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आज का चिंतन

ब्रह्म के चार मुख की वास्तविकता*

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Dr D K Garg

पौराणिक मान्यताये: पौराणिक ब्रह्मा को शरीरधारी मानते है जो किसी अन्य लोक में रहता है। उसका परिवार है , पत्नी है ,पुत्र है ,हाथ में कमंडल है ,चार मुख है । ब्रह्मा की मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है, मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा की जाती है, भोग लगाते है और रंग-बिरंगे वस्त्र पहनाए जाते है । कहते है की गंगा जी ब्रह्मा जी के कमंडल से पैदा हुई। श्रीमद् भागवत पुराण में बताया गया है कि ब्रह्माजी की उत्पति भगवान विष्णु की नाभि से हुई है। जब ब्रह्माजी प्रकट हुए तो उन्हें कोई लोक दिखाई नहीं दिया। तब वे आकाश में चारों ओर देखने लगे, इससे उनके चारों दिशाओं में चार मुख हो गए। संबंधित सरस्वती देवी, ब्रह्मा जी की मानस पुत्री थीं और बाद में वह ब्रह्मा जी की पत्नी बनीं। ब्रह्माजी के 14 मानसपुत्र हैं ।
विश्लेषणः– ब्रह्मा जी को लेकर इतनी कपोल कल्पनाये मिलती है की सच्चाई की तलाश में भ्रमित होना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त पुराणों में ब्रह्मा के अवतार बताकर और भी अधिक भ्रमित कर दिया। इसके अलावा राजस्थान के पुष्कर में तो ब्रह्मा का स्थायी निवास भी बता दिया है जहा लोग पाषाण की मूर्ति वाले ब्रह्मा को वास्तविक ब्रह्मा मानकर दर्शन करने आते है। ब्रह्मा जी को भोग लगाते है और मूर्ति बने ब्रह्मा की आरती उतारी जाती है।और पूजा कराने वाले पण्डे को पैसा देते है।
इन अवैज्ञानिक कथाओं और मान्यताओं में समय ना बर्बाद करके वास्तविक वैदिक भावार्थ समझना चाहिए।
ब्रह्मा शब्द ईश्वर के लिए चारो वेद में आया है -जैसे की ऋग्वेद में ब्रह्मा के 108 संदर्भ मिलते है ,यजुर्वेद में ब्रह्मा के ८ ,सामवेद में ब्रह्मा के १८ और अथर्ववेद में ब्रह्मा के 85 संदर्भ मिलते है ।
ब्रह्म शब्द का अर्थ है कल्याणकारी ईश्वर जिसने समस्त प्राणी मात्र के कल्याण के लिए सृष्टि की रचना की और मानव के कल्याण के लिए चार वेदों का ज्ञान दिया।
(बृह बृहि वृद्धौ) इन धातुओं से ‘ब्रह्म’ शब्द सिद्ध होता है। योऽखिलं जगन्निर्माणेन बर्हति वर्द्धयति स ब्रह्म’
जो सम्पूर्ण जगत् को रच के बढ़ाता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘ब्रह्म’ है।

क्या ब्रह्मा के चार मुख है?

उत्तर है , हां है,और ना ,नही है,
मतलब?
यानि कि निराकार ब्रह्मा के चार मुख है परंतु साकार ब्रह्मा के चार मुख नही है।
वेद ईश्वर का ज्ञान है जो सृष्टि के रचियता ब्रह्म ने चार ऋषियों द्वारा दिया इसलिए ईश्वर को चार मुख वाला ब्रह्म भी कहा गया है और वेदों के विद्वान को इसीलिए ब्राह्मण कहते है।
यदि आप किसी शरीरधारी ब्रह्मा की बात करते है तो समझ लो कि किसी भी मनुष्य के चार मुख नहीं होते है। यदि कोई ऐसी विकृति के साथ जन्मा है तो तुरंत मृत्यु निश्चित है।
ये चार मुख वाले ब्रह्मा की कल्पना अलंकार की भाषा है,ये स्पष्ट है कि ब्रह्म वह ईश्वर है जो चारो वेदों के ज्ञान का देने वाला है। चारों वेद मुख पर कंठस्थ होने वाले मनुष्य को चतुर्मुखी या चतुर्वेदी भी कहा जाता है, यह एक उपाधि है ।
निराकार परमेश्वर हमेशा से है और हमेशा रहेगा ।वह ईश्वर चारो युग में जैसे की -सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग में विद्यमान है ,इसी प्रकार सर्वान्तर्यामी है जो की चारों दिशाओं -उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम में छाया है , वह चारों पुरुषार्थ -अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का भी प्रतीक हैं और चारों वेदों -ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद द्वारा ज्ञान देने वाला है। इसलिए ईश्वर ब्रह्माजी के चार मुख सर्वव्यापकता का प्रतीक है। सरल शब्दों में कहे तो ब्रह्मा यानी भगवान शरीर रूप में नहीं, बल्कि तत्व रूप में हर जगह मौजूद हैं।
ब्रह्मा ईश्वर द्वारा चार वेदो का ज्ञान दिया गया ।वेद अपौरुषेय है, मानव निर्मित नहीं है क्योंकि वेद में जो ज्ञान है, वो मानव अपनी बुद्धि से न तो समझ सकता है और न ही वैसे कल्पना करके लिख सकता है। अगर यह मान भी ले की वेद मानव निर्मित है। तो वेद में विरोधी बातें होती और वेदों का सिद्धांत एक मत नहीं होता। क्यों? इसलिए क्योंकि मनुष्य की बुद्धि बहुत कमजोर है और चारो वेदो में 20416 मन्त्र हैं। इतने मन्त्र को मन की कल्पना अनुसार लिखना, फिर उनके सिद्धांत में भी भेद न हो, उनमें कोई त्रुटी न हो, ब्रह्माण्ड, सूर्य, चन्द्र, मंगल आदि ग्रह की कल्पना करना तथा यह कहना कि अनंत प्रकार के ब्रह्माण्ड होते है, यह संभव नहीं हो सकता। अतएव वेद मानव निर्मित नहीं है।
क्या वेद अपौरुषेय?
अरेऽस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानन्यस्यैवैतानि सर्वाणि निश्वसितानि॥ – बृहदारण्यकोपनिषद् २.४.१०
भावार्थ:- जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, मन्त्रविवरण और अर्थवाद हैं, वे इस महद्भूत के निःश्वास हैं।
अर्थात् उन महान परमेश्वर के द्वारा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, विद्या, उपनिषद, इत्यादि निःश्वास की तरह सहज ही बाहर प्रकट हुए। तात्पर्य यह है कि परमात्मा का निःश्वास ही वेद है।

