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भारतीय संस्कृति

*रामेश्वरम मंदिर -समीक्षा*

डॉ डी के गर्ग

पौराणिक मान्यता – रामेश्वरम मंदिर तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में स्थित है। यह तीर्थ हिन्दुओं के चार धामों में से एक है। रामेश्वरम के विख्यात मंदिर की स्थापना के बारें में यह रोचक कथा है कि राम ने युद्ध के बिना सीताजी को छुड़वाने का बहुत प्रयत्न किए,और इस प्रयास के सफल ना होने पर विवश होकर उन्होने युद्ध किया। इस युद्ध हेतु राम को वानर सेना सहित सागर पार करना था, जो अत्यधिक कठिन कार्य था। तब श्री राम ने, युद्ध कार्य में सफलता और विजय के पश्चात कृतज्ञता हेतु भगवान शिव की आराधना के लिए समुद्र किनारे की रेत से शिवलिंग का अपने हाथों से निर्माण किया, तभी भगवान शिव स्वयं ज्योति स्वरुप प्रकट हुए और उन्होंने इस लिंग को श्री रामेश्वरम की उपमा दी। इस युद्ध में रावण के साथ, उसका पूरा राक्षस वंश समाप्त हो गया और अन्ततः सीताजी को मुक्त कराकर श्रीराम वापस लौटे।

यहां स्थापित शिवलिंग बारह द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है।रामेश्वरम् के विशाल मंदिर को बनवाने और उसकी रक्षा करने में रामनाथपुरम् नामक छोटी रियासत के राजाओं का बड़ा हाथ रहा। अब यह रियासत तमिलनाडु राज्य में मिल गई हैं।

विश्लेषण :- मनुष्य को सत्य को ग्रहण करने और असत्य के त्याग के लिए तत्पर रहना चाहिए । गप्प और अप्रमाणिक कथाएं आस्था का विषय नहीं होनी चाहिए।
रामेश्वरम् का यह मंदिर भारतीय निर्माण-कला और शिल्पकला का एक सुंदर नमूना है। इसके प्रवेश-द्वार चालीस फीट ऊंचा है। मंदिर के अंदर सैकड़ौं विशाल खंभें हैं, जो देखने में एक-जैसे लगते हैं ; परंतु पास जाकर जरा बारीकी से देखा जाय तो मालूम होगा कि हर खंभे पर बेल-बूटे की अलग-अलग कारीगरी है।
यह मंदिर मानव कृत है और इसकी मूर्तिया भी अच्छे कारीगर की कुशाग्र बुद्धि का परिचायक हैं।
अब कथानक पर चिंतन करते है।

प्रश्न : क्या राम ने शिवलिंग पूजा की थी?
(साभार आचार्य श्री राम शर्मा)

