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द्वितीय चरण में विस्तार होता है। छोटा चर्च अब एक बड़ा बन जाता है। उसका विस्तार हो जाता है। अब वह छुप-छुप कर नहीं अपितु आत्म विश्वास से अपनी उपस्थिती दर्ज करवाता है।
1. स्थानीय सभा के स्वरुप में परिवर्तन- अब वह हर रविवार को आम सभा में लाउड स्पीकर लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। अनेक लोग सालाना ईसाई बनने लगते है। अब उसके पादरी ईसाई मत की क्यों श्रेष्ठ है और पगान स्थानीय देवी देवता क्यों असफल हैं। ऐसी बातें चर्च की दीवारों के भीतर खुलेआम बिना रूकावट के बोलने लगते है। न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। अपितु वह धीरे धीरे आक्रामक भी होने लगते है। कुछ अंतराल में बड़ी बड़ी चंगाई सभाओं का आयोजन चर्च करता है। पूरे शहर में पोस्टर लगाए जाते है। स्थानीय टीवी पर उसका विज्ञापन दिया जाता है। दूर दूर से ईसाईयों को बुलाया जाता है। विदेशी मिशनरी भी अनेक बार अपनी गोरी चमड़ी का प्रभाव दिखाने के लिए आते है।
2. चर्च के साथ मिशनरी स्कूल//कॉलेज का खुलना- अब चर्च के साथ ईसाई मिशनरी स्कूल खुल जाता है। उस स्कूल में हिन्दुओं के बच्चे मोटी मोटी फीस देकर अंग्रेज बनने आते हैं। उन बच्चों को रोज अंग्रेजी में बाइबिल की प्रार्थना करवाई जाती है। ईसा मसीह के चमत्कार की कहानियां सुनाई जाती हैं। देश में ईसाई समाज की गतिविधियों के लिए दान कहकर धन एकत्र किया जाता है। जो हिन्दू बच्चा सबसे अधिक धन अपने माँ-बाप से खोस कर लाता है। उसे प्रेरित किया जाता है। जो नहीं लाता उसे नजरअंदाज अथवा तिरस्कृत किया जाता हैं। कुल मिलाकर इन ईसाई कान्वेंट स्कूल से निकले बच्चे या तो नास्तिक अथवा ईसाई अथवा हिन्दू धर्म की मान्यताओं से घृणा करने वाले अवश्य बन जाते हैं। इसे आप का जूता आप ही के सर बोले तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
3. बिज़नेस मॉडल- चर्च अब धर्म परिवर्तित हिन्दुओं को अपने यहाँ रोजगार देने लगता है। चर्च शिक्षा, स्वास्थ्य,अनाथालय, NGO आदि के नाम पर विभिन्न उपक्रम आरम्भ करता है। चपरासी, वाहन चालक से लेकर अध्यापक , नर्स से लेकर अस्पताल कर्मचारी, प्रचारक से लेकर पादरी की नौकरियों में उनकी नियुक्ति होती हैं। कुल मिलाकर यह एक बिज़नेस मॉडल के जैसा खेल होता हैं। धर्म परिवर्तित व्यक्ति को इस प्रकार से चर्च पर निर्भर कर दिया जाता है कि अब उसे न चाहते हुए भी चर्च की नौकरी करनी पड़ती हैं। अन्यथा वह भूखे मरेगा। जिससे धर्म परिवर्तित वापिस जाने का न सोचे। यह मॉडल विश्व में अनेक स्थानों पर आजमाया जा चूका हैं।
4. बाइबिल कॉलेज- चर्च अपने यहाँ पर धर्म परिवर्तित ईसाईयों के बच्चों को चर्च द्वारा स्थापित Theology अर्थात धार्मिक शिक्षा देने वाले विद्यालयों में भर्ती करवाने के लिए प्रेरित करता हैं। इस उद्देश्य दूसरी पीढ़ी को अपने पूर्वजों की जड़ों से पूरी प्रकार से अलग करना होता हैं। इन विद्यालयों में वे बच्चे पढ़ने जाते है जिनके माता-पिता में हिन्दू धर्म के संस्कार होते है। उनके बच्चें एक सच्चे ईसाई के समान सोचे और वर्ते। हिन्दू देवी-देवताओं और मान्यताओं पर कठोर प्रहार करे और ईसाई मत का सदा गुणगान करे। ऐसा उनकी मानसिक अवस्था को तैयार किया जाता है। इन Theology कॉलेजों से निकले बच्चे ईसाइयत का प्रचाररात-दिन करते हैं।
