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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

जानिए अब तक के उपराष्ट्रपतियों के बारे में

यू.पीए. की ओर से सोनिया गांधी ने उपराष्ट्रपति पद के लिए निवर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को ही अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है। हामिद अंसारी का दूसरी बार इस पद के लिए उम्मीदवार बनना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि वह राष्ट्रपति पद के कितने प्रबल दावेदार थे। उनकी पत्नी ने अजमेर की दरगाह पर चादरें वैसे ही नहीं चढ़ाईं थीं, बल्कि जब दावेदारी मजबूत होती चली गयी थी तो उस समय ये कुछ धार्मिक अनुष्ठान भी याद आ ही गये थे। अपनी दावेदारी पर प्रणव की पकड़ सफल होती देखकर अंसारी असंतुष्ट चल रहे थे। वह राष्ट्रपति बनते बनते रह गये और उनकी राष्ट्रपति बनने की हार्दिक इच्छा भी थी, इन्हीं दो बातों से प्रेरित होकर तथा 2014 के लोकसभा चुनावों के दृष्टिगत एक मुस्लिम को संप्रग की ओर से पुन: एक मौका दिया गया है। वैसे अंसारी साहब का अपना कार्यकाल अविवादित रहा है। उन्होंने राज्यसभा की कार्यवाही सही ढंग से चलाई। इस उम्मीदवारी पर हठीली और रूठनी दीदी ममता ने अपनी ओर से असहमति व्यक्त की है, जबकि राजग अपना प्रत्याशी लाकर इस पद के लिए चुनाव कराना चाहता है। दोनों की अपनी अपनी राजनीति है। अंसारी ने दूसरी बार एक विजित होते हुए उम्मीदवार के रूप में उपराष्ट्रपति पद के लिए मैदान में आकर इतिहास रचा है। यदि वह चुनाव जीतते हैं तो वह पूर्व राष्ट्रपति राधाकृष्णन के पश्चात पहले उपराष्ट्रपति होंगे जिन्हें यह पद निरंतर दूसरी बार मिलेगा। राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद के समय में 13 मई 1952 से लेकर मई 1962 तक इस पद पर लगातार दो बार एस. राधाकृष्णन रहे थे। राधाकृष्णन 13 मई 1962 को राष्ट्रपति बन गये थे तो फिर डा. जाकिर हुसैन (1962-67) उपराष्ट्रपति बने। उनके राष्ट्रपति बनने पर पद बीच में ही रिक्त हो गया था। ये पहले उपराष्ट्रपति थे जिन्होंने लगभग दो वर्ष तक ही उपराष्ट्रपति के रूप में कार्य किया। क्योंकि राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन का 3 मई 1969 को देहांत हो गया था। तब कांग्रेस ने 1969 में अपनी ओर से नीलम संजीवा रेड्डी को चुनाव मैदान में उतारा। लेकिन इंदिरा गांधी ने अपने विरोधियों को धूल चटाने के लिए उपराष्ट्रपति वी.वी.गिरि को देश के संवैधानिक प्रमुख के पद का प्रत्याशी बनाया। इसलिए वी.वी.गिरि ने 20 जुलाई 1969 को अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। पहली बार देश में यह स्थिति बनी कि देश में राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति कोई नही था। इसलिए विधिवत यह व्यवस्था की गयी कि ऐसी परिस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वाह करेगा। अत: जस्टिस एम. हिदायतुल्लह ने 20 जुलाई 1969 से 23 अगस्त 1969 तक इन पदों का दायित्व निर्वाह किया। इसके पश्चात गोपालस्वरूप पाठक देश के उपराष्ट्रपति बने। यह पहले उपराष्ट्रपति थे जिनके रहते उपराष्ट्रपति को ही राष्ट्रपति बनाने की अब तक की परंपरा टूट गयी। इंदिरा गांधी ने फखरूद्दीन अली अहमद को देश का राष्ट्रपति बनवा दिया और गोपाल स्वरूप पाठक के स्थान पर बी.डी. जत्ती देश के उपराष्ट्रपति बने अली अहमद का भी पद पर रहते 11 फरवरी 1977 को देहांत हो गया था। तब जनता पार्टी की सरकार थी। मोरारजी देसाई ने वी.वी. गिरि के सामने राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ चुके नीलम संजीवा रेड्डी को देश का पहली बार निर्विरोध राष्ट्रपति बनवाया, बी.डी. जत्ती के लिए इस कारण बनी बनाई परंपरा पुन: टूट गयी। बी.