वैदिक सम्पत्ति गतांक से आगे…

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इसीलिए वेद में विविध प्रकार के कारीगरों को मानपान देने की आज्ञा इस प्रकार दी गई है-

नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः कुलालेभ्यः कमरेभ्यश्च वो नमो ।
नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः ।। (यजु० 16/27)

अर्थात् तक्षा, रथकार, कुलाल, बढ़ई, निषाद और अन्य छोटे बड़े कारीगरों का सत्कार हो । कारीगरों की इस प्रतिष्ठा से प्रतीत होता है कि भोजन, वस्त्र, गृह और गृहस्थी से सम्बन्ध रखनेवाले सभी पदार्थ तैयार कराने का वेदों में आदेश है। कपड़ा बनाने के लिए वेद उपदेश देते हैं कि-

सीसेन तन्त्र मनसा मनीषिण ऊर्जासूत्रेण कवयो वयन्ति ।
अश्विना यज्ञ सविता सरस्वतीन्द्रस्य रूपं वरुणो भिषज्यन् ।। (यजु० 19/80)

अर्थात सीसा के यन्त्र से मननशील विद्वान् ऊन को उसी तरह बुनते हैं, जिस तरह दोनों बिजलियों को बरसात मे वरुणदेव ओत-प्रोत करते हैं। इसके आगे कवच सीने का उपदेश इस प्रकार है-

व्रजं कृणुध्वं स हि वो नृपाणो वर्म सोव्यध्वं बहुला पृथूनि.।
पुरः कृणुध्वमापीरघुष्टा मा वःसुस्त्रोच्चमसो द्दहता तम् ॥ (ऋ०10/101/8)

अर्थात हे राजन् ! बड़े बड़े गाँवों के व्रज कायम करो, मोटे मोटे चमड़े के वर्म सिलवायो और लोहे के किले बनवाओ, जिससे तुम्हारा हवन का चमचा न टपके राज्य नष्ट न हो जाय। यहाँ सीने का प्रयोग पाया जाता है, इसके अतिरिक्त नाव और विमान बनाने का उपदेश इस प्रकार है-

वेदा यो वीना पतताम् ।
वेद नावःसमुद्रियः ।। (ऋ० 1/25/7)

अर्थात् जी पक्षी बादल आदि ‘वि’ के स्थान को और अन्तरिक्ष में उनके चलने की गति को जानता है, वह आकाश के विमान और समुद्र की नाव को जानता है। क्योंकि पक्षी जिस नियम से उड़ते हैं, उसी नियम से विमान और नौका भी चलाई जाती है। इसीलिए वि=पक्षी और मान = सद्दश अर्थात पक्षी के सद्दश ही को विमान कहते हैं। इसके अतिरिक्त वेदों में हल, रथ, गाड़ी, धनुष बाण, यज्ञपात्र और गृहनिर्माण सम्बन्धी ग्रस्त्र, शस्त्र, वस्त्र और औषधि आदि बनाने के समस्त औजारों का विस्तृत उपदेश है, इसलिए वेदों में कलाकौशल का पर्याप्त ज्ञान पाया जाता है। परन्तु बिना गणित के व्यापार का काम नहीं चल सकता, इसलिए देखते हैं कि वेदों में गणित और रेखागणित का कैसा वर्णन है।

यजुर्वेद अध्याय 15 के मन्त्र 4 और 5 में अनेक प्रकार के छन्दों का वर्णन करते हुए ‘अक्षरपंत्तिश्छन्द ‘ और ‘अङ्काङ्क छन्द:’ का स्पष्ट उल्लेख है। इसमें अक्षर और अङ्क अलग अलग कहे गये हैं। इससे पाया जाता है। कि वेदों में अंक विद्या है । अथर्ववेद में दश तक अङ्कों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि

य एवं देवमेकवृतं वेद ।। ( अथर्व०13/4/15)

न द्वितीयो न तृतीयश्चतुर्थो नाप्युच्यते ।
न पञ्चमो न षष्ठः सप्तमो नाप्युच्यते ।
नाष्टमोन नवम दशमो नाप्युच्यते । (अथर्व० 13,4,16 – 18)
इन्हीं नौ अकों की दहाई बनाने का वैज्ञानिक क्रम अथर्ववेद काण्ड 5 सूक्त 15 के कई मों में विस्तारपूर्वक इस प्रकार बतलाया गया है कि-

एका च मे दश च मे द्वे च मे विशतिश्व मे०, तिस्त्रश्र्व
मे त्रिशसच मे०, चतस्त्रश्र्व मे चत्वारिंशच्च मे०, पञ्च च मे
पञ्चाशञ्च मे०, षट् च मे षष्टिश्व मे०, सप्त च मे० सप्ततिश्व मे०,
अष्ट च मेऽशीतिश्र्व मे०, नव च मे नवतिश्र्व मे०, दश च मे
शतं च मे०, शतं च मे सहस्त्रं च मे०। (अथर्व० 5/15/1-11)

इस मन्त्र के द्वारा यह ज्ञात हुआ कि वेदों के आदेशानुसार एक से लेकर नौ तक अङ्कों से ही दस बीस, तीस, चालीस, पचास और नब्बे आदि दहाइयां बनाई गई हैं। दहाइयों के लिए कोई नवीन संज्ञा मुकर्रर नहीं की गई। यही नहीं बल्कि जिस संकेत से दो का बीस तीन का तीस और नौ का नब्बे बनता है, उसी से दश का सौ और सौ का हजार भी बनता है। क्योंकि उपर्युक्त मन्त्र में ‘दश च मे शतं च मे शतं च मे सहल चमे’ स्पष्ट कहा गया है। इस दहाई का क्रम बतानेवाला नीचे दिया हुआ यजुर्वेद का मंत्र बड़ा ही स्पष्ट है-
इमा में अग्न इष्टका धनेवः सन्त्वेका च दश च दश च शतं च,
शतं च सहस्रं च सहस्रं चायुतं चायुतं च नियुतं च नियुतं च प्रयुतं।
चाबुदं च न्यर्बुद्धं च समुद्रश्र्व मध्यं चान्तश्र्व परार्द्धश्रवैता मे
अग्न इष्टका धेनवःसन्त्यमुत्रामुपष्मिंल़्लोके (यजु०17/2 )

इस मन्त्र में दहाई का चिन्ह बढ़ाते हुए परार्द्ध तक की संख्या बतलाई गई है। संसार में इससे बड़ी संख्या का पता अवतक नहीं लगा। इससे स्पष्ट ही कहा गया कि एक का दश, दश का सौ सौ का हजार हो जाता है और इसी तरह दहाई बढ़ाते हुए परार्द्ध तक हो जाता है।
इन नौ तक अंकों, बीस, तीस, चालीस तथा नब्बे तक की दहाइयों पर दश, सौ हजार परार्द्ध तक की संख्याओं के संकेतों का वर्णन करके अब आगे दहाइयों और बड़ों के संयोगों से जो संख्यायें बनती हैं, उनका नमूना दिखलाते हैं ।
क्रमशः

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