5. पारिवारिक कलह – ईसाई चर्च इस कला में माहिर है। जिस परिवार का कोई सदस्य ईसाई बन जाता है तथा अन्य सदस्य हिन्दू बने रहते है। वह घर झगड़ों का घर बन जाता हैं। शुरू में वह ईसाई सदस्य सभी सदस्यों को ईसाई बनने का दबाव बनता हैं। घर के कार्यों में सहयोग न करना। हिन्दू त्योहारों को बनाने का विरोध करना। हिन्दू देवी देवताओं की निंदा करना। अपनी क्षमता से अधिक दान चर्च को देना। अपनी पत्नी और बच्चों को ईसाई न बनने पर संसाधनों से वंचित करना। अपने माँ-बाप को ईसाई न बनने के विरोध में सुख सुविधा जैसे भोजन,कपड़े,चिकित्सा सुविधा आदि न देना। यह कुछ उदहारण है। अपना एक अनुभव साँझा कर रहा हूँ। बात 2003 की है। मैं कोयम्बटूर तमिल नाडु में MBBS का छात्र था। मेरे समक्ष एक परिवार जो ईसाईयों के पेंटाकोस्टल सम्प्रदाय से था। अपने मरीज का ईलाज करवाने आया। इस ईसाई सम्प्रदाय में दवा के स्थान पर रोगी का ईसा मसीह की प्रार्थना से चंगा होने को अधिक मान्यता दी जाती है। उस परिवार का मुखिया अन्य सदस्यों के न चाहते हुए भी अस्पताल से एक गंभीर रोगी की छुट्टी करवाकर चंगाई प्रार्थना करवाने के लिए चर्च ले गया। रोगी का क्या हुआ होगा सभी समझ सकते है। जो ईसाई यह लेख पढ़ रहे है। वे कृपया आत्मचिंतन करे क्या परिवारों को उजाड़ना यीशु मसीह का कार्य है?
इस दूसरे चरण में तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, पंजाब आदि राज्य आते है। इन राज्यों में सरकारें चर्च की गतिविधियों की अनदेखी करती है। क्यूंकि वह चर्च के कार्यों में फालतू हस्तक्षेप करने से बचती है। सरकार की नाक के नीचे यह सब होता है मगर वह कुम्भकर्णी नींद में सोती रहती हैं।
तीसरे चरण में चर्च एक विशाल बरगद बन जाता है। इस चरण को “प्रभुत्व” का चरण कहते है। इस चरण में ईसाई मत का गैर ईसाईयों के प्रति वास्तविक सोच के दर्शन होते है। चर्च के लिए इस चरण में जायज और नाजायज के मध्य कोई अंतर नहीं रहता। वह उसका साम-दाम दंड भेद से अपने उद्देश्य को लागु करने के लिए किसी भी हद तक जाता है।
1. हिंसा का प्रयोग -हिंसा पूर्व में उड़ीसा में ईसाई धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या करना भी इसी नीति के अंदर आता हैं। उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा में रियांग जनजाति बस्ती थी। उस जनजाति ने ईसाई बनने से इंकार कर दिया। उनके गावों पर आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया। उन्हें हर प्रकार से आतंकित किया गया। ताकि वह ईसाई बन जाये। मगर रियांग स्वाभिमानी थे। वे अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर आसाम में आकर अप्रवासी के समान रहने लगे। मगर धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया। खेद है कि कोई भी मानवाधिकार संगठन ईसाईयों के इस अत्याचार की सार्वजानिक मंच से कभी निंदा नहीं करता।
2. सरकार पर दबाव- अपने संख्या बढ़ने पर ईसाई समाज एकमुश्त वोट बैंक बन जाता है। चुनाव के दौर में राजनीतिक पार्टियों के नेता ईसाई बिशप के चक्कर लगाते है। बहुत कम लोग यह जानते है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने तो मिजोरम में भारतीय संविधान के स्थान पर बाइबिल के अनुसार राज्य चलाने की सहमति प्रदान की थी। पंजाब जैसे राज्य में सरकार द्वारा धर्म परिवर्तित ईसाईयों के लिए सरकारी नौकरियों में एक प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। मदर टेरेसा दलित ईसाइयों के आरक्षण के समर्थन में दिल्ली पर धरने में बैठ चुकी है। (कमाल है धर्म परिवर्तन करने के पश्चात भी दलित दलित ही रहते हैं। ) केरल और उत्तर पूर्व में राजनीतिक पार्टियों के टिकट वितरण में ईसाई बहुल इलाकों में चर्च की भूमिका सार्वजानिक हैं। गोवा जैसे राज्य