कर्नाटक में कांग्रेस की जीत और विपक्षी एकता का भविष्य

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योगेंद्र योगी

विपक्षी दलों के कर्ताधर्ताओं को इस बात का अंदाजा भी बखूबी है कि कांग्रेस को साथ लिए बगैर विपक्षी एकता का ख्वाब धरातल पर नहीं उतर सकता। विपक्षी दल कांग्रेस को साथ लेना तो चाहते हैं किन्तु सतर्कता बरतते हुए समान दूरी बनाए रख कर।

कर्नाटक के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारी शिकस्त देकर जोरदार झटका दे चुकी कांग्रेस से विपक्षी दल भी सतर्क हो गए हैं। विपक्षी दलों की एकता में कांग्रेस की कर्नाटक में हुई प्रचंड जीत बाधा बन गई है। पहले हिमाचल प्रदेश और उसके बाद कर्नाटक में सत्ता में वापसी से कांग्रेस जिस तरह से नए सिरे से उठ खड़ी हुई है, उससे न सिर्फ भाजपा भौंचक्की है बल्कि विपक्षी एकता की कवायद करने वाले गैर भाजपा दलों मे खलबली मची हुई है। कांग्रेस की जीत का यह सिलसिला इस बात के संकेत भी हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस कोई बड़ा कारनामा करने की फिराक में है। यही वजह है कि कुछ दिनों पहले तक कांग्रेस को साथ लेने की कवायद करने वाले क्षेत्रीय दलों के नेताओं को अब अपने राज्यों में कांग्रेस से ही खतरा मंडराता हुआ नजर आ रहा है।

विपक्षी दलों को दरअसल दोहरा डर सता रहा है। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तौर पर भाजपा पहले से ही मौजूद है किन्तु भाजपा विरोधी के तौर पर कांग्रेस दूसरा बड़ा खतरा बन गई है। भाजपा चूंकि सभी विपक्षी दलों की खुले तौर पर एक नम्बर की प्रतिद्वन्द्वी है, इसलिए उसके नुकसान-फायदों और ताकत का अंदाजा सभी को है, किन्तु कांग्रेस ने लंबे समय बाद सत्ता में जिस तरह जोरदार वापसी की है, उससे क्षेत्रीय दलों के समक्ष नई परेशानी खड़ी हो गई है।

विपक्षी दलों के कर्ताधर्ताओं को इस बात का अंदाजा भी बखूबी है कि कांग्रेस को साथ लिए बगैर विपक्षी एकता का ख्वाब धरातल पर नहीं उतर सकता। विपक्षी दल कांग्रेस को साथ लेना तो चाहते हैं किन्तु सतर्कता बरतते हुए समान दूरी बनाए रख कर। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सुर बदल गए। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के विपक्षी एकता के लिए किए जा रहे प्रयासों की पुनर्समीक्षा करनी पड़ी है। ममता बनर्जी कांग्रेस को विपक्षी एकता में शामिल करने को बेशक राजी हो गई हों किन्तु उससे समान दूरी बनाए रखने पर भी जोर दे रही हैं। ममता ने जो फार्मूला दिया है उसके तहत उन्होंने कहा कि वे कांग्रेस का समर्थन करने के लिए तैयार हैं, बशर्ते वे पश्चिम बंगाल उनका समर्थन करें। उन्होंने कहा, ‘जहां भी कांग्रेस अपनी-अपनी सीटों पर मजबूत है, वह वहीं चुनाव लड़े। हम उनका समर्थन करेंगे, लेकिन उन्हें दूसरे राज्यों में प्रभावी क्षेत्रीय दलों का भी समर्थन करना होगा।

