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आज का चिंतन हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

वज्र से कठोर तथा फूलों से कोमल थे स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज

कन्हैया लाल आर्य, उपप्रधान आत्मशुद्धि आश्रम बहादुरगढ़
संस्कृत साहित्य के एक उज्ज्वल रत्न थे आचार्य भवभूति जी। इन्होंने एक उत्तम पुस्तक की रचना की है जिसका नाम है ‘उत्तर राम चरितम्’। इस पुस्तक में भवभूति जी ने भगवान राम का उस समय का वर्णन किया है जब उनकी धर्मपत्नी सीता जी का अपहरण हो जाता है, उस समय भगवान् राम वहां पर वन के वृक्षों, वहां विद्यमान पक्षियों, पशुओं, वनस्पतियों, पर्वतों, नदी-नालों से भावविहल होकर सीता का पता पूछते हैं। उस समय सीता की एक सखी वासन्ती राम के इस कोमल रूप को देखकर आश्चर्य प्रकट करते हुए कहती है-
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादाये।
लोकोत्तराणां चेतांसी को हि विज्ञातुमर्हति।।
उत्तम पुरुषों का चरित्र वज्र से भी कठोर और फूलों से भी कोमल होता है, उसे जानने में कौन समर्थ हो सकता है? अर्थात् वासन्ती ने जिस राम के वज्र स्वरूप को देख रखा हो वह उसके कुसुम रूप को देखकर आश्चर्य व्यक्त करती है इसी प्रकार हम जब अपने चरित नायक स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज के जीवन को देखते हैं तो हमें अनायास यह उक्ति उनके जीवन से सम्बन्धित लगती है। यदि उनके जीवन का निकटता से मूल्यांकन किया जाये तो वह यह है-
“नारिकेल समाकारा दृश्यन्ते हि सुहज्जना:”
जिस प्रकार नारियल ऊपर से कठोर होता है, परन्तु उसके अन्दर अमृत तुल्य जल एवं कच्ची गिरी होती है। इसी प्रकार स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज का जीवन नारियल की सही व्याख्या है।
“स्वामी रामेश्वरानन्द जी निःसन्देह कर्मयोगी थे। उन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलनों, हैदराबाद सत्याग्रह और विशेषतः पंजाब के हिन्दी सत्याग्रह में अपने साहस और कार्य कुशलता का जो परिचय दिया, वह हम सब जानते हैं। जबकि पंजाब में फूट की भयंकर अग्नि अकाली भाईयों की भूल से भड़कने वाली थी तो स्वामी जी ने अपनी त्यागपूर्वक बलिदानी भावनाओं से प्रेरित होकर जो मार्ग प्रशस्त किया है उससे हमें निःसन्देह गौरव प्राप्त हुआ है।”
यह उपरोक्त भावनाएं थी तत्कालीन सार्वदेशिक सभा के प्रधान स्वामी ध्रुवानन्द जी महाराज की। यह विचार उन्होंने स्वामी रामेश्वरानन्द जी की उस सफलता पर प्रकट किये थे जब स्वामी जी पंजाब के अकालियों विशेषकर मास्टर तारा सिंह की पंजाबी सूबा बनाने की हठधर्मी के कारण अनशन पर बैठने के विरुद्ध स्वयं भी आमरण अनशन पर बैठ गए तभी मास्टर तारा सिंह अपने कुचालों में असफल हुआ था और उसी का यह परिणाम था कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी ने मास्टर तारा सिंह को ‘जूते और झूठे बर्तन साफ करने’ का दण्ड दिया था।
जन्म, बचपन एवं संन्यास की दीक्षा-
उत्तर प्रदेश का बुलन्दशहर जनपद एक ऐसा सौभाग्यशाली स्थान है जिसने आर्य समाज की कई महान विभूतियों को जन्म देने का श्रेय प्राप्त है उनमें से एक थे स्वनामधन्य पूज्य स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज!