और भी समझिए कि वेदों के ऐसे मन्त्र भी है जिनमें चारों वेदों के नाम पाये जाते हैं। इन मन्त्रों के प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि वेद चार हैं। इसलिए अलंकार की भाषा में कहा जाता है की ब्रह्मा के चार मुख है। उदाहरण के लिए प्रमाण देखें:
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दाँसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।- यजुर्वेद ३१/७
पदार्थ – हे मनुष्यो! तुमको चाहिये कि (तस्मात्) उस पूर्ण (यज्ञात्) अत्यन्त पूजनीय (सर्वहुतः) जिसके अर्थ सब लोग समस्त पदार्थों को देते वा समर्पण करते उस परमात्मा से (ऋचः) ऋग्वेद (सामानि) सामवेद (जज्ञिरे) उत्पन्न होते (तस्मात्) उस परमात्मा से (छन्दांसि) अथर्ववेद (जज्ञिरे) उत्पन्न होता और (तस्मात्) उस पुरुष से (यजुः) यजुर्वेद (अजायत) उत्पन्न होता है, उसको जानो॥
यत्र ऋषयः प्रथमजा ऋचः साम यजुर्मही। एकर्षिर्यस्मिन्नार्पितः स्कम्भं तं ब्रूहि कतमः स्विदेव सः॥ – अथर्ववेद १०/७/१४
पदार्थ – (यत्र) जिस [परमेश्वर] में (प्रथमजाः) प्रथम उत्पन्न (ऋषयः) ऋषिः [मन्त्रों के अर्थ जाननेवाले महात्मा], (ऋचः) स्तुतिविद्याएँ [ऋग्वेद], (साम) मोक्षविद्या [सामवेद], (यजुः) सत्सङ्गविद्या [यजुर्वेद] और (मही) पूजनीय वाणी [ब्रह्मविद्या अर्थात् अथर्ववेद] वर्तमान है। (यस्मिन्) जिसमें (एकर्षिः) एकदर्शी [समदर्शी स्वभाव] (आर्पितः) भली-भाँति जमा हुआ है, (सः) वह (कतमः स्वित्) कौन सा (एव) निश्चय करके है ? [उत्तर] (तम्) उसको (स्कम्भम्) स्कम्भ [धारण करनेवाला परमात्मा] (ब्रूहि) तू कह ॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥ – अथर्ववेद १९/६/१३
पदार्थ – (तस्मात्) उस (यज्ञात्) पूजनीय (सर्वहुतः) सब के दाता [अन्न आदि देनेहारे] [पुरुष परमात्मा] से (ऋचः) ऋग्वेद [पदार्थों की गुणप्रकाशक विद्या] के मन्त्र और (सामानि) सामवेद [मोक्षविद्या] के मन्त्र (जज्ञिरे) उत्पन्न हुए। (तस्मात्) उससे (ह) ही (छन्दः) अथर्ववेद[आनन्ददायक विद्या] के मन्त्र (जज्ञिरे) उत्पन्न हुए, और (तस्मात्) उस से (यजुः) यजुर्वेद [सत्कर्मों का ज्ञान] (अजायत) उत्पन्न हुआ ॥
इस प्रकार वेदों के इन मन्त्रों से यह सिद्ध होता है कि वेद चार हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद चारों वेदों के प्रमुख विषय क्रमशः हैं ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान है। उपरोक्त विश्लेषण से ब्रह्मा के चार मुख वाली अलंकारिक भाषा का वास्तविक भावार्थ स्पष्ट हो जाता है।

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