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वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?

वंदे मातरम पर बवाल क्यों ? अध्याय 7

वंदे मातरम और भारत का स्वाधीनता आंदोलन

हम सभी जानते हैं कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना १८८५ में हुई थी। १८५७ की क्रांति की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए इस संगठन की स्थापना की गई थी अर्थात अंग्रेजों को इस बात का डर निरंतर सताता रहता था कि भारत के लोग १८५७ की क्रांति को कहीं फिर से न दोहरा दें ? इसलिए अंग्रेजों ने यह निर्णय लिया कि भारत के लोगों का आक्रोश कम करने के लिए कोई ऐसा संगठन स्थापित किया जाए जो उन्हें ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एकजुट होने से रोकने का काम कर सके और उनके भीतर क्रांति के राष्ट्रवादी भावों का संचार न होने पाए। तब एक ब्रिटिश सेवानिवृत्त आईसीएस अधिकारी ए.ओ.ह्यूम ने इस संगठन की स्थापना की। इस ब्रिटिश अधिकारी ने १८५७ की क्रांति में भाग लिया था और ३१ भारतीय लोगों की हत्या भी की थी।
१८८६ में जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का दूसरा अधिवेशन कोलकाता में हुआ तो जाने-अनजाने पता नहीं कैसे इस संगठन के मंच से यह गीत अर्थात ‘ वंदे मातरम’ गाया गया था। तब उस समय इसे कविवर हेमचंद्र द्वारा स्वर दिया गया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मंच से इस गीत का गाया जाना एक महत्वपूर्ण घटना थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ब्रिटिश सरकार के लिए एक सुरक्षा कवच के रूप में की गई थी। इसलिए प्रारंभिक कांग्रेसी अधिवेशनों के काल में इस प्रकार के गीतों का इसके मंच से प्रसारण होना सचमुच आश्चर्यजनक था।

यह इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि इस गीत को गाए जाने से प्रत्येक वर्ष कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशनों में इसे गाने की परंपरा पड़ जानी चाहिए थी। इसके उपरांत भी यह बात ध्यान देने योग्य है कि उस समय कांग्रेस के किसी मुस्लिम सदस्य अथवा ब्रिटिश सरकार की ओर से इस गीत को लेकर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की गई थी। यद्यपि कालांतर में जब इस गीत ने लोगों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित करना आरंभ किया और भारतवर्ष में राष्ट्रवाद की लहर इस गीत के कारण दौड़नी आरंभ हुई तो ब्रिटिश सरकार इस को लेकर सावधान हुई।

कांग्रेस का १२ वां अधिवेशन

सन १८९६ में कांग्रेस का १२ वां अधिवेशन कोलकाता में आयोजित किया गया था। जिसकी अध्यक्षता मुस्लिम नेता एम. रहीमतुल्ला सयानी द्वारा की गई थी। वह कांग्रेस के स्थापना अधिवेशन अर्थात १८८५ में भी उपस्थित रहे थे। उनकी गिनती उस समय एक प्रमुख भारतीय वकील और राजनेता के रूप में की जाती थी। उन्होंने मुस्लिम समाज के लोगों से भारत के स्वाधीनता आंदोलन में सम्मिलित होने और कांग्रेस का साथ देने का आह्वान किया था। वह मुंबई में विधान परिषद के सदस्य भी रहे थे। सन १८९६ में उन्हें कांग्रेस के १२ वें कोलकाता अधिवेशन का अध्यक्ष बनाया गया था।
एम. रहीमतुल्ला सयानी की उपस्थिति में कांग्रेस के इस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा ‘ वंदे मातरम ‘ गीत गाया गया था। कांग्रेस के सभी सदस्यों ने इस गीत के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की थी।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और वंदे मातरम

