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आज का चिंतन

स्वामी दयानंद और आर्द्देयोश्यरत्नमाला

महर्षि दयानंद द्वारा आर्य उद्देश्य रत्न माला नामक पुस्तक लिखी है।
इसमें 100 सिद्धांत बताए गए हैं एक सिद्धांत जो सबसे मुख्य और महत्वपूर्ण है ईश्वर ।
अब दूसरी परिभाषा धर्म की की गई है।
जिसमें कहा गया है कि ईश्वर की आज्ञा का पालन और पक्षपातरहित सर्वहित करना है। जो प्रत्येक प्रत्यक्ष आदि आठ प्रमाणोंसे और वेदोक्त होने से आचरण करने योग्य है उसको धर्म कहते हैं ।तो धर्म की परिभाषा महर्षि दयानंद बता रहे हैं कि धर्म का स्वरूप है ईश्वर की आज्ञा का यथावत पालन करना, यह धर्म है। आजकल धर्म के नाम से लगभग 2000 संगठन चल रहे हैं। वह सब अपने आप को धर्म कहते हैं। वास्तव में वो धर्म नहीं है। वह है संप्रदाय। इनका नाम है संप्रदाय। जिस संविधान का निर्माता संचालक ईश्वर हो वह तो है धर्म।और जो संविधान मनुष्यों ने बनाया उसका नाम संप्रदाय।
ईश्वर ने जो संविधान बनाया, चलाया उसका नाम धर्म है। जो संविधान मनुष्य ने बनाया चलाया उसका नाम संप्रदाय है ।
ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद का संविधान बनाया और उसमें सब बातें ज्ञान विज्ञान प्रतिपादित की है ।‌
मनुष्य तो अल्पज्ञ है और संसार में एक से एक बढ़कर बुद्धिमान बैठे फिर भी पूर्ण कोई भी नहीं है। पूर्ण ज्ञान वाला मनुष्य कोई भी नहीं है।इसलिए मनुष्य जब भी कोई कानून बनाएगा,संविधान बनाएगा तो उसमें गलती होने की पूरी संभावना है, तो यह जितने संप्रदाय चल रहे हैं जैन, बौद्ध, ईसाई, मुस्लिम आदि एक भी धर्म नहीं है बल्कि यह सब संप्रदाय हैं। यह सब महाभारत के बाद स्थापित हुए। कोई 4000 वर्ष पहले ,30000 वर्ष पहले, कोई 2000 वर्ष पहले कोई 1400 वर्ष पहले कोई 500 वर्ष पहले बनाए गए हैं। जो मनुष्यों के द्वारा बनाए गए हैं।क्योंकि ईश्वर ने तो सृष्टि के प्रारंभ में ही ज्ञान मनुष्य को वेद के रूप में दे दिया था।

