अंधे क्या ढोएंगे इस राष्ट्र को!

अपना राष्ट्र एक भूमि का टुकड़ा ही तो नही है न वाणी का एक अलंकार है और न मस्तिष्क की कल्पना की एक उड़ान मात्र है। वह एक महानतम जीवंत शक्ति है, जिसका निर्माण उन करोड़ों अरबों जनों की शक्तियों को मिलाकर हुआ है। जैसे समस्त देवशक्तियों को एकत्र कर बलराशि संचित की गयी और उसे परस्पर जोड़कर एकता स्थापित की गयी जिसमें से भवानी महिष-मर्दिनी प्रकट हुई। वह शक्ति जिसे हम भारत, भवानी माता कहकर पुकारते हैं। अरबों लोगों की श्क्तियों का जीवंत एवं जाग्रत स्वरूप है, परंतु आज वह अपनी ही संतानों के बीच तमस, अज्ञान स्वाथलोलुपता के वशीभूत होकर कराह रही है। आज अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। इस राष्ट्र ने अपनी आंखों से क्या कुछ नही देखा। कभी इसने अपने ही आंगन में ऋषियों को तपस्या करते देखा इसी ने ऋषियों को पोषण दिया और ऋषियों ने राष्ट्र को विकसित करने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। बलिदानियों की लंबी एवं पुण्य परंपरा रही है इसे विकसित करने में। ऋषियों ने राष्ट्र निर्माण हेतु तप किये और अपनी देह, मन एवं प्राणा सर्वस्व को जला दिया। इसके पुण्यभाव से राष्ट्र समृद्घ और शक्तिशाली कहलाने योग्य बना। समस्त विश्व में इसकी पुण्य पताका आसमानों की बुलंदियों को चूमती रही। अपने राष्ट्र की नींव में बलिदानी प्रथा परंपरा रही है। भगीरथ ने गंगा अवतरण कर अपने पूर्वजों का उद्घार करने एवं राष्ट्र को एक नवीन वरदान देने के लिए अपनी पीढिय़ा होम कर दी। एक या दो नही कई पीडिय़ां इसमें खप गयीं तब कहीं जाकर राष्ट्र को गंगा के रूप में बेशकीमती, अनमोल एवं दैवीय उपहार उपलब्ध हो सका। इस राष्ट्र की रग रग में ज्ञान की धारा प्रवाहित करने हेतु शंकर से शंकराचार्य तक मंथन किया। पाणिनि ने व्याकरण रचा, पंतजलि ने योगदर्शन किया, वाल्मिीकि ने रामायण की रचना की, व्यास जी ने महाभारत रचाा, कृष्ण ने गीता गाई। स्वामी विवेकानंद एवं श्री अरिविंद ने इस धारा को वर्तमान युग तक प्रवाहित किया।
राष्ट्र में संवेदना एवं भक्ति का सजल प्रवाह प्रवाहित करने के लिए मीरा, रसखान, नानक, दादू, रज्जव ने अबोल स्वरों को स्वर कर दिया और भक्ति की नई तान छेड़ दी, वर्तमान भक्ति साहित्य में यह देखा जा सकता है। इसका जीवंत प्रतिमान वैदिक नारी गार्गी, अपाला घोषा से लेकर रानी लक्ष्मीवाई, दुर्गावती, पद्यावती तक ने शौर्य साहस एवं पराक्रम की नूतन गाथा लिख दी। राष्ट्र, का आर प्रत्येक क्षेत्र जो उन्नत एवं विकसित हो सका, उसने पीछे अनेक शूरवीरों एवं पराक्रमियों की कुर्बानी सन्निहित है। इसके लिए अपनी पीढिय़ां झोंक दी गयी और राष्ट्र के विभिन्न आयामों का विकास संभव हो सका।
