पानी की कमी से जूझते रेगिस्तान के गांव

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मीना कुमारी/ईना मीणा
उदयपुर, राजस्थान

गांव गांव में नल के माध्यम से जल पहुंचाने की योजना लगातार परवान चढ़ रही है. देश के कई ऐसे राज्य हैं जहां इस योजना ने अपने लक्ष्य को समय रहते प्राप्त किया है. इस योजना ने गांव में पानी की समस्या को दूर कर दिया है. जिन राज्यों में यह योजना लगातार परवान चढ़ रही है उनमें राजस्थान भी एक है. ख़ास बात यह है कि पिछले साल तक अपने लक्ष्य से काफी दूर रहने वाले इस राज्य ने इस मुद्दे में तेज़ी से प्रगति की है और अब यह सबसे अधिक कनेक्शन जोड़ने वाला देश का दूसरा राज्य बन गया है. इस वर्ष मार्च में राजस्थान में एक माह में तीन लाख 75 हज़ार 65 परिवारों को जल जीवन मिशन के तहत कनेक्शन प्रदान किये गए हैं. राज्य के 7 ज़िलों ने पचास फीसद से अधिक जल कनेक्शन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है. हालांकि अभी भी राजस्थान के कई ऐसे ज़िलों के ग्रामीण क्षेत्र हैं जहां लोगों को पानी की किल्लत से जूझना पड़ रहा है.

राजस्थान में सबसे ज्यादा पानी की कमी पाई जाती है. लोगों को पीने का पानी भी बहुत मुश्किल से नसीब होता है. गर्मी के मौसम में इंसानों के लिए तो मुसीबत है ही, पशु भी इस मुसीबत से जूझते रहते हैं. उन्हें भी मुश्किल से पानी नसीब हो पाता है. कई बार तो पानी की कमी के कारण उनकी मौत भी हो जाती है. पानी की कमी के कारण ही इस राज्य में अन्य राज्यों की तुलना में कम फसल उगती है. कई बार किसानों को अपनी लागत तक नहीं मिल पाती है. जो किसान खेती में अपना पैसा लगाते हैं, वह भी पूरा नहीं हो पाता है. इसका एक उदाहरण राजस्थान के उदयपुर से 75 किलोमीटर दूर सलूंबर ब्लॉक स्थित मालपुर गांव है. यह ब्लॉक से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. यह गांव पहाड़ी क्षेत्र जैसा दिखता है, इसमें बहुत घने पेड़ पौधे हैं.

लेकिन गांव के लोग पानी की समस्या से बहुत परेशान हैं. गांव के किसान वानीथा का कहना है कि मै पिछले 65 सैलून से खेती कर रहा हूं. लेकिन पानी की कमी के कारण अच्छी तरह से खेती नहीं हो पाती है और न ही किसी जानवर को रख पाते हैं. वह कहते हैं कि गांव में रोजगार का कोई पर्याप्त साधन भी नहीं है. इसलिए इस गांव के बहुत से परिवार गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं. वह बताते हैं कि वर्ष 2003 में गांव में पानी की किल्लत को दूर करने के लिए तालाब का निर्माण किया गया है. जिसमें हम बारिश के मौसम में पानी इकट्ठा करते हैं. फिर उसी पानी को अन्य महीनों में पशुओं को पानी पिलाने में उपयोग में लाया जाता है. लेकिन इंसानों के लिए पीने के पानी की समस्या अभी भी बनी हुई है. गांव में एक ही हैंडपंप है जिस पर बहुत ज्यादा भीड़ हुआ करती है. अगर व्यक्ति सुबह उठकर पानी लेने जाता है तो उसे दोपहर हो जाती है, तब जाकर उसे पानी नसीब होता है. आज भी हालात कुछ ऐसे ही बने हुए हैं.