आपका जन्म बुलन्दशहर के छोटे से ग्राम कुरैव में जाखड़ गोत्र में रामरूप नाम से हुआ। आपका बचपन अत्यन्त दुःखद वातावरण में व्यतीत हुआ। छः मास की अवस्था में माता और दस-बारह वर्ष की आयु में पिता का देहान्त हो गया। माता-पिता के अभाव में आपके मन में वैराग्य के बीज उत्पन्न हो गये और भगवद् भजन में मग्न रहने के साथ साधु-महात्माओं का संग करने लगे। १४-१५ वर्ष की आयु में घर छोड़कर संन्यास लेने का निर्णय कर लिया। साधु सन्तों की संगति में आध्यात्मिक तृप्ति नहीं हुई तो आप संस्कृत की नगरी काशी में पहुंच गये और वहां गुजराती संन्यासी स्वामी कृष्णानन्द जी से संन्यास की दीक्षा लेकर स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती बन गये।
गुरु से मिलन-
आप अपनी आत्मा की तृप्ति के लिए वहां काशी में न टिक, अपितु काशी से प्रयाग, मथुरा, वृन्दावन होते हुए दिल्ली पहुंच गए। वहां यमुना नदी के किनारे एक सुरीली आवाज ने आपको आकर्षित किया। वहां जाकर देखा कि एक महात्मा अपने भजनोपदेश द्वारा तर्क पूर्ण बातें कर रहे हैं। वहां पर खड़े एक सज्जन ने इस महात्मा के बारे में बड़ी कड़वी बात कही, “हम तो पहले ही कहें थे आर्य समाजी कुत्ता हो कुत्ता, जिनके पीछे पड़ जाये छोड़ नाय।” यह वाक्य सुनकर स्वामी जी चौके और उस महाशय से पूछा, “कौन है आर्य समाजी?” वे सज्जन बोले, “तोय न पतो ये जो भौंक रहयो है, ये आर्य समाजी तो है।” यह सुनकर स्वामी रामेश्वरानन्द जी सिर से पैर तक कांप गये, क्योंकि उन्होंने सुन रखा था, जो आर्य समाजी की बात सुन लेता है, वह नरक में जाता है। अब बात सुनना तो दूर, आर्य समाजी के दर्शन भी हो गये, अब मेरा क्या होगा कुछ देर कि कर्त्तव्यविमूढ़ से खड़े रहे, आंखों के आगे अन्धेरा छा गया। फिर मन में आय कि नरक में तो जाना ही जाना है, कम से कम इस बाबा की बात तो सुन लें। यह विचारकर महात्मा जी के व्याख्यान को अन्त तक सुना और सभा की समाप्ति पर उनसे प्रार्थना की कि वह मुझे अपना शिष्य बन लें। यह महात्मा कोई और नहीं थे ये थे स्वामी भीष्म जी महाराज। इस प्रकार उनकी यह यात्रा अपने गुरु के मिलन के साथ पूर्ण हो गई। ये वह स्वामी भीष्म जी थे जिन्होंने अपने जीवन के १२३ वर्ष के दीर्घ जीवन में आर्यसमाज के अनेक रत्न, महोपदेशक, विद्वान् एवं भजनोपदेशक दिए हैं जिनमें मुख्य स्वामी रामेश्वरानन्द जी, स्वामी ओमानन्द जी जैसे संन्यासी हैं।
गुरुकुल की स्थापना तथा सेवा कार्य-
स्वामी भीष्म जी का ऐसा प्रभाव पड़ा कि जो व्यक्ति केवल रामायण और हनुमान चालीसा का पाठ करने में ही मोक्ष मानता था अब वह न केवल भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का एक सेनानी बना, अपितु हैदराबाद सत्याग्रह और हिन्दी सत्याग्रह आन्दोलन का अगुआ नेता भी बना। नमक सत्याग्रह में जेल गये। उस समय उनका एक ही नारा था- “नमक कानून तोड़ दिया, अंग्रेजों का सिर फोड़ दिया’ पुलिस ने जाल बिछाकर उन्हें उस जेल में बन्दी बनाया जिसमें पं० जवाहर लाल नेहरू बन्दी थे। स्वामी जी राष्ट्रीय आन्दोलन में तो कूद ही चुके थे, इसके साथ ही वे महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा निर्दिष्ट गुरुकुल