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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

देश का विभाजन और सावरकर, अध्याय -12 (ख) सोहरावर्दी की देशद्रोही सोच

यह पूर्णतया सत्य है कि यदि सावरकर नहीं होते तो पाकिस्तान आज के बहुत बड़े भारत के भाग को ले जाने में सफल हो जाता। सावरकर की सोच पर काम करते हुए उस समय ऐसे अनेक हिंदू वीर रहे जिन्होंने देश के कई शहरों को या भागों को पाकिस्तान में जाने से रोकने में अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी। ऐसे वीर योद्धाओं में से ही एक महावीर गोपाल पाठा खटीक रहे , जिन्होंने कोलकाता को भारत से अलग होने से बचाने में सफलता प्राप्त की थी।
हरियाणा शिक्षा विभाग में राजपत्रित अधिकारी रहीं श्रीमती आर्या चंद्रकांता क्रांति जी द्वारा हमें एक लेख भेजा गया जिसमें पाठा जी के बारे में विशेष जानकारी दी गई है। इस लेख से हमें पता चलता है कि जिस समय बंगाल के मुख्यमंत्री सुहरावर्दी ने 16 अगस्त 1946 का आयोजन कर कोलकाता में हिंदुओं का नरसंहार कराया था , उस समय उसकी इस सोच के पीछे एक ही कारण काम कर रहा था कि कोलकाता भारत में ना रह करके पाकिस्तान में जाना चाहिए। कोलकाता जैसे प्रमुख व्यापारिक शहर को जिन्नाह अभी खोना नहीं चाहता था। तब कोलकाता को हिंदू मुक्त करने की जिम्मेदारी सोहरावर्दी को दी गई। हिंदू मुक्त कोलकाता का अभिप्राय था कि लोग स्वेच्छा से पाकिस्तान में जाने का निर्णय लेंगे और इस प्रकार यह व्यापारिक शहर हिंदुओं की हत्या के बदले उन्हें सहज रूप में प्राप्त हो जाएगा। निश्चित रूप से गांधी और नेहरू सोहरावर्दी की हिंसा के सामने उस समय आत्मसमर्पण कर चुके थे। वे इस योजना को फलीभूत हो जाने देते यदि समय रहते हमारे क्रांतिकारी योद्धा कुछ कठोर कदम नहीं उठाते ।
उस समय कोलकाता में 64% हिंदू और 33% मुसलमान थे।
सोहरावर्दी ने अपनी योजना को सिरे चढ़ाने के लिए उस दिन सार्वजनिक हड़ताल करवा दी थी। मुसलमान मस्जिद में एकत्र हुए और हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार का संकल्प लेकर बाहर निकले तो जो भी हिंदू नजर आया उसी को उन्होंने काटना आरंभ कर दिया। हिन्दुओं के पास कोई हथियार नहीं था, इसलिए मुसलमानों की उस भीड़ के सामने उनके सामने कटने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं था। सौहरावर्दी ने सभी मुसलमानों को यह बता दिया था कि वह निश्चिंत होकर अपना काम करें , क्योंकि उसने पुलिस को पहले ही यह निर्देश दे दिया है कि वह मुसलमानों के काम में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचाए।
उक्त लेख का लेखक हमें बताता है कि ‘लोहे की छड़ों, तलवारों और अन्य खतरनाक हथियारों से लैस लाखों मुसलमानों की भीड़ कलकत्ता के कई हिस्सों और आसपास के इलाकों में फैल गई। पहले मुस्लिम लीग कार्यालय के पास हथियारों और हथियारों की एक हिंदू दुकान पर हमला किया गया। उसे लूट लिया गया और जलाकर राख कर दिया गया। मालिक और उसके कर्मचारियों के सिर काट दिए गए। हिंदुओं को सब्जियों की तरह काटा गया। कई हिंदू महिलाओं और युवा लड़कियों का अपहरण कर लिया गया और उन्हें सेक्स स्लेव के रूप में ले जाया गया। 16 अगस्त को हजारों हिंदू मारे गए और हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया।
17 अगस्त को भी हत्याएं जारी रहीं। 600 हिंदू मजदूरों, ज्यादातर उड़ीसा से केसोराम कॉटन मिल्स लिचुबगन में सिर काट दिया गया था। कोलकाता में नरसंहार का नंगा नाच चल रहा था। हिन्दू भाग रहे थे, सुहरावर्दी को 19 अगस्त तक अपनी जीत का आश्वासन दिया गया था। 17 अगस्त तक हजारों हिंन्दू मारे जा चुके थे।’