उत्तर ==जनता को भ्रम में डालने के लिए एक बेतुकी कथा यह उड़ाई गई की मर्यादा पुरुषोत्तम राम चन्द्र जी महाराज ने सेतुबंध रामेश्वरम में शिवलिंग पूजा की थी तथा उसे स्थापित किया था।
यदि इस कथानक पर विश्वास किया जाए तो फिर राम को जो लोग ईश्वर मानकर या ईश्वर का अवतार मानकर पूजते हैं ,इसमें दोष आ जायेगा। रामेश्वरम के शिवलिंग को अवतार स्वरूप रामचंद्र ने क्यों स्थापित किया ?
वाल्मीकि रामायण में ही राम का प्राचीनतम जीवन चरित्र है ,इस प्रकार का कोई लेख इसने नहीं है ,जिससे इस मिथ्या कहानी को समर्थन मिल सके।राम भगवान के समय में उस शिवलिंग वा मंदिर का नाम चिन्ह भी ना था किन्तु यह ठीक है कि दक्षिण भारत के राम नामक एक राजा ने रामेश्वरम का मंदिर बनवाया,इसलिए इस मंदिर और शहर का नाम रामेश्वर धर दिया है।
इतिहास में एक ही नाम के कई पात्र होते हैं ।राम भगवान आज से साढ़े नौ लाख साल पहले हुए थे।तब से लेकर अब तक ना जाने कितने राम नाम के व्यक्ति का भारत और विश्व भर में जन्म हुए होंगे। लोगों को इस कारण भ्रम हो गया कि राम ने शिवलिंग की पूजा की और यह शिवलिंग पूजा करने की बात स्वार्थी धूर्त लंपट पंडितों ने अपनी आजीविका के लिए उड़ाई थी। देखिए वाल्मीकि रामायण के लंका कांड में रामचंद्र जी के संबंध में वाल्मीकि जी ने क्या लिखा है:
‌जब राम चन्द्र सीता जी को विमान में ले हनुमान आदि के साथ श्री लंका से चल कर आकाश मार्ग में विमान पर बैठ कर अयोध्या को आते थे तब सीता माता से कहा है कि-हे सीते!तेरे वियोग से हम व्याकुल होकर घूमते थे और इसी स्थान पर चातुर्मास किया था और परमेश्वर (महादेव=जो देवों का देव है)की उपासना, ध्यान और संध्या भी किया करते थे। वहीं जो सर्वत्र विभू व्यापक देवों का देव महादेव परमात्मा है उस की कृपा से हम को सब सामग्री यहां प्राप्त हुई ।और देख!यह सेतु हम ने बांध कर लंका में आके ,उस रावण को मार ,तुझ को ले आए।इसके सिवाय वहां बाल्मीकि ने रामायण मेंअन्य कुछ भी नहीं लिखा है। बाल्मीकि जी ने रामायण में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं किया है कि राम जी ने शिवलिंग की पूजा की।
राम द्वारा शिव स्थापना का वास्तविक सत्य :=आपको ये जानकर आश्चर्य होगा की श्रीराम की विजय के लिए रावण से विजय हेतु यज्ञ करवाया था और इस यज्ञ में रावण ने सीता को दिया अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया था।
इसका विवरण ना तो बाल्मीकि रामायण में मिलता है और ना ही तुलसी की रामायण में। इसका विवरण ब्रह्मचारी कृष्ण दत्त के प्रवचन में मिलता है। जब महानंद जी से इस विषय में प्रश्न किया तब उन्होंने विस्तार से बताया।
श्री राम युद्ध से पूर्व एक विशेष यज्ञ करना चाहते थे जिसके लिए ब्रह्मा (पंडित) के रूप में उन्हें एक ऐसे विद्वान की आवश्यकता थी जिसको चारों वेदों के विस्तृत ज्ञान हो। राम ने अपने सहयोगियों से चर्चा की तो मालूम हुआ की रावण ही एक ऐसा विद्वान है जो यज्ञ संपन्न करवा सकता है।
फिर राम ने हनुमान के माध्यम से रावण से संपर्क किया और रावण इसके लिए तैयार हो गया। लेकिन रावण ने कहा की बिना पत्नी के यज्ञ कराना उचित नहीं है। फिर विमान द्वारा सीता को वहा लाया गया और राम -सीता ने रावण के द्वारा यज्ञ सम्पन्न मन किया।
फिर एक अन्य प्रश्न सामने आया की यज्ञ करवाने वाले पंडित को बिना दक्षिणा के यज्ञ संपन्न नहीं करवाना चाहिए। इसके लिए सीता ने अपने पास से एक स्वर्ण आभूषण रावण को दक्षिणा स्वरूप दिया।
इस प्रकार समुद्र के पास ,राम ने शिव (यानि निराकार ईश्वर ) की आराधना की।
ऋषियों ने कहा है – ‘अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः’ ।। (अथर्ववेद 9.15.14)
कि यज्ञ ही संसार की सृष्टि का आधार बिंदु है।

रामेश्वरम का मंदिर यह तो स्पष्ट है की ये वह स्थान हो भी सकता है जहाँ श्री राम ने अपनी पत्नी के साथ यज्ञ किया था।
ये समुंद्र से सटा हुआ शहर है ,और यही मंदिर भी है, मंदिर के ने समुंद्र में आप स्नान कर सकते हैं। समुद्र में आपको नहाने के समय अन्दर कुछ गंदगी मिलेगी और आपके पैरो में कपडे के टुकड़े आ सकते हैं क्योकि प्रथा है की स्नान के बाद अपने कपडे समुद्र में छोड़ जाते हैं। इसके अतिरिक्त मंदिर में लगभग २२ कुवे हैं जिनका पानी शरीर पर डलवाने के लिए पेमेंट देनी होती है। यदि पूरी बाल्टियां डलवानी है तो फीस ज्यादा होगी अन्यथा पानी सर पैर डलवाकर आगे बढ़ते जाओ। मैंने ध्यान से देखा तो लगा की ये पानी शायद टैंकरों द्वारा लेकर इनमे डाला जाता है। इसका क्या लाभ है ?ये किसी को नहीं मालूम ,सिर्फ अंधविश्वास है। मंदिर से कुछ दूरी पर मांस की दुकान थी ,जहाँ बकरे लटके हुए थे। मैंने ईश्वर से यही प्रार्थना की पहले इस स्थान को धार्मिक नगरी तो घोषित कराओ।