प्रणाली को भी मूर्तरूप देना चाहते थे। अपने गुरु स्वामी भीष्म जी की प्रेरणा एवं अपने प्रिय शिष्य आचार्य धर्मवीर के सहयोग से १७ अप्रैल १९३९ को विधिवत करनाल के निकट घरौण्डा में एक गुरुकुल की स्थापना की। १५ अगस्त १९४७ को तो देश स्वतन्त्र हो गया। धार्मिक उन्माद के कारण देश को कई यातनाओं का सामना करना पड़ा। स्वामी जी ने पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) से आए शरणार्थियों की जहां अन्न, वस्त्र से खूब सहायता की वहां अपने निकटवर्ती सारे क्षेत्र को मुसलमानों से मुक्त करा लिया।
कार्यक्षेत्र-
१९३९ में जब हैदराबाद के धर्मान्ध नवाब द्वारा हिन्दुओं के साथ अन्याय किया तो आप सैकड़ों मील दूर होते हुए भी ७२ आर्यवीरों का एक जत्था लेकर नवाब की संगीनों एवं गोलियों का प्रहार सहन करने के लिए हैदराबाद पहुंच गये। हैदराबाद जेल में आप ने बहुत सारी यातनाएं सही परन्तु ऋषि दयानन्द का दीवाना बिल्कुल घबराया नहीं। नवाब के अन्याय के विरुद्ध सदैव अपने जीवन को आहुत करने में तत्पर रहा। देश के स्वतन्त्र होने के पश्चात् १९५७ में प्रताप सिंह कैरो ने अपना दमन चक्र हिन्दुओं पर चलाया तभी निर्णय लिया गया कि आर्य समाज हिन्दी और हिन्दुओं की रक्षा के लिए एक आन्दोलन चलाया जाये। उन दिनों स्वामी जी आर्य समाज गुड़गांव छावनी में वेदोपदेश कर रहे थे। आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब के प्रधान पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी महाराज एवं सभा मन्त्री पं० जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती जी के अलग-अलग दो पत्र स्वामी को मिले उसमें लिखा था-
“हमने आपको हिन्दी सत्याग्रह का द्वितीय सर्वाधिकारी नियुक्त किया है, हम आशा करते हैं कि आप हमारी इस प्रार्थना को अवश्य स्वीकार करेंगे।”
स्वामी जी ने एक अनुशासित सिपाही की तरह यह रण निमन्त्रण सहर्ष स्वीकार किया। स्वामी जी के इस आन्दोलन में कूदते ही पड़ोसी राज्यों में जोश का समुद्र उमड़ पड़ा। स्वामी जी को कई प्रकार से प्रताड़ित किया गया परन्तु यह नरपुगांव ‘रुकना झुकना क्या जाने’ की उक्ति को चरितार्थ कर रहा था। स्वामी जी कई मास तक जेलों में रहे। इसी बीच स्वामी आत्मानन्द जी रुग्ण हो गए। हिन्दी आन्दोलन को प्रचण्ड रूप देने के लिए श्री घनश्याम सिंह जी गुप्त की अध्यक्षता में नई दिल्ली में सर्वसम्मति से स्वामी जी को ‘हिन्दी रक्षा समिति पंजाब’ का प्रधान चुना गया। इसी बीच मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी सूबे की मांग को लेकर आमरण अनशन की घोषणा कर दी। सभी हिन्दी प्रेमी स्तब्ध रह गये। मास्टर तारा सिंह की धमकी का उत्तर देने के लिए पूज्य स्वामी जी महाराज ने अपना आमरण अनशन प्रारम्भ कर दिया। पूज्य स्वामी जी महाराज ने अपना आमरण अनशन तब तक चालू रखा जब तक भारत सरकार की ओर से उन्हें इस विषय में आश्वस्त नहीं कर दिया कि पंजाबी सूबा नहीं बनेगा। इस विषय में तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू जी ने स्वामी जी को सम्बोधित करते हुए लिखा था-