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक स्वराज्य के समर्थक थे। उन्होंने प्रारंभ से ही पूर्ण स्वराज्य की साधना करनी आरंभ कर दी थी। वह टुकड़ों में स्वराज्य लेने के समर्थक नहीं थे।
इसीलिए देश के लोग भी उनका विशेष सम्मान करते थे। १९०५ में उन्होंने ‘ स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर ही रहूंगा’ – ऐसे क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते हुए लोगों को पूर्ण स्वराज्य की महत्ता बता दी थी।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक यह भी भली प्रकार जानते थे कि स्वराज्य की यह लड़ाई वंदेमातरम के माध्यम से ही जीती जा सकती है। क्योंकि ‘ वंदेमातरम ‘ लोगों के भीतर देश भक्ति के भावों का संचार कर रहा था।
यही कारण रहा कि वह वंदे मातरम के प्रति विशेष श्रद्धा रखते थे। लोगों तक वंदेमातरम के संदेश को पहुंचाने के भाव से प्रेरित होकर उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज की समाधि पर भी इस गीत की पंक्तियां लिखवाई थीं। उन्होंने अपने भाषणों में लोगों के मध्य जाकर मंचों से वंदे मातरम शब्द का बार-बार प्रयोग किया। उनके समर्थकों ने भी इस शब्द का बहुत ही सम्मान के साथ नारे के रूप में प्रयोग किया। उन सबके भीतर वंदे मातरम के प्रति एक विशेष आकर्षण का भाव उत्पन्न हो गया था। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जब सन १९१४ में जेल से छूटकर बाहर आए तो उस समय भी उनके समर्थकों ने ‘ वंदेमातरम ‘ का जय घोष किया था। लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। अगले दिन के समाचार पत्रों में इस सारी घटना का समाचार प्रकाशित हुआ था। जिससे इस नारे को और अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई।

उग्र आंदोलन और वंदे मातरम

लाला लाजपत राय , लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक, विपिन चंद्र पाल अर्थात लाल, बाल, पाल की इस सुविख्यात तिक्कड़ी ने जिस आंदोलन के माध्यम से भारत को स्वाधीन करने का मार्ग अपनाया था, उसे भारत के स्वाधीनता आंदोलन के इतिहास में उग्र आंदोलन के रूप में जाना जाता है। उग्र का अभिप्राय आज के प्रचलित शब्द उग्रवाद से नहीं है। इसका अभिप्राय है तेजस्वी राष्ट्रवाद का समर्थक होना। पूर्ण तेजस्विता के साथ अपनी मांगों को प्रस्तुत करना और उतनी ही तेजस्विता के साथ उन मांगों को मनवाने के लिए आंदोलन करना। इसमें ” जैसे को तैसा ” की नीति पर काम किया जाता है। जिसे उर्दू में ” तुर्की ब तुर्की जवाब देना ” कहा जाता है।
इस आंदोलन के नेताओं का मानना था कि यदि अंग्रेज देश को प्यार से छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं तो उनके विरुद्ध उन्हीं की शैली में युद्ध करना या युद्ध के उपाय अपनाना कोई बुरी बात नहीं है। स्पष्ट है कि इस प्रकार के उग्र विचारों को फैलाने में ” वंदेमातरम ” की विशेष भूमिका रही थी। उन दिनों वंदेमातरम का बोलना अपने आप को राष्ट्रवादी के रूप में प्रस्तुत करना होता था। किसी भी व्यक्ति के मुंह से यदि कोई व्यक्ति वंदेमातरम का उद्घोष सुन लेता था तो उसके प्रति वह स्वयं ही आकर्षित हो जाता था। लाल – बाल- पाल का इस वंदे मातरम को अपनाना उनके लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ। इसे आप इस प्रकार भी कह सकते हैं कि लाल – बाल – पाल के द्वारा इस नारे को अपनाने पर यह जनसाधारण की जिव्हा पर आ गया। बड़े नेताओं का अनुकरण सामान्य रूप से जनसाधारण किया करता है। जब देश के लोगों ने देखा कि हमारे बड़े नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ,लाला लाजपत राय और विपिन चंद्र पाल वंदे मातरम का प्रयोग कर रहे हैं तो उन्होंने भी उनका अनुकरण करते हुए इस जयघोष को जनसाधारण का जयघोष बना दिया।
इस प्रकार वंदेमातरम उन दिनों क्रांति की मशाल बन गया था। लोगों को देश – धर्म पर अपना बलिदान देने के लिए प्रेरित करने वाला प्रकाश पुंज बन गया था। राष्ट्र धर्म पर मर मिटने की भावना का प्रतीक बन गया था। क्रांति की इस मशाल की लौ से अनेक युवाओं को प्रेरणा मिली। नई ऊर्जा मिली। जिससे देश का क्रांतिकारी आंदोलन तेजी से आगे बढ़ा। वंदे मातरम् बोलना देश-धर्म पर मर मिटने के लिए अपने आप को समर्पित करना होता था।