गांधी की अहिंसा ने डाल दिए हथियार

उस समय गांधी जी की अहिंसा सोहरावर्दी के मुस्लिम गुंडों की हिंसा के सामने हथियार डाल चुकी थी। वह बड़ी बेशर्मी से कोलकाता के चौराहों पर नीलाम हो रही थी और बहुत ही कायरता के साथ अपना सर्वस्व मिटाती जा रही थी। उस दृश्य को देखकर गांधी जी को तनिक भी लज्जा नहीं आई। ना ही उन्होंने अपनी अहिंसा के इतने बड़े अपमान पर किसी प्रकार का खेद व्यक्त किया। हिंदुओं की स्थिति बहुत दयनीय हो चुकी थी। उन्हें गाजर – मूली की भांति काटा जा रहा था। शासन-प्रशासन पूर्णतया मौन हो चुका था। तब एक आर्य हिंदू वीर ने इस घटना से उत्तेजित होकर प्रतिशोध लेने और डटकर सामना करने का निर्णय लिया। यह आर्य योद्धा ही गोपाल मुखर्जी था ,जो कि एक बंगाली खटीक थे। उनके मित्र उन्हें पाठा इसलिए कहते थे क्योंकि वह मीट की दुकान चलाते थे । वे कोलकाता के बोबाजार इलाके में मलंगा लेन में रहते थे।
लेखक लिखता है कि गोपाल उस समय 33 वर्ष के थे, और एक कट्टर राष्ट्रवादी, और सुभाष चंद्र बोस के दृढ़ अनुयायी और गांधी के अहिंसा के सिद्धांत की आलोचना करते थे। गोपाल गली-गली संस्था भारत जाति वाहिनी चलाते थे। उनकी टीम में 500 – 700 लोग थे – सभी अच्छी तरह से प्रशिक्षित पहलवान थे। 18 अगस्त को गोपाल ने फैसला किया कि वे भागेंगे नहीं, और मुसलमानों पर जवाबी हमला करेंगे। उन्होंने अपने पहलवानों को बुलाया, उन्हें हथियार दिए। एक मारवाड़ी व्यवसायी ने उसे वित्त देने का फैसला किया, और उसे पर्याप्त धन दिया। उनकी योजना सबसे पहले जवाबी हमलों से हिन्दू क्षेत्रों को सुरक्षित करने की थी। उनके शब्द थे “हर 1 हिन्दू के लिए 10 मुसलमानों को मार डालो!”
उस समय हिंदुओं के विनाश के लिए प्रत्येक मुसलमान मुस्लिम लीगी बन चुका था। इस प्रकार मुस्लिम लीग के पास जिहादी गुंडों की संख्या लाखों तक पहुंच गई थी। जबकि अपने मौलिक स्वभाव में साधारणतया शांत रहने वाले हिंदुओं के पास ऐसी कोई बड़ी सेना नहीं थी। उनका मनोबल उन्हें उस अत्यंत भयावह स्थिति में मुसलमानों का सामना करने के लिए प्रेरित कर रहा था। बस, अपने उसी परंपरागत हथियार के बल पर पाठा जी ने अपने कुछ मुट्ठी भर हिन्दू युवकों को मुसलमानों का सामना करने और कोलकाता को एक मुस्लिम शहर बनने से रोकने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण योजना पर काम करना आरंभ किया।