ममता बनर्जी का बयान यह साफ इशारा करता है कि कांग्रेस उन राज्यों में सीटों के लिए ज्यादा न सोचें, जहां क्षेत्रीय दल मजबूत हैं। ममता बनर्जी इसके जरिए बिहार में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव, झारखंड में हेमंत सोरेन, पंजाब में अरविंद केजरीवाल, ओडिशा में नवीन पटनायक, तमिलनाडु में एमके स्टालिन और तेलंगाना में के. चंद्रशेखर राव को ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। ममता का प्रयास है कि सब मिल कर कांग्रेस पर इस तरह का दवाब बनाएं ताकि उनकी सत्ता पर आंच ना आए। दरअसल ममता बनर्जी चाहती हैं कि कांग्रेस लोकसभा की 543 में से सिर्फ़ 200 सीटों के आसपास ही चुनाव लड़े और बाकी सीटों पर अलग-अलग राज्यों में जो भी क्षेत्रीय दल मजबूत स्थिति में हैं, कांग्रेस उनको समर्थन दे।

विपक्षी दलों की इस कवायद से कांग्रेस ऐसा करके सत्ता के अपने रास्ते कभी भी बंद नहीं करना चाहेगी। गौरतलब है कि विपक्षी एकता की कवायद की शुरुआत में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में शामिल करने से साफ इंकार कर दिया था। कर्नाटक की जीत के बाद अखिलेश यादव के सुर भी बदल गए। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता पर पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के दिए बयान का समर्थन किया है। अखिलेश ने कहा है कि जो मजबूत हो उसे आगे कर चुनाव लड़ा जाए। बिहार में नीतीश कुमार और तेलंगाना में केसीआर सहित सभी दल यही चाहते हैं।

आश्चर्य की बात यह है कि ममता बनर्जी हों या अखिलेश यादव सहित दूसरे विपक्षी नेता, कांग्रेस को सशर्त विपक्षी एकता में शामिल करने की दलील तो रहे हैं किन्तु कांग्रेस क्या चाहती है, यह किसी ने जानने का प्रयास नहीं किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने ममता बनर्जी के फॉर्मूले को सिरे से खारिज कर दिया। इससे साफ जाहिर है कि कर्नाटक चुनाव के बाद जीत के रथ पर सवार कांग्रेस नहीं चाहती उसे क्षेत्रीय दलों से सीटों के तालमेल के घाटा का सौदा करने पड़े। क्षेत्रीय दल जिस तरह से कांग्रेस के समक्ष शर्तें रख रहे हैं, उस लिहाज से कांग्रेस के केंद्र में सरकार बनाने का लक्ष्य ही विफल हो जाएगा। क्षेत्रीय दलों का प्रयास है कि उनके राजनीतिक आधार वाले राज्यों में भाजपा की तरह कांग्रेस भी उनसे दूर रहे, पर कांग्रेस अपने वोट बैंक का समर्थन उनके पक्ष में करे।

यह निश्चित है कि कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों की शर्तें किसी भी सूरत में मंजूर नहीं होंगी। कांग्रेस ऐसा करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगी। कांग्रेस का राजनीतिक नेटवर्क पूरे देश में हैं। ऐसे में जिन राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सत्ता है, उनमें भी सीटों पर बंटवारा किए जाने पर ही कांग्रेस का विपक्षी दलों से गठबंधन संभव है। जबकि विपक्षी दल चाहते हैं कि जिन राज्यों में उनका संगठन नाममात्र का है और कांग्रेस वहां प्रभावी भूमिका में है, कांग्रेस सिर्फ वहीं तक सीमित रहे। यदि विपक्षी दलों की यह दलील कांग्रेस को स्वीकार होती तो कर्नाटक में भी देवगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर से समझौता करती, क्योंकि कांग्रेस ने करीब दो दशक बाद सत्ता में वापसी की है। इसलिए कांग्रेस विपक्षी दलों की एकता के लिए अपनी कुर्बानी किसी भी हालत में नहीं देगी। यह भी निश्चित है कि क्षेत्रीय दलों के प्रभाव वाले राज्यों में कांग्रेस के प्रत्याशी खड़े होने से वोटों का बंटवारा होगा, इससे कहीं न कहीं फायदा भाजपा को मिल सकता है। ऐसे में वोटों के ध्रुवीकरण के कारण समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों की सत्ता की वापसी की उम्मीदों पर पानी फिरना तय है। मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य से यह भी स्पष्ट है कि क्षेत्रीय दल कितना ही प्रयास कर लें, कांग्रेस को साथ लिए बगैर भाजपा को हराने के उनके मंसूबे आसानी से पूरे नहीं होंगे।

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