“प्रिय स्वामी जी, आपने मेरा लोकसभा का बयान देखा और आज जो मैंने लोकसभा में कहा उसको भी आप कल समाचार पत्रों में देखेंगे? इससे हमारी नीति साफ मालूम हो जायेगी। मैं तो समझता हूं कि आपको अपना अनशन छोड़ देना चाहिए और मैं आशा करता हूं कि यह आप करेंगे।
आपका जवाहर लाल नेहरू २९/०८/१९६१ नेहरू जी द्वारा आश्वस्त किये जाने के उपरान्त स्वामी जी ने १६ अगस्त १९६१ से किया हुआ अपना आमरण अनशन ३१ अगस्त १९६१ को स्थगित कर दिया। उसी का परिणाम है कि आज भी वह पंजाबी सूबे के सपना उन दुष्टों का द्वारा सफल नहीं हो सका। इनकी उस सफलता पर लाला राम गोपाल शाल वाले जी ने कहा था, “मास्टर तारा सिंह जी के पंजाबी सूबे के स्वप्न को भस्मसात करने में जो शानदार काम महाराज श्री स्वामी रामेश्वरानन्द जी महाराज ने किया है, उसे भारत देश के निवासी तथा समूची आर्य जनता कभी नहीं भुलायेगी।”
संसद यात्रा-
इसी बीच लोकसभा के चुनाव घोषित हो गए। क्षेत्र के लोग एवं दूसरे-जिलों तथा प्रान्तों के लोग स्वामी जी को लोकसभा में पहुंचाने के लिए कटिबद्ध हो गए। तब उन्हें अपने गुरु स्वामी भीष्म जी महाराज का आदेश मिला तो वे करनाल संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीता और लोक सभा में संस्कृत भाषा में शपथ ग्रहण की। उनके सांसद बनने पर कुछ विरोधियों ने कहा, “यह साधु संसद में जाकर क्या करेगा?” परन्तु प्रथम अधिवेशन में ही स्वामी जी के प्रश्नों एवं भाषणों में तहलका मचा दिया। श्री स्वामी जी वेतन और भते के नाम पर जो कुछ संसद से मिलता था, वह सब अपने क्षेत्र के निर्धन व्यक्तियों की सहायतार्थ दे दिया करते थे। उन्होंने सांसद को फ्लैट व कोठी के रूप में मिलने वाली किसी भी सुविधा को स्वीकार नहीं किया। प्रतिदिन घरौण्डा से प्रातः काल ६ बजे चलने वाली रेलगाड़ी से दिल्ली आते थे। दिल्ली रेलवे स्टेशन से संसद भवन तक प्रायः पैदल ही आते थे और सायंकाल ६ बजे चलने वाली रेलगाड़ी से वापिस गुरुकुल घरौण्डा लौट आते थे। कभी कार्यवशात रात्रि में दिल्ली ठहरना पड़ता तो आर्य समाज सीताराम बाजार (अजमेरी गेट के पास) दिल्ली के अधिकारियों ने उनके ठहरने के लिए एक कमरा दे रखा था।
जब स्वामी जी ने संस्कृत में शपथ ली तो उनसे प्रभावित होकर ३३ अन्य सांसदों ने भी संस्कृत में शपथ ग्रहण की। यह एक अपूर्व दृश्य था। स्वामी जी से पूर्व लोकसभा का समस्त साहित्य अंग्रेजी में छपता था। हस्ताक्षर पंजिका में सदस्यगण अंग्रेजी में हस्ताक्षर करते थे। स्वामी जी से प्रभावित होकर अन्य कई सांसदों ने न केवल हिन्दी में हस्ताक्षर करने प्रारम्भ किये। अपितु हिन्दी में कार्यवाही भी मुद्रित होनी प्रारम्भ हो गई।
संसद का एक संस्मरण कुछ समय पूर्व आर्य केन्द्रीय सभा दिल्ली के पूर्व प्रधान डॉ० शिव कुमार शास्त्री जी ने मुझे सुनाया वह इस प्रकार है-
स्वामी जी, महाराज संसद में अपना भाषण प्रारम्भ करने से पूर्व वेद मन्त्र का गान किया करते थे। आज लोकसभा के साहित्य में सैकड़ों वेद मन्त्र मुद्रित हो चुके हैं। १३ अप्रैल १९६१ को जब लोकसभा में अंग्रेजी को अनिश्चित काल तक सहभाषा के रूप में लाने का विधेयक सरकार ने रखा। स्वामी जी ने इसका पूर्ण विरोध किया। मार्शल द्वारा आपको बलपूर्वक संसद के शेष सत्र के लिए निकाल दिया। परन्तु धर्मधुनि स्वामी जी इतना अपमान सहन करने के पश्चात् भी हिन्दी की रक्षा के लिए और दृढ़ प्रतिज्ञ हो गये। भला परिश्रमी व्यक्ति कभी असफल होता है। अन्त में ‘सत्यमेव जयते’ के आधार पर स्वामी जी की विजय हुई और सरकार को अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी का अनुवाद भी प्रस्तुत करने की स्वीकृति देनी पड़ी।
