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आज का चिंतन

🌷मनुस्मृति और धर्म 🌷*

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वास्तविक धर्म क्या है और धर्म कैसा होना चाहिए।धर्म क्या है इस पर वैषेशिक के महर्षि कणाद कहते हैं:-
‘यतोऽभ्युदय निःश्रेयस्सिद्धि स धर्मः’।
अर्थात् जो कर्म हमारा अपना उद्धार अरें और प्राणी मात्र को जिससे सुख मिले वह धर्म है।
परमात्मा ने संसार रचा।उसमें नाना प्रकार के फल फूल,वनस्पतियाँ,औषधियाँ,अन्न,आदि उसने हमारे लिए उत्पन्न किये।उस परमपिता ने हमें उनका प्रयोग भी वेद द्वारा बता दिया।वेद ज्ञान सृष्टि की उत्पत्ति के समय हमारे लिए दिया।वह सब प्राणीमात्र के लिए एक-सा होने से संसार भर के मनुष्यों का धर्म वेद है।
बाकी जो ये मत मतान्तर चल रहे हैं ये धर्म नहीं मत हैं,जिन्हें मनुष्य अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए चलाता है।और इन मतावादियों की पुस्तकों में अपने ही मत वालों का भला सोचना बाकी दूसरे मजहब के लोग हैं उनसे नफरत करना लिखा है।अतः जो विद्वान होते हैं वे इन मजहबी किताबो के सत्य असत्य की खोज कर लेते हैं और जो साधारण जन होते हैं वे इनके चंगुल में फंस जाते हैं।अतः इनका त्याग ही हितकर है।
धर्म १४०० अथवा ३-४ हजार वर्ष से नहीं बल्कि जब से सृष्टि बनी है तब से है।इस लिहाज से भी यह मत,धर्म की कसौटी पर पूरे नहीं उतरते,धर्म तो सारे संसार के लिए एक ही है।
मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण कहे हैं और मनु सृष्टि के प्रथम शासक चक्रवर्ती (विश्व) भर के राजा हुए हैं उनका रचा स्मृति ग्रन्थ सब विद्वानों ने हर
प्रकार से उच्च और श्रेष्ठ माना है।
धर्म के लक्षण ये हैं
धृति क्षमा दमो अस्तेयं शोचं इन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम् ।।
व्याख्या:–
(1) धृतिः―सदा धैर्य रखना,अधीर न होना।
(2) क्षमा―हानि,लाभ,मान,निन्दा,स्तुति,सुख-दुःख,में सहनशील रहना।
(3) दमो―मन को सदा धर्म में प्रवृत्त रखना और अधर्म से रोकना,अर्थात् अधर्म करने की इच्छा भी न करनी।
(4) अस्तेय―चोरी त्याग अर्थात् बिना आज्ञा,अथवा छल कपट,विश्वासघात व किसी व्यवहार अथवा वेद विरुद्ध प्रचार से पर पदार्थ का ग्रहण करना चोरी और उसको छोड़ना साहूकारी कहलाती है।
(5) शौच―राग द्वेष,पक्षपात छोड़ के बाहर भीतर की पवित्रता।बाहर की पवित्रता जल,मृत्तिका से होती है।
(6) इन्द्रियनिग्रह:―इन्द्रियों को अधर्माचरण से रोककर सदा धर्म में चलाना।
(7) धीः―बुद्धिनाशक तथा मादक द्रव्यों का त्याग,दुष्टों के संग न करना,आलस्य प्रमाद आदि का त्याग और श्रेष्ठ पदार्थों का सेवन,सत्पुरुषों का संग और योग से बुद्धि को बढ़ाना।
(😎 विद्या―पृथ्वी से लेके परमेश्वर पर्यन्त यथार्थ ज्ञान और उनसे यथा योग्य उपकार लेना।
(9) सत्य―मन,वाणी,आत्मा में एक सा कर्म होना इससे विपरित मन में कुछ और,वाणी में कुछ और,आत्मा में कुछ असत्य है।
(10) अक्रोध–क्रोध आदि दोषों को छोड़ के शान्ति आदि गुणों को धारण करना।
अब इन पुस्तकों को इन लक्षणों से मिलाएँ और देखें कि वे इस कसौटी पर कितने पूरे उतरते हैं।एक स्थान पर फिर मनुजी कहते हैं-
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः ।
एतच्चर्तु विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ।।
अर्थ:-वेद,स्मृति,वेदानुकूल उप्रोक्त मनुस्मृत्यादि शास्त्र,सत्य पुरुषों का आचार जो सनातन अर्थात् वेद द्वारा परमेश्वर प्रतिपादित कर्म और अपनी आत्मा में प्रिय अर्थात् जिसको आत्मा चाहता है जैसा कि सत्य भाषण,ये चार धर्म के लक्षण अर्थात् इन्हीं से धर्माधर्म का निश्चय होता है।
