आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही रूपों में यह शरीर अद्भुत बेजोड़ है।

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