में कैथोलिक चर्च के समक्ष बीजेपी जैसी पार्टियां भी बीफ जैसे मुद्दों पर चुप्पी धारण कर लेती हैं। तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा पहले धर्म परिवर्तन के विरोध में कानून बनाने फिर ईसाई चर्च के दबाव में हटाने की कहानी अभी ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं हैं। नियोगी कमेटी द्वारा प्रलोभन देकर जनजातियों और आदिवासियों को ईसाई बनाने के विरोध में सरकार को जागरूक करने का कार्य किया गया था। उस रिपोर्ट पर सभी सरकारें बिना किसी कार्यवाही के चुप रहना अधिक श्रेयकर समझती हैं। मोरारजी देसाई के कार्यकाल में धर्म परिवर्तन के विरोध में विधेयक पेश होना था। उस विधेयक के विरोध में मदर टेरेसा ने हमारे देश के प्रधानमंत्री को यह धमकी दी कि अगर ईसाई संस्थाओं पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो वे अपने सभी सेवा कार्य स्थगित कर देंगे। इस पर देसाई जी ने प्रतिउत्तर दिया कि इसका अर्थ तो यह हुआ कि ईसाई समाज सेवा की आड़ में धर्मान्तरण करने का अधिक इच्छुक है। सेवा तो केवल एक बहाना मात्र है। खेद है कि मोरारजी जी की सरकार जल्दी ही गिर गई और यह विधेयक पास नहीं हुआ। इस प्रकार से ईसाई चर्च अनेक प्रकार से सरकार पर दबाव बनाता है।
3. गैर ईसाईयों के घरों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष- ईसाई समाज से सम्बंधित नौजवान लड़के-लड़कियों को ईसाइयत के प्रति समर्पण भाव बचपन से सिखाया जाता हैं। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने के कारण उनका आपस में वार्तालाप चर्च के परिसर में, युथ प्रोग्राम में, बाइबिल की कक्षाओं में, गर्मियों के कैंप में, गिटार/संगीत सिखाने की कक्षाओं में आरम्भ हो जाता हैं। इस कारण से अनेक युवक युवती आपस में विवाह भी बहुधा कर लेते है। इसके साथ साथ वे अपने कॉलेज में पढ़ने वाले गैर हिन्दू युवक-युवतीयों से भी विवाह कर लेते हैं। इस अंतर धार्मिक विवाह को कुछ लोग सेक्युलर सामाज का अभिनव प्रयोग चाहे कहना चाहे। मगर इस सम्बन्ध का एक अन्य पहलू भी है। वह है प्रभुत्व। ईसाई युवती अगर किसी हिन्दू युवक से विवाह करती है तो वह ईसाई रीति-रिवाजों, चर्च जाने, बाइबिल आदि पढ़ने का कभी त्याग नहीं करती। उस विवाह से उत्पन्न हुई संतान को भी वह यही संस्कार देने का पूरा प्रयत्न करती है। वही अगर ईसाई युवक किसी हिन्दू लड़की से विवाह करता है, तो वह अपनी धार्मिक मान्यताओं को उस पर लागु करने के लिए पूरा जोर लगाता है। जबकि गैर ईसाई युवक- युवतियां अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर न इतने प्रबल होते और न ही कट्टर होते है। इस प्रभुत्व की लड़ाई में गैर ईसाई सदस्य बहुधा आत्मसमर्पण कर देते हैं। अन्यथा उनका घर कुरुक्षेत्र न बन जाये। धीरे धीरे वे खुद ही ईसाई बनने की ओर चल पड़ते है। ईसाई समाज के लड़के-लड़कियां हिन्दू समाज के प्रबुद्ध वर्ग जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत युवक-युवतियों से ऐसा सम्बन्ध अधिकतर बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम पर बहुत कम लोगों की दृष्टि जाती हैं। कम शब्दों में हिन्दू समाज की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक प्रतिरोधक क्षमता धीरे धीरे उसी के विरुद्ध कार्य करने लगती हैं। पाठक स्वयं विचार करे। यह कितना चिंतनीय विषय है।