कांग्रेस के मंच से गाया जाता रहा वंदे मातरम

सर दिनशॉ एडुलजी वाचा की अध्यक्षता में सन् १९०१ में कांग्रेस का अधिवेशन कोलकाता में संपन्न हुआ। वह एक पारसी राजनीतिज्ञ थे। जो कि कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उनकी अध्यक्षता में संपन्न हुए कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन में ‘ वंदेमातरम ‘ गीत को श्री चरणदास के द्वारा फिर से गाया गया था। इसी अधिवेशन में पहली बार गांधी जी भी उपस्थित हुए थे। तब तक उन्हें कोई लोकप्रियता प्राप्त नहीं हुई थी। गांधी जी एक अनजान से व्यक्ति के रूप में इस अधिवेशन में सम्मिलित हुए थे। क्योंकि इस संगठन के बारे में उन्होंने सुन रखा था, इसलिए इसके वार्षिक अधिवेशन में उपस्थित होने के लिए चले गए थे। इस अधिवेशन में सर फिरोजशाह मेहता, लोकमान्य बी.जी. तिलक, जी.के. गोखले जैसे कई नेता उपस्थित रहे थे। जिनसे मिलने का सौभाग्य गांधी जी को मिला। इस प्रकार कई बड़े नेताओं की उपस्थिति में ‘ वंदेमातरम ‘ को यहां पर प्रस्तुत किया गया था। गांधी जी सहित किसी भी नेता ने इस जीत पर किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की थी। १९०१ के इस अधिवेशन में ‘ वंदेमातरम ‘ को एक परंपरा के रूप में मान्यता प्राप्त हुई और इसके बाद हर अधिवेशन में यह गीत गाया जाने लगा।

सरला देवी चौधुरानी और वंदेमातरम

१९०५ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन बनारस में आयोजित किया गया था। इस राष्ट्रीय अधिवेशन में ‘ वंदेमातरम ‘ को गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर की भतीजी श्रीमती सरला देवी चौधुरानी द्वारा प्रस्तुति दी गई थी। वह अपने समय की एक सुविख्यात शिक्षाविद महिला थीं। भारत के स्वाधीनता आंदोलन में उनका विशेष योगदान रहा था। उन्होंने महिला शक्ति के संगठन पर विशेष कार्य किया था। जिससे उनके द्वारा जब ‘ वंदे मातरम ‘ को गाया गया तो महिला शक्ति ने इसे बड़ी तेजी से अपनाया। उनके भीतर एक वीरांगना के भाव थे और देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी। यही कारण था कि श्रीमती सरला देवी चौधुरानी को पंजाब में ‘ पंजाब की शेरनी’ के नाम से जाना जाता था।
श्रीमती चौधुरानी का एक अच्छा राजनीतिक अनुभव रहा था। अबसे पहले भी उन्होंने कांग्रेस संगठन की सेवा की थी।

सन १९०१ के अधिवेशन के बाद से इस गीत को कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन के अवसर पर निरंतर अगले कई वर्ष तक गाया जाता रहा। श्रीमती सरला देवी चौधुरानी ने महिला शक्ति को राष्ट्रीय आंदोलन के साथ जोड़ने में विशेष भूमिका का निर्वाह किया। इस पवित्र कार्य में उनकी अन्य महिला साथियों ने भी उनका भरपूर साथ दिया था। वे राष्ट्रगीत के प्रारंभिक दौर की गायिका थीं। ‘ भारत स्त्री महामंडल ‘ की स्थापना कर उन्होंने अपने भीतर छुपी विशेष संगठन शक्ति का परिचय दिया था। उनके इस प्रकार के कार्यों से नारी शक्ति के बीच भी ‘ वंदेमातरम’ ने अपनी पैठ बनाई। उनके नारी जागरण के कार्यों से महिला सशक्तिकरण की प्रक्रिया को बलवती करने में सहायता मिली। बड़ी संख्या में नारी शक्ति राष्ट्रीय आंदोलन के साथ आकर जुड़ी। महिलाओं ने भारत की प्राचीन परंपरा का निर्वाह करते हुए ‘ वंदेमातरम’ कहते हुए आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया।

