आओ जिंदगी जिएं मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तरह

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वर्ष 2023 की दीपावली का सनातन धर्म के लिए विशेष महत्व है, क्योंकि इस वर्ष मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम की जन्म भूमि अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण होने जा रहा है। वैसे तो दीपों का त्यौहार समूचे विश्व में मनाया जाता है। मान्यता है यह जगमग दीप ज्योति का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।
विभिन्न भाषाओं में लिखी ‘रामायण’ में रावण को विद्वान और शिव भक्त बताया है। लेकिन सनातनी ऐसा मानते हैं कि ‘रावण’ बुराई का प्रतीक है। क्योंकि उसने छल और कपट का सहारा लेकर सीता जी का हरण किया था और राम- रावण युद्ध हुआ था । मान्यता है कि दीपावली के दिन श्री राम रावण का वध कर अयोध्या वापस लौटे थे। उसी समय वनवास की अवधि भी खत्म हो गई थी। राजा राम के आने की खुशी में अयोध्यावासियों ने घर घर दीप जलाकर अपने आराध्य का स्वागत किया था। तभी से यह दीपों का मनाया जाता है।
रावण में बहुत सारी बुराइयां थी। वह अहंकार से भरा हुआ था। वह अपने से छोटों को कभी भी बराबरी का दर्जा देना नहीं चाहता था। उसके मन में सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास जैसे मानवीय गुण नहीं थे। प्रजा को खुशहाल देखने की अभिलाषा नहीं थी। वह भोजन भी गरिष्ठ करता था और बहुत ज्यादा समय निंद्रा में खोया रहता था। छल और कपट उसकी प्रवृर्ती थी और आसपास के राज्य को हड़पने की नीति रहता था। शायद यही वजह रही होगी कि सगे भाई विभीषण ने असत्य का साथ छोड़ श्री राम की शरण में आना पड़ा था।
अब सोचना होगा कि रावण दहन करने से क्या हमारे अंदर का अहंकार खत्म हो जाता है ? क्या हमारे अंदर हमारी मां बहनों के प्रति श्रद्धा और भक्ति जागृत होती है ? क्या हम अपने से उम्र में छोटे लोगों को बराबरी का दर्जा देते हैं ? क्या हमारे व्यक्तिगत जीवन में मेषज भोजन और सादा विचार है ? क्या हमारे अंतर्मन में हड़प नीति का अंकुर नहीं छिपा है ? क्या हम अपने आस-पड़ोस के लोगों को सुकून से जिंदगी जीने दे रहे हैं ? क्या हम अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल बनाने के लिए जितने श्रम और धर्म की जरूरत है उतना कर रहे हैं ?
अनुभव बताता है कि वास्तव में इंसान की निजी जिंदगी में वह नहीं हो रहा है जो होना चाहिए। हमें हमारे अंदर के रावण का विनाश कर अपने विचारों में भगवान श्री राम की तरह व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक जीवन में पवित्रता लानी होगी। परिवार के साथ ही साथ राष्ट्र का भविष्य उज्जवल हो ऐसी करनी करनी होगी। इंसान को इंसान की इज्जत करना सिखना होगा। राजनीति में भी प्रदूषण फैल रहा है। इस प्रदूषण को भी कम करने का विचार करना होगा। राजनीति करने वाले लोगों में राक्षस प्रवृत्ति पनपती जा रही है। बागर ही उठ कर खेत चरने लगी है।
देश के अंदर ऐसी ताकतें पनप रही है जो समाज और राष्ट्र को हानि पहुंचाने का काम कर रही है। ये ताकतें हमारे आस पास गली-मोहल्लों में ही है। इसलिए हमें भगवान श्री राम की तरह जीवन जीने की कला सीखना होगा। उनके आदर्श को अपने दैनिक जीवन में अभ्यास में लाने की जरूरत है। यदि आज के ऊहापोह वातावरण में जी रहे लोग, जिनकी धर्म में आस्था है और वे ऐसा मानते हैं कि राजा राम का व्यक्तिगत व कृतित्व आज की पीढ़ी को सही दिशा दिखाने में समर्थ है तो समाज और राष्ट्र हित में हमारे परिवार में राजा राम के आदर्श को स्थापित करने की चेष्टा करनी होगी। इसकी एवज में नयी पीढ़ी हमें दुआएं देगी।