गोपाल पाठा की वीरता

अपनी इस योजना में उन्होंने भारत के चरित्र बल को प्राथमिकता दी और अपने सभी साथियों को यह कड़े निर्देश जारी किए कि मुसलमानों का प्रतिरोध करते समय वे उनकी महिलाओं से कुछ नहीं कहेंगे। यह तब था जबकि उस समय मुस्लिम लीगी गुंडे मर्यादाओं की सारी सीमाओं को लांघते हुए महिलाओं का शीलभंग करने का कीर्तिमान स्थापित कर रहे थे।
आजाद हिंद फौज और नेताजी सुभाष चंद्र बोस की नीतियों में विश्वास रखने वाले गोपाल के पास भी उस समय दो पिस्तौलें थीं। ये दोनों पिस्टल उन्हें आजाद हिंद फौज से ही मिली थीं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सावरकर जी की नीतियों से प्रेरित होकर गोपाल जी और उनके साथियों ने 18 अगस्त से मुसलमानों के विरुद्ध लड़ना आरंभ किया। 18 अगस्त को ही कुछ मुस्लिम डकैत उनकी कॉलोनी में प्रवेश करने में सफल हो गए थे। तब गोपाल जी और उनकी टीम ने उनका उसी प्रकार स्वागत किया जिस प्रकार डकैतों का स्वागत करना अपेक्षित होता है। मुस्लिम डकैतों का हिंदू वीरों ने गोपाल जी के नेतृत्व में डटकर सामना किया और प्रत्येक डकैत को दोजख की आग में झोंक दिया। मात्र 24 घंटे में ही गोपाल जी और उनके साथियों ने सड़कों पर नंगा नाच कर रहे उन मुस्लिम डकैतों को या तो समाप्त कर दिया या मैदान छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया।
जब इस घटना की जानकारी सोहरावर्दी को हुई तो वह भी आश्चर्यचकित रह गया था। उसकी सारी योजना पर पानी फिर चुका था। कोलकाता को वह एक मुस्लिम शहर बनाने के लिए निकला था पर कुछ मुट्ठी भर हिंदू वीरों ने उसकी योजना को सिरे नहीं चढ़ने दिया। गोपाल जी का अभियान अभी रूका नहीं था। अब उन्होंने उन जिहादियों को चिन्हित किया जिन्होंने दो दिन के हिंदू नरसंहार में हमारे अनेक हिंदू भाइयों को मौत के घाट उतार दिया था या हमारी माता बहनों के साथ अमानवीय अत्याचार किए थे। 20 अगस्त से उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर इन बदमाशों को ढूंढ – ढूंढकर मारना आरंभ किया।
जब यह सब कुछ हो रहा था उस समय गांधीजी बड़े आराम से चरखा चला रहे थे और ‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम…’ गाकर सपनों के संसार में सैर कर रहे थे।

हिसाब कर दिया पूरा

गोपाल जी के इस प्रकार के अप्रत्याशित साहस को देखकर अनेक हिंदुओं में प्राणों का संचार हुआ और जो अपना सब कुछ लुटा चुके थे वह भी इधर – उधर से आकर अपने हिंदू वीर योद्धा के साथ जुड़ गए। इसके पश्चात सबने सामूहिक रूप से जेहादी बदमाशों का अंत करना आरंभ किया। अगले 2 दिन में इतने मुसलमानों को काटा गया कि उनकी संख्या कटे हुए हिंदुओं की संख्या से अधिक हो गई। अब हिसाब पूरा हो चुका था। सोहरावर्दी को भी पता चल गया था कि हिंदुओं की वीरता क्या होती है ? उस समय कई तथाकथित हिंदू नेताओं की आंखें भी खुल चुकी थीं। पर गांधीजी की अहिंसा अभी भी हिंदू मुस्लिम एकता की भांग पिए पड़ी थी। वह नशे की हालत में अभी भी यही बुदबुदा रही थी- ईश्वर अल्लाह तेरो नाम….?
गोपाल जी और उनके साथियों की वीरता और पराक्रम के भाव को देखकर मुसलमान 22 अगस्त तक कोलकाता से भागने लगे थे। तब सोहरावर्दी ने अपनी पराजय स्वीकार की और कांग्रेस के अहिंसावादी दोगले नेताओं से अनुरोध किया कि वे हिंदू मुस्लिम एकता का राग छेड़कर किसी प्रकार गोपाल जी और उनके साथियों को शांत करें। इस निर्दयी मुसलमान मुख्यमंत्री को अपनी निर्दयता पर तो कोई पश्चाताप नहीं था, पर उसे अब यह आभास अवश्य हो गया था। यदि गोपाल जी व उनके साथियों का खेल कुछ समय और जारी रह गया तो उसकी अपनी भी जान जा सकती है। उस समय गोपाल जी ने प्राणों की भीख मांग रहे सोहरावर्दी के साथ इस शर्त पर समझौता किया कि सभी मुस्लिम जिहादी गुंडे उन्हें अपने हथियार सौंप दें। सोहरावर्दी ने गोपाल जी की इस शर्त को सहर्ष स्वीकार कर लिया।
उस समय कोई भी कांग्रेसी गोपाल जी और उनके साथियों के साथ नहीं आया था। उनकी कायरता उन्हें कहीं दूर खींचकर ले गई थी। अपनी परंपरागत शैली में उन्होंने हिंदुओं की वीरता पर कोई टिप्पणी भी नहीं थी। इतना ही नहीं, बाद में जब इतिहास लिखा गया तो नेहरू ने अपने मुस्लिम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद को इतिहास लिखने की जिम्मेदारी देकर हमारे इस महानायक को इतिहास के कूड़ेदान में फिंकवाने की पूरी व्यवस्था कर दी। अपनी इसी मुस्लिमपरस्ती को कांग्रेस ने अपना राष्ट्रवादी स्वरूप कहकर प्रचारित किया है और इसी को अपनी राष्ट्रभक्ति के नाम से संबोधित करती रही है।