इसलिए महर्षि जी यहां बता रहे हैं कि जिसका स्वरूप ईश्वर की आज्ञा का यथावत पालन करना वह धर्म ईश्वर की आज्ञा वेदों में है। जितने भी यह संप्रदाय वाले हैं यह
सब अपनी अपनी पुस्तक को धर्म पुस्तक बताते हैं। और ईश्वर का संदेश बताते हैं यह गलत है। कैसे गलत है?
इसको थोड़ा समझ लेते हैं।
क्या आप ऐसा मानते हैं कि ईश्वर ने सृष्टि बनाई हैं ?
क्या बिना संविधान के कोई देश चल सकता है?
कोई नहीं चल सकता ।
ईश्वर ने इतनी बड़ा संसार बनाया तो उसमें भी कोई संविधान तो होना चाहिए। उसके बिना तो कैसे चलेगा। इसका मतलब हुआ कि ईश्वर ने जब संसार बनाया, मनुष्य, पशु, पक्षी, प्राणी सारे उत्पन्न किये तो उनके लिए कोई कानून संविधान भी बनाएगा। अब प्रश्न यह विचारने का कि जो ईश्वर संविधान बनाएगा। वह कब बनाना चाहिए। सृष्टि के आरंभ में या सृष्टि के बीच में।
आरंभ में बताना, बनाना चाहिए। तभी तो लोगों को पता चलेगा कि कानून है । यह करना है या नहीं करना तो शुरू में बताना ठीक है ।ईश्वर का संविधान होगा। वह सृष्टि के आरंभ में होना चाहिए,तो ठीक है। अब यह जितने संप्रदाय है, और उनकी जितनी पुस्तक है इन सबको टेस्ट करके देख लीजिए। बाइबल , कुरान, आदि को पढ़कर उनके समय की गणना स्वयं कर लीजिए कि वह सृष्टि के प्रारंभ में है या सृष्टि के बीच में दी गई है और जो एक मनुष्य के द्वारा दी गई है।
इस सृष्टि को चलते हुए एक करोड़ 96 करोड़ 8 लाख तिरेपन हजार वर्ष 124 वर्ष हो चुके हैं।संसार की सबसे पुरानी पुस्तक वेद है। ऐसा बड़े-बड़े विद्वान स्वीकार करते हैं ।इससे पता चलता है कि वेद सृष्टि के आरंभ का दिया हुआ ज्ञान है। ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में जो ज्ञान दिया वह वेद है ।इसलिए जो ईश्वर का संदेश है कि ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करना ,यह धर्म है ।और पक्षपात रहित ,न्याय पूर्वक सर्वहित करना होता है। पक्षपात अथवा पार्शियल्टी नहीं करना। न्याय पूर्वक करना ।
पक्षपात का मतलब क्या होता है?
आपके बेटे ने गलती कर दी वह तो आपने छुपा ली और दूसरे की गलती को अपने सर्वत्र उजागर कर दिया सार्वजनिक कर दिया। यह पक्षपात है। जो आपको अच्छा हो शुभ हो वह दूसरों को भी शुभ अच्छा लगता है। जैसे मैं अपने सुख के लिए प्रयत्न करता हूं ऐसे दूसरे के सुख के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इसको पक्षपात रहित बोलते हैं इसलिए धर्म ,सत्य और न्याय तीनों शब्द समानार्थक है ।धर्म, सत्य ,न्याय की व्याख्या है , इन तीनों के अनुसार व्यवहार करना । यह धर्म कहलाता है तो ईश्वर ने जो बातें बताई वह सब के लिए (इक्वल) समान रूप से है। भारत वालों को तो 20 तक छूट दी जाएगी जापान वालों को 20 तक फालतू टैक्स लगेगा। जापान वाले कम लेंगे । ऐसा करना पक्षपात है, न्याय नहीं है ,धर्म नहीं है। ईश्वर जो कहता है वह करो वह धर्म है। तो ईश्वर का विचार ,उसकी मान्यता, उसका सिद्धांत ,उसका कथन, उसका आचरण को भी व्यवहार में लाना ,करना चाहिए। यह धर्म की परिभाषा हैं। ईश्वर के उसे संविधान को केवल भारत के लोग पढ़ेंगे जापान वाले नहीं पढ़ेंगे अफ्रीका वाले नहीं पढ़ेंगे ।अमेरिका वाले क्या करें ।
इस प्रकार अलग-अलग संविधान बनाना न्याय संगत नहीं होगा बल्कि पक्षपात पूर्ण होगा।
धर्म का पालन करें ।
धर्म की पहचान के लिए प्रमाण है। प्रत्यक्ष प्रमाण,अनुमान, उपमान, शब्द प्रमाण। ये चार मुख्य मुख्य प्रमाण है। मुख्य प्रमाण के अतिरिक्त चार और भी है ।उनके नाम इतिहास, अर्थापति संभव एवं अभाव प्रमाण है। यह आठ प्रकार के प्रकार के प्रमाण होते हैं । धर्म के व्यवहारों की ,आचरण की सारी परीक्षा प्रमाणों से हो चुकी है। धर्माचरण है वह प्रमाणों के विरुद्ध नहीं होगा। दोनों की समानता होगी ,अनुकूलता होगी ।एक जैसे होंगे। न्याय दर्शन में बताया है कि जितने भी प्रमाण होते हैं उन सबका आपस में निर्णय एक ही होता है ,विरोध नहीं होता। अगर प्रत्यक्ष प्रमाण कहता है की अग्नि गरम है तो अनुमान अथवा उपमान में आपस में कोई विरोध नहीं है। ऐसे ही जो ईश्वर का वचन है वेद, उसमें भी प्रमाण पूर्वक कोई विरोध नहीं ।वह भी उसके लिए समान ही है। इसलिए कहा जो धर्म है वह परीक्षित, अच्छी तरह से उसकी परीक्षा की जा चुकी है। वह प्रमाणों के अनुकूल है। जो विरुद्ध हो वह अधर्म, जो वेदों के विरुद्ध हो वह अधर्म है। तो धर्म -अधर्म को समझने के लिए हमको ईश्वर आज्ञा अर्थात वेदों को समझाना पड़ेगा ।
वेदों के समझने से ही समस्त सृष्टि का कल्याण है। वेदों की विपरीत आचरण करने से ही अन्याय, अधर्म, पाप सृष्टि में व्याप्त होगा।
देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट ग्रेटर नोएडा
अध्यक्ष उगता भारत समाचार पत्र।
चलभाष 98 1183 8317

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