सर्व ग्राही है कि अयोध्या के राजा राम अच्छाई के प्रतीक है। श्री राम ने सबसे पहले परिवार के समक्ष आदर्श प्रस्तुत किया है कि भाई -भाई को कैसा रहना चाहिए। माता -पिता की आज्ञा का पालन किस हद तक करना चाहिए। प्रजा का ध्यान किस प्रकार रखना चाहिए। सब तपके के लोगों को साथ लेकर, सबके लिए लाभकारी विकास की योजना बना कर , सबका विश्वास जीत कर राज्य का शासन चलाना चाहिए। ऐसी सर्वमान्य युक्तियां श्री रामजी ने सिखाई है। इस संदर्भ में स्वामी विवेकानंद के श्री राम के बारे में विचार इस प्रकार है –
“आदर्श सामने होने पर मनुष्य की शिक्षा में अत्यंत सुविधा होती है। श्री राम को सदादर्शों का खजाना कहा जाए तो भी अतियुक्ति न होगी। उनके चरित्र से मनुष्य सब तरह की सह शिक्षा प्राप्त कर सकता है। मनुष्यों की सत् शिक्षा के लिए जितना गुरुपद का कार्य श्री राम -चरित्र कर सकता है उतना अन्य किसी का चरित्र नहीं कर सकता । श्री राम का ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ नाम इसी कारण से पड़ा है।” अतः राम चरित्र जग -मंगल करणी है।
रामचरित्र मानस में सीता का वर्णन अद्भुत एवं अप्रतिम नारी के रूप में हुआ है। हमारी माता -बहनों को भी सीता जी के ‘नारी जीवन’ पर गहन मंथन करना चाहिए। आज बहुत कम नारी ऐसी है जो सीता जी की तरह भयानक संकट में अपने पति का साथ देती है ? बहुत कम है ऐसी नारी हैं जो पति की लोग लाज के लिए मान मर्यादा को दहलीज के बाहर नहीं जाने देती हैं ? ऐसी बहुत कम नारी हैं जो लव- कुश जैसे परमवीर पुत्रों को जन्म देकर भगवान राम की मर्यादा में चार चांद लगा देती है ?
भगवान राम की माताएं , पिता राजा दशरथ, पत्नी सीता, बड़े भाई भरत और लक्ष्मण – ये सब एक आदर्श जीवन जीने की कला सिखाते हैं। इसीलिए रघुवंश को एक आदर्श परिवार माना गया है। राजा राम का एक एक चरित्र संपूर्ण मानवता के लिए शांति दूत बनकर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक जीवन जीने का तौर तरीका सिखाता है। यथा –
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।
श्री राम के राज्य में प्रजा अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुसार वेदों में बताए गए मार्ग पर चलते थे। यही कारण था कि सबकी जीवन शैली- ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ पर आधारित थी। इस कारण सुख प्राप्त करते थे। भय,शोक, रोग, दैहिक , दैविक और भौतिक आदि सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होकर जीवन जीने का आनंद लेते थे। प्रजा में राग – द्वेष, काम -क्रोध, मोह- लोभ, झूठ- कपट, प्रमाद- आलस्य आदि दुर्गुण दूर रहते थे। श्री राम के राज्य में सब लोग परस्पर प्रेम करते थे और अपने-अपने धर्म -कर्म का पालन करते थे। धर्म के चारों चरणों – सत्य, शौच,दया और दान से राज्य परिपूर्ण होता था। राम के शासनकाल में प्रजा स्वप्न में भी पाप करने का नहीं सोचतीं थी। सभी स्त्री- पुरुष अपने राजा राम के अनन्य भक्त थे और इस कारण मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी थे। इतना ही नहीं, श्री राम के राज्य में प्रजा के अतिरिक्त पशु -पक्षी, भूमि, वृक्ष और देवी देवता कृपा बरसाते थे। यथा –
राम राज बैठे त्रैलोका।
हर्षित भए गेल सब सोका।।
बयरू न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई।।
