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डॉ डी के गर्ग

कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन ये पर्व मनाया जाता है। ऋषि धन्वंतरि के जन्म उपलक्ष में मनाये जाने वाले इस पर्व का नाम बिगड़कर ‘‘धनतेरस‘पड़ा। आयुर्वेद का प्रारंभिक ज्ञान अथर्ववेद से मिला लेकिन इस ज्ञान को शोध करके विस्तार करने का श्रेय ऋषि धन्वंतरि को जाता है। इसलिए इस महापुरुष को सम्मान देने के लिए वैद्य लोगों ने भगवान धन्वन्तरि की संज्ञा दी है।
पर्व से सम्बंधित पौराणिक कथाये :
इस दिन समुद्र-मंथन के समय भगवान् ऋषि धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथों में अमृत से भरा कलश था। इसलिए इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा समाज में प्रचलित हो गई। यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन (वस्तु) खरीदने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। धन तेरस पर भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा होती है। उन्हें आयुर्वेद का जन्मदाता और देवताओं का चिकित्सक माना जाता है।
धन्वंतरि के जन्म के सम्बन्ध में हमें तीन कथाएं मिलती हैं। कौन सी कथा प्रामाणिक है, ये कहना असम्भव है:-
1. प्रथमः धन्वंतरि की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई थी। वे समुद्र में से अमृत का कलश लेकर निकले थे जिसके लिए देवों और असुरों में संग्राम हुआ था। इस प्रकार की समुद्र मंथन की कथा श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण आदि पुराणों में मिलती है।
2.द्वितीयः धन्व काशी नगरी के संस्थापक काश के पुत्र थे। काशी के राजवंश में धन्व नाम के एक राजा ने उपासना करके अज्ज देव को प्रसन्न किया और उन्हें वरदान स्वरूप धन्वंतरि नामक पुत्र मिला। इसका उल्लेख ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण में मिलता है।
3.तृतीय: इस कथा में किसी अज्ञात गालव ऋषि का नाम जोड़ दिया है की जब गालव ऋषि प्यास से व्याकुल होकर वन में इधर-उधर भटक रहे थे तो कहीं से घड़े में पानी लेकर जा रही वीरभद्रा नाम की एक कन्या ने उनकी प्यास बुझायी। इससे प्रसन्न होकर गालव ऋषि ने आशीर्वाद दिया कि तुम योग्य पुत्र की मां बनोगी। लेकिन जब वीरभद्रा ने कहा कि वे तो एक वेश्या है तो ऋषि उसे लेकर आश्रम गए और उन्होंने वहां कुश की पुष्पाकृति आदि बनाकर उसके गोद में रख दी और वेद मंत्रों से अभिमंत्रित कर प्रतिष्ठित कर दी, वही धन्वंतरि कहलाए।
ऋषि धनवन्तरी जन्म कथा विश्लेषण:
उपरोक्त तीनो कथायें अलग-अलग है, इसलिए इस पचड़े में पड़ने का कोई औचित्य नहीं है। लेकिन एक बात स्पष्ट है कि ये पर्व ऋषि धन्वन्तरि के जन्म के उपलक्ष में मनाया जाता है जिन्हे आयुर्वेद जगत में चिकित्सा के देवता के रूप में सम्मान दिया गया हैं । राजा विक्रमादित्य जिन्हें विक्रम संवत के आरंभकर्ता के रूप में जाना जाता है, उनके दरबार में नवरत्नों में पहला नाम धनवन्तरि का ही था। ज्योतिर्विदाभरण नामक ग्रन्थ में इन नव रत्नों की चर्चा प्राप्त होती है ।
ये हैं –
धन्वन्तरि-क्षपणकामरसिंह-शङ्कुवैतालभट्ट-घटकर्परकालिदासाः ।
ख्याती वराहमिहिरो नृपतेः सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ।।
अर्थात् ऋषि धन्वंतरि क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेताल भट्ट, घटखर्पर, कालिदास सुविख्यात वराहमिहिर तथा वररुचि विक्रम के नवरत्न थे। धन तेरस वास्तव में ऋषि धनवंतरि जी की जयन्ती है। ऋषि धनवंतरि भारत के एक महान् वैद्य थे। इस आलोक में ऋषि धन्वंतरि का जन्म प्रामाणिक रूप से देखा जाना चाहिए।
मान्यता हैं कि भव्य एवं दिव्य रूप वाले भगवान धन्वंतरि को पहली बार देखकर देवता और दानव दोनों आश्चर्य-चकित हुए थे। धन्वंतरि का जो काल्पनिक चित्र देखने को मिलता है उसमें उनके लम्बे हाथ ,वे कानों में मगरमच्छ जैसी आकृति वाले कुंडल , गले में अनेक प्रकार के रत्नाभूषणों एवं विभिन्न जड़ी-बूटियों से गुंठित वनमाला तथा शरीर पर पीताम्बर धारण करने वाले चिर युवा प्रतीत होते है ।इसमें श्रद्धावश ऋषि के व्यक्तित्व को बढ़ा -चढ़ा के प्रस्तुत किया है।
धन तेरस पर्व विश्लेषण: दिवाली से दो दिन पहले यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाने वाला अत्यंत लोकप्रिय त्योहार ‘धनतेरस’ धन-धान्य ही नहीं, बल्कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य जगत की भी विरासत का प्रतीक है। क्योकि –