श्री स्वामी जी श्रमिक वर्ण के प्रति भी सहानुभूति रखते थे चाहे वह खेत में हल चलाने वाला मजदूर हो या औद्योगिक क्षेत्र का सामान्य मजदूर। एक बार उनके संसदीय क्षेत्र यमुनानगर में श्री गोपाल पेपर मिल में मजदूरों पर अत्याचार हुए। स्वामी जी ने इस अत्याचार के विरोध में १० जनवरी से ४ फरवरी १९६४ तक पं० जवाहर लाल नेहरू प्रधानमन्त्री की कोठी पर धरना दिया।
आप ने २६ अप्रैल १९६५ से १० मई १९६५ तक लोकसभा के प्रांगण में गोवध के विरोध में अनशन किया। आप ७ नवम्बर १९६५ को संसद भवन पर गोभक्त प्रदर्शन कारियों को सम्बोधित करते हुए गिरफ्तार कर लिए गए और आप को तिहाड़ जेल में नजरबन्द कर दिया गया। १९६५ में आम चुनाव में आप मात्र १९ मतों से पराजित हो गए।
देश एवं आर्य समाज की विषम परिस्थितयों ने इस बूढ़े सिंह को घायल कर दिया। वृद्धावस्था के चिन्ह स्पष्टतया दिखाई देने लगे शरीर भी जर्जर हो गया। इसी बीच एक और वज्रपात हुआ कि उनका प्रिय शिष्य आचार्य पं० धर्मवीर शास्त्री जो उनसे ४० वर्ष छोटे थे, जिसको उन्होंने पुत्रवत पाला, पढ़ाया, अपना उत्तराधिकारी बनाया, वह दिवंगत हो गया। श्री स्वामी जी का शारीरिक क्षीणता के साथ-साथ उनकी मानसिक स्थिति भी खराब होने लगी। उनका स्वास्थ्य प्रतिदिन गिरता चला गया। डॉ० शिवकुमार शास्त्री जी ने बताया कि मैं ८ मई १९९० रात्रि के सात बजे आर्य समाज गुड़गांव में व्याख्यान देने के लिए जा रहा था कि गुरुकुल घरौण्डा के आचार्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी, तेजस्वी व्यक्तित्व के धनी डॉ० देवव्रत जी का फोन आया कि श्रद्धेय स्वामी जी महाराज का नश्वर शरीर नहीं रह। ९ मई १९९० को उनका अन्तिम संस्कार पूर्ण वैदिक रीति से किया गया।
देश के विभिन्न प्रान्तों में स्वामी जी के प्रति श्रद्धांजलि प्रकट करने के लिए शोक सभाएं हुई। संसद में उनकी स्मृति में मौन रखा गया।
श्रद्धेय स्वामी जी महाराज ने आर्य जाति की रक्षा, स्वतन्त्रता एवं अधिकारियों की रक्षा के लिए जीवन भर संघर्ष किया। गुरुकुल प्रणाली को प्रचारित कर अपने गुरु के प्रेरणा स्त्रोत अपने मार्ग दर्शक ऋषि दयानन्द जी को सच्ची श्रद्धांजलि दी। अपने शिष्यों को विद्वान् बनाया ‘भूयश्च शरद: शतात्’ वेद की इस सूक्ति को जीवन में चरितार्थ किया।
स्वामी रामेश्वरानन्द सरस्वती जी की स्वयं रचित इस गीतिका की कुछ पंक्तियों से अपनी इस लेखनी को विराम दे रहा हूं।
हे ब्रह्मन संसार में क्या यह समय होगा कभी।
ब्रह्मवर्चस्वी निज देश वासी विप्र गण होंगे कभी।
वृष्टि समय पर हो सदा सब औषधि फूले फले।
सब वस्तु से सम्पन्न हो सब वेद मार्ग पर चलें।।
[स्त्रोत- आत्म-शुद्धि-पथ मासिक का मई २०१९ का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

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