4. व्यापार नीति- बहुत कम लोग जानते है कि संसार के प्रमुख ईसाई देशों के चर्च व्यापार में भारी भरकम धन का निवेश करते हैं। चर्च ऑफ़ इंग्लैंड ने बहुत बड़ी धनराशि इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में लगाई हुई है। यह विशुद्ध व्यापार है। यह एक प्रकार का चर्च और व्यापारियों का गठजोड़ है। इन कंपनियों से हुए लाभ को चर्च धर्मान्तरण के कार्यों में व्यय करता है। जबकि व्यापारी वर्ग के लिए चर्च धर्मान्तरित नये उपभोक्ता तैयार करता है। एक उदहारण लीजिये चर्च के प्रभाव से एक हिन्दू धोती-कुर्ता छोड़कर पैंट-शर्ट-कोट-टाई पहनने लगता है। व्यापारी कंपनी यह सब उत्पाद बनाती है। चर्च नये उपभोक्ता तैयार करता है। उसे बेचकर मिले लाभ को दोनों मिलकर प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग अनेक शताब्दियों से संसार के अनेक देशों में होता आया हैं। प्रभुत्व के इस चरण में अनेक छोटे देशों की आर्थिक व्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और परोक्ष रूप से चर्च के हाथों में आ चुकी हैं। यह प्रक्रिया हमारे देश में भी शुरू हो चुकी हैं। इसका एकमात्र समाधान स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक प्रयोग हैं।
5. सांस्कृतिक अतिक्रमण- विस्तार चरण में चर्च सांस्कृतिक अतिक्रमण करने से भी पीछे नहीं हटता। वह उस देश की सभी प्रचीन संस्कृतियों को समूल से नष्ट करने का संकल्प लेकर यह कार्य करता हैं। आपको कुछ उदहारण देकर समझाते है। केरल में कथकली नृत्य के माध्यम से रामायण के प्रसंगों का नाटक रूपी नृत्य किया जाता था। ईसाई चर्च ने कथकली को अपना लिया मगर रामायण के स्थान पर ईसा मसीह के जीवन को प्रदर्शित किया जाने लगा। तमिलनाडु में भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से नटराज/ शिव की पूजा करने का प्रचलन है। चर्च ने भरतनाट्यम के माध्यम से माता मरियम को सम्मान देना आरम्भ कर दिया। हिन्दू त्योहारों जैसे होली,दीवाली को प्रदुषण बताया और 14 फरवरी जैसे फूहड़ दिन को प्रेम का प्रतीक बताकर मानसिक प्रदुषण फैलाया। हर ईसाई स्कूल में 25 दिसंबर को सांता के लाल कपड़े पहन कर केक काटा जाने लगा। देखा देखी सभी हिन्दुओं द्वारा संचालित विद्यालय भी ऐसा ही करने लगे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वे लोग किसका अँधा अनुसरण कर रहे है। इसे ही तो सांस्कृतिक अतिक्रमण कहते है।
तृतीय चरण में हमारे देश के केरल, उत्तर पूर्वी राज्य नागालैंड, गोवा आदि आते है। जहाँ की सरकार तक ईसाई चर्च की कृपा के बिना नहीं चल सकती। हिन्दुओं की इन राज्यों में कैसी दुर्गति है। समीप जाकर देखने से ही आपको मालूम चलेगा। अगर तीसरा प्रभुत्व का चरण भारत के अन्य राज्यों में भी आरम्भ हो गया तो भविष्य में क्या होगा? यह प्रश्न पाठकों के लिए है। हिन्दू समाज को अपनी रक्षा एवं बिछुड़ चुके अपने भाइयों को वापिस लाने के लिए दूरगामी वृहद् नीति बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। अन्यथा बहुत देर न हो जाये!
(यह लेख मैंने अपने जीवन के पिछले 15 वर्षों के अनुभव के आधार पर लिखा है। दक्षिण, मध्य और उत्तर भारत में रहते हुए मैंने पर्याप्त समय ईसाई समाज के विभिन्न सदस्यों के साथ संवाद किया। यह लेख उसी अनुभव के आधार पर आधारित है। – #डॉविवेकआर्य)
(सलंग्न चित्र में आप संस्कृतिकरण की छाप स्पष्ट देख सकते है। ईसा मसीह को जबरदस्ती श्री कृष्ण के साथ नत्थी करने का प्रयास किया जा रहा है। विस्तार चरण में इन्हीं श्री कृष्ण के चित्र की ईसाई पादरी निंदा करेंगे और प्रभुत्व चरण में जो कोई ईसाई बहुल इलाके में श्री कृष्ण की पूजा करेगा। उसका पूरा विरोध चर्च सदस्य करते हैं।)

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