१. धन्वंतरि वैद्य को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब केवल धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरि जी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया।
२. धन्वंतरि आदि आयुर्वेदाचार्यों अनुसार 100 प्रकार की मृत्यु होती है। उनमें एक ही काल मृत्यु है, शेष अकाल मृत्यु रोकने के प्रयास ही आयुर्वेद निदान और चिकित्सा हैं। आयु के न्यूनाधिक्य की एक-एक माप धन्वंतरि ने बताई है। आज भी आयुर्वेद में १०० प्रकार की मृत्यु को स्वीकार किया गया है।
३. समुन्द्र मंथन द्वारा अमृत की खोज कथा की वास्तविकता : धन्वंतरि के विषय में जो कथा समुन्द्र मंथन की सुनाई जाती है उसमे अलंकारिक भाषा का प्रयोग हुआ है जिसमे एक अत्यंत गूढ़ सन्देश छिपा है। हमारा मस्तिष्क एक समुन्द्र है जिसमे असंख्य विद्याएँ छिपी हुई है जिसके सदुपयोग यानि विचार मंथन द्वारा भूमि एवं समुन्द्र व आकाश में विद्यमान प्रकृति में छिपी औषधिय की अनुपम खोज करके प्राणी मात्र के उत्थान के महान कार्य धन्वंतरि ने किया। धन्वंतरि की लोक कथा में समुन्द्र मंथन का यही अर्थ है कि धन्वन्तरि द्वारा की गई खोज का कार्य बहुत जटिल और असंभव यानि समुन्द्र मंथन जैसा था यानि कि ऐसा शोध जैसे दही का परिश्रम द्वारा मंथन करके माखन निकाला जाता है इसी तर्ज पर ऐसी वनस्पतियों की खोज करना जिसका उपयोग प्राणिमात्र के लिए अमृत तुल्य हो। इससे पूर्व वनस्पति के विषय में किसी को इतना प्राकृतिक ज्ञान नहीं था।
धन्वंतरि ने औषधीय वनस्पतियों के ज्ञाता होने के कारण यह बताया कि समस्त वनस्पतियाँ औषधि के समान हैं उनके गुणों को जानकर उनका सेवन करना व्यक्ति के शरीर के अंदर निरोगता लाएगा जो मनुष्यों के दीर्घ आयु के लिए आवश्यक है, इसीलिए समुद्र मंथन द्वारा अमृत प्राप्ति कहा गया।
4. ये जो कहा जाता है कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान करने के बाद भगवान शिव को भगवान धन्वंतरि ने ही अमृत प्रदान किया था, जिसकी कुछ बूंदें छलक कर काशी नगरी में भी गिर गयी थीं। इसीलिए माना जाता है कि काशी कभी नहीं नष्ट होने वाली कालजयी नगरी बन गयी। यह भी अलंकारिक भाषा है। जब कोई वैद्य किसी औषधि की खोज करता है तो उसको स्वयं भी एक कठिन परीक्षा से गुजरना होता है, जिसको विष पान की संज्ञा दी गयी है और काशी क्योकि धन्वंतरि का कार्य क्षेत्र था इसीलिए वनस्पति चिकित्सा में काशी हमेशा से अग्रणी रहा है।
5. धन्वंतरि से आयुर्वेद का ज्ञान पाकर अनेको ऋषि-मुनियों ने सभी पृथ्वी वासियों के रोग-निवारणार्थ उपचार की अनेक चिकित्सकीय पद्धतियां भी विकसित कीं। यही वह कालखंड था, जब महान वैद्य एवं चिकित्सा- विज्ञानी वाग्भट्ट जी ने भी काशीराज यानी भगवान धन्वंतरि से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया। बाद में उन्होंने ‘आष्टांग हृदय’ नामक ग्रंथ की रचना की, जो आयुर्वेद का एक मानक ग्रंथ है। आयुर्वेद के इन तमाम ग्रंथों में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों एवं वृक्षों इत्यादि की चिकित्सकीय पद्धतियों का भी वर्णन है। उल्लेखनीय है कि काशी के राजा दिवोदास ने काशी में विश्व का पहला शल्य चिकित्सा विद्यालय स्थापित किया और आचार्य सुश्रुत को इसका प्रधानाचार्य नियुक्त किया था। इस प्रकार भगवान धन्वंतरि के माध्यम से ब्रह्मा जी द्वारा प्रदत्त आयुर्वेद के अद्भुत एवं अत्यंत महत्वपूर्ण ज्ञान का पृथ्वी पर प्रचार-प्रसार हुआ।
6. धन्वंतरि को आयुर्वेद का जन्मदाता और देवताओं का चिकित्सक , भगवान विष्णु का अवतार बताने में भी अलंकारिक भाषा का प्रयोग हुआ है। उनको विष्णु की संज्ञा देने का अभिप्राय यह है कि चिकित्सक रोगी को जो मृत्यु शय्या पर है उसको अपनी चिकित्सा द्वारा पुनः जीवन देता है।
ये स्पष्ट है कि धनतेरस का पर्व आयुर्वेद के जनक ऋषि धन्वन्तरि की जन्म तिथि के उपलक्ष्य में उनको सम्मान देने के लिए मनाया जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इससे स्पष्ट होता है कि यह पर्व ऋषि धन्वन्तरि के जन्म से पूर्व नहीं मनाया जाता था, और इस पर्व की शुरुआत ऋषि धन्वन्तरि के जन्म के बाद शुरू हुई।

