वीरभूमि पाटलिपुत्र मगध के भौगोलिक एवं ऐतिहासिक घटनाक्रमों का वास्तुशास्त्रीय विवेचन

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रामेन्द्र पाण्डेय

राज्यों के उत्थान एवं पतन के वर्णन से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं जिनमें कुछ पन्ने इतिहास के गौरवशाली अतीत की याद दिलाते हैं। मगध का इतिहास भी भारतवर्ष के लिए गौरवमयी रहा है। मगध के उत्थान एवं पतन दोनों ने भारतवर्ष के राजनैतिक, सामाजिक जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। मगध के इतिहास ने भारतीय उपमहाद्वीप के साथ-साथ यूरोप एवं एशियाई देशों के भी सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, धार्मिक स्थितियों में बड़े परिवर्तन किए हैं। ऐतिहासिक घटनाक्रमों के साथ साथ भौगोलिक परिवर्तनों को इतिहासकारों तथा भूगोलवेत्ताओं द्वारा सदा वर्णित किया गया है, परन्तु भौगोलिक परिवर्तनों तथा ऐतिहासिक घटनाक्रमों का वास्तुशास्त्रीय सम्बन्ध एक नयी विधा है। इतिहास एवं भूगोल का तादात्म्य वास्तुशास्त्र के नियमों के साथ स्थापित करने की विधि एक नवीन परम्परा को जन्म देती है, जिसमें परिवर्तनों एवं घटनाक्रमों की प्रमाणिकता आवश्यक तत्व है।

महाजनपद काल के पूर्व मगध प्रभावशाली साम्राज्य नहीं था। काशी, वत्स, वैशाली आदि महाजनपद मगध को अपने समान न मानते हुए सम्बन्ध स्थापित नहीं करते थे। मगध में रहने वालों को अन्य महाजनपद के लोग कीकट, जंगली, असभ्य, असुर लुटेरा, हत्यारा आदि शब्दों का प्रयोग करते थे। इतिहासकारों के अनुसार मगध की प्रजा का वैशाली आदि महाजनपदों में प्रवेश भी अवांछनीय था। परन्तु भौगोलिक परिवर्तनों के कारण मगध की भूमि में क्षत्रिय वर्ण के गुणों की वृद्धि हो रही थी। वास्तुशास्त्र के अनुसार अब मगध की भूमि में साम्राज्य का विस्तार व सम्राटों की पराक्रमी भूमिका में वृद्धि आवश्यक हो गया था।

लगभग 2600 वर्ष पूर्व के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक परिवर्तनों का वास्तुशास्त्रीय दृष्टिकोण से विश्लेषण नए तथ्यों को उजागर करता है। आवश्यकता है इन वैज्ञानिक तथ्यों को राष्ट्रहित एवं जनहित में उपयोग करने की। आचार्य वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में भारतवर्ष के समस्त राज्यों का दिशाओं व नक्षत्रों के आधार पर 9 वर्गों में वर्गीकरण किया है। इस वर्गीकरण में मगध भारतवर्ष के पूर्व वर्ग अर्थात् पूर्व दिशा में स्थित है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी के आस-पास मगध महाजनपद के अन्तर्गत वर्तमान पटना, नालन्दा, गया, हजारीबाग, औरंगाबाद, जहानाबाद, भोजपुर, रोहतास, कैमूर आदि जिले के क्षेत्र होते थे।

नदियों के मार्ग में परिवर्तन प्रकृति की एक स्वाभाविक भौगोलिक प्रक्रिया है, जिसका अध्ययन भूगोलवेत्ताओं द्वारा होता रहा है। इन परिवर्तनों के कारण उस स्थान के आकार तथा मिट्टी के रंग, रूप एवं संरचना में हुए परिवर्तनों की व्याख्या के साथ साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं धार्मिक परिवर्तनों को भी भूगोल विषय के नियमों में आबद्ध करने की भूगोलवेत्ताओं की विशद परम्परा रही है।

