वैश्विक चुनौतियां और भारत की विकास दर

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

देखा जाए तो इस दौरान रियल एस्टेट, फायनेंस और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी विकास दर रही है। अब देश में त्यौहारी सीजन आरंभ हो जाने से यह माना जा रहा है कि दिसंबर तक देश की अर्थ व्यवस्था कुलाचे भरने की स्थिति में रहेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि विपरीत हालातों के बावजूद देश की आर्थिक विकास दर के आंकड़े लगातार उत्साह जनक सामने आ रहे हैं। खास बात यह है कि चालू वित्तीय वर्ष के पहली तिमाही के आंकड़े आशा से अधिक बेहतर रहने के साथ ही पिछले वित्तीय वर्ष की चारों तिमाही से अधिक रहे हैं। यह सब तो तब है जब दुनिया के देश अभी आर्थिक संकट के दौर से ही गुजर रहे हैं। पड़ोसी पाकिस्तान के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं तो अन्य देशों की अर्थ व्यवस्था भी हालातों से जूझ रही है। दरअसल कृषि क्षेत्र बड़ा सहारा बन कर उभर कर आता रहा है। हालांकि आने वाली तिमाही कृषि क्षेत्र के लिए अनुकूल इसलिए नहीं मानी जा सकती कि देश में मानसून धोखा देता दिखाई दे रहा है। देष के अधिकांश हिस्सों में मानसून के आंकड़े निराशाजनक आ रहे हैं। यह सर्वविदित है कि खरीफ की फसल लगभग पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है और मानसून ने जिस तरह से अगस्त माह में बेरुखी दिखाई है उससे कृषि जगत में निराशा आई है। मौसम विज्ञानियों की मानें तो सितंबर माह में भी मानसून के जो संकेत मिल रहे हैं वह निराशाजनक ही आ रहे हैं। किसानों की ललाट पर चिंता की रेखा साफ दिखाई दे रही है। अब तो मानसून की बेरुखी से सरकार भी चिंता में आ गई है।

दरअसल कृषि क्षेत्र इस मायने में महत्वपूर्ण हो जाता है कि देश में सर्वाधिक रोजगार के अवसर कृषि क्षेत्र से ही आते हैं तो कृषि क्षेत्र ने भारतीय अर्थ व्यवस्था को बड़ा सहारा दिया है। कोरोना काल में कृषि क्षेत्र ने अर्थ व्यवस्था ही नहीं बल्कि देश के लोगों खासतौर से गरीब लोगों को जो राहत दी है वह अतुलनीय रही है। आज भी देश के गोदाम अन्न धन से भरे हैं तो देश कम से कम अन्नधन को लेकर तो बेफ्रिक है। हालांकि कृषि क्षेत्र के लिए चुनौती भरा समय आ गया है पर देश के अन्नदाता की मेहनत पर सबको भरोसा है। दरअसल चालू वित वर्ष की पहली तिमाही के जो आंकड़े एनएसओ ने जारी किए हैं वह उत्साहवर्द्धक हैं। जारी आंकड़ों के अनुसार जून 23 तिमाही में कृषि क्षेत्र में मूल्य सवंर्द्धन 3.5 फीसदी रहा है जो एक साल पहले की इसी अवधि के 2.4 प्रतिशत से कहीं अधिक है। यह परिणाम समग्र प्रयासों से ही संभव हो सके हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो अप्रैल-जून तिमाही जीडीपी में वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत रही है हालांकि आरंभिक अनुमान 8 प्रतिशत से नीचे रहने के बावजूद अर्थ व्यवस्था के सकारात्मक दिशा में बढ़ने के तो स्पष्ट संकेत हैं ही।