डी. जत्ती पहले उपराष्ट्रपति थे जिन्होंने उपराष्ट्रपति रहते हुए राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद की मृत्यु हो जाने पर पहली बार साढ़े पांच माह तक राष्ट्रपति के पद के दायित्वों का निर्वाह किया। उनसे पूर्व वी.वी.गिरि ने राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के उपरांत 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969 तक लगभग ढाई माह तक राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वाह किया था। वी.वी.गिरि के द्वारा 20 जुलाई 1969 को उपराष्ट्रपति पद से त्याग पत्र देने के पश्चात न्यायमूर्ति मौहम्मद हिदायतुल्लाह ने उपराष्ट्रपति पद को सुशोभित किया। जब यह न्यायाधीश रहते हुए कार्यकारी राष्ट्रपति बने थे तो उस समय 24 अगस्त 1969 को आपने वी.वी.गिरि को राष्ट्रपति पद की शपथ दिलाई थी। 1979 से 1984 तक अपने उपराष्ट्रपति पद की शोभा बढ़ाई। 1984 में आर. वेंकटरमण देश के उपराष्ट्रपति बने। वह 1989 तक देश के उपराष्ट्रपति रह सकते थे, लेकिन 1987 में उन्हें कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाया और लगभग 3 वर्ष तक उपराष्ट्रपति रहने के बाद वे 25 जुलाई 1987 को देश के राष्ट्रपति बन गये। तब डा. शंकर दयाल शर्मा को देश का उपराष्ट्रपति बनाया गया। उन्होंने 1987 से 1992 तक देश के इस प्रमुख पद के दायित्वों का बड़ी ही संजीदगी से निर्वाह किया। जब वह उपराष्ट्रपति थे उसी समय मई 1991 में लोकसभा के चुनाव हुए थे, चुनावों के दौरान 21 मई 1991 को राजीव गांधी की हत्या हो गयी थी। कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, तब डा. शर्मा के बारे में जैसा कि कांग्रेस के वरिष्ठ दिवंगत नेता अर्जुन सिंह ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पी.वी. नरसिंहाराव से पहले उनसे कहा गया था कि अब आप प्रधानमंत्री बन जायें। लेकिन उन्होंने इस पद को विनम्रता से ठुकरा दिया था। बाद में वह 25 जुलाई 1992 को देश के उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बने।डा. शर्मा ने उत्तराधिकारी बने एक राजनयिक डा. के.आर. नारायणन। इन्होंने 1992 से 1997 तक इस पद को सुशोभित किया। इन्हें भी पद पर रहते हुए प्रोन्नति दी गयी और ये देश के राष्ट्रपति (25 जुलाई 1997 को) बन गये। 1997 में डा. के.आर. नारायण के उत्तराधिकारी बनाये गये भाजपा पृष्ठभूमि के कृष्णकांत। उन्हें भाजपा ने 2002 में उपराष्ट्रपति से राष्ट्रपति बनने का अवसर नही दिया। परिस्थितियों को देखकर तथा कुछ अपनी राजनीतिक गोटियों को फिट बैठाने के लिए भाजपा ने डा. ए.पी.जे. कलाम को देश का राष्ट्रपति बना दिया। कृष्णकांत मनमसोसकर रह गये। उन्हें गहरा सदमा लगा और वह हृदय गति रूकने से मृत्यु को प्यारे हो गये। कृष्णकांत के उत्तराधिकारी के रूप में आये भैंरो सिंह शेखावत। 2002 से 2007 तक वह पद पर कार्यरत रहे। उन्होंने राष्ट्रपति पद का चुनाव कांग्रेस प्रत्याशी डा. प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के सामने लड़ा पर वह हार गये। तब उनकी जगह वर्तमान उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी आये। जो अब निरंतर दूसरी बार उपराष्ट्रपति बनने जा रहे हैं?अब तक कुल 12 व्यक्तियों ने देश के उपराष्ट्रपति पद को सुशोभित किया है। उपराष्ट्रपति पद की 13 बार शपथ दिलाई गयी है। जिनमें डा. राधाकृष्णन ऐसे व्यक्ति रहे हैं जिन्होंने लगातार दो बार इस पद की शपथ ग्रहण की है। अब उस परंपरा में हामिद अंसारी का नाम आना तय जान पड़ता है। क्योंकि मतदाता के निर्वाचक मंडल में उनका पलड़ा भारी दीख रहा है। अब तक के उपराष्ट्रपतियों में वह सौभाग्यशाली हैं क्योंकि उनका जाना तय लग रहा था। लेकिन वह मुकद्र के सिकंदर निकले और राजनीतिक परिस्थितियों ने उन्हें फिर से एक अवसर उपलब्ध करा दिया।