पाटलिपुत्र के ऐतिहासिक घटनाक्रमों व भौगोलिक परिवर्तनों में वास्तुशास्त्र की वैज्ञानिक धारणाएं स्पष्ट होती दिखाई हैं। इसी क्रम में वास्तुशास्त्र में वर्णित भूमि के क्षत्रिय वर्ण के गुण व उस पर निर्मित राजधानी व भवन शासन-तन्त्र को विशेष प्रभावित करते दिखते हैं।

पूर्वाप्लवा च रक्ता च कुशदर्भैरलंकृता।।

रक्तगन्धा च या भूमि: क्षत्रियाणां प्रशस्यते।

जो भूमि रक्तवर्ण हो, रक्त जैसी गन्ध देने वाली हो, कुश से युक्त हो तथा जिसका ढलान पूर्व दिशा की ओर हो, वह भूमि क्षत्रियों के लिए प्रशस्त होती है।

वास्तुशास्त्रीय विवेचन में भूमि के रंग, रूप, जल प्रवाह व नगर नियोजन महत्वपूर्ण हैं। भौगोलिक परिवर्तनों के कारण भूमि में परिवर्तन आता है, जिसका प्रभाव सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक आदि भूगोलवेत्ताओं द्वारा परिभाषित किए गए हैं। मगध की भूमि के रंग व नदियों की बदलती हुई धाराओं ने भी मगध में सामाजिक, राजनैतिक कई परिवर्तन दिये। वत्स एवं अंग महाजनपदों के मध्य बसे मगध महाजनपद के उत्तर में गंगा, पूर्व में चम्पा एवं पश्चिम में सोना नदियां बहती थीं। भूगोलवेत्ताओं के अनुसार गंगा एवं सोन नदियों की विशाल जलधाराएं अपना मार्ग बदलती रही हैं। उत्तर में प्रवाहित गंगा की विशाल जलधाराएं अपना मार्ग बदलती रही हैं। उत्तर में प्रवाहित गंगा की विशाल धारा आज भी वर्षा के दिनों में लगभग 6 से 24 कि.मी. की चौड़ाई में दिखती है।

सोन नदी के भारी जल-प्रवाह और उसकी विशालता के कारण प्राचीन साहित्य में इसे नदी के स्थान पर ‘नदÓ के रूप में वर्णित किया गया है। प्राचीन यूनानी लेखक स्ट्रैबो के सन्दर्भ से अलेक्जेंडर कनिंघम ने इसे इरन्नोबोस (अर्थात् हिरण्यवाह) नाम से वर्णित किया है। मगध की पश्चिमी सीमा पर प्रवाहित सोना नदी विन्ध्य व कैमूर की पहाडिय़ों से निकलकर मगध के मैदानी क्षेत्र में ही प्रवेश करती थी। पहाड़ी क्षेत्रों में निश्चित मार्ग वाली विशाल जल-धारा मगध के मैदानी क्षेत्र में पहुंचते ही उन्मुक्त हो जाती थी, न पहाड़ों का मार्गावरोध न तटबन्धों का।