देखा जाए तो इस दौरान रियल एस्टेट, फाइनेंस और सर्विस सेक्टर में भी अच्छी विकास दर रही है। अब देश में त्यौहारी सीजन आरंभ हो जाने से यह माना जा रहा है कि दिसंबर तक देश की अर्थ व्यवस्था कुलाचे भरने की स्थिति में रहेगी। बाजार में मांग बढ़ेगी तो इससे उत्पादन और वितरण दोनों ही क्षेत्रों में अर्थ व्यवस्था में उछाल आयेगा। कोराबारियों की मानें तो त्यौहारी सीजन में बाजार और अधिक गुलजार रहेगा और अर्थ व्यवस्था को पंख लगेंगे। हालांकि मानसून की बेरुखी का असर भी देखने को मिल सकता है। ऐसे हालातों में कृषि से इतर अन्य सेक्टरों को बेहतर परिणाम देने होंगे ताकि आर्थिक विकास की दर बनी रहे। थोड़ा चिंतनीय इसलिए अवश्य है कि पहली तिमाही में निर्यात और विनिर्माण क्षेत्र में सुस्ती दिखाई दी है। ऐसे में चुनौतियां और अधिक हो जाती हैं।

हालांकि माना यह जा रहा है कि मानसून की बेरुखी के बावजूद अर्थव्यवस्था पर इसलिए ज्यादा असर नहीं पडना चाहिए क्योंकि सरकार ने खेती किसानी के लिए योजनाबद्ध प्रयास किए हैं और सिंचाई सुविधा का विस्तार करने से फसलों को बचाया जा सकेगा। हालांकि यह तात्कालिक समाधान ही हैं क्योंकि इसे नकारा नहीं जा सकता कि अर्थ व्यवस्था को मानसून अवश्य प्रभावित करता है। बस उस असर को कम करने के प्रयास हो सकेंगे। विश्व व्यापी खाद्य संकट का असर दुनिया के देशों में सफ दिखाई दे रहा है। हमारे यहां से भी गेहूं और चावल के निर्यात को हतोत्साहित किया गया है। पिछले दिनों टमाटर के भावों की नई ऊंचाइयों को देशवासी देख चुके हैं। टमाटर दो सौ पार तो अदरक को चार सौ का आंकड़ा छूते देखा है। लगभग सभी खाद्य पदार्थों के भावों में तेजी देखने को मिल रही है। रोजमर्रा के खर्च खासतौर से रसोई के खर्च में बढ़ोतरी चिंता का सबब बनती जा रही है।

भले ही हमारी आर्थिक विकास दर संभली हुई ही नहीं अपितु बढ़ रही है। पर चिंता के कारण यथावत हैं। जो हालात अंतररास्ट्रीय स्तर पर देखने को मिल रहे हैं उससे अधिक आशा की जानी बेमानी ही होगी। अपितु अर्थ व्यवस्था के क्षेत्र में जो सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं उसे सकारात्मक ही माना जाएगा क्योंकि दुनिया के हालात जस के तस हैं। देश में जहां चुनावों की तैयारी चल रही है वहीं वन नेशन वन इलेक्शन से नई परिस्थितियां आने वाली हैं। चुनावों के बाद सामान्यतः महंगाई बढ़ती ही देखी गई है तो दूसरी और विदेशों के हालात देखें तो रूस यूक्रेन युद्ध समाप्ति के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। चीन की बौखलाहट सामने है तो अमेरिका और योरोपीय देशों के आर्थिक व राजनीतिक हालात कोई आशाजनक नहीं दिखाई दे रहे हैं। इन सबके बीच प्राकृतिक आपदाओं और आतंकवादी गतिविधियों का दौर जारी है। ऐसे में आने वाले दिनों में दुनिया के देशों के आर्थिक हालात को लेकर कोई आशा नहीं की जा सकती।

ऐसे में चालू साल की पहली तिमाही में बेहतर विकास दर के बाद अब अधिक चुनौतियां इसलिए सामने आ गई हैं कि मानसून, चुनाव, त्यौहार और अन्य कारण आने वाले दिनों में अर्थ व्यवस्था के लिए चुनौती पूर्ण होंगे और ऐसे में अभी से संभल कर चलना होगा ताकि विकास दर के स्तर को बनाये रखा जा सके। यह सरकार और अर्थशास्त्रियों के सामने बड़ी और गंभीर चुनौती होगी।

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