पर्व का वास्तविक एवं विकृत रूप: –

यह स्पष्ट है कि धन्वंतरि त्रयोदशी से बिगड़ कर यह शब्द ‘धनतेरस हो गया और हम रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाकर इसे ‘धन‘तेरस के रूप में मानने लगे।इस दिन धन्वंतरि की काल्पनिक मूर्ति की पूजा की जाती है और बाजार से धातु के बर्तन और सोना, चांदी आदि के बर्तन, मूर्तियां आदि खरीदने की परम्परा प्रचलित हो गयी कि धनतेरस को घर में धन के रूप में बर्तन ,सोना आदि आना चाहिए।

ऋषि धनवंतर‍ि ने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे और बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया और धनवंतर‍ि ने कई ग्रंथ ल‍िखे, उनमें से ही एक है धनवंतरि संह‍िता जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने ऋषि धनवंतरि से ही इस च‍िक‍ित्‍साशास्त्र का ज्ञान प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। ऋषि कहते है आयुर्वेद का पालन करो तो तुम्हारे जीवन मे ऐश्वर्य आएगा ।हमने उल्टा अर्थ लेकर खरीदारी शुरू कर दी। आयुर्वेद ने स्वस्थ शरीर को ही धन माना है।
पहला सुख निरोगी काया
और दूजा सुख घर में हो माया’ यानि की धन लक्ष्मी को दूसरा दर्जा दिया गया है।
एक वेद मंत्र है जिसमें ईश्वर से १०० वर्ष तक स्वस्थ्य रहने की प्रार्थना की गयी हैः
तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् ।
पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं श्रुणुयाम शरदः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्।।
भाव कुछ ये है कि हे सूर्यदेव! हम सौ शरदों (वर्षों) तक देखें, हमारी नेत्रज्योति तीव्र बनी रहे (पश्येम शरदः शतम्) हमारा जीवन सौ वर्षों तक चलता रहे (जीवेम शरदः शतम्) सौ वर्षों तक हम सुन सकें, हमारी कर्णेन्द्रियां स्वस्थ रहें (श्रुणुयाम शरदः शतम्) हम सौ वर्षों तक बोलने में समर्थ रहें, हमारी वागेन्द्रिय स्पष्ट वचन निकाल सकें (प्रब्रवाम शरदः शतम्) हम सौ वर्षों तक दीन अवस्था से बचे रहें, दूसरों पर निर्भर न होना पड़े, हमारी सभी इंन्द्रियां-कर्मेन्द्रियां तथा ज्ञानेन्द्रियां, दोनों शिथिल न होने पावें (अदीनाः स्याम शरदः शतम्) ओर यह सब सौ वर्षों बाद भी होवे, हम सौ वर्ष ही नहीं उसके आगे भी निरोग रहते हुए जीवन धारण कर सकें।
(भूयः च शरदः शतात)।
(शरद् का अर्थ है शरद् ऋतुय एक शरद् एक वर्ष का पर्याय है।)
आयुर्वेद के अनुसार, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ शरीर और दीर्घायु से ही हो सकती है।और संसार में शल्य तंत्र को पुर्णतः विकसित किया। आज संसार में शल्य तंत्र (सर्जरी) आयुर्वेद की देन है।

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