भौगोलिक अध्ययनों से ज्ञात होता है कि महाजनपद काल से पूर्व मगध की पश्चिमी सीमा पर (वर्तमान आरा शहर के पश्चिम में) दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित सोना नदी की धारा में नासिरीगंज के पास परिर्वतन हुआ और वहां से पूर्व उत्तर दिशा की तरफ बहती हुई फतुहा के पास गंगा में मिली। पुन: इस धारा में कियुल के पास परिवर्तन हुआ और सोन नये मार्ग से फतुहा के पास गंगा में मिली भूगोलवेत्ताओं के अनुसार भारतीय इतिहास में बुद्धकाल अथवा महाजनपद काल के नाम से प्रसिद्ध समय में नदी की धारा ने पुन: अपनी दिशा में परिवर्तन किया तथा चिलबिली, बैरिया से होती हुई पाटलिग्राम के अति निकट क्षेत्रों को प्रभावित करती हुई पूर्व दिशा में फतुहा के पास गंगा में मिली। सोन की धारा में नासिरीगंज के पास पुन: परिवर्तन हुआ और यह एक नये मार्ग सैदाबाद, विक्रमगंज के पास से होती हुई चिलबिली के पास अपनी पुरानी धारा में मिल गयी। रावेन्शा ने भी यह सिद्ध किया है कि निश्चयात्मक रूप से सोन नदी पहले पटना शहर के ठीक ऊपर गंगा में मिल जाती थी। सोन की अन्य सहायक नदियां, मोहिनी, पुनपुन, चन्दन आदि भी गंगा के समानान्तर पूर्व दिशा में प्रवाहमान थीं। मगध के मैदानी क्षेत्र में सोन का प्रवाह अब सीधे उत्तर दिशा में न होकर पूर्वोत्तर एवं पूर्व दिशा की तरफ हो गया।

इस प्रकार सोन की विशाल धारा बदलने से बहुत बड़ा क्षेत्र प्रभावित हुआ। कैमूर पठार की मिट्टी लाल बलुआई है। लाल बुलुआई मिट्टी वाले कैमूर पठार से निकलकर सोन मगध के मैदानी क्षेत्रों के के ऊपर लाल रंग बालुका की परत दर परत चढ़ाती रही। इन भौगोलिक परिवर्तनों के कारण मगध की भूमि लाल वर्ण वाली भूमि में परिवर्तित होती जा रही थी। गया-औरंगाबाद क्षेत्र की मिट्टी के साथ साथ मगध जनपद के अधिकांश क्षेत्रों में भी मिट्टी का वर्ण लाल पाया जाता था। इस प्रकार लाल रंग की मिट्टी वाले भू-क्षेत्र में वृद्धि हुई। मगध के मैदानी क्षेत्र में उत्तरोत्तर लाल रंग की मिट्टी के क्षेत्र में वृद्धि हो रही थी तथा नदियों के पूर्व दिशा की ओर प्रवाह में भी।

भूमि पर जल प्रवाह पूर्व दिशा की ओर हो तथा मिट्टी का रंग लाल हो ऐसी भूमि की संज्ञा वास्तु-शास्त्र में ‘क्षत्रिया ‘ होती है। यह भूमि क्षत्रिय वर्ण के गुणों को प्रभावी बनाती है। ऐसी भूमि पर क्षत्रिय वर्णोचित कार्य सुगमता एवं सफलता पूर्वक किए जाते हैं अर्थात् राज्य एवं राजा की अभिवृद्धि होती है। जो भूमि गहरे लाल रंग का हो और जल का बहाव पूर्व की ओर एवं भूमि पर पूर्व की ओर जल बहता हो, रंग गहरा लाल हो और अश्वत्थ वृक्षों से समन्वित हो, वह क्षत्रियों के लिए हितकारी होता है।

पाटलिपुत्र के निकटवर्ती क्षेत्र में गंगा पूर्व दिशा में प्रवाहमान थी व सोन और इसकी सहायक नदियों का जल प्रवाह भी पूर्व दिशा में परिवर्तित हो गया था तथा सोन की लाल बालुका के कारण मिट्टी भी रक्तवर्णा हो गयी। ‘पूर्वप्लवा रक्तवर्णाÓ पाटलिग्राम की भूमि पर कुश भी उगे हुए थे। चाणक्य के पैर में कुश धंसने पर कुश की जड़ में म_ा डालने का प्रसंग मिलता है। वास्तुशास्त्र की दृष्टि से पाटलिग्राम में सर्वाधिक क्षात्र-धर्म का गुण आ गया।