पानी की कमी झेलती गांव की एक महिला कमली देवी कहती हैं कि यहां हैंडपंप गांव से 400 मीटर की दूरी पर बना है और हम सब को वहीं से पानी लाना पड़ता है. हमें घर के काम के लिए इतनी दूर से पानी लाना पड़ता है. जिससे हमारा न केवल समय बर्बाद होता है बल्कि शारीरिक रूप से भी नुकसान उठाना पड़ता है. जिससे गांव की महिलाएं बहुत परेशान हैं. चाहे बर्तन धोने हों, या कपड़े धोने हों, या फिर घर के अन्य काम के लिए पानी की आवश्यकता हो, इन सब के लिए वही एकमात्र हैंडपंप पर पूरा गांव निर्भर है. गांव की एक अन्य महिला गीता देवी का कहना है कि पानी के इंतज़ाम करना महिलाओं के लिए सबसे अधिक कष्टकारी है क्योंकि इससे न केवल शरीर पर प्रभाव पड़ता है बल्कि कई बार छेड़छाड़ का शिकार भी होना पड़ता है. वह कहती हैं कि जब हम पानी लेने जाते हैं तो कुछ लोग हमारे लिए गलत शब्दों का भी प्रयोग करते हैं.

पानी की किल्लत में सबसे अधिक गर्भवती महिलाओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. उन्हें इसी हालत में इतनी दूर से पानी लाना मज़बूरी है. यदि किसी घर में कोई गर्भवती महिला एकल परिवार में रहती है तो उसके लिए पानी लाना दोगुनी मुसीबत हो जाती है. कभी कोई अन्य महिला पानी लाने में उसकी मदद कर देती है, लेकिन यह ज़्यादा दिन संभव नहीं हो पाता है. यदि गांव में घर घर नल लग जाए तो महिलाओं की कठिनाइयां दूर हो सकती हैं. एक अन्य महिला फन्ता देवी कहती हैं कि हम महिलाओं को पानी भरने के लिए सुबह 5 बजे उठना पड़ता है. यदि देर से हैंडपंप पर पहुंचे तो पानी के लिए घंटों इंतज़ार करनी पड़ जाती है. सिर्फ पानी भरना ही मुसीबत नहीं है, बल्कि उसे भरकर लाना भी कुछ महिलाओं के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं है. हम जैसी कुछ महिलाओं का घर पहाड़ियों पर है, ऐसे में हमें पानी लेकर ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना बहुत बड़ी मुसीबत है कई बार तो गिरने का खतरा बना रहता है. जिस दिन घर में नल के माध्यम से पानी आने लगेगा हम महिलाओं की मुसीबत कम हो जाएगी. हमें शारीरिक और मानसिक रूप से लाभ मिलेगा.

जल जीवन मिशन से पहले राजस्थान में लोगों को पानी के संकट से बचाने के लिए इंदिरा गांधी नहर बनाई गई थी. जिसे राजस्थान नहर के नाम से भी जाना जाता है. इस नहर को बनाने का सुझाव सर्वप्रथम 1948 में बीकानेर के तत्कालीन सिंचाई इंजीनियर कंवरसेन ने दिया था. इस परियोजना को केंद्र सरकार की स्वीकृति मिलने के पश्चात 1952 में सतलुज व व्यास के संगम पर हरिके बैराज नामक बांध का काम शुरू हुआ था. इस बांध से इंदिरा गांधी नहर को जोड़ा गया था. इस नहर की कुल लम्बाई 649 किलोमीटर है जिसमें से 169 किमी पंजाब में 14 किमी हरियाणा में तथा शेष राजस्थान में है.

यह पश्चिमी राजस्थान की एक महत्वपूर्ण परियोजना है. इसे क्रियान्वित करने का मुख्य उद्देश्य थार के मरुस्थल में पेयजल की आपूर्ति, व्यर्थ भूमि के उपयोग तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर आबादी बसाना था. यह एशिया की सबसे बड़ी मानव निर्मित नहर है. वर्तमान में इस परियोजना को बाड़मेर के गडरा रोड़ तक बढ़ा दिया है. इस नहर ने राजस्थान के कुछ इलाके में पानी की किल्लत को दूर कर दिया है, लेकिन जहां यह नहीं पहुंची वहां आज भी लोग पानी की कमी से जूझ रहे हैं. ऐसे जल जीवन मिशन यक़ीनन मालपुरा और इसके जैसे अन्य गांवों के लिए वरदान साबित होगा. (चरखा फीचर)

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