बंगाल का विभाजन और वंदेमातरम

१९०५ ईस्वी में अंग्रेजों ने बंगाल का सांप्रदायिक आधार पर विभाजन किया, जिसका राष्ट्रवादी नेताओं , संगठनों, संस्थानों की ओर से तीखा विरोध किया गया। लोग सड़कों पर उतर आए और बंगाल के इस सांप्रदायिक आधार पर किए गए विभाजन को ( जिसे इतिहास में बंग-भंग के नाम से जाना जाता है ) तुरंत वापस लेने के लिए ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाया जाने लगा। हमारे देश के नेताओं ने बंगाल विभाजन को हिंदू – मुस्लिम एकता में दरार डालने वाला ब्रिटिश सरकार का एक षड़यंत्र पूर्ण कदम माना।
वीर सावरकर ने भी उस समय बंग भंग के विरोध में विदेशी वस्तुओं की होली जलाने का काम किया और स्वदेशी व स्वराज्य के समर्थन में अनेक ओजस्वी भाषण दिए। आगे चलकर १९०७ में उन्होंने १८५७ की क्रांति के ५० वर्ष पूर्ण होने पर उस क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता आंदोलन कहकर एक पुस्तक लिखी।

इस पुस्तक को लिखने के लिए उन्हें बंग – भंग के आंदोलन में ‘ वंदे मातरम ‘ के माध्यम से एक विशेष प्रेरणा मिली थी। जब उन्होंने देखा कि लोग वंदे मातरम कहकर किस प्रकार एक नई ऊर्जा से भर जाते हैं ? लोगों के भीतर ऊर्जा के संचार को उन्होंने और अधिक गति देने के लिए १८५७ की क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता आंदोलन घोषित कर ओजस्वी शैली में वह पुस्तक लिखी तो उसके पश्चात भारत के क्रांतिकारी आंदोलन में और अधिक उफान आ गया। बंग- भंग के प्रकरण को लेकर उन्होंने स्पष्ट घोषित किया कि यह अंग्रेजों की चाल है। जिससे हिंदू और मुस्लिम धर्म की जड़ों को कमजोर किया जा सके। सावरकर जी ने इस विभाजन का विरोध किया और हिंदू – राष्ट्र की अवधारणा के अंतर्गत सभी भारतवासियों को एक सांझा संस्कृति के आधार पर जोड़ने का प्रयास किया।

अंग्रेजों को डर लगने लगा था

६ अगस्त १९०५ को बंग-भंग के विरोध में कोलकाता के टाउन हॉल के पास हमारे क्रांतिकारियों द्वारा एक विशेष सभा का आयोजन किया गया। जिसकी सूचना मिलने पर लगभग ३०००० लोगों का जनसैलाब वहां एकत्र हो गया। इतनी बड़ी संख्या में लोगों का एक साथ मिलकर वंदे मातरम का जय घोष करना अंग्रेजों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती थी। उनके लिए बहुत बड़ा संदेश था कि भारत के लोग किसी भी प्रकार के आतंक अथवा अत्याचार से डरने वाले नहीं हैं। इसलिए अंग्रेजों को अपनी दमनकारी और जनविरोधी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए।

जब इन सभी लोगों ने सामूहिक रूप से वंदे मातरम का गान किया तो अंग्रेजों के पैरों के तले की धरती के खिसक गई थी। वह समझ गये थे कि भारत में शीघ्र ही १८५७ की क्रांति की पुनरावृति हो सकती है । वास्तव में अंग्रेज १८५७ की क्रांति के पश्चात भारत के लोगों से और विशेष रूप से क्रांतिकारियों से बहुत अधिक भयभीत रहते थे। भारत के लोगों को उन्होंने इस क्रांति के समय ही सबसे पहले अपने उग्र रूप में देखा था। यद्यपि १८५७ की क्रांति के पश्चात प्रतिक्रांति के समय अंग्रेजों ने लगभग डेढ़ करोड़ भारतवासियों की हत्या कर डाली थी, परंतु इसके उपरांत भी डर तो डर ही होता है। इसलिए उन्हें अब भारत के लोग प्रतिक्षण क्रांति करते हुए दिखाई देने लगे थे।
यही कारण था कि जब बंग-भंग के विरोध में टाउन हॉल की सभा में उन्होंने भारत के लोगों को ३०००० की संख्या में एकत्र हुए देखा तो उन्हें बुरे सपने आने लगे। इस समय जब लोगों ने सामूहिक रूप से ‘ वंदेमातरम ‘ का गान किया तो अंग्रेजों को इस गीत से भी डर लगने लगा था। लोगों ने अति उत्साह का प्रदर्शन करते हुए इस समय ‘ वंदेमातरम ‘ संप्रदाय का भी गठन कर लिया था। इससे पता चलता है कि ‘ वंदे मातरम ‘ उस समय हमारे देश के लोगों के लिए कितना प्रिय हो गया था ?

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )

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