अब पाटलिग्राम की भूमि राजधानी बनने के लिए तैयार थी। गंगा, गण्डक और सोन नदियों के संगम पर बसे पाटलिग्राम में राजधानी की नींव के रूप में दुर्ग-निर्माण अजातशत्रु द्वारा हुआ। सुनीथ एवं वस्सकार नामक अमात्यों को राजगृह से वैशाली जाते समय महात्मा बुद्ध ने नगर मापन करते देखा था। पाटलिग्राम के उपासकों ने एक अवस्थागार के उद्घाटन समारोह के अवसर पर बुद्ध को भी आमन्त्रित किया था। आर्यमंजुश्रीमूलकल्प के अनुसार मगध का राज्य 300 योजन से बढ़कर 500 योजन हो गया। भगवती सूत्र में 9 लिच्छवियों, 9 मल्लों तथा कासी-कोसल के 18 गणराजाओं के संघ का परास्त करने का वर्णन मिलता है (नव मल्लह, नव लेच्छई, कासी कोसलगा अ_ारसवी गणरायाणों पराजइत्था)। अजातशत्रु के शासनकाल में मगध का विस्तार होता रहा।

वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से सर्वाधिक क्षात्र-धर्म वाली पूर्वप्लवा एवं रक्तवर्णा भूमि पर पाटलिपुत्र नगर का निर्माण हुआ। अन्य महाजनपदों की राजधानियों की अपेक्षा क्षत्रिय वर्ण का वास्तुशास्त्रीय गुण पाटलिपुत्र में सर्वाधिक था। पाटलिपुत्र सभी महाजनपदों की राजधानियों व राजगृह से समृद्ध एवं ताकतवर बनता गया।

पाटलिपुत्र की क्षात्र-धर्म वाली भूमि अयोग्य राजाओं को नकारती रही। सोन व गंगा की बदलती धाराओं के कारण भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों में परिवर्तन के फलस्वरूप मगध के विस्तार का सिलसिला अनवरत रहा। किसी अन्य महाजनपद द्वारा मगध पराजित नहीं हुआ। पाटलिपुत्र के राजधानी बनने के बाद इस प्रक्रिया को और भी बल मिला। मगध के शासक यदि विस्तार नहीं दे सकते थे तो अपदस्थ होना आवश्यक हो गया। क्षात्र-धर्म वाली भूमि को क्षत्रिय जाति की आवश्यकता नहीं थी। क्षात्र वर्ण के गुणों से युक्त किसी भी जाति किसी भी कुल के व्यक्ति को मगध अपनाता रहा।

मगध के शासक असाधारण एवं विपुल धनसम्पत्ति के स्वामी बनते चले गये। देश के विभिन्न भागों से प्राप्त आहत मुद्राओं से इस काल की समृद्धि का संकेत मिलता है। कथासरित्सागर के अनुसार, नन्दों के पास 11 करोड़ स्वर्ण मुद्राएं थीं। मगध का व्यापार पश्चिमोत्तर क्षेत्र, हिमालय के पार के क्षेत्र एवं पश्चिमी एशिया के क्षेत्रों तक फैला। पाटलिपुत्र तक्षशिला और पश्चिमी एशिया के देशों से जुड़ गया। तक्षशिला से प्राप्त आहत सिक्के व्यापारिक सम्बन्धों की पुष्टि करते हैं।

कथासारित्सागर और बृहत्कथामंजरी के उल्लेखों के अनुसार, लक्ष्मी के साथ-साथ सरस्वती भी पाटलिपुत्र को विभूषित कर रही थीं। वर्ष, उपवर्ष, पाणिनि, कात्यायन, वररूचि, व्याडि जैसे प्रसिद्ध एवं उद्भट विद्वान् मगध की धरती पर शास्त्र की परम्परा को भी आगे बढ़ा रहे थे। राजशेखर की काव्यमीमांसा के अनुसार ‘पाटलिपुत्र समस्त शास्त्रकारों तथा विभिन्न दर्शन पद्धतियों के संस्थापकों की परीक्षा का केन्द्र था। मगध की धरती पर शास्त्र की परम्परा भी आगे बढ़ती रही।