श्री राम की माता, पिता, भाई, प्रजा और गुरु भक्ति अतुल्य है। बिना किसी हिचकिचाहट के वन जाने का निर्णय लेकर उन्होंने माता कैकेई और पिता दशरथ की आज्ञा का पालन किया और माता कौशल्या को समझा बुझाकर उन्हें भी दुखी नहीं किया। भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता जब उनके साथ वन को चलने के लिए हठ करने लगे तो श्री राम ने उन्हें भी दुःखी नहीं किया। भरत ने राज्य सिंहासन पर बैठने से आनाकानी की तो राम ने उन्हें बड़े जतन से समझाया और वे राजी हो गए। गुरु के प्रति श्रद्धा और सेवा करने में प्रसन्नता का आनंद लेने का भाव यदि किसी शिष्य को सीखना है तो उसे भगवान श्री राम की गुरु भक्ति से सीखी जा सकती है। प्रजा के प्रति सेवा भाव जग जाहिर है।
आजकल यह चर्चा जोरों पर है कि यदि रामराज आ जाएगा तो इस देश में रह रहे शूद्रों और अन्य धर्मावलंबियों का क्या होगा ? विनम्रता पूर्वक ऐसे प्रश्नों के संदर्भ में कहा जा सकता है कि भगवान श्री राम ने वनवास के समय किसी भी उच्च कुलीन के राजा- महाराजा की मदद नहीं ली। कबन्द को सद्गति देकर श्री राम माता शबरी के आश्रम गए और उनके झूठे कंद,मूल और फल खाए और भाव विभोर होकर कहा -‘मां शबरी मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूं । जाति- पांति, कुल- धर्म, बल , कुटुंब गुण और चतुररता इन सब के होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है जैसे जल ही बदल दिखाई देता है। यह भगवान श्री राम की समरसता तथा बिना भेदभाव के साथ नवधा भक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा नारी के प्रति सच्ची श्रद्धा भक्ति प्रकट करता है । इतना ही नहीं, रघुवंशी भरत को जब यह पता चला कि निषाद राज श्री राम के मित्र हैं। सुनते ही उन्होंने अपना रथ त्याग कर निषाद राज के पास पैदल ही गये। निषादराज ने अपना गांव, जाति और नाम सुनाकर धरती पर माथा टेक कर सत्कार किया । तब भारत जी ने उठाकर अपनी छाती से लगा लिया । यथा – “राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरी उमगत अनुराग ।।
श्री राम के हृदय में ऊंच- नीच, गरीब- अमीर एवं पुरुष- नारी में भेद रखने की भावना लेशमात्र नहीं थी। तभी तो वनवास के दौरान वनराज जामवंत और सुग्रीव के मेहमान रहे। चाहते तो अपने और अपने भाई भरत एवं लक्ष्मण के ससुर की मदद ले सकते थे। इसीलिए भगवान राम जगदीश्वर और रामेश्वर है।
यह राम का ही जीवन चरित्र है की पूरे वनवास के दौरान और युद्ध के समय पशु पक्षी यथा -श्री काकभुशुण्डि और गरुड़ जी ने भी उनकी मदद की। राम एवं रावण युद्ध के समय वनमानुष हनुमान,जाम्बवान,नील,नल और अंगद आदि ने योद्धाओं के रूप में सहायता की और युद्ध जीतने में राम की मदद की थी। उसे समय के वनवासियों द्वारा राम को तन मन धन से मदद करना यह दर्शाता है कि राम राज्य में किसी का अनर्थ नहीं होगा।
भारत और विश्व के लिए यही मंथन का समय है कि हम कैसे राम की तरह जिंदगी जिएं और राम की तरह परिवार और राष्ट्र का विकास करें। सुंदर भवन का निर्माण बाहर से होता है। जिसमें ईंट ,पत्थर, सीमेंट आदि लगाए जाते हैं, लेकिन समाज और राष्ट्र का निर्माण संस्कार से होता है। संस्कार के उपयोग से ही चेतन आती है । चिन्तनशील व्यक्ति भीतर की सामग्री का उपयोग अपने आप समरसता भाव जगाने में कर लेता है। इसलिए कहा भी गया है कि मानव जीवन दुर्लभ है । वह व्यक्ति जो चेतन मन की परत खोल कर समाज और राष्ट्र को जाग सके, उसका जीवन सफल है।
हो सके तो ऐ सखे। राम की तरह जियो।।
जितना भी जियो। मर्यादापूर्वक जियो।।

डॉ बालाराम परमार ‘हॅंसमुख’

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