क्या किसी भी प्राणी को निर्दोष में हिंसा करना धर्म है?क्या मनुष्यों में एक-दूसरे से द्वेष करना धर्म है?क्या अपने को ऊँचा सोचना और दूसरों को काफिर कहना धर्म का अंग है क्या बहुत विवाह करना धर्म की आज्ञा है।और यदि यह धर्म के अंग किसी की बुद्धि में हैं तो यह धर्म नहीं और न ही कोई ऐसा सम्प्रदाय धर्म की गिनती में आ सकता है।यदि ये धर्म हैं तो फिर अधर्म क्या है?
जिस व्यक्ति अथवा समाज के अन्दर अच्छे गुण सब प्राणियों से प्यार और दया,सत्याचार,पवित्र आहार और शुभ संकल्प के विचार हैं वे सब सज्जन आर्य और इससे भिन्न सभी दैत्य काफिर हैं।चाहे कोई हिन्दू,मुसलमान,ईसाई कोई भी हो।
कहने का तात्पर्य यह है कि यह सभी सम्प्रदाय मनुष्यों के बनाए हुए हैं और समय-२ पर स्वार्थी लोगों ने अपने-२ स्वार्थ की सिद्धि हेतु बनाये हैं और यह सम्प्रदाय(मजहब) प्यार नहीं सिखाते,लड़ना-भिड़ना सिखाते हैं,ईर्ष्या-द्वेष सिखाते हैं।जोड़ना नहीं तोड़ना सिखाते हैं।केवल वैदिक धर्म ही है जो सच्चाई का मार्ग दिखाता है।जीवन को ऊंचा उठाता है।
इन मतवादियों ने धर्म के स्वरुप को इस प्रकार बिगाड़ के रख दिया है कि साधारण तो क्या समझदार मनुष्य भी इस प्रकार भ्रम में पडे हुए हैं कि वे समझ नहीं पा रहे कि धर्म क्या है और अधर्म क्या है।
कई मूँछ-दाढ़ी रखना धर्म मानते हैं कई केवल दाढ़ी को धर्म ले बैठे हैं।कोई तिलक आदि लगाना धर्म मानते हैं।कई पांच बार नमाज पढ़ना धर्म मानते हैं,कोई मन्दिर में जाकर मूर्ति पर जल चढ़ाना कोई गिरजाघर में जाना धर्म माने बैठे हैं कोई व्रतों में भूखे रहने को धर्म समझ बैठे हैं तो कोई रोजे रखकर धर्म का पालन करते हैं।
कोई जागरण करवाना धर्म समझते हैं तो कोई असंख्य प्राणियों की एक ही दिन में हिंसा सवाब (धर्म) मानते हैं।इस प्रकार इन सबका यत्न स्वर्ग के लिए है।पर घोर अंधकार में ठीक मार्ग न मिलने से जैसा मार्ग न पाने वाले राही की भांति यह सब ठोकरें खाते फिरते हैं।ठीक दिशा मिलेगी नहीं जब तक वेद की शरण में नहीं आते क्योंकि वेद ही सबका धर्म है।
हर मानव का चाहे वह अपने आपको हिन्दू,मुसलमान,सिख,जैनी,ईसाई अथवा किसी सम्प्रदाय से जुड़ा मानता हो।मानव का माता के गर्भ से जन्म लेने पर वह न हिन्दू होता है न मुसलमान न ईसाई न सिख।और यह सब भेद जब उसको कुछ ज्ञान होता है तब होता है,ज्ञान से तात्पर्य सत्य ज्ञान नहीं,किन्तु उस सम्प्रदाय का ज्ञान जिससे उस परिवार का जोड़ है सम्बन्ध है और सत्यासत्य से मिश्रित है।
सत्य ज्ञान तो ठीक दिशा देगा।
तात्पर्य यह है कि वेद सबके लिए संसार भर के स्त्री पुरुषों के लिए है।किसी एक व्यक्ति विशेष वर्ग अथवा देश के लिए नहीं और यही स्वर्ग (बहिश्त) का मार्ग है।इसमें पक्षपात नहीं,संसार के समस्त प्राणीमात्र के लिए कल्याण पथ-प्रदर्शक है।सूर्य की भांति चमकता ज्ञान का भंड़ार है।जैसे परमात्मा के बनाये हुए सूर्य,चन्द्र,तारे,जल,हवा,जमीन आदि का उपयोग सबके लिए है,किसी से ईश्वर ने भेदभाव नहीं किया,और कर्मों का फल भी सबको भोगना पड़ता है चाहे मुसलमान हो या हिन्दू।इसका सबसे बड़ा प्रमाण ये है कि दोनों जातियों में सुख-दुःख देखे जाते हैं।इसी प्रकार वेद का ज्ञान ईश्वर ने सबके लिए दिया है,कोई उससे आचरण में लाकर लाभ न उठाये तो इसमें ईश्वर क्या करे?

#डॉविवेकआर्य द्वारा लिखित एवं मनुस्मृति भाष्यकार डॉ सुरेंदर कुमार जी द्वारा सम्पादित ‘ मनुस्मृति को जानें’ amazon पर इस लिंक पर उपलब्ध है।

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