अब मगध की भूमि को अपने वास्तुशास्त्रीण गुण के अनुरूप ही शासक का वरण करना आवश्यक हो गया था। भारतीय इतिहास में धननन्द का वर्णित चरित्र पाटलिपुत्र की भूमि को स्वीकार नहीं था। ई.पू. 344 में महापद्मन्द उग्रसेन द्वारा स्थापित परम प्रतापी नन्द वंश को 22 वर्षों की अल्प अवधि में ही गद्दी से पदच्युत होना पड़ा। चन्द्रगुप्त मौर्य ने ई.पू. 323 में धननन्द की हत्या कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। राजनीति, कूटनीति, अर्थशास्त्र के साथ-साथ वास्तुशास्त्र के भी महान् ज्ञाता राष्ट्रवादी चाणक्य को मगध की मिट्टी ने तक्षशिला त्यागने को मजबूर किया। चाणक्य व चन्द्रगुप्त का अभ्युदय मगध की भूमि पर एक साथ हुआ। मगध की भूमि ने अपने गुणों के अनुरूप क्षत्रिय वर्ण वाले चाणक्य (ब्राह्मण जातीय) एवं चन्द्रगुप्त मौर्य को वरण किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी चाणक्य ने वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के लिए अपने कौटिलीय अर्थशास्त्र में भूमिछिद्रविधान, जनपद-निवेश, दुर्गविधान, दुर्गनिवेश, निशान्त-प्रणिधि आदि नामक कई अध्यायों का सृजन किया और चन्द्रगुप्त के लिए मगध की भूमि पर पूर्णरूपेण उपयोग भी। चाणक्य सर्वप्रथम आचार्य हैं जिन्होंने सुरक्षित दुर्ग के बारे में वास्तु के सिद्धान्तों का विस्तार से विवेचन किया। के.ए. नीलकण्ठ शास्त्री के अनुसार, ”….कौटिल्य ने जहां कहीं भी नीति का विवेचन किया है, उसने प्रजाहित को प्रथम स्थान दिया है। मौर्य शासन पद्धति का प्रधान उद्देश्य प्रजा का सतत् कल्याण एवं सुख था।ÓÓ चाणक्य के काल में प्रजा का सतत् कल्याण एवं सुख की अनुभूति समस्त इतिहासकार करते हैं और यह अनुभूति चाणक्य के वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के उपयोग का प्रतिफल था।

राजगृह एवं पाटलिपुत्र की भूमि में एक भयंकर दोष चला आ रहा था। शासक या तो पूर्व शासकों के हत्यारे होते थे या पितृहन्ता। यह तत्कालीन क्षात्र-धर्म की समझ थी या समस्या, परन्तु इस दोष की समाप्ति चाणक्य द्वारा वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के प्रयोग करने के कारण हुई। नगर-निवेश एवं दुर्ग का निर्माण सभी कुछ वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुरूप किया गया। फलस्वरूप पूर्व शासक की हत्या व पितृहन्ता का दोष पाटलिपुत्र की भूमि पर समाप्त हुआ। (वास्तुशास्त्र की उपेक्षा के बाद इसकी पुनरावृत्ति देखी गयी।)