गप्प कथाओं का वास्तविक प्रभाव इस प्रकार की करायें उन स्वार्थी पंडों की आजाविका का साधन बन चुका है और वे इस हेतु अपनी इस असभ्य अश्लील और लंपट शिवलिंग पूजन को बंद होने देना नहीं चाहते।क्या ऐसा हो सकता है कि वह महान राम जो चारों वेदों का ज्ञाता और ईश्वर महादेव का भक्त था।
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम चन्द्र जी महाराज को बदनाम करने के लिए उन्हें भी शिवलिंग पूजक बता कर दुनिया में कलंकित करो।हिन्दू मत इसलिए बदनाम हुआ और वैदिक धर्म इसीलिए इस हिन्दू धर्म के विभिन्न मत संप्रदाय के अश्लील कार्यों से कलंकित हुआ जिसके फल स्वरूप मंदिरों जैसी धार्मिक स्थलों पर भी स्त्री पुरुष की कामुक दृश्य और अश्लील चित्रे उकेरी गईं ।उदाहरण के लिए आप विश्व प्रसिद्ध कामख्या मंदिर और खजुराहों के मंदिर का मुआयना कर आइए।अजंता एलोरा की नंगी नंगी मूर्तियों को कौन हिन्दू नहीं जानता ;अब समय है ऐसे अश्लील मंदिरों के पुनरुद्धार की।पूरी के जगन्नाथ मंदिर और कोणार्क मंदिर में भी यही अश्लील और नग्न मूर्तियां और उसमे विभिन्न प्रकार की चित्रकारी देखी जा सकती हैं जिसको हमारे स्वार्थी पंडे और नेता गन भारत की अनमोल विरासत बता कर भारत के प्राचीन सत्य सनातन वैदिक धर्म और संस्कृति को कलंकित करने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । इन मंदिरों में बनी नग्न मूर्तियों और चित्रों का हवाला देकर ईसाई और मुसलमान दोनों ही हमारे प्राचीन वैदिक हिन्दू धर्म पर कीचड़ उछालते हैं और मजाक भी बनाते हैं।कामख्या मंदिर में तो मां कामख्या की गुप्त अंगों योनि की पूजा और पश्य वध ,पशुपति मंदिर में पशु पालन के बजाय उलटे पशु बलि ,इन वाममार्गियों ने मध्य काल में प्रचलित की और ये शिवलिंग पूजन भी उसी समय से भारत देश में प्रचलित हुआ ।शिवलिंग पूजा का आरंभ दक्षिण भारत में प्रारंभ हुआ और शैव मत ने शिव पुराण बनाकर उसमे विभिन्न प्रकार के शंकर भगवान द्वारा किए गए चमत्कार दिखलाकर भोली भाली जनता को गुमराह किया और इस अश्लील शिवलिंग पूजन का प्रचार प्रसार किया ।अब तो हालत यह हो गई है कि कोई भी पढ़ा लिखा व्यक्ति यह देखने सुनने और समझ ने तक का यत्न नहीं करता है कि शिवलिंग पूजा का असली रूप क्या है?वास्तविक बात यह है कि कुछ पुराणों ने व उनके भक्तों ने प्रशंसा में शिव पुराण आदि ग्रंथों में कुछ ऐसे पुलंदे बांधे है की उनकी चका चौंध में किसी को असलियत जान ने की बात सुझती ही नहीं ।
बहुत कम लोग धर्म के विषय में सत्य असत्य का अन्वेषण( खोज )करते हैं ।बाजार में दो पैसे की हांडी खरीदते समय दस दुकानों पर देखते हैं कि कहीं फूटी तो नहीं हैं,किन्तु धर्म जिसका संबंध इस लोक में अभ्युत्थन एवं जीवन के अनंतर अन्य जन्म के सुख और अंत में मोक्ष व मुक्ति से होता है,उसके बारे में इतनी लापरवाही बरतते हैं।
भारत के मध्य युग काल से, जब महाभारत के युद्ध के बाद प्राचीन सत्य सनातन वैदिक धर्म नष्ट हो चुका था इस वाममर्गीय अर्थात दुष्ट मार्ग में चलने वाले सभ्यता के आदर्श योनि -लिंग पूजा को करते चले आ रहे हैं ।उदाहरण के लिए हमने ऊपर कामख्या मंदिर और भारत के प्राचीन अन्य बड़े बड़े मंदिरों का उल्लेख भी किया जहां ये अश्लील स्त्री की योनि और शिव के गुप्त लिंग की पूजा होती हैं। आर्य समाज को छोड़कर कितने लोगों ने पाखंड और अंधविश्वास के विरुद्ध आवाज उठायी है ?