स्वाधीनता के पूर्व तक पराधीन राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिए चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह और क्रांतिकारियों की पूरी पीढ़ी समाप्त हो गयी और इन्हीं के बलिदानों के कारण सैकड़ों वर्षों तक अपना राष्ट्र पराधीनता के घोर दुर्दिन झेलता रहा। जिस प्रकार व्यक्ति का कर्म ही पाप और पुण्य बनकर उसे सुख दुख प्रदान करता है, ठीक उसी प्रकार राष्ट्र के भाग्य एवं दुर्भाग्य, योग एवं दुर्योग बनकर प्रकट होते हैं। स्वाधीनता के पूर्व इस राष्ट्र के दुर्योग एवं दुर्भाग्य बनकर प्रकट होते हैं। स्वाधीनता के पूर्व इस राष्ट्र के दुर्योग एवं दुर्भाग्य को काटने के लिए तमाम योगी, तपस्वी तप में निरत रहते थे और भौतिक रूप से राष्ट्र की बलिवेदी पर बंदा वैरागी से लेकर राजगुरू, बिस्मल, भगतसिंह आदि अपने प्राणों को हंसते हंसते न्यौछावर कर देते थे। इसी के पुण्य प्रभाव से राष्ट्र का दुर्योग छंटता था। राष्ट्र के पराधीनता रूपी दुर्भाग्य को काटने में रमण महर्षि, श्री अरविंद, विवेकानंद आदि ने तप करके सूक्ष्म जगत में हलचल मचा दी। स्वामी विवेकानंद ने स्थूल और सूक्ष्म दोनों रूपों में राष्ट्र निर्माण की पटकथा लिख दी। तभी जाकर इस राष्ट्र को अभूतपूर्व स्वतंत्रता मिल सकी। राष्ट्र की स्वाधीनता के साथ ही बलिदानी प्रथा समाप्त हो गयी। स्वाधीन राष्ट्र की सत्ता को भोगने के लिए वह सब कुछ किया जा रहा है, जिसे दृग देखना पसंद नही करते, कान श्रवण नही कर सकते और बुद्घि हारकर पस्त हो जाती है। सत्ता का सुख भोगने के लिए तो घुड़दौड़ मची है। परंतु इस राष्ट्र में भ्रष्टाचार, पापाचार हिंसा, हत्या, बलात्कार आदि से जो भोग चढ़ रहा है उसे काटने के लिए कौन भला सोच रहा है। कौन इस संदर्भ में विचार कर रहा है, किसे इसकी चिंता है? स्वाधीनता के साथ हमने अपने बाह्य शत्रुओं को तो भगा दिया, परंतु उन आंतरिक शत्रुओं को क्या कहा जाए, जो हमारे अंदर घर कर गये हैं और ये हैं हमारी मुख्यत: कमजोरियां, हमारी कायरता, हमारी स्वार्थपरता, हमारा मिथ्याचार और हमारी अंधी भावुकता।
आज हमारा उद्देश्य राष्ट्र के उत्थान एवं विकास से संबंधित नही है। केवल अपना एवं अपने क्षुद्र स्वार्थ की पूर्ति के लिए भीषणतम पापाचार एवं भ्रष्टाचार हमारी मानसिकता में घर कर गया है। हमारा उद्देश्य भ्रांतिपूर्ण है। हमने जिस भावना को लेकर आगे बढऩे का संकल्प उठाया है। यह सच्चाई और एकनिष्ठता से कोसों दूर है, हमने जिन तरीकों को चुना है वे सही नही हैं। हमने अपने राष्ट्र को जिन नेताओं के कंधों पर रखा है वे कंधे ही जर्जर एवं रोग ग्रसित है। हम ऐसे लोगों पर ही आज निर्भर हैं। ये क्या हमारा भविष्य सुधारेंगे।
परंतु इस सबके बावजूद ऐसी कौन सी शक्ति है जो हमारे राष्ट्र को अक्षुण्ण एवं जीवित बनाये रखे हुए है। यह सृजन शक्ति हमें, हमारे युवाओं की पूरी पीढ़ी को फिर से बलिदान करने के लिए ललकार रही है। पर चाहती है कि हमारे अंदर आक्रामक गुण, उड़ान भर्ती आदर्शवाद की भावना, उद्वत सृजन, निर्मल प्रतिरोध तथा प्रखर विवेक एवं सजल संवेदना एक साथ संवेदित हों।
एक आध्यात्मिक जीवन विश्व के भविष्य की प्रथम आवश्यकता है। हम केवल अपनी राजनीतिक और आध्यात्मिक स्वतंत्रता के लिए ही नही लड़ते, बल्कि मानव जाति के आध्यात्मि उद्घार के लिए संघर्ष करते हैं।
हमें स्वयं को बदलना होगा, जीवन को नूतन एवं आध्यात्मिक ढंग से परिभाषित करना होगा, क्योंकि अध: पतन और विनाशोन्मुख लोगों के बीच ऋषिगण और महान आत्माएं अधिक समय तक जन्म लेती नही रह सकतीं।

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