जिन्नाह की योजना हो गई चकनाचूर

उक्त लेख से हमें आगे पता चलता है कि ‘कोलकाता पर कब्जा करने की जिन्नाह की योजना 22 अगस्त तक चकनाचूर हो गई थी और कोलकाता में भगवा झंडा फहरा रहा था। कोलकाता के बाद गोपाल ने अपने संगठन को भंग नहीं किया और बंगाल के हिन्दुओं को बचाते रहे। जब सब कुछ खत्म हो गया, जैसा कि एक फीचर फिल्म के अंत में पुलिस आती है। गांधी ने गोपाल से मुलाकात की और अहिंसा और हिंदू-मुस्लिम एकता के अपने पाठों को लेकर उनसे अपने शास्त्रों (हथियार) को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा। तब गोपाल के शब्द थे “गांधी ने मुझे दो बार बुलाया, मैं नहीं गया। तीसरी बार कुछ स्थानीय कांग्रेसी नेताओं ने मुझसे कहा कि मुझे कम से कम अपने कुछ हथियार जमा करने चाहिए। मैं वहाँ से चला गया, मैंने देखा कि लोग आ रहे हैं और हथियार जमा कर रहे हैं, जो किसी के काम के नहीं थे। आउट-ऑफ-ऑर्डर पिस्टल, उस तरह की चीज!’
तब गांधी के सचिव ने मुझसे कहा: ‘गोपाल! तुम गांधीजी को हथियार क्यों नहीं सौंप देते?’ गोपाल ने उत्तर दिया, ‘इन भुजाओं से मैंने अपने क्षेत्र की महिलाओं को बचाया, लोगों को बचाया है। मैं सरेंडर नहीं करूंगा। गोपाल ने फिर कहा, कलकत्ता हत्याकांड के दौरान गांधीजी कहाँ थे? तब वह कहाँ थे जब हिन्दू मारे जा रहे थे? भले ही मैंने किसी को मारने के लिए कील का इस्तेमाल किया हो, मैं उस कील को भी नहीं छोड़ूंगा!’
सुहरावर्दी ने कहा, “जब हिन्दू वापस लड़ने का मन बनाते हैं, तो वे दुनिया में सबसे घातक हो जाते हैं!” गोपाल पाठा और श्यामा प्रसाद मुखर्जी दो महान नायक थे जिन्होंने बंगाल के हिन्दुओं को जेहादी मुस्लिम डकैतों से बचाया था! लेकिन इसे पढ़ने से पहले आप में से कितने लोग गोपाल पाठ के बारे में जानते थे? चूंकि गोपाल ने गांधी के सिद्धांत का पालन नहीं किया, इसीलिये उनका नाम सेकुलर काग्रेसियों और वामपंथियों ने इतिहास की किताबों से हटा दिया गया। लेकिन वह भारत के गुमनाम हीरो हैं, जिन्होंने लाखों हिन्दू लोगों की जान बचाई। उन्हीं की बदौलत आज कोलकाता भारत का हिस्सा है।
‘महात्मा’ होकर भी लोग हिंदुओं के हत्यारे बन गए थे। अपने ऐसे ही महात्मा पर कॉन्ग्रेस आज तक फूल चढ़ाती हैं और हमारे महानायक गोपाल जी की आत्मा इतिहास के कूड़ेदान में पड़ी हुई कराहती है। माना कि सावरकर जी ने कभी कोई ‘माफी’ मांग ली थी और उन्होंने ऐसा करके बड़ा ‘पाप’ कर दिया था, पर गोपाल जी का क्या दोष है ? उनकी वीरता को नमन करना भी कांग्रेसियों ने देश में पूर्णतया निषिद्ध कर दिया है?

डॉ राकेश कुमार आर्य

( यह लेख मेरी नवीन पुस्तक “देश का विभाजन और सावरकर” से लिया गया है। मेरी यह पुस्तक डायमंड पॉकेट बुक्स दिल्ली से प्रकाशित हुई है जिसका मूल्य ₹200 और पृष्ठ संख्या 152 है।)

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