क्षात्र-धर्म वाली भूमि पर वास्तुशास्त्र के अनुसार नगर संरचना और दुर्ग निवेश से मगध साम्राज्य के सम्राटों के वैभव, पराक्रम, ऐश्वर्य सभी में वृद्धि हुई तथा पितृहन्ता का दोष भी समाप्त हुआ। वास्तुकला का विकास भी अपनी चरम सीमा पर दिखाई देता है। इतिहास के पन्नों में अंकित है कि सम्राट् अशोक ने कलिंग की लड़ाई के पश्चात बौद्ध धर्म अपना लिया था। कठोर सम्राट अब बहुत ही दयालु व उदार हो गया था। निश्चित ही सैकड़ों शासकीय भवनों के निर्माण व नगर नियोजन पर भी सम्राट की उदारता का प्रभाव पड़ा। शासकीय व्यवस्था में, चाणक्य की परम्परा की जगह बौद्ध मतावलम्बियों का प्रभाव भी स्वाभाविक ढंग से हुआ।

अब नई व्यवस्था में प्राचीन परम्परा से हटकर निर्माण का कार्य हुआ। वास्तुशास्त्र की प्रचलित परम्पराओं में बदलाव भी स्वाभाविक था। अलग दिखाई देने की धारणा ने उन्हें प्रचलित वास्तुशास्त्र के नियामों की अवहेलना की होगी। कौटिल्य के व्यावहारिक वास्तु (नगर संरचना आदि) नियमों की अनदेखी हुई। तत्कालीन समय में चाणक्य द्वारा स्थापित परम्परा जो कि वैदिक थी से बौद्ध-परम्परा में भिन्नता होने के कारण भवनों के निर्माण में भिन्नता आई होगी। नवीन भवनों के निर्माण वास्तुशास्त्र के अनुसार न होने से इन भवनों में भी क्षात्र धर्म में कमी आ गई। अब पाटलिपुत्र के नगर व दुर्ग दोनों में ही क्षात्र धर्म में कमी आ गई।

इधर सोन नदी भी अपनी धारा बदलती रही। सोन नदी पूर्व से पश्चिम की तरफ बढ़ती गई अर्थात् पाटलिपुत्र की भूमि अब पहले की तरह पूर्व की ढालुआं नहीं रही। परिणामत: वास्तुशास्त्रीय नियमों के अनुरूप क्षात्र-धर्म में कमी आ गई। अब पाटलिपुत्र की भूमि, नगर व दुर्ग में पहले की तरह क्षात्र-धर्म का गुण नहीं रहा। नगर एवं दुर्ग के विकास की परिवर्तित प्रक्रिया ने, नदियों की धाराओं ने क्षात्र-धर्म में कमी ला दी।

मगध की राजधानी-क्षेत्र पाटलिपुत्र में क्षात्र-धर्म की कमी के कारण मगध के ऐश्वर्य, पराक्रम, साम्राज्य विस्तार सभी में कमी होना स्वाभाविक हो गया। परिणाम मगध का साम्राज्य कई खण्डों में बंट गया व उनकी राजधानियां कई स्थानों पर स्थापित हो गयीं। मौर्यों द्वारा स्थापित मगध का अखण्ड साम्राज्य विखण्डित हो गया। मगध साम्राज्य और उसकी सैन्य शक्ति में किसी प्रकार की कमी नहीं हुई, फिर भी मगध विखण्डित हो गया।

इस प्रकार मगध की भूमि पर भौगोलिक परिवर्तनों द्वारा हुए भूमि के गुणों में उत्पन्न परिवर्तनों के अनुरूप ही ऐतिहासिक घटनाक्रम के विवरण घटित हुए जो भूमि के वास्तुशास्त्रीय गुणों को प्रमाणित करते हैं।