उपराष्ट्रपति का निर्वाचक मण्डल

उपराष्ट्रपति के लिए चुनाव राष्ट्रपति के चुनाव की भांति आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार ही होता है। लेकिन इसमें राज्यों के विधानमंडल भाग नही लेते। संसद के दोनों सदनों के सदस्यों को ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 66 (1) उपराष्ट्रपति का निर्वाचक मंडल घोषित करता है। उपराष्ट्रपति होने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए तथा उसकी आयु पैंतीस वर्ष से ऊपर होनी चाहिए। वह किसी लाभ के पद पर कार्यरत नहीं होना चाहिए।

उपराष्ट्रपति की पदावधि

उपराष्ट्रपति की पदावधि पांच वर्ष है। वह अपनी इच्छा से पांच वर्ष पूर्ण होने से पूर्व भी पद त्याग कर सकता है। उसे राज्यसभा के सदस्य बहुमत से हटा सकते हैं। इस प्रकार के प्रस्ताव से लोकसभा का सहमत होना आवश्यक है। उपराष्ट्रपति को हटाने के लिए महाभियोग की आवश्यकता नही है। वह राज्यसभा का पदेन सभापति होता है। राष्ट्रपति की मृत्यु होने पर पद त्याग करने पर या पद से हटाये जाने पर वह तब तक राष्ट्रपति के पद के दायित्वों का निर्वाह करता है जब तक कि कोई नही व्यवस्था नही हो जाती है। जून 1960 में डा. राजेन्द्र प्रसाद 15 दिन की सोवियत रूस की यात्रा पर गये थे तो उस समय उनकी अनुपस्थिति में पहली बार डा. राधाकृष्णन ने उनके पदीय दायित्वों का निर्वाह किया था। कई 1961 में डा. राजेन्द्र प्रसाद बीमार पड़ गये थे तो उस समय उन्होंने संकट की स्थिति को समझते हुए स्वयं डा. राधाकृष्णन के लिए कह दिया था कि ऐसी स्थिति में वह मेरे पदीय दायित्वों का निर्वहन करें।जब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के दायित्वों का निर्वहन कर रहा होता है तब उसे वेतन आदि की उपलब्धियां वही मिलती हैं जो एक राष्ट्रपति को मिलती हैं, अन्यथा तो वह राज्यसभा के सभापति की उपलब्धियों का ही पात्र है। राष्ट्रपति पद की किसी आकस्मिक रिक्त स्थान को भरने के लिए ही उपराष्ट्रपति की आवश्यकता होती है। इसी लिए उसके चुनाव में लोकसभा के सांसद भी भाग लेते हैं। वह सीधे जनता के द्वारा नहीं चुना जाता, इसलिए वह संसद के उस उच्च सदन का ही सभापतित्व करता है। जिसके सांसद सीधे जनता से नहीं चुने जाते हैं। संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता उपराष्ट्रपति नही करता बल्कि लोकसभाध्यक्ष करता है। इसका कारण भी ये ही हैं कि संसद को जनता की प्रतिनिधि संस्था माना जाता है, इसलिए प्रत्यक्ष रूप से चुना गया जनप्रतिनिधि (लोकसभा का सांसद जो उस समय लोकसभाध्यक्ष है) ही ऐसे संयुक्त अधिवेशन की अध्यक्षता करता है। फिर भी उपराष्ट्रपति का पद बहुत ही महत्वपूर्ण है।

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