पाखंड खंडनी पताका गाड़ी :-आर्य समाज ने पौराणिक पंडितों को चुनौती दी और उन्हें शास्त्रार्थ में पराजित कर हराया भी ।चौदह वर्ष की छोटी सी आयु में शिव मंदिर में शिव लिंग पर उछलते कूदते चूहे को देख कर ऋषि दयानन्द सरस्वती जी को शिवलिंग और पत्थर की मूर्ति पूजा से विश्वास उठ गया।छोटे से बालक दयानंद सरस्वती ने यह सोचा की जो शिव एक छोटे से जीव चूहे तक से अपनी रक्षा नहीं कर सकता ,वह उनके दुख कैसे दूर करेगा।क्या सृष्टि को बनाने वाले परम पिता शिव भगवान इतने असहाय और कमजोर है कि एक छोटे से जीव को अपने ऊपर से नहीं हटा सकते।उसी समय ऋषिदयानन्द सरस्वती ने* दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली कि जब तक वे सच्चे शिव की प्राप्ति नहीं कर लेते तब तक वे इसके प्रयास में निरंतर जुटे रहेंगे।ऋषि दयानंद ने सच्चे शिव की खोज की और सारे संसार के मजहब मत मतांतर और संप्रदायों के घनघोर घटा टोपों को नष्ट करके एक वैदिक परमात्मा के वास्तविक स्वरूप को संसार के सामने रख कर लोगों को सच्चे शिव परम पिता परमात्मा के बारे में बताया।

इस प्रकार ऋषि दयानन्द ने मानव मात्र का धर्म के विषय में मार्ग दर्शन किया ।वह महान व्यक्ति युग दृष्टा महर्षि दयानन्द सरस्वती जी थे जिन्होंने अद्वितीय विद्या बल ,योग बल एवम् अजेय तर्क बल के सहारे मत मतांतर संप्रदाय के अन्धकार को नष्ट करके अपने अमर ग्रंथ” सत्यार्थ प्रकाश” के द्वारा मनुष्यों को सत्य बात समझने की बुद्धि प्रदान की ।ऋषि दयानंद सरस्वती जी द्वारा स्थापित आर्य समाज धर्म के और सच्चे शिव परम पिता परमेश्वर के विषय में जनता को निरंतर मार्ग दर्शन करने में प्रयत्न शील है;परंतु कुछ वर्षों से आर्य समाज की वेदी से अंधविश्वास और पाखंड के खिलाफ आवाज उठनी लगभग बंद हो चुकी है।कुछ तो विधर्मियों के बढ़ते दबाव के कारण वश और कुछ आर्यों और हिन्दुओं के आलस्य और प्रमाद के कारण पूरे भारत में अंधविश्वास और पाखंड का बोल बाला बढ़ गया है।

सुझाव -:राष्ट्र के चरित्र को सुरक्षित रखने के लिए हमारी देवी देवताओं के अश्लील चित्र ,मंदिरों और अश्लील पुराणों को तुरंत जब्त कर लें।उन मंदिरों को फिर से पुनरुद्धार करके उनको वैदिक गुरुकुल में तब्दील कर दें ताकि गरीब और अनाथ बच्चों को उचित वैदिक धर्म की शिक्षा दीक्षा प्राप्त हो सके,हो सके तो इन अश्लील मंदिरों को तोड कर उन स्थानों पर गौशाला का निर्माण करवा जाए जिससे कि गौ संवर्धन का महान कार्य हो सके।

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