स्थापत्यम्: वास्तु विज्ञान पर एक अतुलनीय शोध पत्रिका

भवन निर्माण भारत की चौंसठ कलाओं में से एक महत्वपूर्ण कला है। भवन निर्माण की कला पर अपने देश में प्राचीन काल से ही काफी काम हुआ है और कई बड़े-बड़े ग्रंथों की रचना की गई है। दुर्भाग्यवश अपने देश की ऐसी सभी प्राचीन कलाओं को उनकी भाषा नहीं समझ पाने और अपनी साम्राज्यवादी नीतियों के कारण आधुनिक यूरोपीय विद्वानों ने नकार दिया और उन्हें अंधविश्वास तक की संज्ञा दे दी। मध्य काल के अविद्वान पंडितों द्वारा इन कलाशास्त्रों में किए गए मिथ्याचारों ने उनके इन आरोपों को और पुष्ट किया। भारत की भवन निर्माण की प्राचीन कला वास्तु के साथ भी यही कुछ हुआ है। या तो लोग इसे सिरे से खारिज कर देते हैं या इसे एक अंधविश्वास के साथ अपनाते हैं। इसे विज्ञान के रूप में स्वीकार व स्थापित करने वाले लोगों की काफी कम या नगण्य है। विज्ञान की दृष्टि से वास्तु को समझने की कोशिश करने वाले एक ऐसे ही विभूति हैं श्री रामेंद्र पांडे।

श्री रामेंद्र पांडे दिल्ली स्थित वास्तु सदन के अध्यक्ष हैं और लगभग 30 वर्षों से वास्तु पर शोध कर रहे हैं। वास्तु के क्षेत्र में श्री रामेंद्र पांडे एक बड़ा हस्ताक्षर हैं। उनकी अध्यक्षता में वास्तु सदन में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं अनुसंधानशालाओं के साथ मिल कर वास्तु शास्त्र को वैज्ञानिक स्वरूप में प्रस्तुत करने का कार्य किया जा रहा है। श्री रामेंद्र पांडे ने वास्तु शास्त्र का केवल किताबी अध्ययन नहीं किया है। उसके सिद्धांतों को जांचने के लिए उन्होंने देश भर का भ्रमण किया है। बड़े बड़े भवनों, मंदिरों, बाजारों और शहरों से लेकर छोटे-छोटे गांवों, कस्बों आदि की खाक छानी है। पुराने वास्तुशास्त्रीय सिद्धांतों को प्रत्यक्ष की कसौटी पर कसा है और उन्हें पुनस्र्थापित किया है। अपने इस व्यापक शोध का लाभ वे वास्तु के जिज्ञासुओं को कराते रहते हैं, परंतु यह लाभ केवल कुछ लोगों तक ही सीमित न रहे और वास्तु का एक विज्ञान के रूप में प्रचार किया जा सके, इसके लिए उन्होंने स्थापत्यम् के नाम से एक शोध पत्रिका प्रारंभ की है।

अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशित स्थापत्यम् मासिक पत्रिका का ध्येय वाक्य है जर्नल ऑफ द इंडियन साइंस ऑफ आर्किटेक्चर एंड एलायड साइंस यानी भारतीय भवननिर्माण शास्त्र और संबंधित विज्ञान की शोध पत्रिका। यह ध्येय वाक्य ही वास्तु की वैज्ञानिकता को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। वास्तु कोई टोने-टोटके की चीज नहीं है, वह भवन निर्माण की कला का विज्ञान है। आज जिसे हम आर्किटेक्चर कहते हैं, उसे ही प्राचीन काल में वास्तु कहा जाता था। चिकने, मोटे आर्ट पेपर पर प्रकाशित स्थापत्यम् पत्रिका का कलेवर अत्यंत आकर्षक और सामग्री अत्यंत ही सारगर्भित हैं। सारे आलेख काफी शोधपरक और सरल भाषा में हैं। चित्रों से इस जटिल विषय को सरल बना दिया गया है। शोध छात्रों के अलावा सामान्य पाठक भी स्थापत्यम् को पढऩे का आनंद उठा सकते हैं। यहां हम स्थापत्यम् में ही प्रकाशित एक शोध-आलेख का संक्षिप्त अंश प्रकाशित कर रहे हैं। यह आलेख वास्तु के अनुसार भूमि के प्रकारों का वर्णन करता है और बतलाता है कि किस प्रकार वास्तु के बदलने से हमारा इतिहास प्रभावित हुआ है।

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