भगवान बुद्घ और अंगुली माल

जो कामनाओं से भरे होते हैं, प्रभु उन्हें धन, स्त्री, पुत्र और पद-नाम के खिलौने देकर अपने से दूर रखते हैं। यदि तुम दानशील हो और दूसरों की पीड़ा को तुम अपनी पीड़ा समझते हो तो धन तुम्हारे लिए वरदान सिद्घ हो सकता है। यदि तुम उस का उपयोग ज्यादा भोग भोगने में ही करते हो और गरीब तुम्हें कीडे-मकोडे और अधिक धन संग्रह का साधनामात्र दिखते हैं तो तुम इस से अपना और सत्यानाशा ही करोगे।

साईं इतना दीजिये जा में कुटुम्ब समाय।

मैं भी भूखा न रहूं और साधु न भूखा जाए।। (कबीर)

सत्संग में शब्दों के अतिरिक्त वक्ता और उसके हाव-भावों का भी अपना एक प्रभाव होता है।

सत्संग-भवन में हाथ मुख और पैरों को धोने और अच्छी तरह से पौंछने के नियम का भी कडाई से पालन किया जाता था। सत्संग के समय के अतिरिक्त किसी भी स्त्री को बिना किसी को साथ लिये आश्रम में आने की इजाजत नहंी थी। यदि उसे कुछ विशेष पूछना होता था तो उसे अपने पति, पिता व भाई को साथ लाना जरूरी था।

वहां हर समय सफाई व्यवस्था और गहन शांति रहती थी। मैंने अभी तक ऐसा कोई व्यक्ति नहंी देखा है कि जो खाने पीने के संबंध में इतना नियमनिष्ठ और पता तुला हो। भगवान बुद्घ के विषय में यह कहा जाता है कि वे प्रतिदिन सैर को जाते हुए निश्चित संख्या में ही पैर उठाते थे, उतनी ही संख्या में अपने हाथ हिलाते थे। एक ही करवट सोते थे और एक निश्चित समय तक ही बिस्तर पर सोते थे। वह भोजन निश्चित समय पर और एक मान में न अधिक  और न कम लेते थे।

एक बार आनंद ने उन की कुटिया में सोने की आज्ञा मांगी, जिस में भगवान बुद्घ सोते थे। वह सोने के लिए लेट गया किंतु वास्तव में वह सोया नहंी रात भर बुद्घ को देखता रहा। उसने देखा कि वे अपनी बांयी करवट दायें बाजू को कोहनी पर रख कर सो गये। ठीक छह घंटे बाद वे उठे और शौचादि के लिए गये। स्नानादि के बाद वे ध्यान के लिए बैठे। रात को न तो उन्होंने करवट बदली और न खर्राटे ही भरे।

अगली रात आनंद ने फिर उन्हें इसी प्रकार देखा। सब कुछ वैसे ही घटित हुआ। आनंद उन की सब क्रियाओं में नियमितता और एकरूपता देखकर चकित रह गया और उसने भगवान बुद्घ से पूंछा-भगवान दूसरी चीज की नियमितता के बारे में तो बहुत कुछ समझा जा सकता है, परंतु नींद में इतनी नियमितता कैसे संभव है? आप करवट नहीं बदलते हैं और ठीक निश्चित समय पर उठ बैठते हैं, यह कैसे?

भगवन बुद्घ मुस्कराये और बोले-आनंद, भला शरीर अपने आप कैसे हिल सकता है जब तक कि मैं इसे हिलने की इजाजत न दें? एक गद्दे की ओर संकेत करते हुए वे बोले-क्या यह गद्दा यहां से वहां अपने आप जा सकता है? जब तक कि इसे कोई हटाये नहीं, यह जहां का तहां पड़ा रहेगा, अत: यह बहुत ही स्पष्ट है, मैं शरीर को हिलाता नहीं हूं, अत: यह जहां का तहां पडा रहता है।

सोने से पूर्व मैं शरीर में यह संकल्प डाल देता हूं कि इसे ठीक छह घंटे बाद उठ जाना है। अत: यह निश्चित समय पर उठ जाता है। इस में आश्चर्य क्याा है। अंगुलीमाल एक कुख्यात हत्यारा दुष्टï डाकू था। एक दिन बुद्घ को उधर से जाना था। बहुतों के रोकने पर भी वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहे। जैसे ही वे उस जंगल से गुजरने लगे। उन पर अंगुलीमाल से आमना सामना हुआ। वह उन्हें देखकर अपने कुल्हाड़े की धार तेज करने लगा और चिल्लाया- क्या तुम्हें किसी ने बताया नहंी है कि मैं अब तक 888 व्यक्तियों को मौत के घाट उतार चुका हूं?

भगवन बुद्घ ने उसे रूक जाने का संकेत किया और जिस पीपल के नीचे वह उन्हें मारने से पहले खड़ा था, उसके दो तीन पत्ते तोडऩे को कहा। अंगुलीमाल ने कुछ पत्ते तोड़े और वह बुद्घ के समीप आ गया। क्या तुम पहले की तरह इन पत्तों को पुन: वृक्ष परलगा सकते हो? बुद्घ ने पूंछा अंगुलीमाल जोर से हंसा और बोला-अब मैं जान गया हूं कि तुम इस जंगल में क्यों आए हो? तुम पागल हो, क्या तुम यह नहीं जानते कि एक बार तोडऩे पर पत्ते दुबारा वृक्ष पर नहीं लगाये जा सकते? बुद्घ हल्के से मुस्कराये और बोले- यदि पत्ते एक बार तोड़े जाने पर पुन: वृक्ष पर नहीं लगाये जा सकते तो तुम मनुष्यों को मारने में क्यों लगे हुए हो जबकि तुम्हारे लिये किसी को एक क्षण के भी जीवन दान दे पाना संभव नहीं, और आश्चर्य, अंगुलीमाल ने कुल्हाड़ा फेंक दिया और उनके चरणों में गिर पड़ा। कुछ भिक्षु जो कुछ दूरी पर छिपकर यह सब कुछ देख रहे थे, चकित रह गये। बुद्घ ने उसे कंधों से पकड़ कर ऊपर उठाया और बोले-उठो, प्रिय उठो तुम एकाएक छलांग भरकर लक्ष्य के अभिमुख हो गये हो। कुछ दिनों बाद अंगुलीमाल नगर में भिक्षा मांगने गया तो लोगों ने उसे पहचान लिया। वे उसे पत्थर मारने लगे किंतु वह संतुलित बना रहा अैर अंतत: लहूलुहान और अध्मरा हुआ जमीन पर गिर पड़ा। बुद्घ भी उधर को सहसा भिक्षार्थ आए। अंगुलीमाल की दशा देखकर उसके निकट गये। वह नीचे बैठ गये और उसका सिर गोदी में रखकर बोले-अंगुलीमाल, तुम कैसे हो? क्या तुम अत्यंत भाग्यवान नहीं हो? इन सब लोगों ने अपने इस कर्म द्वारा अपना अपना ऋण चुका लिया है। अब तुम एक स्वतंत्र पक्षी हो। तुम्हारे लिए निर्वाण का द्वारा खुल गया है।

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